सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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भ° २४ |
पिडका, व्यंग, रक्तपिनजन्य रोग शीघ्र ही नष्ट होते है ।
वक्तव्य--गरम पानीया साबुन का उपयोग तथा पाउडर का ठगाना सुख के सान्दय को, त्वचा की कोमलता को ब्रिगा-
इता है--इसे सदा याद रक्खं ॥९६॥
सुखं खु निरोश्रोन दृढं पश्यति चज्ञुषा ॥१७॥ मतं खरोतोड जनं श्रं वियुद्धं सिन्धुसंभवम् ।
दाहकण्डूमखघ्नं च दृष्टिक्रेदरुजापहम् ॥१८॥
तेजोरूपावहं चेव सहते मारुतातपौ ।
न नेत्ररोगा जायन्ते तस्मादञ्चनमाचरेत् ॥१€॥ आंखों म ४५ अंजन (या काजल) लगाने से मनुष्य विना कष्ट के सुखपूवक बारीक वस्तु को देखता है, आंख से स्थिरता
से देखता है । सिन्ध प्रदेश मे उत्पन्न निर्मल खोतांजन श्र माना है । यह अंजन आंख की जलन, खाज, मैक को नष्ट करता है, आंख कौ क्लिन्नता (गदलापन) ओर पीड़ा को दूर
करता हे । आंख सूयं का प्रतिनिधि-होने से-अंजन लगाने पर ओंलो मे तेज अता दहे, ओर ओंख वायु एवं धूपकोभी वदरत करती है । अंजन ल्गनेसे नेत्रम रोग नहीं होते, इसल्यि अंजन करना चाहिये ॥१७-१६॥ अुक्तवाञ्छिरसा सातः श्रान्तश्छदेनवाहसैः | रात्रौ जागरितश्चापि नाञ्ग्याञ््वरित एव च ॥२०। {. भोजन करके, शिर समेत स्नान करके, वमन या अन्य थकान के कारणों से थका, रात्रि मे जागरण किया ओर उ्वर रोगी आंख मे अंजन न करे ॥२०॥ कृपू रजातीकक्कोरल्वङ्गकटुकाहयैः । सचूणपूगेः सदितं पत्रं ताम्बूढजं शुभम् ॥२९॥ ` सुखवेश्नयसौगन्ध्यकान्तिसौ एवकारकम् । ^ दसुदन्तस्वरमरुजिडन्द्रियविशोधनम् ॥२२॥ परसेंशमनं हृदयं गखामयविनाशनम् । | पथ्य सुप्रोस्थिते युक्ते स्नाते वान्ते च मानवे ॥२३॥ रक्तपिततक्षतक्षीणतृष्णामूच्छपरीतिनाम् । <. ठ ५ । रूक्षदुबमत्योनां न हितं चास्यशोषिणाम्॥२४॥ कपूर, जातीफल, शोतल्चीनी, लवंग, कटुका (ल्ताक- सूरी), चुना जर सुपारी के साथ पान खाना उत्तम है । पान क )६ से मुख की निमेखुता, सुख में सुगन्धि, कान्ति, सौष्ठव ता
पृख से पानी आना बन्द् होताः द । पान द्य है, गर के रोगों भे न्ट करता है | सोकर उठने पर, भोजन् के पीले स्नान के । अपरन्त, वमन के पीछे मनुष्य पान खाये । रक्तपित्त रोगी ्षतच ण्) प्यास-मूच्छां से. पीड़ित, रूत्त) दुबल एव यख ओष रेगियो के छथि पान हितकारी नदीं हे ॥२१-२४॥। शिरोगतास्तथा रोगाङ्द्िरोभ्यज्गोऽपकषति।
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धिकित्खास्थानम्
। .हइन-दन्त- स्वर-मल-जिहा-उनका शोधन होता है ।
| ४७९ करोति शिरसस्ठरपनिं सस्वकमपि चाननम् । सन्तपणं चेन्द्रियाणां सिरसः प्रतिपूरणम् ॥२६॥ शिर को तेर से भरना (शिर पर भी प्रकार तै ख्गाना) शिर पर क्रिया तेल का अभ्यंग शिरे रोगो को दूर करता दे । बालो को कोमल, रम्बा, धना, चिकना ओर काला बनाता द । शिर को खाली (शल्य) नहीं होने देता । सुख की चा का भी सुन्द्र करता है । इन्द्रियों को सन्तर्षित करता हे ॥ मधुक क्षोरजक्टां च सरलं देवदास च । चद्रक पश्चनामानं समभागानि संहरेत् ॥२७॥ तेषां कल्ककषायाभ्यां चक्रतेटं विपाचयेत् । सदेव शीतलं जन्तोभूरधनि तें प्रदापयेत् ।॥२६॥ सुख्दी, विदारी, सरलकाष्ट, देवदारु, टघुपंचमूल, ये प्रत्येक समभाग टेकर इनके कल्क ओर कषाय से कोलर का ताजा निकाला तै सिद्ध करे । इस तैल का चिर पर ठ्गाना सव धातुओं मे शीतर है ॥२७-२८॥ केगभ्रसाधनी केश्या रजोजन्तुमटापहा । कधी का करना वालो के ल्थि हितकारी है तथा धूल, ज् आदि का नाश करता है ।
दयमन्याशिरःकणशूघनं कर्णपूरणम् ॥२९॥ कानां मे तेल डालना-हनु-मन्या शिर ओर कान के शूल को नष्ट करता है ।
वक्तव्य--“धारयेत् पूरणं क्ण, कण॑मूरं विमदंयन् । सज: स्यान्मा दवं यावत् मावाशतमवेदने? ॥(२६॥ अभ्यङ्गो मादेवकरः कफवातनिरोधनः । धातूनां पुष्टिजननो ृजावणेबर्प्रदः ।[३०॥ स्नेह का अभ्यंग सम्पूणं शरीर पर करना त्वचा को कोमल करता है, कफ ओर वायु को रोकता है । रसादि धाठओं को पुष्ट करता दै, त्वचा कौ शुद्धि, वणं, बल को देता दै। वक्तव्य--“रोमान्तेषु अनुदेदस्य स्थित्वा मात्राशतत्रयम् । ततः प्रविशति स्नेहः चतर्भिगच्छति त्वचम् ॥” सेकः श्रमष्नोऽनिर्हद्भग्नसन्धिप्रसाधकः।
क्ष ताग्निद्ग्धामिहतविधष्टानां रुजापहः ॥३१॥ जर्सिक्तस्य वधेन्ते यथा -मूलेऽङ्कुरास्तरोः । तथा धातुविवद्धिर्हि स्नेहसिक्तस्य जायते ॥३२॥ सम्पूणं अगो का पखििक-भरमनाशक, वायु दृद्रोग-भगन- सन्धि का प्रसाधक, क्षत अग्नि से जठे, चोट ख्ये, धिखड़ लगे हुओं को पीडा को मिटाता हे । जिस प्रकार इक्ष के अंकुर जल से सेचन करने पर बदृते हँ उसी प्रकार स्तेह से सेचन
करने पर धातुओं की इद्धि होती हे ॥२३१,२२॥ 5 सिरामुखं रोसकूपेधेमनीभिश तपयन् । शरीरबखमाधत्ते युक्तः स्नेहोऽवगाहने ॥३३॥ `