भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २४ ]

कस्मैचिदावक्षीत, न चोल्कापातोत्प्रातेन्द्रधनषि । नार्गिन- मुखेनोपधमेत् । तापो भूमिं वा पाणिपादेनाभिहन्त्यात् ॥

आग, गौ, गुरु, ब्राह्मण, प्रेखा (दोला), दम्पती (पति- पत्नी) — इनके बीच में से न गुरजे । मुदे के पीछे अनुगमन न करे । देवता, गौ, ब्राह्मण, चैत्य, ध्वजा, रोगी, पतित और पाप करनेवाली छाया को न लोवे । छिपते हुए या उगते हुए सूर्य को न देखे । बछड़े को दूध पिलाती, या स्वयं पीती हुई अथवा दूसरे के अन्न को खाती हुई गाय की चर्चा किसीसे न करे । उल्कापात (आकाश से अग्नि का गिरना) उत्प्रात, इन्द्र धनुष को न देखे । मुख से अग्नि में फूंक न मारे । पानी या भूमि में पैर से चोट न करे ।

वक्तव्य—उत्प्रात-दिव्य-भौम और आन्तरिक्ष भेद से तीन प्रकार के हैं । दिव्य उत्प्रात प्रतिमा-रोदन, गन्धर्व नगर दर्शन आदि । भौम-भूकम्प आदि । आन्तरिक्ष-तारापतन, रविपरिवेष्ट आदि । गन्धर्वनगर का नाम चरक, सत्यार्थप्रकाश एवं दर्शन में भी आता है ॥६२॥

न वेगान् धारयेद् वातमूत्रपुरीषादीनाम् । न बहि- र्बंगान् प्रामनगरदेवतायतनरुमशानचतुष्यसलिल्लाशयप- थिसन्निष्कृष्टानुत्सृजेन्न प्रकाशं न वायुवग्निसलिलसोमाकर्गो- गुरुप्रतिमुखम् ॥६३॥

वायु, मूत्र और मल आदि के उपस्थित वेगों को न रोके । मल-मूत्र आदि बाह्य वेगों को ग्राम, नगर, मन्दिर, रुमशान, चौराहा, पानी के तालाब, रास्ता इनके पास न त्यागे । खुले मैदान में (दिवर्वादे) न त्याग करे । वायु, अग्नि, जल, चन्द्रमा, सूर्य, गौ, गुरु की ओर मुख करके मल मूत्र न त्यागे ॥

न भूमिं विलिखेत, नासंयुतमुखः सदसि जृम्भोहार- कासश्वासश्चवृत्तुत्सृजेत्, न पर्यङ्क्रिकावष्टम्भादमसार- णानि गुरुसन्निधौ कुर्यात् ॥६४॥

भूमि को न कुदे । मुख को बिना ढाँपे सभा में जम्भाई, दुकार, कास, श्वास, छींक न करे । गुरु के पास में कुरीं पर सहारा लगाकर, या पैर को फैलाकर न बैठे ॥६४॥

न बालकर्णनासास्त्रोतदोशनाक्षिविराण्यभिकुष्णीयात् न वीजयेत् केशमुखनखवस्त्रगात्राणि, न गात्रनखव- क्त्रवादित्त्र कुर्यात्, न काष्ठलोष्ट्रुणादीनभिहन्त्याच्छिन्ध्या- च्छिन्ध्याद्वा ॥६५॥

बाल, कान, नासा-स्त्रोत, आँख, दाँत इनके विवरों को न कुदे (इनमें अंगुली न डालें) । केश, मुख, नख, वस्त्र या शरीर को न कम्पाये । शरीर, नख, मुख इनसे बाजे का काम न करे, काष्ठ, लोह, तिनके आदि पर चोट न करे, न इनको तोड़े और न इनके टुकड़े करे ॥६५॥

न प्रतिवातातपं सेवेत्, न सुक्रमान्नोऽग्निमुपासीत्, नोत्कटकाल्यकाष्टासनमध्यासीत्, न प्रीवां विषमं धारयेत् न विषमकायः क्रियां भजेत् मुखीत वा, न प्रततमीक्षेत् विशेषाज्ज्योतिर्भारस्करसूक्ष्मचलभ्रान्तानि, न भारं शिरसा वहेत्, न स्वप्नजागरणशयनानसन्स्थानचङ्क्रमणयानवाह- नप्रधावनलङ्घनप्लवनप्रतरणहास्यभाष्यव्यवायव्यायामादी- नुचितानप्यतिसेवेत् ॥६६॥

सामने की वायु या धूप का सेवन न करे । खाते ही अग्नि को न सेके । बहुत ऊँचे (विषम), छोटे, लकड़ी के आसन पर न बैठे । गर्दन को टेढ़ा न रखे । शरीर को टेढ़ा करके (झुकाकर) कार्य न करे । और न भोजन करे । बल लगाकर या निरन्तर न देखे । विशेषतः ज्योतिः सूर्य, सूक्ष्म, अस्थिर, भ्रान्त रूपों को निरन्तर न देखे । शिर पर बोझ न उठाये । नींद, जागना, लेटना, बैठना, खड़े रहना, घूमना, घोड़े आदि की सवारी, रथ आदि की सवारी, दौड़ना, कूदना, लावना, तैरना, हास्य, बोलना, मैथुन, व्यायाम आदि उचित कार्यों को भी अधिक मात्रा में सेवन न करे ।

वक्तव्य—“पृष्ठतः सेवेदकं, जठरेण हुताशनम्” ॥६६॥ उचितदाप्यहितात् क्रमशो विरमेत्, हितमनुचितम- प्यासेवेत् क्रमशः, चैकान्ततः पादहीनात् ॥६७॥

उचित भी (अभ्यास किये-जिसकी आदत पड़ी हुई है) परन्तु हानिकारक आहार विहार से क्रमशः—धीरे-धीरे अलग हो जाये । हितकारी परन्तु अनुचित (अनभ्यस्त-जिसकी आदत नहीं) आहार विहार का क्रमशः सेवन करे । चतुर्थांश या षोडशांश रूप के बिना सम्पूर्ण रूप से आहार विहार का सेवन या त्याग न करे ।

वक्तव्य—अभ्यस्त वस्तु का चतुर्थांश या षोडशांश छोड़ते हुए इसमें अनभ्यस्त वस्तु का उतना ही चतुर्थांश या षोडशांश मिलता जाये । इस प्रकार बरते हुए सम्पूर्ण वस्तु त्याग करके सम्पूर्ण अनभ्यस्त वस्तु का ग्रहण करे । “अचितादहिताद्भिमात् क्रमशो विरमेन्नरः । हितं क्रमेण सेवेत् क्रमश्चात्रोपदिश्यते ॥ प्रक्षोपापचये ताम्भ्यां क्रमः पादांशिको भवेत् । एकान्तरं तत्- श्रोध्वं द्रव्यन्तरं व्यन्तरं तथा ॥” चरक० सू० अ० ७।३६-३७॥

नावाकगिराः शयीत, न भिन्नपात्रे मुखीत, नविना पात्रेण, नाञ्जलिपुदेनापः पिबेत्, काले हितमितस्निग्धम- धुरप्रायमाहारं वैद्यप्रत्यवेक्षितमरुनीयात्, प्रामगणगणिका- पणिकशत्रुसत्रशठपतितभोजनानि परिहरेत्, शेषाण्यपि चानिष्टरूपरसगन्धस्पर्शशब्दमानसानि, अन्यान्येवंगुणा- न्यपि संभूय दत्तानि, (तान्यपि) मक्षिकाबालोपहतानि, नाप्रक्षालितपाणिपादो मुखजीत, न मूत्रोच्चारपीडितः, न

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