भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० २४ ] ६१

चिकित्सास्थानम्

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करते समय जब श्वास फूलने लगता है, तब समझ लेना चाहिये कि आधा बल लग चुका है, इस समय व्यायाम से विरत हो जाना चाहिये। कुछ दिन व्यायाम करते २ पसीना आने लगे तब समझ लेना चाहिये कि आधा बल चुक गया है ॥३८-५०॥

उद्गतं वातहर् कफमेदोविलापनम् ॥५१॥

स्थिरीकरणमङ्गानां त्वकप्रसादकं परम् ।

उद्वर्त्तन (उबटन लगाना) — वातनाशक, कफ और मेद को विलयन करनेवाला है, अंगों को स्थिर करता है। त्वचा को अतिशय निर्मल करता है। (विष्ठापनम्-द्रवीकरणम्) ॥५१॥

सिरामुखबिविक्तत्वं त्वकस्थस्याग्नेश्च तेजनम् ॥५२॥

उद्वर्षणोत्सादनाभ्यां जायेयातामसंशयम् ।

उत्सादनाद् भवेत् क्षीणां चिरोपात् कान्तिमद्वपुः ॥५३॥

प्रहर्षसौभाग्यमुज्जाघवादिगुणान्वितम् ।

उद्वर्षणं तु विज्ञेयं कण्डूकोठानिलापहम् ॥५४॥

ऊर्बोः संजनयस्याशु फेनकः स्थैर्यलाघवे ।

कण्डूकोठानिलतत्तमभमठरोगपहश्च सः ॥५५॥

तेजनं त्वगगतस्याग्नेः सिरामुखबिचेचनम् ।

उद्वर्षणं त्विष्टिकथा कण्डूकोठविनाशनम् ॥५६॥

उद्वर्षण और उद्वर्त्तन से त्वचा में स्थित सिराओं के मुख का खुलना, त्वचा में स्थित अग्नि (प्राजक पित्त) की क्षीति निश्चय रूप से होती है। उत्सादन से स्त्रियों का शरीर विशेष रूप से सुन्दर होता है। शरीर में प्रहर्ष, सौभाग्य, शुद्धि, लघुता आदि गुण आते हैं। उद्वर्षण, कण्डू, कोठ और वायु को नष्ट करता है। फेनक जंघाओं में स्थिरता एवं लघुता लाता है। फेनक कण्डू, कोठ, वायु, स्तम्भ, मैलजन्म रोगों को (द्वेषण कच्छू आदि को) नष्ट करता है। त्वचा में स्थित प्राजक अग्नि को प्रदीप्त करता है, सिराओं के मुख को खोलता है। ईंट आदि से उद्वर्षण कण्डू, कोठ को नष्ट करता है।

वक्तव्य — उद्वर्षण-अस्नेहौषधचूर्णादिभिः वर्णनम्, यथा-चने या मसूर के आटे से मलना। उत्सादन-स्नेहकल्केन उद्वर्षणम् उद्वर्त्तनम्, यथा-चने के आटे में तेल और दही मिलाकर मलना। फेनक-रीठे या आंवले आदि के पानी से या साबुन से धोना। ईंट (झामा) से उद्वर्षण आजकल खड़ के स्पर्ज से शरीर को रगड़ना, या खहर के कपड़े से स्नान करते समय शरीर को रगड़ना ॥५२-५६॥

निद्रादाहश्रमहर् स्वेदकण्डूरुपापहम् ।

हृयं मलहर् श्रेष्ठं सर्वेन्द्रियविबोधनम् ॥५७॥

तन्द्रापाम्पोशमनं तुष्टिदं पुंस्त्वर्धनम् ।

रक्तप्रसादनं चापि स्नानमग्नेश्च दीपनम् ॥५८॥

छण्णेन शिरसः स्नानमहितं चक्षुषः सदा ।

शीतेन शिरसः स्नानं चक्षुष्यमिति निर्दिशेत् ॥५९॥

श्लेष्ममासृतकोपे तु ज्ञात्वा व्याधिवलावल्म ।

काममुष्णं शिरःस्नानं भैषज्यार्थं समाचरेत् ॥६०॥

अतिशीताम्बु शीते च श्लेष्ममासृतकोपनम् ।

अत्युष्णमुष्णकाले च पित्तशोणितवर्धनम् ॥६१॥

तच्छातिसारज्वरित्कर्णशूलांनिलातिषु ।

आधमानारोचकाजीर्णमुक्तवरमु च गहिंतम् ॥६२॥

सौभाग्यदं वर्णकरं प्रीत्योजोबलवर्धनम् ।

स्वेददौर्गन्ध्यवैवर्ण्यश्रमघ्नमनुलेपनम् ॥६३॥

स्नानं येषां निषिद्धं तु तेषामप्यनुलेपनम् ।

स्नान — निद्रा, दाह एवं श्रम का नाशक, स्वेद, कण्डू और प्यास का नाशक, हृय, मल को दूर करने में श्रेष्ठ, सब इन्द्रियों को सचेत बनानेवाला, तन्द्रा, पाप्मा (अलङ्करी-मनहूसी) को दूर करनेवाला है। प्रसन्नता एवं पुरुषत्व का वर्धक, रक्त को निर्मल करनेवाला और अग्नि को बढ़ानेवाला है। गरम पानी से शिर का धोना आँखों के लिये सदा हानिकारक है। शीतल पानी से शिर का स्नान करना आँखों के लिये हितकारी है। कफ और वायु के प्रकोप में रोग के बल और निर्बलता को जानकर इच्छानुसार गरम पानी से शिर का स्नान औषध रूप में हो बरते। अति शीतल या शीतश्रुत में ठण्डे पानी का स्नान कफ और वायु को कुपित करता है। अतिउष्ण जल या उष्णश्रुत में गरम पानी का स्नान पित्त और रक्त को कुपित करता है। अतिसार, ज्वर, कर्णशूल, वातव्याधि, आभ्यान, अरोचक, अजीर्ण एवं भोजन करनेपर स्नान करना निन्दित है। अनुलेपन (चन्दन आदि का शरीर पर लेप) सौभाग्य देनेवाला, वर्ण को बढ़ानेवाला, प्रीति, भोज, बलवर्धक है, स्वेद, दौर्गन्ध्य, विवर्णता और श्रम को नष्ट करता है। जिन लोगों के लिये स्नान निषिद्ध है, उनके लिये अनुलेपन भी निषिद्ध है ॥

रक्षोघ्नमथ चौजस्यं सौभाग्यकरमुत्तमम् ॥६४॥

सुमनोस्वररत्नानां धारणं प्रीतिवर्धनम् ।

फूलों की माला, सुन्दर वस्त्रों एवं रत्नों को धारण करना, रक्षोघ्न (भूत आदि बाधा, विष बाधा आदि से बचानेवाला), भोज के लिये हितकारी, सौभाग्य करनेवाला (बढ़पन श्रीमत्त्व देनेवाला) और प्रीति को बढ़ाता है।

वक्तव्य — “वज्रं मरकतः सारः पित्तुको विषमृषिका । कर्के-तनः सर्पमणिर्वैद्यं गजमौक्तिकम् । धार्थं गरमणियांश्च वरोषध्वो विषापहाः ॥” चरकः चिकि० । “काम्यं यशस्यमायुष्यमल-द्वमीनं प्रहर्षणम् । श्रीमत् पारिषदं शस्तं निर्मलास्वरधारणम् ॥ वृष्यं सोगन्ध्यमायुष्यं गन्धमाल्यनिषेवणम् । धन्यं मंगलमायुष्यं श्रीमद् न्यसनसूदनम् ॥ हर्षणं काम्यमौजस्यं रत्नाभरणधारणम् ॥”

चरक सूत्र० अ० ५ ॥५७-६४॥

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