सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 548, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें४८२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० २६ ]
वि० मन्तव्य—महता मेदुरोगेण—उपदंश एवं शुक दोध आदि के विकारों से भी क्लीवता हो जाती है। कभी २ तो शिरन ही सड़ जाता है। सर्म्च्छेदेन वा पुनः—शुकवह खोतषु अथवा अण्डवह सिराओं अथवा अण्ड वृषणों के कटने, निकाल देने, बधिया कर देने से भी नपुंसकता हो जाती है। एक स्मरणीय एवं विचारणीय बात है—उक्त प्रकार की क्लीवता नर के समान नारी में भी होती है। मैथुन कर्म की इच्छा न होना अथवा सामर्थ्य न होना नर नारी दोनों में समान रूप से मैथुन की इच्छा एवं सामर्थ्य हो जाते हैं, इसलिये यहाँ पर नर का उद्देश करके जो कुछ भी कहा गया है वह सब नारी के लिये भी समझना चाहिये। अर्थात् नर-नारी दोनों के लिये वाजीकरण का वैसे ही उपयोग किया जाता है जैसे ज्वरादि रोगों में अन्यान्य चिकित्सा का ॥१०-१५॥
विधिर्वाजीकरो यस्तु तं प्रवद्याम्यतः परम् । तिलमाषविदारोणां शालीनां चूर्णमेव वा ॥१६॥ पौण्ड्रकेतुरसैराद् मर्दितं सैन्धवान्वितम् । वराहमेदसा युक्तां घृतेनोत्कारिकां पचेत् ॥१७॥ तां भक्षयित्वा पुरुषो गच्छेत्तु प्रमदाशतम् ।
इसके आगे श्रेष्ठ वाजीकर विधि को कहूँगा। तिल, उड़द, विदारी अथवा शालिधान्य के चूर्ण को पौण्ड्रे या गन्ने के रस में गैयकर (मथकर) इसमें थोड़ा सा सैन्धानमक मिलाकर, सुअर की मेद के साथ घी में उत्कारिका (पूरी या कचौरी) तले। इनको खाकर पुरुष एक सौ स्त्रियों में रमण करता है ॥१६,१७॥ बस्ताण्डसिद्धे पयसि भावितानसकृत्तिलान् ॥१८॥
शिशुमारवसापक्वाः शङ्कुल्यस्तैस्तिलैः कृताः । यः खादेत् पुमान् गच्छेत् स्त्रीणां शातमपूर्ववत् ॥१९॥
बकरे के अण्ड से सिद्ध किये दूध में तिलों को बहुत बार भावित करके दूध के अनुपान से खाये। इन्हीं तिलों की बनाई कचौरियों को शिशुमार की वसा में पकाकर खाये। इस प्रकार जो पुरुष इन योगों का सेवन करता है, वह एकही औरतों में प्रथम सुरत की तरह रमण करता है।
वक्तव्य—“द्वय्यादधुर्णुं क्षीरं क्षोराचोयं चतुर्गुणम् । क्षीरा- वशेषः कर्त्तव्यः क्षीरपाके त्वयं विधिः” ॥१८,१९॥
पिप्पलीलवणोपेते बस्ताण्डे क्षीरसर्पिषि ।
साधिते, भक्षयेद्यस्तु स गच्छेत्तु प्रमदाशतम् ॥२०॥
दूध से निकाले घी में पिप्पली और लवण के साथ बकरे के अण्ड सिद्ध करके जो पुरुष खाता है, वह एक सौ स्त्रियों में रमण कर सकता है ॥२०॥
पिप्पलीमाषशालीनां यवगोधूमयोस्तथा ।
चूर्णभागैः समस्तैस्तु घृते पूपलिकां पचेत् ॥२१॥
तां भक्षयित्वा पीत्वा तु शर्करामधुरं पयः ।
वरश्चटकवद् गच्छेदशवारान्निरन्तरम् ॥२२॥
पिप्पली, उड़द, चावल, जौ और गेहूँ इनके समान भाग चूर्ण से घी में पूपलिका (पूरी) सिद्ध करे। इनको खाकर पीछे से शर्करा से मधुर किया दूध पीये। इससे मनुष्य चिड़िया के समान निरन्तर दस बार मैथुन कर सकता है ॥२१,२२॥ विदाराः सुकृतं चूर्णं स्वरसेनैव भावितम् ।
सपिर्मधुयुतं लीड्वा दश क्षीरधिगच्छति ॥२३॥
एवमासलकं चूर्णं स्वरसेनैव भावितम् ।
शर्करामधुसर्पिर्भिर्युक्तं लीड्वा पयः पिवेत् ॥२४॥
एतेनाशीतिवर्षाऽपि युवेव परिहृष्यति ।
विदारी का अच्छी प्रकार (बारीक) बनाया चूर्ण विदारी के स्वरस से भावित करके (सात बार) घी और मधु के साथ मिलाकर चाटने से मनुष्य दस स्त्रियों में मैथुन करता है। इसी प्रकार आंवले के चूर्ण को आंवले के स्वरस से भावित करके शर्करा, मधु और घी के साथ चाटकर पीछे से दूध पीये। इससे अस्सी वर्ष का बुढ़ा भी युवा की भाँति सत्र होता है ॥२३,२४॥
पिप्पलीलवणोपेते बस्ताण्डे घृतसाधिते ॥२५॥
शिशुमारस्य वा खादेत्तु तं वाजीकरे भूशम् ।
कुलारकूर्मनक्काणामण्डान्येवं तु भक्षयेत् ॥२६॥
महिषर्षभबस्तानां पिवेच्छुकाणि वा नरः ।
घी में तले हुए बकरे के अण्डों का या शिशुमार के अण्ड को पिप्पली और सैन्धानमक के साथ खाये। ये अतिशय वाजीकर हैं। कुलीर (कैकड़ा), कलुआ, नक इनके अण्डों को भी इसी प्रकार खाये। अथवा मनुष्य भैंस, बैल या बकरे के शुक को पीये।
वक्तव्य—आजकल जुन्द वेदस्तर का यूनानी में उपयोग इसी कार्य के लिये होता है। एलोपैथी में अण्डों का चूर्ण, गोली, इजैक्शन वरता जाता है। इनको दूसरी ग्रन्थियों के साथ मिलाकर या अलग बरतते हैं ॥२५,२६॥
अश्वत्थफलमूलत्वकं शुक्लसिद्धं पयो नरः ॥२७॥
पीत्वा सशर्कराक्षौद्रं कुलिङ्गं इव हृष्यति ।
विदारिमूलकलकं तु श्रुतेन पयसा नरः ॥२८॥
उडुम्बरसमं पीत्वा वृद्धोऽपि तरुणायते ।
माषाणां पल्लमेकं तु संयुक्तं क्षौद्रसर्पिषा ॥२९॥
अवलिह्य पयः पीत्वा तेन वाजी भवेन्नरः ।
क्षीरपक्वास्तु गोधूमानात्तमगुमाफलैः सह ॥३०॥
शीतान् घृतयुतान् खादेत्ततः पश्चात् पयः पिवेत् ।
नक्कम्पिकमण्डूकचटकाण्डकृतं घृतम् ॥३१॥
पादाभ्यङ्गनेन कुहते बलं भूमिं तु न स्थूशेत् ।
यावत् स्थूशति नो भूमिं तावद् गच्छेन्निरन्तरम् ।
स्वयंगुमेतुरकयोः फलचूर्णं सशर्करम् ।
धारोष्णेन नरः पीत्वा पयसा न क्षयं ब्रजेत् ॥३१॥