सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १९ ]
प्रातस्तथायोपश्रुतशान्तिः कृतमङ्गलो गां स्मृष्टुवा तथैवासीत, तस्य जोर्ण सोमे क्ष्दिस्तप्यते, ततः शोणितार्कं कुमिन्व्यामिश्रं छदितवते सार्थं श्रुतशीतं क्षीरं वितरेत्; ततस्तृतीयेऽह्नि कुमिन्व्यामिश्रमतिसार्यते, स तेनानिष्टप्रतिग्रहभक्तप्रभृतिभिर्विशेषैर्विनिर्मक्तः शुद्धतनुर्भवति, ततः सार्थं स्नाताया पूर्ववदेव क्षीरं वितरेत्, क्षौमवस्त्रास्तृतायां चैनं शय्यायां शाययेत्, ततश्चतुर्थेऽह्नि तस्य श्वयथुरुत्पद्यते ततः सर्वाङ्गैभ्यः क्रमयो निष्क्रामन्ति, तदहर्षवशय्यायां पांशुभिरवकीर्णमाणः शयीत, ततः सार्थं पूर्ववदेव क्षीरं वितरेत्; एवं पञ्चमषष्ठयोर्दिवसयोर्वर्तते, केवलमुभयकालमस्मै क्षीरं वितरेत्; ततः सप्तमेऽह्नि निर्मासस्त्वगस्थिभूतः केवलं सोमपरिग्रहादेवोच्छ्वसिति, तदहश्च क्षीरेण सुखोष्णोपरिपिच्य तिलमधुकचन्दनानुल्लिप्तैर्ह्वैः पयः पाययेत्, ततोऽष्टमेऽह्नि प्रातरेव क्षीरपरिपिक्तं चन्दनप्रदिग्धगान्त्रं पयः पाययित्वा पांशुशय्यां समुत्सृज्य क्षौमवस्त्रास्तृतायां शय्यायां शाययेत्, ततोऽस्य मांसमाप्याप्यते, त्वक् चावदलति, दन्तनखरोमाणि चास्य पतन्ति; तस्य नवमादिवसात्प्रभृत्युणुतैलाभ्यङ्गः सोमवल्कृषायपरिपेकः; ततो दशमेऽह्न्येतदेव वितरेत्, ततोऽस्य त्वक् स्थिरतासुपैति; एवमेकादशद्वारुशयोर्वर्तते; ततस्तत्रयोदशाहात् प्रभृति सोमवल्कृषायपरिपेकः; एवमाषाडशाद्वर्तते; ततः सप्तदशद्वारुशयोर्दिवसयोर्दशना जायन्ते सिन्धुरिणः स्निग्धवज्रवैद्यैर्यस्फटिकभकाशाः समाः स्थिराः सहिष्णवः। तदा प्रभृति चानवैः शालितण्डुलैः क्षीरयवागृमुपसेवेत यावत् पञ्चविंशतिरिति; ततोऽस्मै द्वाच्छाल्यादौ मृदुसयकालं पयसा, ततोऽस्य नखा जायन्ते विदुमेन्द्रगपकतरुणादित्यप्रकाशाः स्थिराः स्निग्धा लक्षणसपन्नाः केशाश्च सूक्ष्मा जायन्ते, त्वक् च नोत्तोषत्वात्सौषुष्यवैद्यैर्यप्रकाशाः; ऊर्ध्वं च मासात् केशान् वापयेत्, वापायत्वा चांशीरचन्दनकुण्णतिलकलकैः शिरःप्रदिहात् पयसा वा स्नापयेत्, ततोऽस्थानन्तरं समरात्रात् केशा जायन्ते भ्रमराञ्जननिभाः कुञ्चित्वाः स्थिराः स्निग्धाः, ततस्त्रिरात्रात् प्रथमावसथपरिसरात्रिच्छम्य सुदृढं स्थित्वा पुनरेवान्तः प्रविशेत्, ततोऽस्य बलातैलमभ्यङ्गायंश्च वाचयं, यवपिष्टमुदूर्तनार्थं सुखोष्णं च पयः परिपेकार्थं, अजकर्णकृषायमुत्सादनार्थं सांशीरं कृपोदकं स्नानार्थं, चन्दनमनुलेपार्थं, आमलकरसविमिश्राश्चास्य यूपसूपविकल्पाः क्षीरमधुकसिद्धं च कृष्णतिलमवचारणार्थं; एवं दशरात्रं, ततोऽन्यदशरात्रं द्वितीये परिसरे वर्तते; ततस्तृतीये परिसरे स्थिरीकुर्वन्नात्मानमन्यदशरात्रमासीत, किञ्चिदातपपवनान् वा सेवेत्, पुनश्चान्तः प्रविशेत्, न चात्मानमादर्शोऽस्य वा निरीक्षेत् रूपशा-
लित्वात्, ततोऽन्यदशरात्रं क्रोधादीन् परिहरेत्, एवं सर्वेषामुपयोगविकल्पः विशेषतस्तु वल्लीप्रतान्छुपकादयः सोमा ब्राह्मणश्च त्रियवैश्यैर्भक्षयितव्याः। तेषां तु प्रमाणमध्वचतुष्कमुष्टयः ॥१२॥
अथवा सार्थकाल में भोजन करके शान्तिपाठ सुनकर, कुशा की शय्यापर काले मृग की मृगछाला बिछाकर-मित्रों से घिरा हुआ सोये। प्यास लगने पर शीतल जल ही थोड़ा सा पीये। ( भोजन न करने पर दूध ही पीये ) फिर प्रातःकाल उठकर शान्तिपाठ सुनकर, स्वस्तिवाचन करके, गाय का स्पर्श करके पूर्व की भाँति रहे। सोम के जीर्ण होने पर वमन होता है। फिर रक्तमिश्रित कुमियुक्त वमन करनेवाले मनुष्य को सार्थकाल गरम करके ठण्डा किया दूध देवे। फिर तीसरे दिन कुमिमिश्रित मल आता है। इससे वह मनुष्य अनिष्ट-प्रतिग्रह भोजन आदि से मुक्त होकर शुद्ध शरीरवाला होता है। फिर सार्थकाल स्नान किये हुए को पूर्व की तरह दूध देवे। रेशम की चादर बिछाई शय्यापर इसको सुलाये। फिर चौथे दिन इसमें शोथ उत्पन्न होता है। फिर सब अंगों से कुमि निकलते हैं। फिर उसी दिन शय्यापर धूल बिछाकर सोये। सार्थकाल पूर्व की भाँति गरम करके ठण्डा किया दूध दे। इसी तरह पाँचवें और छठे दिन करे। केवल दोनों समय इसको दूध ही देवे। फिर सातवें दिन मांस के बिना, त्वचा और अस्थिमात्र रहते हैं, सोम के पीने के कारण ही बचा रहता है। उस दिन सुहाते हुए गरम दूध से स्नान करके तिल, मुलेहट्टी और चन्दन का लेप शरीर पर कराके दूध पिलाये। फिर आठवें दिन प्रातःकाल में ही दूध से स्नान कराके, चन्दन का शरीर पर लेप कराके, दूध पिलाये। धूल की शय्या को छोड़कर रेशम से बिछाई शय्यापर लिटा देवे। फिर इसका मांस बढ़ने लगता है ( पुष्ट होता है )। त्वचा फटती है, दाँत-नख और रोम गिर जाते हैं। नवें दिन से इसके शरीर पर अणुतैल का अभ्यंग करे, खैर की छाल के कृषाय से स्नान कराये। दसवें दिन इसी प्रकार करे। इससे इसकी त्वचा स्थिर बन जाती है। ग्यारहवें और बारहवें दिन भी इसी प्रकार करे। तेरहवें दिन से लेकर खैर की छाल के कृषाय से स्नान कराये। इस प्रकार सोलहवें दिन तक करे। फिर सत्तरहवें और अठारहवें दिन नोकदार, स्निग्ध, वज्रवैद्यैर्य-स्फटिक-के समान निर्मल, समान, स्थिर, खट्टे आदि का सहन करनेवाले दाँत निकल आते हैं। तब से लेकर पुराने शाली चावलों की कणियाँ से दूध में बनाई यवागू को खाये। पचीसवें दिन तक इसी प्रकार करे। फिर इसको शाली चावलों का नरम भात दूध के साथ दोनों समय देवे। फिर इसके मृग, बौरबहुटी, तरुण सूर्य के समान लाल नख निकल आते हैं। स्थिर, स्निग्ध, सूक्ष्म एवं लक्षणों से युक्त बाल उग आते हैं। नोले कमल, अलसी के फूल, तथा वैद्य के सहस्र वर्णवाली त्वचा हो जाती है। एक मास के पीछे बालों को कटवा दे। बाल कटवा कर खस, चन्दन, काले तिल इनको