भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० २४ ]

चिकित्सास्थानम्

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सुखदायक शय्या (चौड़ी-लम्बी, तथा गहरे एवं तकियों से युक्त) पर सोना, श्रम और वायुनाशक, तथा वृष्य है, पुष्टि, निद्रा एवं धृति को देनेवाला है। इससे विपरीत शय्या दुःखदायी और विपरीत गुण करती है। बालों की चंवर से हवा करना ओज के लिये उत्तम, मक्खी-मच्छर आदि को हटानेवाला है। पंखे की वायु-शोध, दाह, श्रम, स्वेद और मूच्छा नाशक है ॥८१, ८२॥

प्रीतिनिद्राकरं वृष्यं कफवातश्रमापहम् ।

संवाहनं मांसरक्तत्वकप्रसादकरं सुखम् ॥८३॥

संवाहन (चापी करना)—प्रीति, निद्रा को देनेवाला, वृष्य है। कफ, वात एवं श्रम का नाशक, मांस, रक्त और त्वचा को निर्मल करनेवाला तथा सुखदायक है। (संवाहन—हस्ताभ्यां शनैः शनैराहनम्) ॥८३॥

प्रवातं रौदयैवैष्यंस्तम्भकृदाहपत्किनुत् ।

स्वेदमूच्छांपिपासाहनमप्रवातमतोऽन्यथा ॥८४॥

सुखं वातं प्रसेवेत श्रीभ्रमं शरदि मानवः ।

निवातं ह्यायुषे सेव्यमारोग्याय च सर्वदा ॥८५॥

आतपः पित्तवृणाग्निस्वेदमूच्छांप्रमासकृत ।

दाहवैष्यंकारो च छाया चैतानपोहति ॥८६॥

अग्निर्वातकफस्तम्भशीतवैषयुनाशनः ।

आमाभिष्यन्दजरणो रक्तपित्तप्रदूषणः ॥८७॥

पुष्टिवर्णबलोत्साहमग्निदीप्तितन्द्रिताम् ।

करोति धातुसाम्यं च निद्रा काले निषेविता ॥८८॥

सामने के ओर की वायु—रूक्षता, विवर्णता, स्तम्भ करनेवाली, दाह एवं पाक को नष्ट करती है। पसीना, मूच्छा और प्यास को दूर करती है। जो वायु सामने से झोंक में नहीं आती वह इससे विपरीत गुण करती है। श्रीभ्रम और शरदः श्रुत में मनुष्य सुख से (जितना सहन हो सके) वायु का सेवन करे। निवात (झोंके की सामने की वायु से बचकर) का सदा सेवन करना आरोग्य एवं आयु को देता है। धूप का सेवन-पित्त, वृष्णा, अग्नि, स्वेद, मूच्छा श्रम, और रक्त को करता है। दाह और विवर्णता को उत्पन्न करता है। छाया—धूप के विकारों को दूर करती है। आग का तापना-वायु, कफ, स्तम्भ, शीत और कम्पन को नष्ट करता है। आम एवं अभिष्यन्द की जीर्ण करता है, रक्तपित्त को दूषित करता है। समय पर सेवन की हुई निद्रा-पुष्टि, बल, वर्ण, उत्साह, अग्नि की दीप्ति, अतन्द्रिता (जागरण) एवं धातुओं की समता को करती है ॥८९-८८॥

तत्रादित एव नीचनखरोष्णा शुचिना शुक्लवाससा लघुष्णोषच्छत्रोपातकेन दण्डपाणिना काले हितमितमधुरपूर्वोभिभाषिणा बन्धुभूतेन भूतानां गुरुवृद्धानुमतेन सुसहायेनानन्यमनसा खलूपचरितव्यं, तदपि न रात्रौ, न केशस्थिकण्टकारमनुषमरमोत्करकपालाङ्कारमेध्यस्तानबलिभूमिषु, न विषमेन्द्रकीलचतुष्पथश्रवणासुपरिष्टात् ॥

बचपन से ही नख और रोम कटवाकर, पवित्र, श्वेत, निर्मलवस्त्र धारण करनेवाला, लघु-हल्की पगड़ीवाला, छाता एवं जूता धारण करने का आदी, हाथ में दण्ड (सोटी) रखनेवाला, समय पर हितकारी, थोड़ा एवं मधुर बोले। मिलने पर प्रथम कुशल संगल पूछे। प्राणियों में बन्धुभाव (मैत्री भाव) रखते हुये, गुरु एवं वृद्ध पुरुषों से आशा प्राप्त करके, उत्तम अच्छे सहायक के साथ, एकाग्रमन से चलना चाहिये। इतना होने पर भी रात्रि में बाहर नहीं जाये। केश, अस्थि, काँटे, पत्थर, तुष, राख, कूड़े का ढेर, कपाल (ठीकरे), अंगार अपवित्रस्थान (बध्य भूमि आदि), स्नान एवं बलिभूमि पर से नहीं जाना चाहिये। विषमस्थान, यज्ञ के लिये गाड़े हुए यूप, चौराहे गड्डे के ऊपर से नहीं जाना चाहिये ॥८९॥

न राजद्विष्टपुरुषपैशुन्यानुतानिबदेत्, न देवब्राह्मणपितुरिवादाश्च; न नरेन्द्रो द्विष्टोन्मत्तपतितुल्लुन्नीचानुपासीत। राजा के विरोधी, कठोर, छलवाले, भूट बचन न बोले। देवता, ब्राह्मण, पितर की निन्दा न करे। राजा जिनसे द्वेष करता है, उनकी, उन्मत्त, पति (स्वकीय धर्म से अग्र) तुल्लु (लघु) नीच (स्लेच्छ आदि) की सेवा न करे ॥९०॥

वृक्षपर्वतप्रपातविषमवल्मीकदुष्टवाजिकुञ्जराधिरोहणानि परिहरेत्, पूर्णनदीसमुद्राद्वित्तपल्लवश्वभ्रुकपावतरणानि, भिन्नशून्यगारुमशानविजनारण्यवासामिन्मन्मथालमुजङ्ककौटसेवाश्च, प्रामाधातकलहशस्त्रसन्निपातन्यालसरीस्त्वपशुक्रिसन्निक्पाश्च ॥९१॥

वृक्ष, पर्वत प्रपात (झरना), विषम, वल्मीक, दुष्ट घोड़े, दुष्ट हाथी आदि पर न चढ़े। भरी हुई नदी, समुद्र, न जाने हुए सरोवर, कुआँ, गड्ढे में न उतरे। टूटे अथवा खाली पड़े घर में, रमशान में, मनुष्यों से रहित; जंगल में रहना न करे। अग्नि संप्रम (आग का लगना), हिंसक पशु, साँप, कौट (बिच्छू आदि) के पास न जाये। प्रामाधात (महामारी या मारक रोग जहाँ फैला हो) कलह (झगड़ा जहाँ चल रहा हो), शस्त्र सन्निपात (युद्ध), हिंसकपशु, साँप (अजगर) गाय बैल आदि के पास न जाये।

वि० मन्तव्य—प्रपात-जिस पर से बहुत नीचे गिरता है यथा ऊँची दीवार, नदी द्वारा कटी भूमि का तट-टांग। उपासीत—पास बैठना, रहना, साथ २ कार्य करना, मिलना जुलना, व्यवहार करना। अग्निसम्प्रम-ज्वालामुखी का गहर, जहाँ ज्वाला फूटी हो ॥९१॥

नार्निनगोसुरब्राह्मणप्रेह्लादमृत्यन्तरेण यायात्। न श्रवमनुयायात्। देवब्राह्मणचैत्यश्वजरोगपित्तपापकारिणां च ज्ञायां नाक्रमेत। नास्तं गच्छन्तमुद्यन्तं वाऽद्वित्यं वीक्षेत। गां धापयन्तीं धयन्तीं परसस्यं वा चरन्तीं न