भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० २७ ]

चिकित्सास्थानम्

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भवेत् समर्थश्च वर्गानासु !” घोड़ा आठ वर्ष की अवस्था में पूर्ण यौवन पर होता है ॥८॥

कारमर्याणां निष्कलुक्तातानामेष एव कल्पः पाशुशय्याभोजनवर्जः; अत्र हि पयसा श्रुतेन भोक्तव्यसमानमन्यन् पूर्णनाशिष्यश्च । शोणितपित्तनिमित्तं विकारेण्वेतेषामुपयोगः ॥९॥

गम्भीर फलों में से गुठली निकालकर इसी बिधि से कहरा करे, परन्तु इसमें धूलि की शय्या और भोजन न बरते। इसमें दूध से पकाया भात खाना चाहिये, और सब एक जैसा है, और फलश्रुति भी पहले की भाँति है। रक्त-पित्तजन्य रोगों में इनका उपयोग है ॥१०॥

यथोक्तमागारं प्रविश्य बलामूलाधर्षपलं पलं वा पयसाऽऽलोड्य पिबेत्, जीर्णं पयःसर्पिरोदन इत्याहारः, एवं द्वादशरात्रमुपयुज्य द्वादशवर्षाणि वयस्तिष्ठति; एवं दिवसशतमुपयुज्य वर्षशतं वयस्तिष्ठति । एवमेवातिबलानागबलाविदारीशतावरीणामुपयोगः । विशेषतस्त्वतिबलामुदकेन, नागबलाचूर्णं मधुना, विदारीचूर्णं क्षीरेण, शतावरीमध्येन, पूर्वणान्यत् समानमाशिष्यश्च समाः । एतास्त्वौषधयो बलकामानां शोषिणां रक्तपित्तोपस्रष्टानां शोणितं छर्दयतां विरिच्यमानानां चोपदिश्यन्ते ॥१०॥

कहे हुए आगार (घर में - सूत्र ० अ० १६।४) में जाकर बला के मूल की आधा पल या पल भर मात्रा को दूध में घोलकर पीये। इसके जीर्ण होने पर दूध, घी और भात का आहार करे। इस प्रकार बारह रात्रि सेवन करने से बारह वर्ष तक वय स्थित रहता है। इसी प्रकार एक सौ दिन सेवन करने से एक सौ वर्ष तक वय स्थिर रहता है। इसी प्रकार से अतिबला, नागबला, विदारी, शतावरी का उपयोग करे, भेद इतना है कि अतिबला को पानी से, नागबला के चूर्ण को मधु से, विदारी के चूर्ण को दूध से, नागबला से शतावरी को भी दूध से लेवे। शेष सब पहले की भाँति, और फलश्रुति भी समान है। ये औषधियाँ बलकी चाहवाले, शोषरोगी, रक्त-पित्त से पीड़ित, रक्त का वलन करनेवाले तथा विरेचन करनेवालों के लिये कही जाती है।

वि० मन्तव्य—पुनर्वसु के शब्दों में यह कुटीप्रावेशिक रसायन सेवन का विधान है च० वि० अ० १ में देखिये ॥ १० ॥

वाराहीमूलतुलाचूर्णं कृत्वा ततो मात्रां मधुयुक्तां पयसाऽऽलोड्य पिबेत्, जीर्णं पयःसर्पिरोदन इत्याहारः, प्रतिषेधोऽत्र पूर्ववत्, प्रयोगमिममुपसेवमानो वर्षशतमायुरबान्नोति स्त्रीषु चाक्षयताम्, पतेनैव चूर्णेन पयोऽव-

चूर्णं शतशीतमभिमध्याज्यमुत्पाद्य मधुयुतमुपयुज्यीत सार्थं प्रातरेककालं वा, जीर्णं पयःसर्पिरोदन इत्याहारः, एवं मासमुपयुज्य वर्षशतायुर्भवति ॥११॥

वाराही कन्द के मूल का चूर्ण एक तुला (एक सौ पल) लेकर इसमें से योग मात्रा को मधु युक्त दूध में घोलकर पीये। इसके जीर्ण होने पर दूध घी चावल का भोजन करे। इसमें अपथ्य पूर्व की भाँति है। इस प्रयोग के उपयोग से एक सौ वर्ष की आयु होती है, स्त्रियों में अक्षयता (शुक्र का नाश न होना) मिलती है। वाराही मूल के चूर्ण को दूध में मिलाकर पकाये। इस पके हुए दूध के मथने से जो घी निकले, उस घी को मधु में मिलाकर प्रातः और सार्थ या एक समय खाये। इसके पवने पर दूध, घी, चावल का भोजन करे। इस प्रकार एक मास सेवन करने पर एक सौ वर्ष की आयु होती है।

वक्तव्य—वाराहीकन्दकल्क, दूध चार गुणा, घी एक द्रोण सिद्ध करे। इस प्रकार इस घृत को एक सौ बार पाक करे। इसमें जल भी चौगुना मिलाना चाहिये, ऐसा कई कहते हैं ॥ ११ ॥

चक्षुःकामः प्राणकामो वा बीजकसाराग्नितमन्थमूलं निष्कवाथं माषप्रस्थं साधयेत्, तस्मिन् सिध्यति चित्रकमूलानामक्षमात्रं कल्कं दद्यादामलकरसचतुर्थभागं, ततः स्निग्धमवतार्य सहस्रसंपाताभिहुतं कृत्वा। शीतीभूतं मधुसर्पिभ्यां संमुख्योपयुज्यीत यथाबलं यथासात्त्व्यं च लवणं परिहरन् भक्षयेत्। जीर्णं मुद्गामलकयूषेणालवणेन घृतवन्तमोदनमरनीयात् पयसा वा मासत्रयम्, एवमाभ्यां प्रयोनाभ्यां चक्षुः सौर्पणं भवत्यनल्पबलः क्षीषु चाक्षयो वर्षशतायुर्भवतीति ॥१२॥

आँखों के तेज या प्राणों की इच्छावाले जो हों, वे विजयसार, साल, अग्निमन्थ इनके मूल का क्वाथ करके इसमें एक प्रस्थ उड़द सिद्ध करें। जब उड़द पक रहे हों, तब इसमें चित्रक मूल का कल्क एक कर्ष आँवले का रस चौथाई भाग मिलाये। उड़दों के पक जाने पर उत्तारकर, सहस्र संपात आहुतियों से होम करके, ठण्डा होने पर इसमें मधु और घृत मिलाकर बल के अनुसार खाये। सात्त्व्य के अनुसार नमक को छोड़ते हुए, भोजन करे। पन जाने पर नमक रहित मृग और आँवले के ग्रूप के साथ घृत मिला भात खाये या दूध के साथ भात खाये। इस प्रकार तीन मास करे। इस प्रकार इन प्रयोगों को करने से आँख गरूरू के समान हो जाती है, बहुत बल आता है, स्त्रियों में निर्बलता अनुभव नहीं होती, एक सौ वर्ष की आयु होती है ॥ १२ ॥

भवति चात्र—

पयसा सह सिद्धानि नरः शणफलाणि यः। भक्षयेत् पयसा सार्थं वयस्तस्य न शीर्यते ॥१३॥