भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० २८ ] ६३

चिकित्सास्थानम्

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वमन, विरेचन से शुद्ध होकर घी में जाकर पेया आदि संसर्जन विधि पूरी करके ब्राह्मी स्वरस को लेकर सहस्रपात विधि से होम करके, बल के अनुसार पीये। औषध के जीर्ण होने पर अपराह्ण में नमक रहित यवगू को पीये। दूध जिसको सात्त्व्य हो, वह दूध के साथ यवगू खाये। इस प्रकार सात दिन खाकर ब्रह्मवचस्वी, मेघात्री होता है। दूसरे सात दिन औषध खाकर इच्छित ग्रन्थ को बनाता है, भूला हुआ स्मरण हो जाता है, तीसरे सात दिन सेवन करने से दो बार कहीं सौ बात भी याद हो जाती हैं। इस प्रकार इक्कीस दिन सेवन करने से दारिद्र्य दूर होता है, सरस्वती देवी सामने मूर्ति रूप से खड़ी हो जाती है। सब भूतियाँ (वेद) याद हो जाती हैं। सुनते ही याद करता है, पाँच सौ वर्ष की आयु होती है ॥५॥

ब्राह्मोस्वरसप्रस्थद्वये घृतप्रस्थं विदङ्कृतण्डुलात् कुड्वं द्वे द्वे पले वचामृतयोर्द्वादश हरोतक्यामलकबिभीतकानि इलङ्गपिष्टान्यावाप्यैकध्वं साधयित्वा स्वनुगुणं निदध्यात, ततः पूर्वविधानेन मात्रां यथावलम्पुष्युजोत, जीर्णं पयः सर्पिरोदन इत्याहारः, पूर्ववच्छात्र परीहारः, एतेनोर्ध्व-मधस्तिर्यक् क्रमयो निष्कामन्ति, अलङ्करीयप्रकामति, पुष्करवर्णः स्थिरवयाः श्रुतनिगादी त्रिवर्षं शतायुर्भवति, एतदेव कुष्ठविषमञ्जरापस्मारोन्मादविषभूतग्रहेष्वन्येषु च महान्याधिषु संशोधनमादिशन्ति ॥६॥

ब्राह्मी स्वरस दो प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, विदङ्कृतण्डुल एक कुड्व, वच, गिलोय दो-दो पल, हरङ्ग आँवला और बहेड़ा मिलित बारह पल लेकर इनको बारीक पीसकर एक साथ खिड़ करके, सुरक्षित स्थान पर रख देवे। फिर पूर्व विधि से (वमनादि से शुद्ध होकर पेयादि क्रम का पालन करके) इसको बलानुसार सेवन करे। पचने पर दूध, घी, और भात खाये। पूर्व की भाँति परिहार है। इससे मुख, नासा, गुदा, मूत्र आदि ऊपर एवं नीचे के तथा हाथ पैर आदि सब स्थानों से (स्वचा से) क्रमि निकलते हैं। अलङ्करी दूर होती है, कमल जैसा वर्ण, स्थिर वय, सुनते ही धारण करनेवाला, तीन सौ वर्ष की आयु का होता है। कुष्ठ, विषमञ्जर, अपस्मार, उन्माद, विष-भूत-ग्रह और अन्य महारोगों में यही संशोधन कहा जाता है। (पुष्करवर्णः—पुष्कर पद्मवराटकम्। श्रुतनिगादी—श्रुतग्रहण-शक्तिमान्—इलङ्गः)।

वि० मन्तव्य—मण्डुकपर्णी एवं ब्राह्मी का सेवन करने—४-५ तथा ६ सूत्रों के अनुसार आहार विहार, मात्रा आदि पर ध्यान देवे। प्रायः ब्राह्मी के ७ या १४ सूत्रों का प्रयोग करके पूर्ण लाभ की असफल कामना की जाती है। वचामृतयोः के स्थान पर वचाविद्युतयोः पाठान्तर अधिक संगत है, क्योंकि इस घृत का कुष्ठ आदि रोगों में संशोधनार्थ प्रयोग करने का आदेश है ॥६॥

इतदोष एवागारं प्रविश्य हैमवत्या वचायाः पिण्ड-मासलकमात्रमभिहुतं पयसाऽऽलोड्य पिवेत, जीर्णं पयः सर्पिरोदन इत्याहारः, एवं द्वादशरात्रमुपयुज्जीत, ततोऽस्य ओत्रं त्रिव्रियते द्विरभ्यासात् स्मृतिमान् भवति; त्रिरभ्यासात् श्रुतमादत्ते, चतुर्द्वादशरात्रमुपयुज्य सर्वं तरति क्रिस्चिर्व, तादर्थदर्शनमुत्पद्यते, शतायुश्च भवति। द्वे द्वे पले इतरस्या वचाया निष्कवाध्य पिवेत, पयसा, समानं भोजनं समाः पूर्वेणाशिवश्च ॥७॥

वमनादि से शरीर के दोषों को निकालकर घर में प्रविष्ट होकर श्वेत वच की आँवले के समान मात्रा को होम विधि करके, दूध में घोलकर पीये। इसके जीर्ण होने पर घी, दूध, और भात का भोजन करे। इस प्रकार बारह दिन करे। इससे इसके कान खुल जाते हैं। दो बारह दिन (चौबीस दिन) सेवन करने से स्मृतिशाली हो जाता है। छत्तीस दिन सेवन करने पर सुनते ही याद हो जाता है, अङ्गतालीस दिन सेवन करने पर सब पाप नष्ट हो जाते हैं, एक सौ वर्ष की आयु होती है। दूसरी प्रकार की लाल वच के दो-दो पल दूध के साथ काय करके पीये। भोजन पूर्व की भाँति और फलश्रुति भी पूर्व की भाँति है। (श्रीर पाक विधि से पाक विधि है) ॥७॥

वचाशतपाकं वा सर्पिद्रोणमुपयुज्य पञ्चवर्षं शतायुर्भवति, गलगण्डापचोश्लीपदस्वरमेद्वक्षापहन्तीति ॥८॥

वचा के कल्क से एक सौ बार सिद्ध किये घी की एक द्रोण मात्रा को खाने से पाँच सौ वर्ष की आयु होती है। गलगण्ड-अपची श्लीपद स्वरमेद्व नष्ट हो जाते हैं ॥८॥

अत ऊर्ध्वं प्रवद्यामि आयुष्कामरसायनम्। मन्त्रौषधसमायुक्तं संवत्सरफलप्रदम् ॥९॥ बिल्बस्य चूर्णं पुष्पे तु हुतं वारान् सहस्रशः। श्रीसूक्तेन नरः कल्प्ये समुवर्णं दिने दिने ॥१०॥ सर्षिर्मधुयुतं लिह्यादलक्ष्मीनाशनं परम्। स्वचं विहाय बिल्बस्य मूलकवारं दिने दिने ॥११॥ प्राग्नीयात् पयसा सार्धं स्नात्वा हुत्वा समाहितः। दशसाहस्रमायुष्यं स्मृतं युक्तर्थं भवेत् ॥१२॥ हुत्वा विसानां क्वार्थं तु मधुलाजैश्च संयुतम्। अमोघं शतसाहस्रं युक्तं युक्तर्थं स्मृतम् ॥१३॥ इसके आगे आयुष्काम (आयुर्वर्धक) मंत्र और औषध के साथ, एक वर्ष में फल देनेवाली रसायन को कहूँगा। बिल्ब के चूर्ण को पुष्प नक्षत्र में श्रीसूक्त से (हिरण्यवर्णी हरिणीं सुवर्णरजतसजामित्यादि) एक हजार बार होम करके सुवर्ण के साथ घी और मधु मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल में खाये। यह उत्तम दारिद्र्य नाशक है। बिल्बमूल की छाल उतारकर इसका काय करके प्रतिदिन दूध के साथ खाये।