भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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शटरे सुश्रतखहिता | [ अ° २४ | मुखाल्पाद्‌ दद॑ चज्ञः पीनगण्डं तथाननम्‌ ।&५॥ जूते का पहनना-पैर के रोगो र न्ट करनेवाला, ष्य, अव्यङ्गपिडक कान्तं भवत्यम्बुजस्निभम्‌ । . रक्षोध्न, प्रीतिव्‌धक्‌, चलने मे सुख चानेवाला ओर ओज.

एक विशेष लकड़ी को धिस कर लगाती है) चज्ञु मजवूत स आयु 1 ओर अल) को हानि परहवाता ह, गण्डस्थल ओर सुल मोटा (भरा इमा) होता दै । खख पर | ६ । केश नख आर्‌ रोम को करवाना-अलददमी को नष्ट करता व्यंग (क्षा) एवं पिडका नहीं होती, सख सन्दर तथा कमल || है । दध, लधुता; सोमाग्ध, ओर उत्साह को बद़ाता है। कवच के खमान होता ॥६५॥। का घारण करना (अंगरखी का पहनना) शुद्धि, तेज, वणे ओर

पमं विशदं कान्तममटोञ्ञ्वरख्मण्डलम्‌ ॥६६॥ बल को वद़ाता हे | (चंक्रमणम्‌-रहल्ना-घूमना) ।७१-७५॥ नेवमञ्जनसंयोगाद्‌ भवेच्चामङतारकम्‌। पवित्र केर्यमुष्णीषं वातातपरजोपहम्‌ ॥ यस्यं स्वग्येमायुष्यं धनधान्यविवधंनम्‌ ॥&अं शिर पर पगङो, आदि पहना पवित्र, बालो के लिये उत्तम देवतातिथिविग्राणां पूजनं गोत्नरवधेनम्‌ । है, वायुः भूर ओर्‌ भूप को नष करता दै ।

आंखों मे काजल ठ्गाना (स्याही क्गाना) पलकों के बां वषानिलरजोधमहिमादीनां निवा रणम्‌ ॥५९॥ उञ्ञ € 9 = 9 को घना एवं मलरदिंत (गीद रहित); सुन्दर उञ्जञ्वक बाह्य वण्य चच्चुष्यमोजस्यं शंकरं छत्रधारणम्‌ | चक्ुवाढा बनाता हे । पुतली निमल रहती है । देवता-अतियि- छाते का धारण करना--व॒पां, वायु, धू, बफं (ओष) बाह्ञण का सत्कार करना यश देनेवाला, स्वगं के < व्य उत्तम, | आदि को दूर करता है ! व्ण, ओज एवं आलो ॐ ल्मि आयुवघक, धन-धान्य को बद़नेवाढा तथा गोत्रवघक (पुत्र हितकारी, तथा सुखकारक है ॥७१५॥ देनेवाला) है | ६) चुन: सरोख्पव्याख्विषाणिभ्यो भयापहम्‌ ॥७६॥

जः मुर

नः स ० | भ्रमस्वरनदोषष्नं स्थविरे च प्रशस्यते । आयुस्तजःससुर्साहस्सः ४ द मोः के ९ र ५ देह को टिकाने सत्त्वोत्साहबरस्थेयधयेवीयेविव धनम्‌ ॥७७॥ आहार पुष्टिदायक, तुरन्त वर कारक, देह टकानं- अवटम्भकरं चापि | वाखा, न ति की 1 स्मकर चापि भयघ्नं दण्डधारणम्‌ । क आयु, तेज (कान्ति), उत्ाह, स्मृति, अ व पथ | हाथ म दण्डे का धारण करना--कुत्ता, साप, हिंसक पञ्च ०3 दमा 4 व यागायबेकके मय्‌ से बचातादै। थकान एवं किसने कै ह दोष से रक्षा करनेवाला, बुद़ापे में सारा है । सत्त्व, उत्साह = स (बर), ओज, स्थिरता, धेय, शक्ति को बरद़ातादहै। सहा

हे । आंखों धरो का को घोनायरो ओ भेछरोग एवं भरम को दूर फरता देनेवाला ओर मयनाशक द ॥७६.७७॥ निमंल बनाता है, इष्य, रक्षोष्न तथा प्रीति- स = वघक रै ॥६६॥ | आस्या बणकफस्थांल्यसोकुमायंकरी सुखा ॥५६॥ नौ

निद्राकरो देहसखश्च्चष्यः श्रमसुधियुत्‌ ॥७०॥ वेठना (आराम करना) --वण, कफ, स्थूलता, सुङ्म पादत्वङ्मृदुकारी च पादाभ्यङ्गः सदा हितः । एत्र सुल को देता है ॥७८॥

वैर पर तेक मलना (पैर के तल्लुओं पर ते धिसना)- अध्वा वणकफस्थौल्यसोङकमायंविना्नः। व निद्रा को लानेवाका, शरीर को सख देनेवाला, ओखों क ण्य | अत्यभ्वा विपरीतोऽस्माञ्जरादौ वंल्यक्ृच्च सः ॥७९॥

यत्तु चङ्क्रमणं नातिदेहपीडाकरं भवेत्‌ । उत्तम, श्रम ओर पाव केस्वाप कोनष्टकरताहै। पैर की त्वचा को कोमल वनाता है । ६ तदायुबेखमेधाग्निप्रदमिन्द्रियबोधनम्‌ ॥८०॥ वक्तव्य-- यह प्रथा पुरानी दे-यथा-“उपानयुगलनिष्ि- सतेरचिकणाभ्यां पादाम्यां मुसाफरी- वण, कफ, स्थूलता, सुकुमारता को न्ट च उच्चान उपविष्टा तिष्ठति | | ई । अतिशय सुया वरण क आदि को बहत अधिक मत्रा मृच्छकटिका-अंक ४ ||७०॥ . | मं नष्ट करती है, तथा बुद़ापा एवं दुबकता ठाती है।. नितन . -पादरोगहरं वृष्यं रक्षो प्रीतिवधेनम्‌ ॥७१॥ चलने मे शरीर मेँ बहुत अधिक कष्ट न हो, उतना चना | ध स सदा पादच्रधारणम्‌ । आयु, बल, मेषा, अग्नि को बद़ाता दै जर इन्द्रियो को उच चज्लषोरुपघातङ्चत्‌ ॥७२॥ .. बनाता हे ॥७६.८०॥ ^. मखपानद्भ्यां सदा चङ्कछमणं वरृणाम्‌ 1. | श्र र वध्यं य | स पाप्मोपहामनं ना ॥७३॥ = 1 ॥८९॥ वार्ब्यजनमौजस्यं मश्चिकादीनपोहति । ववस।भाव्यकरमुत्साह बधनम्‌ । < (9 काणवार्‌ शजावणेतेजोबर्विवधेनम्‌ ॥७४॥ शोषदादश्रमस्ेदमूच्छौष्नो न्यजनानिकः ॥८२॥