भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३० ]

पक्ष में प्रतिदिन एक एक पत्र सोम में बदता है, और पूर्णमासी में पूरे पन्द्रह पत्ते हो जाते हैं। कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन एक एक पत्र झड़ने लगता है, और अमावस्या के दिन केवल लता मात्र बच जाती है। अंशुमान् सोम घृत के समान गन्धवाला, एवं कन्दवान् होता है। रजतप्रभ केले के आकार के कन्दवाला है। मुंजवान में लहसुन के समान पत्ते होते हैं। चन्द्रमा और कनकप्रभ सदा जल में रहते हैं। गरुडाहृतनामा और श्वेताक्ष ये पाण्डुर वर्ण, साँप की कैंचुली जैसे, वृक्ष के अप्रभाग में लटकते हैं। शेष दूसरे चित्रित मण्डल (धन्वी से) चित्रित हुए दीखते हैं। सब सोमों के पत्ते पन्द्रह होते हैं, इनके कन्द में दूध होता है, लता रहती है, नाना प्रकार के पत्ते होते हैं ॥२०-२६॥

हिमवत्यर्धुदे सखे महेन्द्र मलये तथा ।

श्रीपर्वते देवगिरी गिरी देवसहे तथा ॥२७॥

पारियात्रे च विन्ध्ये च देवसुन्दे हृदे तथा ।

उत्तरेण वितस्तायाः प्रवृद्धा ये महीधराः ॥२८॥

पञ्च तेषामधो मध्ये सिन्धुनामा महानदः ।

हठवत् प्लवते तत्र चन्द्रमाः सोमसत्तमः ॥२९॥

तस्योहेशेष चाप्यस्ति मुञ्जवानंशुमानपि ।

काश्मीरेषु सरो दिव्यं नाम्ना लुद्रकमानसम् ॥३०॥

गायत्रस्त्रैष्टुभः पाङ्क्तो जागतः शाक्वरस्तथा ।

अत्र सन्त्यपरे चापि सोमाः सोमसमप्रभाः ॥३१॥

हिमालय, पहाड़ की चोटी पर, सहाद्री में, महेन्द्र में, मलयाचल पर, श्रीपर्वत पर, देवगिरि पर, देवसहगिरि पर, पारियात्र में, विन्ध्याचल में, देवसुन्द में, हृद में, वितस्ता के उत्तर में, जो ऊँचे पाँच पर्वत हैं, उनके नीचे, मध्य में, सिन्धु नामक जो बड़ी नदी है, उसमें सोमों में श्रेष्ठ चन्द्रमा सोम हठ (जल कुम्भी) की तरह तैरता है। इसके समीप में ही मुंजवान् अंशुमान् रहता है। कश्मीर में लुद्रक मानस नाम का दिव्य तालाब है, यहाँ पर गायत्र, त्रैष्टुभ, पांक, जागत, शाक्वर तथा चन्द्रमा के समान कान्तिवाले दूसरे सोम हैं ॥२७-३१॥

यैश्चात्र मन्दभाग्यैस्ते भिषजश्चापमानिताः ।

न तान् पश्यन्त्यधर्मिष्ठाः कृतघ्नाश्चापि मानवाः ।

भेषजद्वेषिणश्चापि ब्राह्मणद्वेषिणस्तथा ॥३२॥

इन स्थानों पर जो वैद्यों का अपमान करते हैं, अधर्मिष्ठा, कृतघ्न, औषध से द्वेष करनेवाले, ब्राह्मणों से द्वेष करनेवाले हैं वे लोग इन सोमों को नहीं देख सकते ॥३२॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने स्वभावव्याधिप्रतिषेधनीयं रसायनचिकित्सितं नामैकोनत्रिधोऽध्यायः ॥२६॥

त्रिशतमोऽध्यायः

अथातो निवृत्तसन्तापीयं रसायनं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे निवृत्त सन्तापीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१-२॥

यथा निवृत्तसन्तापा मोदन्ते दिवि देवताः ।

तथौषधीरिमाः प्राप्य मोदन्ते सुवि मानवाः ॥३॥

जिस प्रकार स्वर्ग में देवता संताप (दुःख) से रहित होकर आनन्द करते हैं, उसी प्रकार इन औषधियों को प्राप्त करके पृथ्वीलल पर मनुष्य आनन्द अनुभव करते हैं ॥३॥

अथ खलु सप्त पुरुषाः रसायनं नोपयुञ्जीरन्, तद्यथा-अनात्मवानलसो दरिद्रः प्रमादी व्यसनी पापकृद् भेषजापमानी चेति । सप्तभिरेव कारणैर्न संपद्यते, तद्यथा-अज्ञानादनारम्भादस्थिरचित्तस्वाहारिद्र्यादानायत्त्वाद्धर्मादौषधालाभाच्चेति ॥४॥

सात पुरुष रसायन का सेवन न करें। यथा—अजितेन्द्रिय, आलसी, दरिद्र, प्रमादी, व्यसनी, पापकर्म करनेवाला और औषध का अपमान करनेवाला। सात कारणों से रसायन औषध गुण नहीं करती, यथा—अज्ञान से, औषध का आरम्भ न करने से, चित्त के अस्थिर होने से, दारिद्र्य से (दरिद्रता से), अनायत्ता से, अधर्म से, औषध के न मिलने से ॥४॥

अथौषधीर्याख्यास्यामः—तत्राजगरी, श्वेतकापोती, कृष्णकापोती, गोनसो, वाराही, कन्या, छत्रा, अतिच्छत्रा, करेणु, अजा, चक्रका, आदित्यपर्णी, ब्रह्मसुवर्चला, श्रावणी, महाश्रावणी, गोलोमी, अजलोमी, महावेगवती, चेत्यष्टादश सोमसमवीयां महौषधयो व्याख्याताः। तासौ सोमवत् क्रियाग्रीस्तुतयः शाब्देऽभिहिताः। तासामागारैऽभिहुतानां याः क्षीरवत्स्वस्तासां क्षीरकुडवं सकृदेवोपयुञ्जीत यास्त्वक्षीरा मूलवत्स्वस्तासां प्रेजिनीप्रमाणानि त्रीणि काण्डानि प्रमाणमुपयोगे, श्वेतकापातां समूलपत्राभक्षयितव्या, गोनस्यजगरीकृष्णकापोतीनां सनखमुष्टिखण्डशः कल्पयित्वा क्षीरेण विपाच्य परिस्त्रान्याभिचारितमभिहुतं च सकृदेवोपयुञ्जीत, चक्रकायाः पयः सकृदेव, ब्रह्मसुवर्चला सप्तरात्रमुपयोक्तव्या। भदयकल्पेन शेषाणां पञ्च पञ्च पञ्चाणि क्षीरादककथितानि प्रस्थेऽवशिष्टवतार्य परिस्त्रान्य सकृदेवोपयुञ्जीत। सोमवदाहारविहारी व्याख्यातौ, केवलं नवनीतमभ्यज्ञार्थं, शेषं सोमवदानिर्गमादिति ॥५॥

इसके आगे औषधियों का व्याख्यान करेंगे—अजगरी, श्वेतकापोती, कृष्णकापोती, गोनसी, वाराही, कन्या, छत्रा, अतिच्छत्रा, करेणु, अजा, चक्रका; आदित्यपर्णी, ब्रह्मसुवर्चला, श्रावणी, महाश्रावणी, गोलोमी, अजलोमी, महावेगवती, ये