भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० २६ ]

चिकित्सास्थानम्

४९९

ब्रह्मवर्षमायुष्यकराणाम्, अहिंसा प्राणवर्षनानामुत्कृष्टतमा ।

चरकः ॥२७,२८॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मेधायुष्कामीयं रसायनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८॥

एकोनत्रिंशत्तमोऽध्यायः

अथातः स्वभावव्याधिप्रतिषेधनीयं रसायनं व्याख्या- स्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे स्वभावव्याधिप्रतिषेधनीय रसायन का व्याख्यान करेंगे - जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।

वि० मन्तव्य—स्वभावतः होनेवाली जरा एवं मृत्यु आदि रोगों का निरोध करने के उपाय इस अध्याय में लिखे गये हैं । युवावस्था के पश्चात् जरा स्वभावतः आती है और जरा के पीछे मृत्यु भी स्वभावतः आती है, परन्तु इन उपायों से कुछ काल के लिये जरा एवं मृत्यु का निरोध किया जा सकता है ॥ १, २ ॥

ब्रह्मादयोऽसृजन् पूर्वममृतं सोमसंज्ञितम् ।

जरामृत्युविनाशाय विधानं तस्य वक्ष्यते ॥३॥

ब्रह्मा आदि देवताओं ने बुढ़ापा और मृत्यु के नाश के लिये पूर्वकाल में सोम संज्ञावाले अमृत को बनाया था । उस सोम का विधान कहा जायेगा ॥३॥

एक एव खलु भगवान् सोमः स्थाननामाकृतिवीर्य- विशेषैश्चतुर्विंशतिधा भिद्यते ॥४॥

सोम वास्तव में एक ही है, परन्तु स्थान, नाम, आकार, वीर्य की भिन्नता से चौबीस प्रकार का हो जाता है ॥४॥

तद्यथा—

अंशुमान् मुळजार्शचैव चन्द्रमा रजतप्रभः ।

दूवोसोमः कनीयार्शच श्वेताक्षः कनकप्रभः ॥५॥

प्रतानवोस्तालवृन्तः करवीरोंऽजवानपि ।

स्वयंप्रभो महासोमो यश्चापि गरुडाहृतः ॥६॥

गायत्रस्त्रष्टुभः पाङ्क्तो जागतः शाकवरस्तथा ।

अग्निष्ठोमो रैवतश्च यथोक्त इति संज्ञितः ॥७॥

गायत्र्या त्रिपदायुक्तो यश्चाडुपतिरुच्यते ।

एते सोमाः समाख्याता वेदोक्तैर्नाभभिः शुभैः ॥८॥

सर्वेषामेव चैतेषामेको विभिरूपासने ।

सर्वं तुल्यगुणार्शचैव विधानं तेषु वक्ष्यते ॥९॥

जैसा कि—अंशुमान्, मुजवान्, चन्द्रमा, रजतप्रभ, दूवी-सोम, कनीयान्, श्वेताक्ष, कनकप्रभ, प्रतानवान्, तालवृन्त, करवीर, अंशवान्, स्वयंप्रभ, महासोम, गरुडाहृत, गायत्र, त्रष्टुभ, पाङ्क्त, जागत, शाकवर, अग्निष्ठोम, रैवत, त्रिपदा गायत्री से युक्त और उडुपति—ये चौबीस सोम वेदोंक शुभ नामों से कहे जाते हैं । इन सब सोमों के सेवन करने की एक ही विधि

है और सबका समान ही गुण है । इनका विधान-सेवन-विधि कही जाती है ॥५-९॥

अतोऽन्यतमं सोममुपयुयुतुः सर्वोपकरणपरिचार- कोपेतः प्रशस्ते देशे त्रिवृतसागरं कारयित्वा हृतदोषः प्रतिसंसृष्टभक्तः प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु अंशु- मन्तमादायाध्वरकल्पेनाहृतमभिषुतमभिहुतं चान्तरागारे- कृतमङ्गलस्वस्तित्वाचनः सोमकन्दं सुवर्णसूच्यं, विदार्य पयो गृह्णीयात् सौवर्णे ( राजते वा ) पात्रेऽञ्जलिमात्रं, ततः सकृदेवोपयुज्जीत नास्वादयन्, तत उपस्पृश्य शेषमप्य- वसाद्य यमनियमाभ्यासमात्मानं संयोज्य वायव्यतोऽभ्यन्त- रतः सुहृद्भिर्हृपास्यमानो विहरेत् ॥१०॥

इनमें से किसी भी एक सोम को पीने की इच्छावाला मनुष्य सब साधन एवं परिचारकों से युक्त, उत्तम स्थान में तीन खण्डवाली (एक कोठरी के अन्दर दूसरी, दूसरी में तीसरी) कोठरी बनवाकर, वमनादि से शरीर के दोषों को निकालकर, पेया आदि कम का पालन करके, प्रशस्त तिथि-करण-मुहूर्त-नक्षत्रों में, याज्ञिक विधि से अंशुमान् सोम को लाकर, मृत्तियों से स्नान कराये एवं अग्नि में दिये हुए सोम को, घर के अन्दर, मंगल ( शान्तिपाठ ) और स्वस्तित्वान्न करके सोमकन्द को सुवर्ण की सुई से (चाकू) से चीरकर, सोने या चाँदी के पात्र में एक अंजलि परिमाण रस को ले ले । इस रस को एकदम से ही पी जाये, यूँट-यूँट करके न पीये । फिर आचमन करके, बचे हुए को जल में फेंककर, अपने को यम-नियम रखते हुए, बाणी को नियमित (मौन) करके, मित्रों के साथ विहार करे—घूमि फिरे, बैठे ।

वक्तव्य—साधन-ग्रां दोग्नी शीलवतीमनातुरां जीवद्वत्स्थां सुप्रतिबिहिततुणधरणपानीयम् पाश्याचमनीयोदककोष्ठं, मणिक-घटपिठरपर्योगकुम्भीकुम्भकुण्डशरावदविकोटोदक्षनपरिचमन्थान-चर्मचेल्लसूत्रकार्पासोणादीनि च, चरक सूत्र० । “प्रशस्तदेश-प्रशस्ते भूमिभागे कृष्णमधुरमृत्तिके सुवर्णमृत्तिके वा परिवाप-पुष्करण्यादीनां जलाशयानामन्यतमस्य कृते ।” वास्तुविद्याकुशलः प्रशस्तं रम्यतमस्तर्क निवार्ता प्रवार्तेकदेशं हठमपगतश्वापदपशु-दंष्ट्रिमृषिकपतंगं सुविभक्तसलिलोल्बलमृत्रवन्ःस्थानस्तानभूमि-महानसमुदुमुखं यथर्तुययनासनान्तरणसंपन्नं कुर्यात् ॥” चरक । विहार चार प्रकार हैं, यथा—गमन, चक्रमण, स्थान, और आसन ॥१०॥

रसायनं पीतवास्तु निवार्ते तन्मनाः शुचिः ।

आसीत् तिष्ठन्न क्रामेच्च न कथंचन संविशेत् ॥११॥

रसायन पीकर मनुष्य वायु रहित स्थान में ( जहाँ सीधी वायु न आये ) रसायन में मन लगाकर, पवित्रता के साथ रहे, बैठे, खड़ा रहे और चले, परन्तु लेटे (खोये) नहीं ॥११॥

सायं वा भुक्तवानुपश्रुतान्तिः कुशग्रन्थायां कृष्णा- जिनोत्तरायां सुहृद्भिर्हृपास्यमानः शयीत, तृषितो वा शीतोदकमात्रां पिबेत् ( अशनायितो वा क्षीरं ); ततः