सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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अठारह औषधियाँ सोम के समान शक्तिशाली हैं। इनकी क्रिया (सिवन विधि), और फलश्रुति-स्तुति शास्त्र में सोम के समान कही है। इनके स्थान पर होम करके, जो दूधवाली हों, उनके दूध की एक कुड्ड मात्रा एक साथ पी जाये। जो औषधियाँ दूध रहित हैं, और मूलवाली हैं, उनके मूल में से तर्जनी के बराबर तीन टुकड़े लेकर उपयोग करें। श्वेतकापोती को मूल और पत्ते के साथ खाना चाहिये। गोनसी, अजगरी, कृष्णकापोती, इनको नाख्तों समेत मुट्ठी भरकर-टुकड़े करके, काटकर दूध के साथ पकाकर, छानकर, घूत से थोड़ा स्निग्ध करके, पीछे से होम करके, इसको एक साथ पी जाये। चक्र का दूध एक साथ पीये। भक्ष्य विधि से ब्रह्मसुवर्चला को सात दिन खाना चाहिये। शेष औषधियों के पाँच-पाँच पल लेकर एक आङ्क दूध में पकाये। एक प्रस्थ रहने पर उतारकर, छानकर एक साथ पी जाये। आहार और विहार सोम की भाँति है। केवल भेद इतना है कि अभ्यङ्ग के लिये मक्खन बरते। शेष सब विधि बाहर आने तक सोम की भाँति है ॥५॥
भवन्ति चान्न—
युवानं सिंहविकान्तं कान्तं श्रुतनिगादिनम्। कुर्गुरेताः क्रमेणैव द्विसहस्रायुषं नरम् ॥६॥ अङ्गदी कुण्डली मौली दिव्यस्रक्चन्दनाम्बरः। चरत्यमोघसंकल्पो नभस्यम्बुदुर्गमे ॥७॥ ब्रजन्ति पक्षिणो येन जल्लम्बाश्च तोयदाः। गतिः सौषधिसिद्धस्य सोमसिद्धे गतिः परा ॥८॥
कहा भी है—ये औषधियाँ मनुष्य को युवा, सिद्ध के समान पराक्रमी, सुन्दर शरीर, सुनते ही धारण करनेवाला, तथा दो हजार वर्ष की आयुवाला करती हैं। केभूरयुक्त, कुण्डल धारण किये, मुकुटधारी, दिव्य माला चन्दन और वस्त्र को धारण करके, अभ्यर्थ संकल्पवाला होकर बादल से भी न जाने योग्य आकाश में विचरता है। जिससे पक्षी जाते हैं, और पानी से भरे बादल जिस गति ( मार्ग ) से जाते हैं, औषधि से सिद्ध मनुष्य की वह गति है, सोम से सिद्ध व्यक्ति की गति इससे भी ऊपर हो जाती है ॥६-८॥
अथ वक्ष्यामि विज्ञानमौषधीनां पृथक् पृथक्। मण्डलैः कपिलेश्चित्रैः सर्पाभा पञ्चपिण्निनी ॥९॥ पञ्चारत्रिप्रमाणं च विज्ञेयाऽजगरी बुधैः। निष्पन्ना कनकाभासा मूले द्वयंगुलसंमिता ॥१०॥ सर्पाकारा लोहितान्ता श्वेतकापोतिरुच्यते। द्विपिण्निनी मूलभवासरुणां कृष्णमण्डलाम् ॥११॥ इयरन्तिमात्रां जानीयाद् गोनसीं गोतसाङ्गतिम्। सक्षीरां रोमशं मुष्टीं रसेनेखुरसोपमाम् ॥१२॥ एवंरूपरसां चापि कृष्णकापोतिमादिशेत्। कृष्णसर्पस्वरूपेण वाराही कन्दसंभवा ॥१३॥ एकपत्रा महावीर्या भिन्नाञ्जनसमप्रभा।
छत्रातिच्छत्रके विद्याद्रक्षोभे कन्दसंभवे ॥१४॥ जराभृत्युनिवारिण्यौ श्वेतकापोतिसंस्थिते। कान्तेद्रादजभिः पत्रैर्मयूराङ्गरुहोपमैः ॥१५॥ कन्दजा काञ्चनक्षीरी कन्या नाम महौषधी। करेणुः सुबहुक्षीरा कन्देन गजरूपिणी ॥१६॥ हरितकर्णपलाञ्जस्य तुल्यपर्णा द्विपिण्निनी। अजास्तनाभकन्दा तु सक्षीरा जुपरूपिणी ॥१७॥ अजा महौषधी ज्ञेया जङ्गकुन्देन्दुपाण्डुरा। श्वेतां विचित्रकुसुमां काकादन्यां सर्मां छुपाम् ॥१८॥ चक्रकासोषधीं विद्याञ्जराभृत्युनिवारिणीम्। मूलिनी पञ्चभिः पत्रैः सुरक्तांशुककोमलैः ॥१९॥ आदित्यपिण्निनी ज्ञेया सदाऽऽदित्यानुवर्तिनी। कनकाभा जलान्तेषु सर्वतः परिसर्पति ॥२०॥ सक्षीरा पद्मिनीप्रख्या देवी ब्रह्मसुवर्चला। अरन्तिमात्र्युपका पत्रैर्द्वयंगुलसंमिताः ॥२१॥ पुष्पैर्निलोत्प्लाकाः फलैश्चाञ्जनसन्निभैः। श्रावणां महती ज्ञेया कनकाभा पयस्विनी ॥ श्रावणी पाण्डुराभासा महाश्रावणिलक्षणं। गोलोमी चाजलोमी च रौमशे कन्दसंभवे ॥२३॥ हंसपादौ विचिन्नन्तेः पत्रैर्मूलसमुद्भवैः। अथवा जङ्गपुष्प्या च समाना सर्वरूपतः ॥२४॥ वेगेन महताऽऽविद्या सपत्निमौकसन्निभा। एषा वेगवती नाम जायते ह्यम्बुदक्ष्ये ॥२५॥
इसके आगे औषधियों को पृथक् २ पहिचान करेंगे। अजगरी—चित्रित कपिल वर्ण के धन्वोवाली, सर्प के आकार की, पाँच पत्तों की पाँच अरति प्रमाण होती है। ( अरति—बालित )। श्वेतकापोती—पत्र रहित, स्वर्ण के समान चमकवाली, मूल में दो अंगुल लम्बी, सर्प के आकार की, अन्दर से लाल होती है। गोनसी—दो पत्तोंवाली, मूल में अरुण वर्ण काले धन्वों की दो अरति लम्बी, गाय की नासा के समान आकार की होती है। कृष्णकापोतिका—दुधयुक्त, हंसआटेवाली, कोमल, रस में गन्ने के रस के समान होती है। छत्रा, अतिच्छन्ना—एक पत्तेवाली, महान् शक्ति सम्पन्न, तोड़े हुए अञ्जन के समान कान्ति युक्त, रक्षोभन एवं कन्द से उत्पन्न होती है। ये जरा और मृत्यु को नष्ट करती हैं, श्वेतकापोतिका के आकार की हैं। कन्या—सुन्दर एवं मोर के बालों के समान बारह पत्रों से युक्त, कन्द से उत्पन्न, स्वर्ण के समान दूधमहौषधी है। करेणु—बहुत दूधवाली, और हाथी के समान कन्दवाली है। अजा-महौषधी—हरित कर्णपलाश ( हाथी चिवारी ढाक ) के समान पत्तों की, दो पत्तोंवाली, बकरी के स्तनों के समान कन्द की, दूधवाली, जुपरूप, शंख, कुन्द ( मोगरा ), इन्दु के समान श्वेत होती है। चक्रका औषधि—श्वेतवर्ण, विचित्र फूलों की, काकादनी के समान रूप की, जरा और मृत्यु को नष्ट करनेवाली है। आदित्यपिण्निनी—मूलवाली पाँच पत्तों की, ये पत्ते-