सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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पीसकर सिर पर लेप करे । अथवा दूध से स्नान कराये । इससे सात दिन पीछे, भ्रमर के समान काले मुँबराले, स्थिर, स्निग्ध बाल उत्पन्न होते हैं । फिर तीन दिन पीछे पहले घर की देहली मेंसे (घर की चार दिवारी से) बाहर आकर, थोड़ी सी दूर रह कर फिर अन्दर उसी घर में चला जाये । अभ्यंग के लिये इसे बलातैल बरतना चाहिये । उद्घर्चन के लिये जी का आटा, परिषेक के लिये सुहाता हुआ गरम पानी, उत्सादन के लिये अजकर्ण (साल) का कषाय, स्नान के लिये खस मिश्रित कुण्ड का पानी, लेपन के लिये चन्दन, यूप सूप आदि आँबले का रस मिलाकर बनाये । गाय के दूध और मुलेहटी के कल्क से सिद्ध किया काले तिलों का तेल, श्राक, आदि वस्तुओं के सिद्ध करने में बरते । इस प्रकार दस दिन करे । दूसरे दस दिन दूसरे घर में रहें । इसके पश्चात् तीसरे घर में दस दिन तक वहाँ रहे । थोड़ी धूप और वायु का सेवन करने लगे । और फिर अन्दर चला जाये । अतिशय सुन्दर होने से अपना मुख शीशे या पानी में न देखे । अगले दस दिन तक क्रोध आदि को छोड़ देवे । यह विधि सब सोमों के सेवन की है । विशेषकर वल्ली (लता आदि), (दूर्वा जैसे)-लुपक (झाड़ी जैसे) आदि सोम ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यों को खाने चाहिये । इनकी मात्रा साढ़े तीन मुष्टि (पल) है ॥१२॥
अंगुमन्तं सौवर्णं पात्रेऽभिषुण्युयात्, चन्द्रमसं राजते तावुपुषुच्याष्टगुणमंश्चर्यमवाप्येशानं देवमनुप्रविशति, शेषास्तु ताम्रमये मृन्मये वा राहतिरे वा चर्मणि वितते, शूद्रवजं त्रिभिर्वर्णैः सोमा उपयोक्तव्याः । ततश्चतुर्थं मासे पौर्णमास्यां शुचौ दश ब्राह्मणान्चार्थत्वा कृतमङ्गला निष्क्रम्य यथोक्तं व्रजेदिति ॥१३॥
अंगुमान् सोम को सुवर्ण के पात्र से निचाड़े । चान्द्रमस सोम को चाँदी के पात्र में निचाड़े । इन दोनों का उपयोग करके मनुष्य देवताओं के अधविष ऐश्वर्य को प्राप्त करक भगवान् शिव में प्रवेश करता है । शेष सोमों को ताम्र के, मिट्टी के, या लोहित मृग के चमड़े से बने पात्र में निचाड़े । शूद्र को छोड़कर शेष तीनों वर्ण सोमका उपयोग करें । फिर चौथे मास में पूर्णमासी के दिन पवित्र स्थान पर ब्राह्मणों की पूजा करके, स्वस्तिपाठ करके, घर से निकलकर इच्छानुसार जाये ।
वक्तव्य—अधविषमैश्वर्यम्—“अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा । ईशित्वं च वशित्वं च तथा कामावषा-यिता ॥ आवेशश्चेतसो ज्ञानमर्थानां छन्दतः क्रिया । दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम् ॥ इत्यष्टगुणमाख्यातं योगिनां बलमैश्वरम् ॥” चरकः ॥१३॥
ओषधोनां पतिं सोममुपपुष्य विचक्षणः । दशवर्षसहस्राणि नवां धारयते तनुम् ॥१४॥
नारिगितं तोयं न विषं न शस्त्रं ताक्षमेव च । तस्यालमायःक्षपणे समर्थानि भवन्ति हि ॥१५॥ भद्राणां षष्टिर्वर्षाणां प्रसूतानामनेकधा । कुञ्जराणां सहस्रस्य बलं समधिगच्छति ॥१६॥ क्षीरोदं शक्रसदनमुत्तरांश्च कुरुनपि । यत्रेच्छति स गन्तुं वा तत्राप्रतिहता गतिः ॥१७॥ कन्दर्प इव रूपेण कान्त्या चन्द्र इवापरः । ग्रह्यादयति भूतानां मनांसि स महावृतिः ॥१८॥ साङ्गोपाङ्गश्च निखिलान् वेदान् विन्दति तत्त्वतः । चरत्यमोघसङ्कल्पो देववृत्चाखिलं जगत् ॥१९॥
बुद्धिमान् मनुष्य औषधियों के स्वामी सोम का उपयोग करके दस हजार वर्ष तक नूतन शरीर को धारण करता है । अग्नि, जल, विष, शस्त्र और अस्त्र कोई भी इसकी आयु को नष्ट नहीं कर सकते । अपितु इसको बढ़ाते हैं । उत्तम जाति के साठ वर्ष की आयुवाले तथा मद बहाते हुये हजारों हाथियों का बल आ जाता है । क्षीरसमुद्र, इन्द्र का घर-स्वर्ग, उत्तर कुब-जहाँ भी जाना चाहता है, वहाँ पर वह बेरोक-टोक गति से जा सकता है । रूप में कामदेव के समान, कान्ति में चन्द्रमा के समान, यह महान् तेजस्वी मनुष्यों के मनो को प्रसन्न करता है । अंग-उपांगों समेत सब वेदों को तत्त्व रूप से जानता है । देवता के समान अनर्थ संकल्पवाला जगत् में घूमता है ।
वक्तव्य—‘उत्तर-कुब’ वर्तमान ध्यानस्थान (देवताओं का पर्वत) है जो मध्य एशिया में है । उत्तर कुब का नाम किराता-लुनीय में भी अर्जुन की विजय वर्णन में आया है, यथा—‘विजित्य या प्राज्यमचच्छुत्तरान् कुरुतकुप्यं वसु वासवोपमः’ ॥१४-१६॥
सर्वधामेव सोमानां पत्राणि दश पञ्च च । तानि शुक्ले च कृष्णे च जायन्ते निपतन्ति च ॥२०॥
एकैकं जीयते पत्रं सोमस्याहरहस्तदा । शुक्लस्य पौर्णमास्यां तु भवेत् पञ्चदशच्छदः ॥२१॥ जीयते पत्रमेकैकं दिवसे दिवसे पुनः । कृष्णपक्षक्षये चापि लता भवति केवला ॥२२॥
अंगुमानाज्यगन्धस्तु कन्दवान् रजतप्रभः । कदल्याकारकन्दस्तु मुखवाङ्मगुनच्छदः ॥२३॥ चन्द्रमाः कनकाभासो जले चरति सर्वदा । गरुडाहृतनामा च श्वेताक्षरचापि पाण्डुरो ॥२४॥
सर्पनिर्मोकसहस्रो तौ वृक्षामावलम्बिनौ । तथाऽन्ये मण्डलैश्चित्रैश्चैत्रिता इव भान्ति ते ॥२५॥ सर्वं एव तु विज्ञेयाः सामाः पञ्चदशच्छदाः । क्षीरकन्दलतावन्तः पत्रैर्नानाविधैः स्मृताः ॥२६॥
सब प्रकार के सोमों के पत्ते पन्द्रह होते हैं । ये पत्ते शुक्ल पक्ष में उत्पन्न होते हैं, और कृष्ण पक्ष में गिर जाते हैं । शुक्ल