सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 532, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें४७६
मुश्रुतसंहिता
[ अ० ३३ ]
मिटटी, पक्व लोष्ट ( घड़े का ठीकरा आदि ), कटशर्करा ( अनिद्रग्ध शर्करा-चूना ), आतूष या औदक (मछली आदि) मांस के सेवन करने से, अजीर्ण रोग में मैशुन करने से, विरोधि आहार के सेवन करने से अथवा हाथी, ऊँट, घोड़ा, रथ, मुसाफरी के संक्षोभ से, एकत्रित हुए दोष धातुओं को दूषित करके सम्पूर्ण शरीर में श्वयथु-शोथ उत्पन्न करते हैं ॥४॥
तत्र वातश्वयथुररुणः कृष्णो वा मृदुरनवस्थितास्तो-दादयश्चात्र वेदनाविशेषाः, पित्तश्वयथुः पीतः सरत्को वा मृदुः शीघ्रानुसायुषादयश्चात्र वेदनाविशेषाः, श्लेष्मश्वयथुः पाण्डुः शुक्लो वा स्निग्धः कठिनः शीतो मन्दानुसारौ, कण्डवादयश्चात्र वेदनाविशेषाः, सन्निपातश्वयथुः सर्वे वर्णवेदनः, विषनिमित्तस्तु गरोपयोगाद् दुष्टतोयसेवनात् प्रकुथितोदकावगाहनात् सविषसत्त्वदिग्धचूर्णनावचूर्ण-नाद्वा सविषमन्त्रपुरीषः शुक्लपृष्टानां वा तृणकाष्ठादीनां संस्पर्शनात्, स तु मृदु क्षिप्रोत्थानोऽवलम्बो चलोऽचलो वा दाहपाकरागप्रायश्च भवति ॥५॥
इनमें वातजन्य शोथ अरुण या कृष्णवर्ण, मृदु अस्थिर ( एक स्थान पर न रहनेवाला ) तथा इसमें तोद, मेद, स्फुरण आदि विशेष वेदनायें होती हैं । पित्तश्वयथु पीला, ईषतर्क, मृदु, शीघ्र फैलनेवाला तथा इसमें ऊष, चोष आदि विशेष वेदनायें होती हैं । कफश्वयथु-पाण्डुवर्ण या शुक्ल, स्निग्ध, कठिन, शीत, और फैलनेवाला और इसमें कण्डु आदि विशेष-वेदनायें होती हैं । सन्निपातजन्य श्वयथु-सब प्रकार के वर्ण एवं सब प्रकार की वेदनावाला होता है । विषजन्य शोथ, गरविष के सेवन से, दूषित पानी के सेवन से, सड़े हुए गदले पानी में स्नान करने से, विषैले प्राणी के विष से लिप्त चूर्ण के लिङ्गकने से, विषयुक्त मूत्र-मल शुक्र से स्पर्श हुए तिनके या लकड़ियों के छूने से होता है । यह विषजन्य शोथ मृदु, जल्दी ही उत्पन्न होनेवाला, देर तक रहनेवाला, स्थिर या फैलनेवाला, प्रायः करके जलन, सुखी एवं पकनेवाला होता है, ( यथा मकड़ी का फिर जाना, या शहद की बड़ी मक्ली का काटना ) “यश्चाप्य-रुणवर्णमः शोथो नक्तं प्रणश्यति । स्नेहोष्णमर्दनाभ्यां च प्रण-श्येत् स च वातिकः ॥” विस्तार के लिये देखिये च० सु० अ० १८॥५॥
भवन्ति चात्र—
दोषाः श्वयथुमूर्ध्वं हि कुर्वन्त्यामाशयस्थिताः ।
पक्वागयस्था मध्ये च वर्चःस्थानगतास्त्वधः ॥६॥
कृत्स्नं देहमनुप्राप्ताः कुर्युः सर्वसर्पं तथा ।
कहा भी है—आमाशय स्थित दोष ऊपर के भाग में शोथ उत्पन्न करते हैं । पक्वाशय में स्थित दोष मध्यभाग में मलाशय में स्थित दोष अधोभाग में सम्पूर्ण शरीर में फैले दोष सारे शरीर में फैले शोथ को उत्पन्न करते हैं ॥६॥
श्वयथुमूर्ध्वदेशे यः स कष्टः सर्वैर्गच्छ यः ॥७॥
अर्धाङ्गोऽरिष्टभूतश्च यश्चोर्ध्वं परिसर्पति ।
श्वासः पिपासा दौर्बल्यं ज्वररुच्छर्दिररोचकः ॥८॥
द्विक्रातीसारकासाश्च शूनं सङ्क्षपयन्ति हि ।
सामान्यतो विशेषाच्च तेषां वक्ष्यामि भेषजम् ॥९॥
जो शोथ शरीर के मध्य भाग में होता है, वह सन्निपात ज्वर की भाँति विरुद्धचिकित्सा होने से कष्ट साध्य है । और जो शोथ सारे शरीर में फैला होता है, वह भी कष्टसाध्य है । शरीर के आधे अङ्ग में जो शोथ होता है, वह भी अरिष्ट के समान है । और जो शोथ नीचे से ऊपर को जाता है, या ऊपर से नीचे को फैलता है, वह भी असाध्य है । शोथ युक्त व्यक्ति को श्वास, प्यास, दुर्बलता, ज्वर, वमन, अरोचक, द्विक्रा, अतिसार, कास ये रोग नष्ट कर देते हैं । इन शोथों की सामान्य और विशेष रूप में चिकित्सा कहूँगा ।
वक्तव्य—अर्धोप—नासा से आधे भाग में एक पक्ष में, अथवा, नामि से आधे भाग में—ऊपर नीचे के मेद से । “यस्तु पादाभिनिर्बुत्तः शोथः सर्वांगमो भवेत् । जन्तोः स च सुकष्टः स्यात् प्रसृतः स्त्रीमुखान्च यः ॥ यश्चापि गुह्यप्रभवः त्रिया वा पुरुषस्य वा । स च कष्टमो ज्ञेयो यस्य च स्तुष्यद्वदाः ॥” चरकः “ऊर्ध्वगामिनर्पदभ्यामधोगामिमुखत्वात् त्रियाम्” ॥७-९॥
शोफिनः सर्व एव परिहरेयुरम्ललवणदधिगुडवसाप-यस्तौलघृतपिण्डमयगुरुणि ॥१०॥
सब शोफ रोगी अम्ल, लवण, दही, गुड़, वसा, जल, तैल, घृत, पिण्ड की बनी और गुरु वस्तुओं का त्याग कर देवे ।
वि० मन्तव्य—इन सबका त्याग करके—केवल दूध पर ही निर्वाह करे । निम्नलिखित ११ वें सूत्र के अनुसार अथवा अन्य प्रकार से—विरेचन अवश्य करे । यदि दूध पीने पर भी रोगी जल पीने का इष्ट करे तो अत्यन्त अल्प मात्रा में उष्ण जल दिया जा सकता है । मुखगत शोथ में तीक्ष्ण नस्य देना चाहिये ॥१०॥
तत्र वातश्वयथौ त्रैवृत्तमेरुणदौलै वा मासमर्धमासं वा पाययेत् , न्यग्रोधादिकक्षायसिद्धं सर्पिः पित्तश्वयथौ, आरुणवधादिसिद्धं सर्पिः श्लेष्मश्वयथौ, सन्निपातश्वयथौ स्तुहीक्षीरपात्रं द्वादशभिर्मल्लापात्रैः प्रतिसंस्ज्य दन्तीद्रव-न्तीप्रतीवापं सर्पिः पाचयित्वा पाययेत् , विषनिमित्तेषु करपेषु प्रतीकारः ॥११॥
इनमें वातजन्य शोथ में—ची, तैल और वसा इस त्रैवृत्त स्नेह को या एरुणदौलै को एक मास या पन्द्रह दिन पिलाये । पित्तज शोफ में न्यग्रोधादिगण के कक्षाय में सिद्ध घृत को पिलाये । कफजन्य श्वयथु में आरुण-