भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ३१ ] ६४

चिकित्सास्थानम्

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अठारह औषधियाँ सीम के बतलाया गया है वहाँ सर्वत्र मानव आज भी जाता-आता है, निवास करता है परन्तु उन दिव्य औषधियों को मूल गया है ॥४०॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने निवृत्तसंतापीयं रसायनं नाम त्रिशोऽध्यायः ॥३०॥

एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः

अथातः स्नेहोपयोगिकचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे स्नेहोपयोगिक चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में स्नेहों के उपयोग तथा प्रयोग का वर्णन किया गया है ॥१,२॥

स्नेहसारोऽयं पुरुषः, भाणाश्च स्नेहभूमिष्ठाः स्नेहसाध्याश्च भवन्ति । स्नेहो हि पानानुवासनमस्तिऽक्षिरोवस्थुत्तरबस्तिनस्थकण्णपूर्णगात्राभ्यङ्गभोजनेषूपयोऽयः ॥३॥

यह पुरुष स्नेहसार ( स्नेह के सहारारे टिकनेवाला ) है, और प्राण भी स्नेह की मुख्यतावाले हैं, ( प्राणों का भी मुख्य आधार स्नेह ही है )। तथा रोग भी स्नेह से ही साध्य होते हैं। क्योंकि स्नेह पान-अनुवासन-मस्तिष्क ( शिरोविरेचन ) शिरोबस्ति, उत्तरबस्ति, नस्थ, कण्ण में भरने, शरीर पर अस्थंग, भोजनों में बरतना चाहिये ॥३॥

तत्र द्वियोनिश्चतुर्विकल्पोऽभिहितः स्नेहः स्नेहगुणाश्च । तत्र जङ्गमेभ्यो गन्धं घृतं प्रधानं स्थावरभ्यस्तिलतैलं प्रधानमिति ॥४॥

इसमें स्नेह की योनि ( उत्पत्तिस्थान ) दो प्रकार की ( स्थावर और जंगम ) है। स्नेह के चार भेद ( घी, तैल, वसा और मज्जा ) पहले ( सू० ४-५ में देखिये ) कहे हैं। इनमें जंगम स्नेहों में ( घी, वसा, मज्जा में ) गौ का घृत प्रधान है। और स्थावर स्नेहों में तिल तैल प्रधान है।

वक्तव्य—घृत की प्रधानता में—“नान्यः स्नेहस्तथा कश्चित् संस्कारमनुवर्तते, यथा सर्पिरतः सर्पिः सर्वस्नेहोत्तमं मतम् ॥ चरक० ( २ ) सर्पिस्तैलं वसा मज्जा सर्वस्नेहोत्तमा मताः । एषु चैवोत्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्त्तनात् ॥ चरक० । तैल शब्द—तिलों से उत्पन्न तैल को तैल कहना चाहिये, तथापि दूसरे स्थावर द्रव्यों से उत्पन्न स्नेह को भी तैल कहते हैं। यथा—“निष्पत्तेः तदुगुणत्वाच्च तत्तैलमितरेष्वपि ॥” घी दो प्रकार का है, दूध से निकाला हुआ और दही से निकाला। शुद्ध मांस का स्नेह वसा है, अस्थियों में आभित स्नेह मज्जा है। जंगमों में घी प्रधान है, स्थावरों में तिलतैल,

विरेचन के लिये एरण्ड तैल उत्तम है ॥४॥

अत ऊर्ध्वं यथाप्रयोजनं यथाप्रधानं च स्थावरस्नेहा-नुपदेद्यामः—तत्र तिल्वकैरण्डकोशाप्रदन्तीद्रवन्तीसप्तलाजङ्गिनीपलाशविषाणिकागवाक्षीकम्पिलकगम्पाकनीलिनीस्नेहा विरेचयन्ति, जीमूतककुटजकृतवैधनेद्वैवाकुधा-मार्गवमदनस्नेहा वामयन्ति, विडङ्गखरमज्जरीमधुजिमुसूयर्वल्लीपीलुसिद्धार्थकव्योतिष्मतीस्नेहाः शिरो विरेचयन्ति, करञ्जपूतीककृतमालमातुलुङ्गेडुगुदीकिराततिलस्नेहा दुष्ट-ब्रणेपुप्युच्यन्ते, तुवरककपित्थकम्पिलकभक्ष्जातकपटोलस्नेहा महाव्याधिषु, त्रपुसैर्वास्ककौरुकुतुबीकृष्माण्डस्नेहा मूत्रसंगेषु, कपोतवङ्गावलगुजहरीतकीस्नेहाः शर्करारुमरीषु, कुसुम्भसर्षपातसीपिचुमर्दातिमुक्तकभाण्डीकदुतुम्बीकटभीस्नेहाः प्रमेहेषु, तालनारिकेठपनसमोचप्रियालबिल्बमधूकर्लेष्मातकाप्रातकफलस्नेहाः पित्तसंमृद्धे वायो, बिभीतकभक्ष्जातकपिण्डोतकस्नेहाः कृष्णोकरणे, श्रवणककुटुण्डुकुस्नेहाः पाण्डुकरणे, सरलपीतदारुशिशुपागुरुसारस्नेहा ददुकुष्ठकिटिभेषु, सर्व एव स्नेहा वातमुपद्वन्ति, तैलगुणाश्च समासेन व्याख्याताः ॥५॥

इसके आगे प्रयोजन के अनुसार, प्रधान ( मुख्य ) की दृष्टि से स्थावर स्नेहों को कहेंगे—इनमें तिल्वक, एरण्ड, कोशाप्र, जमालगोठा, द्रवन्ती ( मोगलई एरण्ड ) सप्तला ( सातला ), शंखिनी ( यवतिलका ), टाक, विषाणिका ( मेढ़ाखिगी ), गवाक्षी ( इन्द्रायण ), कमीला, अमलतास, नीलिनी, इनके स्नेह विरेचन करते हैं। जीमूतक ( देवदाली ), कूड़ा, कृतवैधन ( कोशातकी—कडुई तोरई ) इद्वैवाकु ( कडुआ तुम्बा ), धामार्गव ( विषा तोरई—नेनुआ ), मेनफल, इनका स्नेह वमन कराते हैं। विडंग, चिरचिटा, मीठा सहजन, सूर्यवल्ली ( आदित्य भक्ता-हुलहुल ), पीलू, सरसों, मालकंगनी इनका स्नेह शिर का विरेचन करता है। करंज, पूतीकरंज, अमलतास, बिजौरा, हिंगोट, चिरायता इनका स्नेह दूषित ब्रणों में बरता जाता है। तुवरक, कैथ, कमीला, भिलावा, पटोल इनका स्नेह महारोगों में बरता जाता है। खीरा, ककड़ी, कर्काव ( फूट ), तुम्बी पेटा इनका स्नेह मूत्र के अवरोधों में बरता जाता है। कपोतवङ्गा, ( ब्रह्मसुवर्चला या ब्राह्मी ) बावची, हरड् का स्नेह शर्करा एवं अश्मरी में प्रयुक्त होता है। कुसुम्भ ( बरें ), सरसों, अलसी, नीम, माधवीलता, भाण्डी, कडुईतुम्बी और नीली अपराजिता ( कोयल ) इनका स्नेह प्रमेहों में बरता जाता है। ताल, नारियल, कटहल, केला, पियाल, बिल्ब, महुआ, लसूआ, अम्बाड़ा, इन फलों के स्नेह पित्त से मिली वायु में बरते जाते हैं। बहेड़ा, भिलावा, मेनफल, इनका स्नेह श्वेत ब्रण को काला बनाने में बरता जाता है। श्रवण, फङ्गु ( प्रियंगु ) और श्योनाक के