सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १४ ]
वतुर्विशतितमोऽध्यायः
अथातोऽनागताबाधाप्रतिषेधं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे अनागताबाधाप्रतिषेध अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—अनागतः—ईषत् आगतः, नञ् ईषद् अर्थ, बाधा दुःखम्, तस्याः प्रतिषेधः—चिकित्सितम् (डल्लनः) अर्थात्—जो बाधा अर्थात् दुःख नहीं आया है अथवा कुछ आ गया है आने की सम्भावना है उसका प्रतिषेध इस अध्याय में कहा गया है। यथा—मुख की मलिनता के विनाशार्थ दत्तवन का विधान आदि २। इस अध्याय में वे उपदेश दिये गये हैं, जिनके अनुसार चलने से कष्टों का आना ही रुक जाय—प्रतिषेध निरोध ॥ १,२ ॥
उत्थायोत्थाय सततं स्वस्थेनारोग्यमिच्छता।
धीमता यदुसृष्टेयं तत् सर्वं संप्रदृश्यते ॥३॥
आरोग्य को चाहनेवाले, स्वस्थ (रोगी नहीं) एवं बुद्धिमान् मनुष्य को निरन्तर प्रतिदिन जो करना चाहिये, वह सब भली प्रकार कहा जाता है।
वक्तव्य—आयुर्वेद का उद्देश्य “स्वस्थस्य परिरक्षणञ्च” भी है। उसीके लिये यह अध्याय है। उठकर मलत्याग-शौचकार्य प्रथम है, यथा—“ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत्, स्वस्थो रक्षार्थमायुषः। शरीरचिन्तां निर्धर्य कृतशौचविधस्ततः ॥” स्वस्थ मनुष्य को उपःकाल में उठना चाहिये। यह स्वास्थ्य के लिये नितान्त आवश्यक है ॥ ३ ॥
तत्रादौ दन्तधवनं द्वादशाङ्गुलमायतम्।
कनिष्ठिकापरीणाहमुवप्रन्थितमव्रणम् ॥४॥
अयुग्मप्रन्थि यच्चापि प्रत्यग्रं शस्तभूमिजम्।
अवेद्यतुं च दोषं च रसं वीर्यं च योजयेत् ॥५॥
कषायं मधुरं तिक्तं कटुकं प्रातरुहिततः।
निम्बश्च तिक्तके श्रेष्ठः कषायं खदिरस्तथा ॥६॥
मधुको मधुरे श्रेष्ठः करञ्जः कटुके तथा।
क्षौद्रग्योषत्रिवर्गाकतं सतैलं सैन्धवेन च ॥७॥
चूर्णन तेजोवत्याश्च दन्ताश्रित्यं विशोधयेत्।
एकैकं घषयेद्भतं मृदुना कूर्चकेन च ॥८॥
दन्तशोधनचूर्णन दन्तमांसात्यबाधयन्।
तद्वीर्गन्ध्यापदेहो तु रल्लेष्माणं चापकर्षति ॥९॥
वैशद्यमन्नाभिरुचिं सौमनस्यं करोति च।
न खादेद् गल्लाल्लोघजिह्वारोगसमुद्भवै ॥१०॥
अथान्यपाके श्वासं च कासहिष्कावमीषु च।
दुर्बलोऽजीर्णभक्तश्च मूर्च्छांतां मदपीडितः ॥११॥
शिरोरुजांतेस्तृषितः शान्तः पीनकलमान्वितः।
अदितो कर्णशुली च दन्तरोगी च मानवः ॥१२॥
प्रथम दातुन करे। दातुन—बारह अंगुल लम्बी, कनिष्ठिका अंगुली के समान मोटी, सीधी, बिना गांठवाली, काणी या खोखली नहीं, दो गांठें जिसमें न हों और जो ताजी एवं उत्तम भूमि में पैदा हुई हो उस दातुन को करे। मृदु, दोष और दातुन का रस और वीर्य को देखकर दातुन को चुने। कषाय, मधुर, तिक्त और कटुरस की दातुन प्रातःकाल उठकर करे। तिक्त वृक्षों में नीम, कषाय वृक्षों में खैर, मधुर वृक्षों में महुआ और कटु वृक्षों में करञ्ज श्रेष्ठ है। मधु त्रिकटु, दालचीनी, इलायची, तेजपत्र, सैन्धव, तेजबल का चूर्ण इनको तैल (तिल, तैल या सरसों का तैल) में मिलाकर इससे सदा दांतों को साफ करे। कोमल कूची से एक एक दाँत को (ऊपर के दांतों को नीचे की ओर, नीचे के दांतों को ऊपर की ओर) रगड़े। दातुन के साथ दन्तशोधन चूर्ण को रगड़े। इसमें मसूड़ों को किसी प्रकार की पीड़ा न पहुँचाये। इस प्रकार करने से मुख को दुर्गन्धि, मेल और कफ निकल जाता है। मुख में निर्मलता, अन्न में रुचि और मन की प्रसन्नता होती है। गले-तालु-ओष्ठ-जिह्वा रोग में दातुन न करे। मुखपाक श्वास, कास और हिष्का में भी दातुन अच्छी नहीं। दुर्बल, अजीर्ण में भोजन किया, मूर्च्छा से पीड़ित, मद से दुःखी, शिरोरोगी, प्यास से पीड़ित, थका हुआ, मद्यपान के कलम से युक्त, अदितरोगी, कर्णशुलरोगी, दन्तरोगी दातुन न करें ॥४-१२॥
जिह्वांनिलंखनं रौप्यं सौवर्णं चाक्षमेव च।
तन्मलापहरं शस्तं मृदु रल्लदणं दशाङ्गुलम् ॥१३॥
मुखवैरस्यदौर्गन्ध्यशोकजाड्यहरं सुखम्।
दन्तदार्ढ्यंकरं रुच्यं स्नेहगण्डूषधारणम् ॥१४॥
जिह्वा को साफ करने की जिम्मी चाँदी की, सोने की, लकड़ी की होनी चाहिये। यह जिम्मी मल को दूर करने में योग्य, कोमल, चिकनी और दस अंगुल लम्बी होनी चाहिये। इससे मुख की विरसता, दुर्गन्धि, शोक, जड़ता दूर होकर मुख मिलता है। तैल के गण्डूष का मुख में धारण करना दांतों को हड् करता है और भोजन में रुचि उत्पन्न करता है ॥१३,१४॥
क्षीरवृक्षकषायैर्वा क्षीरेण च विमिश्रितैः।
भिन्नोदककषायण तथैवामलकस्य वा ॥१५॥
प्रक्षालयेन्मुखं नेत्रं स्वस्थः शीतोदकेन वा।
नीलिकां मुखगोषं च पिडकां उयङ्गमेव च ॥१६॥
रक्तपित्तकृतान् रोगान् सद्य एव विनाशयेत्।
मुख प्रक्षालन—बरगद आदि क्षीरवृक्षों के कषाय से अथवा इनके कषाय दूधमें मिलाकर या लोघ के कषाय से अथवा आवले के कषाय से या शीतल जल से स्वस्थ मनुष्य मुख और नेत्रों को धोये। इस प्रकार करने से नीलिका, मुखशोष,