सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुद्रासंहिता
[ अ० २४ ]
अवगाहन में प्रयुक्त किया स्नेह शिशा मुखों द्वारा रोमकुरों से धमनियों को तुप्त करता हुआ स्नेह शरीर में बल उत्पन्न करता है। (स्नेह के अन्दर डुबकी मारना, दैठना) ॥३३॥
तत्र प्रकृतितात्म्यतुदैजद्रोषविकारवित्।
नैलं घृतं वा सतिमान् गुन्यादभ्यङ्गसेकयोः ॥३४॥
इसमें प्रकृति, सत्य, श्रुतु, देश, दोष और विकार को जाननेवाला बुद्धिमान् वैद्य, अभ्यंग और परिवेक में तैल या घृत जो ठीक समझे वह बरते ॥३४॥
केवलं तामद्रोषेषु न कथञ्चन योजयेत्।
तरुणज्वर्येजीर्णौ च नाभ्यक्तव्यौ कथञ्चन ॥३५॥
तथा विरिक्तो वान्तश्च निरुद्धो यश्च मानवः।
पूर्वयोः कृच्छ्रता व्याधेरसाध्यत्वमथापि वा ॥३६॥
शेषाणां तद्वहः प्रोक्ता अग्नितमान्यादयो गदः।
सन्तर्पणसमुत्थानां रोगाणां तैत्र कारयेत् ॥३७॥
आम युक्त दोषों में अकेला स्नेह (असंस्कृत स्नेह) किसी भी अवस्था में नहीं बरतना चाहिये। तरुण ज्वर रोगी और अजीर्ण रोगी को कभी अभ्यंग नहीं करना चाहिये। इसी प्रकार विरेचन दिये, वमन कराये, और जिस मनुष्य को निरुद्ध दिया गया, उनको भी अभ्यंग न कराये। प्रथम दो अवस्थाओं में रोग का कुछ साध्य होना अथवा रोग का असाध्य होना होता है। शेष रोगियों को उस दिन अग्नितमान्यादि रोग हो जाते हैं। सन्तर्पणजन्म रोगों में भी स्नेह का अभ्यंग न करे।
वक्तव्यं—सन्तर्पणजन्म रोग—“रोगास्तस्योपजायन्ते संतर्पणनिमित्ताः। प्रमेहकण्डूपिडकाः कोठागण्डुवामयज्वराः ॥ कुष्ठान्यामप्रदोपाश्च मूत्रकृच्छ्रमरोचकाः। तन्द्राबल्लेव्यमतिस्थौल्यमालस्यं गुरुगत्रता ॥ इन्द्रियक्षोतसां लेपो बुद्धेर्माहः प्रमीलकः ॥” चरकः सूत्र अ० २३-५ ॥३५-३७॥
शरीरायासजजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम्।
तत् कृत्वा तु सुखं देहं विमुदनीयात् समन्ततः ॥३८॥
शरीरोपचयः कान्तिग्रांश्राणां सुविभक्तता।
दौर्भाग्नित्वमनालस्यं स्थिरत्वं लोषवं मृजा ॥३९॥
श्रमकलमपिपासोष्णशीतादीनां सहिष्णुता।
आरोग्यं चापि परमं व्यायामातुपजायते ॥४०॥
न चास्ति सहस्रं तेन किञ्चित् स्थाैल्यापकर्षणम्।
न च व्यायामिनं मर्त्यमर्दयन्त्यरयो बलात् ॥४१॥
न चैनं सहसाऽऽक्रम्य जरा समधिरोहति।
स्थिरीभवति मांसं च व्यायामाभिरतस्य च ॥४२॥
व्यायामसिन्मत्रगत्रस्य पदभ्यामुद्धर्तितस्य च।
व्याधयो नोपसर्पन्ति सिंहं लुद्रमुगा इव ॥४३॥
वयोरुपगुणैर्हानसपि कुर्यात् सुदर्शनम्।
व्यायामं कुर्वतो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम् ॥४४॥
विदग्धमविदग्धं वा निर्दोषं परिपच्यते।
व्यायामो हि सदा पथ्यो बलिनां स्निग्धभोजिनाम् ॥
स च जीते वसन्ते च तेषां पथ्यतमः स्मृतः।
सर्वेष्वनुवृहद्दहः पुम्भिरात्महितैषिभिः ॥४५॥
बलस्याधेन कर्तव्यो व्यायामो हन्त्यतोऽन्यथा।
हृदि स्थानस्थितो वायुर्यदा वक्तव्यं प्रपद्यते ॥४७॥
व्यायामं कुर्वतो जन्तोस्तद्बलाधस्य लक्षणम्।
वयोबलअरीराणि देशकालाशनानि च ॥४८॥
समीक्ष्य कुर्याद्व्यायाममन्यथा रोगमाप्नुयात्।
क्षयतृष्णाशुचिच्छुद्धिररक्तपित्तश्रमकलमाः ॥४९॥
कासशोषज्वरश्चासा अतिव्यायामसंभवः।
रक्तपित्तौ कृशः शोषी श्वासकासक्षतातुरः ॥५०॥
भुक्तवान् क्षोषु च क्षीणस्तृण्डभ्रमातेश्च वज्रयेत्।
शरीर में जिस कर्म से आयास उत्पन्न होता है, उस कर्म को व्यायाम कहते हैं। व्यायाम करके शरीर को सुखपूर्वक चारों ओर से मले (जोर से नहीं मले)। व्यायाम करने से शरीर की पुष्टि, कान्ति, अंगों का प्रयत्न, अग्नि की प्रदीप्ति, आलस्य का न होना, स्थिरता, लघुता, शुद्धि, श्रम-कलम-प्यास-उष्णिमा और शीत आदि को सहने की शक्ति, और उत्तम आरोग्य मिलता है। मोटापे को कम करने के लिये व्यायाम के समान दूसरी वस्तु नहीं। व्यायाम करनेवाले मनुष्य के शत्रु बलपूर्वक तिरस्कार नहीं कर सकते। इस पर बुढ़ापा एक दम से चढ़कर नहीं बैठ सकता (अपने समय पर ही आता है)। व्यायाम करनेवाले का मांस हृद होता है (ढीला नहीं रहता)। इसके पास रोग भी नहीं फटकते, जिस प्रकार शेर के पास छोटे मृग जानवर नहीं पहुँच पाते। वय, रूप, और गुण से हीन मनुष्य को भी व्यायाम देखने में सुन्दर बना देता है। नित्य व्यायाम करनेवाले मनुष्य का विरुद्ध भोजन भी, विदग्ध हुआ (अम्लपाक) एवं अविदग्ध (उत्तम विदग्ध) भोजन बिना दोष के पच जाता है। क्योंकि स्निग्ध भोजन करनेवाले बलवान् पुरुषों के लिये व्यायाम सदैव पथ्य है। इन लोगों को शीतकाल और वसन्त ऋतु में व्यायाम पथ्य है। (इन ऋतुओं में दूसरी ऋतुओं से थोड़ा अधिक करना चाहिये)। अपना हित चाहनेवाले मनुष्यों को प्रतिदिन सब ऋतुओं में व्यायाम करना चाहिये। इससे अधिक करने पर वह नुकसान करता है। व्यायाम करते हुए हृदय में स्थित वायु जब मुख में आने लगे (मनुष्य हांपकर मुख से श्वास लेने लगे) यह बलाध का लक्षण है। वय, बल, शरीर, देश, काल, खान-पान को देखकर व्यायाम करे, अन्यथा रोग उत्पन्न होता है। क्षय, तृष्णा, अर्कचि, वमन, रक्तपित्त, श्रम, कलम, कास, शोष, ज्वर, श्वास, ये रोग अति-व्यायाम से उत्पन्न होते हैं। रक्तपित्त रोगी कृश-व्यक्ति, शोषरोगी, श्वास, कास, उरःक्षतरोगी, भोजन किया, स्त्री सेवन से कृश, प्यास और श्रम से पीड़ित मनुष्य व्यायाम न करे।
वि० मन्तव्य—बलाध या अर्द्ध शक्ति—व्यायाम