भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुश्रुतसंहिता

[ अ० ३० ]

सूय के सामान लाल, कोमल, होने हैं। यह महौषधी, सूर्य की ओर सदा मुख रखती है। इसकी चमक स्वर्ण के समान, जल के किनारों पर सब और फेन्ती है ब्रह्मसुवर्चला—दूधवाली, कमलिनी के समान, अरतिमात्र ( बालिस्तभर ) लूग की, दो अङ्गुल लम्बे पत्तों की, नीले कमल के समान फूलों की, और फल अञ्जन के समान काले होते हैं। महा श्रावणी—स्वर्ण के समान कान्ति की और दूधवाली है। श्रावणी-पाण्डुरवर्ण और महाश्रावणी के लक्षणों की है। गोलोमी और अजलोमी—हंआटे-वाली एवं कन्द से उत्पन्न होती है। वेगवती—हंसपाद ( हंस-राज ) के समान टूटे हुए, मूल से निकलते हुए पत्तोंवाली, अथवा सब प्रकार से शांखपुष्पी के समान, बड़े भारी वेग से घिरी हुई, सौप के केंचुली के समान होती है। वर्षा के बीतने पर यह उत्पन्न होती है।

वक्तव्य—अरतिनः—विस्तृतकनिष्ठिकाकुलिमष्टिकहस्तः अरतिनः। वदमष्टिकः अरतिनः—दोनों ही अर्थ इल्हण के हैं। अम्बुदक्षये शरदि ॥८—२५॥

समादौ सर्परूपिण्यो ह्यौषध्यो याः प्रकीर्तिताः।

तासामुद्गरणं कार्यं मन्त्रणानेन सबंदा ॥२६॥

महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवामपि।

तपसा तेजसा वाऽपि प्रशान्स्यध्वं जिवाय वै ॥२७॥

मन्त्रणानेन मतिमान् सर्वा एवाभिमन्त्रयेत्।

अश्रद्धवानैरलसः कृतध्वनैः पापकर्मभः ॥२८॥

नैवासादयितुं शक्याः सोमाः सोमसमास्तथा।

सौप के आकार की पहली जो सात औषधियाँ कही हैं, उनको निम्नमंत्र के साथ उखाड़ना चाहिये। महेन्द्र, राम, कृष्ण, ब्राह्मण, गाय, इनके तप या तेज के कारण कल्याण के लिये उपशमन करो। इस मंत्र से बुद्धिमान् सब औषधियों को आमन्त्रित करे। श्रद्धाहीन आलसी, कृतध्वन और पापकर्म करनेवाले मनुष्य सोम को तथा सोम जैसी अजगरी आदि को नहीं प्राप्त कर सकते ॥२६—२८॥

पीतावशेषममृतं देवैर्ब्रह्मपुरोगमैः ॥२९॥

निहितं सोमवीर्यासु सोमे चाप्यौषधीपतौ।

ब्रह्मा के आगे चलनेवाले देवताओं के पीने से बचे हुए अमृत को सोमवीर्यवाली औषधियों में और औषधियों के पति सोम नामक औषधी में रख दिया था ॥२९॥

देवसुन्दे हृदचरे तथा सिन्धौ महानदे ॥३०॥

हरयते च जलान्तेषु मेध्या ब्रह्मसुवर्चला।

आदित्यपिणीनीं ज्ञेया तथैव हिमसंक्षये ॥३१॥

हरयतेऽजगरो नित्यं गोनसी चाम्बुदागमे।

काश्मीरेषु सरो दिव्यं नाम्ना क्षुद्रकमानसम् ॥३२॥

करेणुस्तत्र कन्या च छत्रातिच्छत्रके तथा।

गोलोमी चाजलोमी च महती श्रावणी तथा ॥३३॥

वमन्ते कृष्णसर्पाख्या गोनसी च प्रहरयते।

कौशिकीं सरितं तीर्त्वा सञ्जयन्यन्यास्तु पूर्वतः ॥३४॥

क्षितिप्रदेशो वल्मीकैराचितो योजनत्रयम्।

विज्ञेया तत्र कापोती उवेता वल्मीकमूर्धसु ॥३५॥

मलये नलसेनौ च वेगवस्थौषधी ध्रुवा।

कार्तिकया पौर्णमास्यां च भक्ष्येत्तामुपोषितः ॥३६॥

सोमवन्च्चात्र वर्तते फलं तावन्च कीर्तिताम्।

सर्वा विचैयास्त्वोपधथः सोमाश्चाप्यनुदे गिरी ॥३७॥

स शृंगैर्देवचरितैरन्बुदानांकिभेदिभिः।

न्यामस्तीर्थैश्च बिख्यातेः सिद्धविपुरसेवितः ॥३८॥

गुहाभिर्भीमरूपाभिः सिंहोन्नादितकुक्षिभिः।

गजालोहिततोयाभिरापगाभिः समन्ततः ॥

विविधैर्धर्तुभिश्चित्रैः सर्वत्रैवोपशोषितः ॥३९॥

नदीषु जलेषु सरःसु चापि पुण्येऽवरण्येषु तथाऽऽश्रमेषु।

सर्वत्र सर्वाः परिमागितव्याः सर्वत्र भूमिहि वसुनिधत्ते ॥

ब्रह्मसुवर्चला तालाबों में श्रेष्ठ देवसुन्द में, महानदी सिन्धु में और जल के किनारे मेध्य बुद्धिवर्धक ब्रह्मसुवर्चला मिलती है। आदित्यपणी भी वसन्त में वहीं मिलती है। अजगरी सदा मिलती है, गोनसी वर्षा में मिलती है। काश्मीर में क्षुद्रक मानस नाम का दिव्य तालाब है, वहाँ पर करेणु, कन्या, छत्रा, अतिच्छत्रा, गोलोमी, अजलोमी, महाश्रावणी होती है। वसन्त में कृष्णसर्पा और गोनसी दीखती है। कौशिकी नदी को पार कर सञ्जयन्ती नदी से पूर्व की ओर वल्मीकों से भरे जो क्षिति ( भूमि ) भाग हैं, ये भूमि भाग तीन योजन लम्बे हैं, वहाँ से ये उत्पन्न होती हैं। वहाँ पर वल्मीक की छोटी पर श्वेतकापोती उत्पन्न होती है। मलय और नलसेतु पर वेगवती औषधियाँ होती हैं। उपवास करके इस औषधि को कार्तिकी की पूर्णिमा को खाये ( सोम के समान आचरण करे ), फल भी सोम के समान है। इन सब औषधियों को और सोम को भी अबुंद पर्वत से एकत्रित करना चाहिये। यह पर्वत देवताओं के विचरने से पवित्र बाढ़लों से भी ऊँचा सिद्धिर्वि—देवताओं से सेवित प्रसिद्ध है। भयङ्कर गुहाओं से युक्त सिंह की गर्जना से नादित हाथी से आलोहित जलवाली नदियों से घिरा नानाप्रकार के विचित्र धातुओं से सब स्थानों पर शोषित है। नदियों में, पर्वतों में, तालाबों में, पवित्र जङ्गलों में, आश्रमों में सब स्थानों में ये सब औषधियाँ दूँढ़नी चाहिये, क्योंकि—भूमि सर्व वसु—( रत्नों को ) धारण करती है।

वि० मन्तव्य—अ० २९ तथा ३० में सोमवर्ग की जिन २४ औषधियों का तथा अजगरी आदि १८ औषधियों का वर्णन किया गया है उनको जानना पहिचानना ज़रूरी हो गया है और साथ ही उनका प्रचार भी समाप्त हो गया है। यद्यपि जिन स्थानों पर उनका होना