सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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उच्छटाचूर्णमप्येवं क्षीरेणोत्तममिष्यते । शतातबुधुच्छटाचूर्णं पेयमेवं बलार्थिना ॥ स्वयंगुप्ताफलैर्युक्तं माषसूपं पिबेन्नरः ॥३४॥ गुप्ताफलं गोखुरकाश्च बीजं
तथोच्छटां गोपयसा विपाच्छ च ।
खजाहृतं शर्करया च युक्तं
पीत्वा नरो हृष्यति सर्वरात्रम् ॥३५॥
काषान् विदारीमपि सोच्छटां च
क्षीरे गवां क्षौद्रघृतोपपन्नम् ।
पीत्वा नरः शर्करया सुयुक्तां
कुलिङ्गवट्टादृष्यति सर्वरात्रम् ॥३६॥
पीपल के फल, मूल, छाल, शुंग ( आगे के कोमल पत्ते ) इनसे सिद्ध किया दूध शर्करा और मधु के साथ पीकर मनुष्य कुलिंग ( चिड़िया ) की भाँति हर्षित ( उत्तेजित ) होता है१ । विदारी मूल के कल्क की गूल्ह के समान मात्रा को गरम किये दूध के साथ पीकर बुद्ध भी युवा की भाँति आचरण करता है । उड़दों की एक पल मात्रा को मधु और घी में मिलाकर, चाटे पीछे से दूध पीये । इसी से मनुष्य शुक्रशाली बनता है । गेहूँ और कौंच को दूध में पकाये, शीतल होने पर इनमें घी मिलाकर खाये, पीछे से दूध पीये । नक, चूहा, मेढक, चिड़िया इनके अण्डों से ( वृषण नहीं, eggless ) बनाया घी पैरों के तल्लु पर मलने से, तब तक बलवान् करता है, जब तक कि मनुष्य पृथ्वी को नहीं छूता । तब तक वह स्त्री सेवन कर सकता है । कौंच और तालमखाने के फल का चूर्ण शर्करा के साथ मिलाकर धारोण दूध के साथ पीने से मनुष्य के शुक्र का क्षय नहीं होता । उच्छटा ( रत्ती श्वेत गुञ्जा ) के चूर्ण को दूध के साथ पीने से भी यही गुण होता है । बल को इच्छावाले को चाहिये कि वह शतावरी और श्वेत घेऊँची के चूर्ण को भी दूध से पीये । कौंच के फलों से मिली उड़द दाल मनुष्य पीये । कौंच के फल, गोखरू के बीज और श्वेत घेऊँचा इनको गाय के दूध में पकाकर मन्थनदण्ड से मिलाये । इसमें शर्करा मिलाकर पीने से मनुष्य सारी रात हर्षित रहता है । उड़द, विदारी, और श्वेत घेऊँची, इनको गाय के दूध में पकाकर इसमें मधु, घी और शर्करा मिलाकर पीने से मनुष्य सारी रात कुलिंग की भाँति हर्षित रहता है ॥२७-३६॥
गृष्टीनां वृद्धवत्सानां माषपर्णभूतां गवाम् ।
यत् क्षीरं तत् प्रशंसन्ति बळकामेषु जन्तुषु ॥३७॥
१ "शमीमक्षवस्थमाहूदः तत्र पुंसवनं कृतम् । तद् वै पुनस्य वेदनम् ॥" अथवेवेद, अक्षवस्थ का उपयोग पुत्रोत्पत्ति में विशेषकर पुंसवन में है ।
क्षीरमांसगणाः सर्वे काकोल्यादिश्च पूजितः । वाजीकरणहेतोर्हि तस्मात्तत्तु प्रयोजयेत् ॥३८॥
प्रथम बार व्याधी, जिसका बछड़ा बड़ा हो गया ( दूध पलेटा हो गया), जिसको उसको उड़द के पत्ते खाने को दिये जाते हैं, उस गाय का दूध बल चाहनेवाले मनुष्यों के लिये उत्तम है । सब प्रकार के दूध, सब प्रकार के मांस, और काकोल्यादिगण, ये वाजीकरण के कारण हैं, इसलिये इनका प्रयोग करे ॥३७-३८॥
एते वाजीकरा योगाः प्रीत्यपत्यबलप्रदाः ।
सेव्या विशुद्धोपचितदेहैः कालाक्षपेक्षया ॥३९॥
ये वाजीकर योग प्रीति (स्त्री प्रीति), सन्तान और बल को देनेवाले हैं । वमन विरेचन से शोषित एवं पुष्ट शरीरवाले मनुष्यों को देश, काल आदि की अपेक्षा से इनका सेवन करना चाहिये ॥३९॥
इति श्रीशुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने क्षीणबलीयवाजीकरणचिकित्सितं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥२६॥
सप्तविंशतितमोऽध्यायः
अथातः सर्वोपधातशमनीयं रसायनं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥
अब इसके आगे सर्वोपधातशमनीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।
वक्तव्य—सर्वोपधातशमनीय शब्द से 'रसायन' शब्द अभिधेत है । रसायन—“लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम् ॥”—रसायन दो प्रकार की है—कुट्टी प्रावेशिक और वातातपिक । यह फिर तीन प्रकार की है—काम्य—प्राणकामः मेधाकामः श्रीकामः—इत्यादि । नैमित्तिक—श्याभिनिमित्त-शिलाजतु, भस्मातक, तुवरकादि सेवन । आज्ञिक-दूध घी का निरन्तर सेवन आदि ।
वि० मन्तव्य—इस अध्याय में रसायन तन्त्र का वर्णन किया गया है ॥१,२॥
पूर्व वयसि मध्ये वा मनुष्यस्य रसायनम् ।
प्रयुञ्जीत भिषक् प्राज्ञः स्तिग्धशुद्धतनोः सदा ॥३॥
नाविशुद्धशरीरस्य युक्तां रासायनो विधिः ।
न भाति वाससि किलष्टे रङ्गयोग इवाहितः ॥४॥
शरीरस्योपधाता ये दोषजा मानसास्तथा ।
उपदिष्टाः प्रदेशेषु तेषां वद्यामि वारणम् ॥५॥
बुद्धिमान् वैद्य, स्तिग्ध एवं शुद्ध शरीरवाले मनुष्य को किशोरावस्था में, अथवा मध्यावस्था में सदा रसायन का सेवन कराये । शरीर का शोधन किये बिना रसायन विधि बरतना ठीक नहीं । मलिन वस्त्र पर जैसे रङ्ग नहीं चढ़ता, इसी प्रकार