सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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पिबेदतिविषां पाठां मुस्तां च सुरदारु च । रोहिणीं कटुकाख्यां च कुटजस्य फलाणि च ॥७४॥ गर्वा मूत्रेण मनुजो भागीर्धरणसमितैः । एष सर्वांन् कफकृतान् रोगान् योगोऽपकर्षति ॥५५॥ वातजन्य सर्वसर में लवण के चूर्ण से प्रतिसारण करे । वातहर द्रव्यों से सिद्ध तैल कवल और नस्य में बरते । फिर विचक्षण वैद्य इसमें निम्न स्नेहिक धूम को बरते । शाल, खिरनी, एरण्ड, हिंगोट, महुआ, सार ( सार ब्रह्म, साल ) इनकी मखजा; गुग्गुल, ध्यामक, जटामांसी, कालानुषारी, सर्जरस, शिलापुष्प और मोम, इन सबका चूर्ण भली प्रकार बनाकर स्नेह में मसलकर, इसको मधु लगाई श्योनाक की डंडी पर लेप करे । यह स्नेहिक धूम सर्वसर में उत्तम है । यह धूम कफनाशक, वायुनाशक और मुखरोगनाशक है । पित्तजन्य सर्वसर में वमन विरेचन देकर रोगी में पित्तनाशक, मधुर-शीतल सम्पूर्ण चिकित्सा बरते । प्रतिसारण, गण्डूष, धूम, और संशोधन बरते । कफजन्य सर्वसर में कफनाशक विधि करे । अतीस, पाठा, मुस्ता, देवदारु, कंटुकी, इन्द्रजो इनको एक धरण ( छे मासा ) मात्रा में गोमूत्र के साथ पीये । यह योग कफजन्य सब रोगों को नष्ट करता है ॥७४,७५॥
क्षीरेक्षरसगोमूत्रदधिमस्तवृन्धकाञ्जिकैः । विदध्यात् कवलान् वीक्ष्य दोषं तैलघृतैरपि ॥७६॥ दोष को देखकर दूध, गन्ने का रस, गोमूत्र, दधि, मस्तु, अम्लकांजी, ( धान्याम्ल और कांजी ) तैल और घृत इनसे कवल करे ॥७६॥
रोगाणां मुखजातानां साध्यानां कर्म कीर्तितम् । असाध्या अपि वद्यन्ते रोगा ये तत्र कीर्तिताः ॥७७॥ ओष्ठप्रकोपे वज्र्याः स्युर्मांसरक्तत्रिदोषजाः । दन्तमूलेषु वज्र्यां तु त्रिलिङ्गगतिसौषिरी ॥७८॥ दन्तेषु च न सिध्यन्ति श्यावदालनमञ्जनाः । जिह्वागतेष्वलासस्तु तालल्येष्ववुर्द तथा ॥७९॥ स्वरन्तो वलयो वृन्दो विदार्यलस एव च । गठोघो मांसतानश्च शतन्नी रोहिणी च या ॥८०॥ असाध्या कीर्तिता ह्येते रोगा नव दशैव च । तेषां चापि क्रियां वैद्यः प्रत्याख्याय समाचरेत् ॥८१॥ साध्य मुख रोगों की चिकित्सा कह दी है । असाध्य रोगों को यहाँ कहते हैं, जो पहले कहे हैं । ओष्ठ प्रकोप में मांसजन्य, रक्तजन्य और सन्निपातजन्य ओष्ठ प्रकोप असाध्य हैं । दन्त मूलों में सन्निपातजन्य गति और सुषिर, दन्त रोग में श्याव, दालन, और मञ्जन, जिह्वागत रोगों में अलास, तालव्य रोग में अबु द, तथा स्वरन्ध, वलय, वृन्द, विदारी, अलस, गलीघ, मांसतान, शतन्नी, रोहिणी, ये उन्नीस रोग असाध्य कहकर चिकित्सा करे ॥
इति श्रीशुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मुखरोगचिकित्सितं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥२२॥
त्रयोविंशतितमोऽध्यायः
अथातः शोफानां चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे शोफों की चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
षड्विधोऽवयवसमुत्थः शोफोऽभिहितो लक्षणतः प्रतिकारतश्च, सर्वसरस्तु पञ्चविधः, तथायाम्—वातपित्तश्लेष्मसन्निपातविषनिमित्तः ॥३॥
अवयव में उत्पन्न शोफ लक्षण और चिकित्सा की दृष्टि से छेः प्रकार का है । और सर्वसर शोथ पाँच प्रकार का है, यथा-वात, पित्त, कफ, सन्निपात और विषजन्य है ।
“त्रयः शोथा भवन्ति, वातपित्तश्लेष्मनिमित्ताः । ते पुनर्द्विविधा निजागन्तुमेदेन ॥ प्रकृतिभित्ताभिः भिद्यमानो द्विविधः त्रिविधः चतुर्विधः सप्तविधोऽष्टविधश्च शोथ उपलभ्यते । पुनश्चैक एवोत्सेवसामान्यात् ॥” च० सू० अ० १८ ।
वि० मन्तव्य—स्थान के आसपक्वैषणीय १७ में कहा गया है कि “शोफसमुत्थानां प्रन्य-विद्रधि-अलजी-प्रभृतयः प्रायेण व्याधयः अभिहिता अनेकाकृतयः, तैः दिल्क्षणः पृथुः प्रथितः समो विषमो वा त्वङ्मांसस्थायी दोषसंघातः शरीरेकदेशोथितः शोफ इत्युच्यते, स षड्विधः वातपित्तकफशोषितसन्निपाताऽऽगन्तुनिमित्ताः” व्याख्या वहाँ देखिये । इस शोफ से भी विलक्षण ( पृथक्-विशिष्ट लक्षणवाला ) जो सर्वसर अर्थात् समग्र शरीर में ( बाहर एवं भीतर ) फैलनेवाला शोथ या श्वयथु नामक रोग होता है, जिसका वर्णन इस अध्याय में किया गया है । शास्त्र समयानुसार यह ५ प्रकार का माना गया है । यह लोकभाषा में “सूजन” या “सोजा” कहा जाता है ॥३॥
तत्रापतर्पितस्याध्वगमनादतिमात्रमभ्यवहरतो वा पिष्टान्नहरितकशाकलवणानि क्षीणस्य वाऽतिमात्रमम्लमुपसेवमानस्य मृत्पक्वलोष्टकटशर्करानूपौदकमांससेवनादजीर्णिनो वा प्राग्न्यधर्मेसेवनाद्विरुद्धहारसेवनात् वा हस्त्यश्चोष्टूरथपदातिसङ्कोशभाण्दा दोषा धातून् प्रदूष्य श्वयथु-मापादयन्त्यखिले शरीरे ॥४॥
इनमें लंघन, व्याधाम, वमन, रुक्षादि आहार विहार के कारण कुछ हुए व्यक्ति के मुसाफरी करने से, अथवा बहुत अधिक मात्रा में भोजन करने से, पिट्टी के बने भक्ष्य, हरित-वर्ग के शाक, लवण आदि के अधिक सेवन करने से क्षीण व्यक्ति के बहुत अधिक मात्रा में अम्ल रस के सेवन करने से