भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० २३ ]

चिकित्सास्थानम्

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धादिगण के क्वाथ में सिद्धघृत को पिलाये। सन्निपातज शोथ में—स्तुहीक्षीर एक आदक को बारह आदक कांजी में मिलाकर इसमें तन्दवी और द्रवन्ती (मोगलई एरण्ड) का कल्क मिलाकर इसमें घी सिद्ध करे और विरेचनार्थ पिलाये। विषजन्म शोथ की चिकित्सा कल्पस्थान में कहेंगे ॥११॥

अत ऊर्ध्व सामान्यचिकित्सितमुपदेद्यामः—तिल्वकृष्टतचतुर्थीनि यान्युक्तान्युदरेषु ततोऽन्यतममुपयुज्यमानं श्वययुसपहन्ति, मूत्रवर्तिक्रियां वा सेवेत, नवायसं वाऽहर्हर्मधुना, विडङ्गातिविषाकुटजफलभद्रादरुनागरमरिचचूर्णं वा धरणमुष्णाम्बुना, त्रिकुटुक्षारायश्चूर्णांनि वा त्रिफलाकषायेण, मूत्रं वा तुल्यक्षीरं, हरीतकीं वा तुल्यगुडामुपयुञ्जीत, देवदारुशुण्ठीं वा गुग्गुलुं वा मूत्रेण वर्षाभूकषायानुपानं वा, तुल्यगुडं शृङ्गवेरं वा, वर्षाभूकषायं मूलकल्कं वा सशृङ्गवेरं पयोऽनुपानमहरहर्मांसं, श्लोषवर्षाभूकषायसिद्धेन वा, सर्पिषा मुद्गगोलुम्बान् भक्षयेत्, पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकमयूरकवर्षाभूसिद्धं वा क्षीरं पिवेत्, सहौषधमुरझीमूलसिद्धं वा, त्रिकुटुकेरण्डरयामामूलसिद्धं वा, वर्षाभूशृङ्गवेरसहदेवदारुसिद्धं वा, तथाऽलाबूबिभोतकफलकल्कं वा तण्डुलाम्बुना, क्षारपिप्पलीमरिचशृङ्गवेरातुसिद्धेन च मुद्गगृषेणालवणैनाल्पस्नेहेन भोजयेद्यदान्नं गोधूमान्नं वा, वृक्षकार्कतकतमालनिरुवर्षाभूकवार्थेश्च परिषेकः, सर्पसुखचर्लासैन्धवशार्ङ्गष्टाभिश्च प्रदेहः कार्यः यथादोषं च वमनविरेचनास्थापनानि तीक्ष्णान्यजस्ममुपसेवेत, स्नेहस्वेदोपनाह्नांश्च, सिराभिरुचाभीर्णं शोणितमवसेचयेदन्मत्रोपद्रवशोफादिति ॥१२॥

इसके आगे सामान्य चिकित्सा का उपदेश करेंगे—उदरों में “हरीतकीचूर्णं प्रस्थ” एक, ‘गन्धे पयसि महावृक्ष’, दूसरा, ‘चव्यचित्रकेत्यादि’—तीसरा, ‘तिल्वकं,’ चौथा (वातव्याधि में कहा) ये जो चार घृत कहे हैं, इनका सेवन करने से शोथ नष्ट होता है। अथवा मूत्रवर्त्ति क्रिया (उदरोत्कवमन विरेचन शिरोविरेचन द्रव्याणां आदि में कही) का सेवन करे। अथवा प्रतिदिन नवायस (प्रमेह पिडका में कहे) की मधु से चाटे। अथवा वायविडंग, अतीस, इन्द्रजौ, देवदारु, सौठ, मरिच के चूर्ण को गरम पानी से पीये। या त्रिकुटु, यवक्षार, लोहभस्म को त्रिफला कषाय के साथ पीये। मूत्र (गोमूत्र) में समान मात्रा में दूध मिलाकर पीये। हरड की समान गुड़ के साथ खाये। देवदारु, सौठ, कों पीये। गुग्गुलु को गोमूत्र से या पुनर्नवा के कषाय के अनुपान से पीये। समान गुड़ के साथ सौठ को खाये। पुनर्नवा के कषाय को या पुनर्नवा के मूल के कल्क को सौठ के साथ दूध के अनुपान से प्रतिदिन

एक मास तक खाये। त्रिकुटु और पुनर्नवा के कषाय से सिद्ध किये घी के साथ उबालकर कुछ मूत्रे हुए मूंग को खाये। पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक अपामार्ग, पुनर्नवा, से सिद्ध दूध पीये। सौठ, सहा (माषपर्णी), शोभांजन की मूल से सिद्ध दूध पीये। त्रिकुटु, एरण्ड, निशोय मूल से सिद्ध दूध पीये। अथवा पुनर्नवा, सौठ, माषपर्णी और देवदारु से सिद्ध दूध पीये। कहुई तुम्बी, बहेड़ा का फल इनका कल्क चावल के पानी के साथ पीये। यवक्षार, पिप्पली, मरिच, सौठ इनसे सिद्ध किये मूंग के ग्रूष में थोड़ा सा नाम मात्र को ही सैन्धव मिलाकर तथा थोड़ा सा घी डालकर इसके साथ जो से बना या गेहूँ से बना भोजन करे। कुटज, आक, करंज, नीम और पुनर्नवा इनके क्वाथ से परिषेक करे। सरसों, हुलहुल, सैन्धव, शार्ङ्गि (काकजंघा) इनसे शोफ पर प्रदेह करना चाहिये। दोष के अनुसार निरन्तर तीक्ष्ण वमन, विरेचन, आस्थापनों को बरते। स्नेह, स्वेद और उपनाह भी करे। उपद्रवजन्म शोथ को छोड़कर शिराओं से बार-बार रक्त को निकाले।

वक्तव्य—आजकल शोथ में मकौय के पत्ते पीस कर उसका लेप करते हैं, उनका अर्क पीते हैं। शीतोष्णस्निग्धरूखादि चिकित्सा से जो शोफ शान्त न हो उसमें रक्त मोक्षण करे।

वि० मन्तव्य—पाठक विचार करें—उक्त योगों में—कोई विरेचन है तो कोई मूत्रल है। इन सबमें नवायस योग, पुनर्नवा के योग तथा पयोनुपान आदि पर विशेषरूप से ध्यान देना चाहिये। मूंग, यव तथा गेहूँ का यद्यपि विधान है, तथापि ये बहुत ही अल्प मात्रा में दिये जायें। ग्रहणी आदि रोगों में शोथ उपद्रव से भी हो जाता है, उस दशा में शोणित का अवसेचन नहीं करना चाहिये। शोथरोग की चिकित्सा के लिये च० चि० अ० १२ अवश्य देख लेना चाहिये ॥१३॥

भवति चात्र—

पिप्पलाभमूलं लवणानि मद्यं

सूदं दिवास्वप्नमजाङ्गलं च।

छियो घृतं तैलपयोगुरूपि

शोफं जिघासुः परिवर्जयेत् ॥१३॥

कहा भी है—

पिड़ी के बने मध्य, अम्लरस, लवण, सब रूप में, मद्य, मिट्टी, दिन में सोना, जांगल मांस के बिना दूसरे मांस, खीन सहवास, घृत, तैल, दूध और मुक्त-भोजन, शोफ को नष्ट करने की इच्छावाला व्यक्ति इनका त्याग करे ॥१३॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने शोथचिकित्सितं नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥२३॥