भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ ८०-२८ ]

खाने से पूर्व स्नान और होम करे। इस प्रकार करने से दस हजार वर्ष की आयु प्राप्त होती है, और युकरथ होता है। हवन करके, बिस् (भिस्) के क्वाथ को मधु और लजा के साथ मिलाकर खाये। यह अत्यर्थ एवं एक सौ हजार वर्ष की आयु देती है, और युकरथ है।

वक्तव्य—बिल्व की इतनी बड़ी महिमा से ही, शायद बिल्वपत्र भगवान् शंकर पर चढ़ाने की प्रथा आर्य-संस्कृति में है। युकरथ—जोड़े हुए रथों में भी जो बरता जाये अर्थात् इनमें किसी प्रकार का परिहार नहीं होता। अथवा जैसे जुड़ा हुआ रथ होने पर तुरन्त कहीं भी जा सकते हैं, उस प्रकार यह रसायन तुरन्त जब इच्छा हो तभी ली जा सकती है, इसके लिये वमनादि कर्म की आवश्यकता नहीं। इसी प्रकार युक्त रथ वस्ति है, जो कि जब जरूरत समझी उसी समय बरती जा सकती है ॥६-१३॥

सुवर्ण पद्मवीजानि मधु लजाः प्रियङ्गवः। गन्व्येन पयसा पीतमलद्भी प्रतिषेधयेत् ॥१४॥ नीलोत्पलदलकवाथो गन्व्येन पयसा श्रुतः।

समुवर्णस्तिलैः सार्धमलद्भीनाशनः स्मृतः ॥१५॥

गन्व्यं पयः सुवर्णं च मधुच्छिद्रं च माक्षिकम्।

पीतं शतसहस्राभिर्हुतं युक्तर्थं स्मृतम् ॥१६॥

सुवर्णं भस्म (या वरक), कमलगढ़ा, मधु, लजा, प्रियंगु, इनको गाय के दूध से पीने पर पाप-दोषाग्नि नष्ट होता है। नीले कमल के पत्तों का क्वाथ गाय के दूध से पकाया हुआ, सुवर्ण और तिल के साथ खाना उत्तम अलद्भी—नाशक है। गाय का दूध, सुवर्ण, मोम और मधु (आमर मधु) पीने पर युक्त रथ रसायन हैं, इसके साथ एक लाख आहुतियों से होम करे ॥

वचाधृतसुवर्णं च बिल्वचूर्णमिति त्रयम्।

मेध्यमायुष्यमारोग्यपुष्टिसौभाग्यवर्धनम् ॥१७॥

वासामूलतुलाकवाथे तैलमावाप्य साधितम्।

हुत्वा सहस्रमन्नीयान्मेध्यमायुष्यमच्यते ॥१८॥

यावकांस्तावकान् खादेदभिभूय यवांस्तथा।

पिप्पलीमधुसंयुक्ताम् शिक्षा चरणवद्धवेत् ॥१९॥

वचाचूर्णं, सुवर्णभस्म और बिल्वचूर्ण इनको बी के साथ चाते। मेधा, आयुष्य, आरोग्य, पुष्टि, और सौभाग्य इससे बढ़ता है। वासामूल के क्वाथ में तैल प्रक्षेप देकर सिद्ध करे। एक हजार आहुति देकर खाये, यह मेध्य और आयुवर्धक कहा जाता है। जो को कूटकर बनाये भक्ष्य को पिप्पली और मधु के साथ खाने पर गुड से सीखे विना ज्ञान होता है, जिस प्रकार कि बाल्यावस्था में घुटने चलने के उपरान्त, विना सीखे पैरों से चलना आ जाता है ॥१७-१९॥

मध्वामलकचूर्णानि सुवर्णमिति च त्रयम् ॥

प्राश्यारिष्टगृहीतोऽपि सुच्यते प्राणसंशयात् ॥२०॥

शतावरीघृतं सम्यगुपयुक्तं दिने दिने।

सखौद्रं समुवर्णं च नरेन्द्रं स्थापयेद्दशे ॥२१॥

गोवन्दना मोहनिका मधुकं माक्षिकं मधु।

सुवर्णमिति संयोगः पेयः सौभाग्यमिच्छता ॥२२॥

पद्मनीलोत्पलकवाथे यष्टीमधुकसंयते।

सर्पिरासादितं गन्व्यं समुवर्णं सदा पिवेत् ॥२३॥

पयश्चानुपिवेत् सिद्धं तेषामेव समुद्धरे।

अलद्भीषनं सदाऽऽयुष्यं राज्ञाय सुभगाय च ॥२४॥

थत्र नोदीरितो मन्त्रो योगेऽवैतेषु साधने।

शब्दिता तत्र सर्वत्र गायत्री त्रिपदा भवेत् ॥२५॥

पाप्मानं नाशयन्त्येता द्युश्चौषधयः श्रियम्।

कुर्युर्नागवलं चापि मनुष्यममरोपमम् ॥२६॥

मधु, आँवले का चूर्ण और सुवर्ण इनको खाकर मृत्यु से पकड़ा हुआ भी मनुष्य प्राण संशय से छूट जाता है। शतावरी-घृत को सुवर्ण और मधु के साथ प्रतिदिन भली प्रकार खाने पर राजा को भी वध में कर देता है। सौभाग्य को चाहनेवाला व्यक्ति गोवन्दन (प्रियंगु), मोहनिका (जिया पोता), मुलेहठी, माक्षिक मधु और सुवर्ण को मिलाकर पीये। लालकमल, नीला कमल, मुलेहठी इनके क्वाथ में सिद्ध किया गाय का घृत सुवर्ण के साथ सदा पीये। और इसके पीछे लाल, नीले कमल और मुलेहठी में सिद्ध किया दूध पीये। यह अलद्भी नाशक, सदा आयुवर्धक, राज्य के लिये और मंगल के लिये है। इन योंगों के बनाने में जहाँ मंत्र का विधान नहीं किया, वहाँ सब स्थानों में तीन पदवाली गायत्री का पाठ करना चाहिये। ये औषधियाँ अलद्भी का नाश करती हैं, और लद्भी को देती हैं। मनुष्यों में हाथियों का वल देती हैं और मनुष्य को देवता के समान बना देती हैं।

वक्तव्य—त्रिपदा गायत्री—“ॐ भूर्भुवःस्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि, धियो योनः प्रचोदयात्” ॥२०-२६॥

सतताध्ययनं वादः परतन्त्रावलोकनम्।

तद्विद्याचार्यसेवा च बुद्धिमेधाकरो गु (ग) णः ॥२७॥

आयुष्यं भोजनं जीर्णं वेगानां चाविधारणम्।

ब्रह्मचर्यमहिंसा च साहसानां च वर्जनम् ॥२८॥

निरन्तर अध्ययन (स्वाध्याय), वाद, दूसरों के ग्रन्थों को देखना, उस विद्या को जाननेवाले आचार्यों की सेवा, ये बुद्धि-मेधा को करनेवाले हैं। पहले भोजन के जीर्ण होने पर भोजन करना, मल-मूत्र के उपस्थित वेगों को न रोकना, ब्रह्मचर्य, अहिंसा और साहसिक कार्यों का त्याग आयुवर्धक है।

वक्तव्य—‘वादे वादे जायते तत्त्वबोधः’ बुद्धि-समझने की शक्ति, मेधा-स्मृति-वारण करने की शक्ति।