सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३१ ]
स्नेह काले को श्वेत बनाने में, चौड़, देवदारु, शीशम, अगर, इन लकड़ियों का स्नेह द्रव, कुछ, किटिभ में बरता जाता है। सभी स्नेह वायु का नाश करते हैं। तैलगुणों को संक्षेप से कह दिया है।
वक्तव्य—महाव्याधि—महाकुष्ठ—प्रमेह आदि आठ हैं। मोच का अर्थ सिम्बल और शिमु भी किया है ॥५॥
अत ऊर्ध्व कषायस्नेहपाकक्रममुपदेद्यामः। तत्र केचिदाहुः—त्वकपत्रफलमूलादीनां भागस्तत्तत्तुर्गुणं जलं चतुर्भागावशेषं निष्कवाध्यापहरेदित्येष कषायपाककल्पः, स्नेहप्रस्तेषु घटसु चतुर्गुणं द्रवमावाप्य चतुरश्चाक्षसमान-भेषजपिण्डानित्येष स्नेहपाककल्पः। एतत्तु न सम्यक्, कस्मात्? आगमासिद्धत्वात् ॥६॥
इसके आगे कषाय तथा स्नेह की पाकविधि का उपदेश करेंगे। इसमें कई आचार्य कहते हैं कि छाल, पत्र, फल, मूल आदि का एक भाग, इससे चार गुणा पानी मिलाकर कषाय करे। चतुर्थांश रहने पर उतार लेवे, यह कषाय कल्पना है। स्नेह के लै प्रस्त लेकर इसमें चौगुना द्रव मिलाकर, चार अक्ष मात्रा में औषधि का कल्क मिलाकर पाक करे, यह स्नेहपाक विधि है। यह ठीक नहीं है, क्योंकि यह शास्त्र से मान्य नहीं है।
वक्तव्य—प्रस्त (दोषल) अथवा, “संयुक्त पंचाङ्गुलिरीषद्व विस्तृतपाणिरेकः”। अक्ष—बड़े के बराबर या कर्ण मात्रा में ॥६॥
पलकुडवादीनामतो मानं तु न्यास्यास्यामः—तत्र द्वादश धान्यमाषा मध्यमाः सुवर्णमाषकः, ते षोडश सुवर्णम्, अथवा मध्यमनिष्पावा एकोनविंशतिधर्षणं, तान्यधर्षतृतीयानि कर्षः, ततश्चोर्ध्वं चतुर्गुणमभिधर्षयन्तः पलकुडवप्रस्थादकद्रोणा इत्यभिनिष्पद्यन्ते, तुला पुनः पलगतं, ताः पुनर्विशतिभारः शुष्काणामिदं मानम्, आर्द्रद्रवाणां च द्विगुणमिति ॥७॥
इसलिये पलकुडव आदि का परिमाण कहते हैं—इसमें श्रेष्ठ मध्यम आकार के बारह माषों (उड़दों) का एक सुवर्ण माष है। ये सोलह सुवर्ण माष एक सुवर्ण कर्ष के बराबर हैं। अथवा मध्यम आकार के उन्नीस निष्पाव (सेम के बीज) एक धरण के बराबर हैं। इन अढ़ाई धरण से एक कर्ष होता है। इससे आगे प्रत्येक का चार गुणा करते हुए पल, कुडव, प्रस्थ, आदक, द्रोण बन जाते हैं। तुला का परिमाण एक सौ पल है। बीस तुला से एक भार बनता है। यह मान शुष्क द्रव्यों के लिये ही है। गीले तथा द्रवों के लिये इस परिमाण को दुगुना करना चाहिये।
वक्तव्य—चार कर्ष से एक पल, चार पल का एक कुडव, चार कुडव से एक प्रस्थ, चार प्रस्थ से एक आदक, चार आदक का एक द्रोण। कहीं पर आर्द्र द्रव्यों का भी दुगुना
नहीं बरतते, यथा—“वासाकुटजकृष्माण्डशतमूलीसहामृता। प्रसारण्यरवगन्धा च शतपुष्पा सहाचराः ॥ नित्यमाद्रीः प्रयोक्तव्या न तासां द्विगुणं भवेत् ॥ प्रस्थ के विषय में—“द्वान्निश-शताडत्रविंशत्यापलैः, षोडशभिः क्रमात्। तोयस्नेहविशुष्काणां द्रव्याणां प्रस्थमादिशेत् ॥ सुश्रुत का मान मागध मान कहाता है, चरक का मान कालिंग मान है” ॥७॥
तत्रान्यतमपरिमाणसंमितानां यथायोगं त्वकपत्रफलमूलादीनामातपपरिशोषितानां छेयानि खण्डशस्त्रेदयित्वा भेद्यान्यगुणो भेदयित्वाडयकुट्याष्टगुणेन षोडशगुणेन वाडम्भसाभिषिच्य स्थाल्यां चतुर्भागावजिष्ठं कषाययित्वा-उपहरेदित्येष कषायपाककल्पः। स्नेहाच्छतुर्गुणो द्रवः, स्नेहचतुर्थांशो भेषजकल्कः, तदैकध्वं संसृज्य विपचेदित्येष स्नेहपाककल्पः। अथवा तत्रोदकद्रोणे त्वकपत्रफलमूलादीनां तुलामावाप्य चतुर्भागावजिष्ठं निष्कवाध्यापहरेदित्येष कषायपाककल्पः; स्नेहकुडवे भेषजपलं पिष्टं कल्कं चतुर्गुणं द्रवमावाप्य विपचेदित्येष स्नेहपाककल्पः ॥८॥
इनमें से किसी एक परिमाण के अनुसार, योग के अनुकूल छाल, पत्ते, फल, मूल आदि जो धूप में सुखाये हों, उनको लेकर उनमें से काटने योग्यों को काटकर, तोड़ने योग्यों को तोड़कर, सबको कूटकर, आठ गुणे (साधारण सस्त द्रव्यों में) या सोलह गुणे (खैर आदि कठिन द्रव्यों में) पानी में डालकर पात्र में रखकर पकाये। पानी का चौथाई अंश रह जाने पर इसको उतार ले, यह कषाय कल्पना है। स्नेह से चार गुणा द्रव, स्नेह से चतुर्थांश औषध का कल्क, इनको एक साथ, मिलाकर पकाये, यह स्नेहपाककल्प है। अथवा एक द्रोण जल में छाल, पत्ते, फल, मूल आदि की एक तुला मिलाकर, चौथाई रह जाने तक कषाय करे, यह कषाय पाक की विधि है। स्नेह के एक कुडव में—औषधि एक पल पीसकर कल्क बनाकर मिलाये, इसमें चार गुणा द्रव (स्नेह का) मिलाकर पाक करे, यह कषाय स्नेहपाकविधि है।
वक्तव्य—कर्षादौ तु पलं यावद् दद्यात् षोडशिकं जलम्। ततस्तु कुडवं यावद् तौयमष्टगुणं भवेत् ॥ चतुर्गुणमतश्चोर्ध्वं यावद् प्रस्थादिकं भवेत्। (२) मुदो चतुर्गुणं देयं कठिनेऽष्टगुणं जलम् ॥ कठिनात् कठिने देयं जलं षोडशिकं मतम् ॥ स्नेहपरिमाण—यत्रैकद्विचित्रचुराणि द्रवद्रव्याणि तत्र सर्वाण्येव स्नेहाच्छतुर्गुणानि पञ्चप्रभृतीनि स्नेहसमानानि। पञ्चप्रभृति यत्र स्युः द्रवाणि स्नेहसंविधौ। तत्र स्नेहसमान्याहुः अर्वाक् च स्याच्छतुर्गुणम् ॥९॥
१ मान के लिये रसयोगसागर भाग-२, और द्रव्यगुणविमर्श का उत्तरार्द्ध देखिये।