भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २० ]

कहा भी है—जो मनुष्य दूध के साथ सिद्ध किये शुण के फलों को दूध के साथ खाता है, उसका वय-गिरता नहीं (वय स्थिर रहता है) ॥१३॥

इति श्री सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने सर्वोपचातशमनीयं रसायनचिकित्सितं नाम समविशोऽध्यायः ॥२७॥

अष्टाविंशतितमोऽध्यायः

अथातो मेधायुष्कामीयरसायनचिकित्सितं व्याख्यार्यामः, यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२१॥

अथ इसके आगे मेधायुष्कामीय रसायन चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में मेधा-स्मरण शक्ति तथा आयु की प्राप्ति के उपाय लिखे गये हैं। उन्माद एवं अपस्मार आदि रोगों में भी इन उपायों का प्रयोग करना चाहिये ॥१, २॥

मेधायुष्कामः श्वेतावल्युजफलान्यातपरिगृह्णाण्या- दाय सूक्ष्मचूर्णानि कृत्वा गुडैत सहलोड्य स्नेहकुम्भे सम- रात्रं धान्यराशिं निदध्यात्, समरात्रादुदुग्धस्य हृतदोषस्य यथाबलं पिण्डं प्रयच्छेदनुदिते सूर्ये, उष्णोदकं चानुपि- वेत् भलातकविधानवच्छागारप्रवेशः, जीर्णोषधैश्चापराह्नि हिमाभिरद्विः परिष्कृतान्नः शालीनां षष्ठिकानां च पयमा अर्कुरामधुरेणौदनमरनीयात्, एवं षण्मासानुपयुज्य विग- तपाप्मा बलवर्णोपेतः श्रुतिगादी स्मृतिमानरोगो वषेश- तायुर्भवति। कृष्ठिनं पाण्डुरोगिणमुदरिणं वा कृष्णाया गोमूत्रेणालोड्यार्धपलिकं पिण्डं विगतलौहिल्ये सवितरि पाययेत्, अपराह्नि चात्वणेतानमलकयूषेण सर्पिधमन्तमोद- नमरनीयात्; एवं मासमुपयुज्य स्मृतिमानरोगो वषश- तायुर्भवति। एष एवोपयोगश्चित्रकमूलानां रजन्त्याश्च, चित्रकमूले विशेषो द्विपलिकं पिण्डं परं प्रमाणं, शेषं पूर्ववत्।

मेधा और आयु की कामनावाला मनुष्य श्वेत बावची के फलों को धूप में सुखाकर बारीक चूर्ण बनाये। इस चूर्ण को गुड़ के साथ मिलाकर घी से स्निग्ध घड़े में रखकर सात दिन तक धान्यराशि में रख देवे। सात दिन के पीछे इसको निकालकर दोषों को वमन-विरेचन से शुद्ध करके, बल के अनुसार सूर्य के उगने से पहले ही योग्य मात्रा में खाकर पीछे से गरम पानी पीये। मिलावे के विधान की भाँति घर में प्रवेश करके नियम पाले। औषध के जीर्ण होने पर अपराह्नि में टण्डे जल से स्नान करके शाली या सांठी के भात को शर्करा मिश्रित दूध से खाये। इस प्रकार छः मास तक सेवन करने पर पाप रहित, बल-वर्ण से युक्त; सुनते ही धारण करनेवाला, स्मृतिशाली

नीरोगी, एक सौ वर्ष की आयु का होता है। कुष्ठरोगी, पाण्डुरोगी या उदररोगी को काली बावची के बीजों का चूर्ण गोमूत्र में घोलकर, आधापल की मात्रा में, सूर्य के लाल वर्ण से पहले अर्थात् उषाकाल में ही पिला देवे। अपराह्नि में नमक रहित यूप से घीवाष्पा भात खाये। इस प्रकार एक मास सेवन करने पर स्मृतिशाली, नीरोगी, एक सौ वर्ष की आयु का होता है। यही उपयोग चित्रकमूल और हल्दी का है। चित्रकमूल में इतना भेद है कि इसकी उत्कृष्ट मात्रा दो पल है, शेष पूर्व की भाँति है।

हृतदोष एव प्रतिसंसृष्टभक्तो यथाक्रममागारं प्रविश्य मण्डूकपर्णीस्वरसमादाय सहस्रसंपाताभिहुतं कृत्वा यथा- बलं पयसाऽऽलोड्य पिबेत् पयोऽनुपानं वा, तस्यां जीर्णो- यां यवान्नं पयसोपयुञ्जीत, तिलैर्वा सह भक्ष्येत्रीनं मा- सान् पयोऽनुपानं जीर्णं पयः सर्पिरोदन इत्याहारः, एवमुप- युञ्जानो ब्रह्मवर्चसी श्रुतिनिगादी भवति वर्षशतमायु- र्वाप्नोति। त्रिरात्रोपोषितश्च त्रिरात्रमेनां भक्ष्येत, त्रिरा- त्रादूर्ध्वं पयः सर्पिरिति चोपयुञ्जीत। बिल्बमात्रं पिण्डं वा पयसाऽऽलोड्य पिबेत् एवं द्वादशरात्रमुपयुज्य मेधावी वषशतायुर्भवति ॥४॥

वमन विरेचन से दोषों को निकालकर पेया आदि का संसर्जन क्रम पालकर क्रमशः भोजन पर पहुँच जाने पर आगार (घर) में प्रविष्ट होकर, मण्डूकपर्णी का स्वरस निकालकर सहस्र संपात आहुतियाँ देकर, बल के अनुसार स्वरस को दूध में मिलाकर पीये, अथवा स्वरस को पीसकर पीछे से दूध, पीये। इसके जीर्ण होने पर जो के अन्न को दूध के साथ खाये। अथवा तिल के साथ खाये। दूध का अनुपान बरते, इस प्रकार तीन मास करे। औषध के जीर्ण होने पर दूध, घी और भात का ही भोजन करे। इस प्रकार करने से ब्रह्मवर्चसवाला, सुनते ही धारण करनेवाला होता है, एक सौ वर्ष की आयु होती है। अथवा तीन दिन उपवास करके तीन दिन इस मण्डूकपर्णी को खाये। तीन दिन के पीछे दूध, घी को खाये। ब्राह्मी की या ब्राह्मीकलक की बिल्बमात्रा (एक पल मात्रा) को दूध में घोलकर पीये। इस प्रकार बारह रात्रि खाने पर मेधावी और एक सौ वर्ष की आयु होती है ॥४॥

हृतदोष एवागारं प्रविश्य प्रतिसंसृष्टभक्तो ब्राह्मीस्वर- समादाय सहस्रसंपाताभिहुतं कृत्वा यथाबलमुपयुञ्जीत, जीर्णोषधश्चापराह्नि यवागूमलवणां पिबेत्, क्षीरसाल्यो वा पयसा मुञ्जीत, एवं समरात्रमुपयुज्य ब्रह्मवर्चसी मे- धावी भवति द्वितीयं समरात्रमुपयुज्य ग्रन्थमीषितमुत्पाद- यति नष्टं चास्य प्रादुर्भवति, तृतीयं समरात्रमुपयुज्य द्वि- र्चचारितं शतमप्यवधारयति, एवमेकविंशतिरात्रमुपयुज्या- लदमीरपकामति, मूर्तिमती चैन वाग्देव्यनुप्रविशति, सर्वा- श्वैनं श्रुतय उपतिष्ठन्ति, श्रुतधरः पञ्चवर्षशतायुर्भवति ॥५॥