सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ अ० २७ ]
मलिन शरीर पर रसायन का रंग नहीं निखरता। शरीर को नष्ट करनेवाले वातादि शारीरिक दोष, रज-तम मानसिक दोष जो स्थान स्थान पर कहे हैं, उनका निवारण कहता हूँ।
वक्तव्य—पूर्व वयसि, मध्ये वा। इससे चरकोक्त—बाल्य मध्य अवस्था लेनी चाहिये। बाल अवस्था सोलह से लेकर तीस वर्ष तक, मध्य अवस्था—तीस से साठ तक है। इस समय में रसायन सेवन करना उत्तम है ॥ देखिये चरक० वि० अ० ना१२२ ॥३५॥
शीतोदकं पयः क्षौद्रं सर्पिरित्येकशो द्विशः।
त्रिशः समस्तमथवा प्राक् पीतं स्थापयेद्वयः ॥६॥
ठण्डा पानी, दूध, मधु, घी इनको अलग अलग, या किन्हीं दो को, किन्हीं तीन को अथवा सबको मिलाकर भोजन से पूर्व (प्रातः) पीने से वय स्थिर रहती हैं ॥६॥
तत्र विडङ्गतण्डुलचूर्णमाहृत्य यद्यीमधुकमधुयुक्तं यथाबलं शीततोयेनोपयुञ्जीत जीततोयं चानुपिवेदेवमहरहर्मांसं, तदेव मधुयुक्तं भलातकक्वाथेन वा, मधुद्राक्षाक्वाथयुक्तं वा, मध्यासलकरसाभ्यां वा, गुड्वोंकाथेन वा, एवमेते पञ्च प्रयोगा भवन्ति, जीर्णं मुद्रागमलकयूषेणालवणेनापस्तेहेन घृतवन्तमोदनमरनीयात्, एते खल्वर्गसि क्षययन्ति, कृमीनुपधन्ति, ग्रहणधारणशक्तिं जनयन्ति, मासे मासे च प्रयोगे वर्षशतं वर्षशतमायुषोऽभिबुद्धिर्भवति ॥७॥
विडंग-तण्डुल ( वाय विडंग की पिपली ) के चूर्ण को लाकर इसमें मुलेहटी का चूर्ण और मधु मिलाकर बल के अनुसार शीतल जल से खाये। पीछे से भी शीतल जल पीये। इस प्रकार प्रति दिन एक मास तक करे। विडंग तण्डुल चूर्ण को मधु में मिलाकर मिलाने के कषाय से पीये। विडंग-तण्डुल चूर्ण को मधु और द्राक्षा क्वाथ में मिलाकर पीये। विडंग-तण्डुल को मधु और आँवले के साथ अथवा गिलोय के क्वाथ से पीये। इस प्रकार से पाँच प्रयोग हैं। इसके जीर्ण हो जाने पर नमक रहित और घी थोड़ा डालकर मूँग और आँवले के गूथ के साथ घी मिला भात खाये। ये योग अर्श को नष्ट करते हैं। कृमियों को मारते हैं। वस्तु को समझने की ओर धारण शक्ति (स्मृति) को उत्पन्न करते हैं। एक एक मास के प्रयोग से एक सौ वर्ष की आयु बढ़ती है ॥७॥
विडङ्गतण्डुलानां द्रोणं पिष्टपचने पिष्टवदुपस्वेव विगतकषायं स्वित्तमवतार्य द्रपदि पिष्टमायसे हृदे कृम्भे मधुदूकोत्तरं प्रावृषि भस्मराशिवन्तर्गृहे चतुरो मासात्रिदध्यात्, वर्षाविगमे चोदुष्टयोपसंस्कृतशरीरः सहस्रसंपाताभिहुतं कृत्वा प्रातः प्रातयथाबलमुपयुञ्जीत, जीर्णं मुद्रागमलकयूषेणालवणेन घृतवन्तमोदनमरनीयात्, पांशुशय्यायां शयीत, तस्य मासादूर्ध्वं सर्वाभिभ्यः कृमयो
निष्क्रामन्ति, तान्गुतैलेनाभ्यक्तस्य वंशविदलेनापहरेत्, द्वितीये पिपीलिंकास्तृतीये यूकास्तथैवापहरेत्, चतुर्थे दन्तनखरोमाण्यवशीर्ण्यन्ते; पञ्चमे प्रशस्तगुणलक्षणानि जायन्ते, अमातुयं चादित्यप्रकाशं बपुरधिगच्छति, दूराच्छ्रवणानि दर्शनानि चास्य भवन्ति, रजस्तमसी चापोह्यसत्त्वमधिष्ठिति, श्रुतनिगाद्यपूर्वात्पादी गजबलोऽप्यवजवः पुनर्युवाऽष्टौ वर्षशतान्यायुरवाप्नोति; तस्याणुतैलमभ्यङ्गायं, अजकर्णकषायमुत्सादनायं, सोशीरं कृपोदकं स्नानायं, चंदनमुपलेपनायं, भरलातकविधानवदाहारः परिहारश्च ॥८॥
विडंग-तण्डुल की एक द्रोण मात्रा को पिष्ट पचन (भाप से गरम करके, जैसा कि गुजरात में ढोकरा बनाने में करते हैं), विधि से पिठी की तरह उबालकर, कषाय से अलग करके, गल जाने पर निकालकर पत्थर पर पीसकर लोहे के हड्डे घड़े में—मधु-मिश्रित जल पर्याप्त डालकर प्राह्ण काल में राख के ढेर में, अन्दर के घर में चार मास तक रख देये। वर्षा बीत जाने पर इसको निकालकर, शरीर को शुद्ध करके, एक हजार आहुतियाँ सहस्र संपात विधि से देकर, प्रतिदिन प्रातः काल बल के अनुसार उपयोग करे। इसके पच जाने पर नमक रहित मूँग और आँवले के गूथ के साथ घृत मिश्रित भात खाये। धूल की शय्या पर सोये। एक मास के पीछे इसके शरीर से कृमि निकलते हैं। इन पर अणुतैल का अभ्यंग करके बाँध की खपच्छ (चिमटे से इनको अलग करे। दूसरे महीने में चिऊंटी और तीसरे महीने में जूँ निकलती हैं, इनको भी इसी प्रकार हटाये। चौथे मास में दाँत—नख और रोम गिर जाते हैं। पाँचवें महीने में उत्तम लक्षणोंवाले दाँत, नख रोम निकल आते हैं। पाँचवें मास में मनुष्यों से अधिक (दिव्य), सूर्य के समान शरीर हो जाता है। कान और आँख की शक्ति बहुत बढ़ जाती है। रज और तम नष्ट होकर सत्त्व गुण बढ़ जाता है। सुनते ही कहनेवाला, नई नई बात कहनेवाला, घोड़े के समान वेगवान्, हाथी के समान बलवान्, पुनः युवा बनकर आठ सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है। इसको अभ्यंग के लिये अणुतैल, उत्पादन के लिए अजकर्ण (साल) का कषाय, स्नान के लिये खस मिला कुर्प का पानी, लेप के लिए चन्दन बरते। आधार और पारहार (स्याज्य) मिलावे के विधान की भाँति है।
वक्तव्य—विडंग-तण्डुल को पोटली में बाँधकर पानी में लटकाकर भी पका सकते हैं। इसमें पोटली का कुछ भाग पानी से छूता रहेगा। इसी कषाय में मधु मिलाकर घड़े में रखले। आठ वर्ष के घोड़े की उपमा चरक में भी है,—“एतेः प्रयोगैः विधिवद्गुणमान्, वीर्योपल्लो बलवर्णयुक्तः। हर्षान्वितो बाजिव-