भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 547, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 547

अ० २६ ]

चिकित्सास्थानम्

४४९

कल्यस्योदप्रवयसो वाजीकरणसेविनः । सर्वेष्वुत्तुष्वहरहर्ष्यवायो न निवारितः ॥३॥ स्थविराणां रिरंसूनां स्त्रीणां वाल्लभ्यमिच्छताम् । योयिप्रसङ्गात् स्त्रीणानां क्लीवानामल्पप्रेतसाम् ॥४॥ विलासिनामर्थवतां रूपयौवनशालिनाम् । वृणां च बहुभार्याणां योगा वाजीकरा हिताः ॥५॥

रोग रहित, तरुण (उठती हुई जवानी या भरी हुई जवानी के) एवं वाजीकरण औषधियों का सेवन करनेवाले व्यक्ति के लिये सब मृत्युओं में प्रतिदिन स्त्री सहवास करना मना नहीं है, अर्थात् वह संयोग कर सकता है। बुद्धि-मैथुन की इच्छा-वाले, स्त्रियों का प्यार चाहनेवाले, स्त्रीसेवन से क्षीण हुए, नपुंसक एवं थोड़े शुक्रवाले, विलासी, धनी, रूप एवं यौवन से भरे, बहुत औरतोंवाले पुरुषों के लिये वाजीकर योग उत्तम है।

वाजीकर—“अवाजिनं वाजिनं कुर्वन्ति अनेन इति वाजीकरणम्। येन वाऽत्यर्थं व्यञ्ज्यते स्त्रीषु शुक्रं तद् वाजीकरणम्। वक्ष्यति च-येन नारीषु सामर्थ्यं वाविलक्ष्यते नरः। व्यञ्ज्यते चाधिकं येन वाजीकरणमेव तत् ॥ वाजः शुक्रं, सोऽस्यास्तीति वाजी, अवाजी वाजी क्रियते येन तद् वाजीकरणम्। किंवा वाजो मैथुनम्, उत्कं हि हारीते-वाजो नाम प्रकाशत्वाच्च मैथुनरंजितम्। वाजीकरणसंज्ञाभिः पुंस्त्वमेव प्रवक्ष्यते ॥ शिवदाससेनः ॥३-५॥

सेवमानो यदौचित्याद्वाजीवात्यर्थवेगवान् । नारीस्त्पर्पयते तेन वाजीकरणमुच्यते ॥६॥ भोजनानि विचित्राणि पानानि विविधानि च वाचःश्रोत्रानुगामिन्यस्त्वचः स्पर्शसुखास्वथा ॥७॥ यामिनी सेन्दुतिलका कामिनी नवयौवना । गीतं श्रोत्रमनोहारि ताम्बूलं मदिराः स्रजः ॥८॥ गन्धा मनोज्ञा रूपाणि चित्राण्युपवतानि च । मनसस्त्राप्रतीघातो वाजीकुर्वन्ति मानवम् ॥९॥

जिस के उचितरूप से निरन्तर सेवन करने पर मनुष्य घोड़े के समान अतिशय वेगवान् बनकर स्त्री को संतुष्ट करता है, उससे उसे वाजीकरण कहते हैं। नानाप्रकार के भोजन, अनेक प्रकार के पेय, कानों के लिये प्रिय वाणियाँ, त्वचा के लिये सुखदायी स्पर्श, चन्द्रमा से शोभित रात्रि, उठती जवानीवाली स्त्री, कानों के लिये मनोहर गीत, पान, मदिरा, मालाएँ मन की प्रिय सुगन्धियाँ (अतर), मन के प्रिय एवं नाना प्रकार के रूप, वाग-वगीचे, मन में ग्लानि (उदासी) का न होना मनुष्य को वीर्यवान् बनाते हैं ॥

वक्तव्य—“सुखाः सदायाः परपृष्ठध्याः, कुल्लाः वनान्ता विशदान्पानाः। गान्धर्वशब्दाश्च सुगन्धयोगाः सत्त्वं विशालं निरुपद्रवं च ॥ सिद्धार्थता चाभिनवश्च कामः स्त्रीचायुषं सर्वमिहात्मजस्य। वयो नवं जातमदश्च कालो, हर्षस्य योनिः परमा नरणाम् ॥” चरक० चि० अ० २-३०।

वाजीकरण तीन प्रकार का है—शुक्रजनक, यथा-मांस घृतादि, प्रवर्त्तक-उच्छृष्टा चूर्णादि, जनक और प्रवर्त्तक दोनों गुणवाला यथा-गोधृत, कौंच आदि। देहवलकारक जनक-गोधू-मादि, केवल मनो बलकर-संकल्यादि (संकल्लो ब्रह्मणाम् चरक)। घृत शीर आदि देह और मन दोनों को बल देते हैं। प्रवर्त्तक-विरेचन-क्षरणाभिमुल करनेवाले, न कि शुक्र का क्षय करनेवाले ॥६-८॥

तैस्तैर्भावेरहर्षैस्तु रिरंसोर्मनसि क्षते । द्वेष्ट्यस्त्रीसंप्रयोगाच्च कलैऽयं तन्मानसं स्मृतम् । कटुकाम्लोष्णलवणैरतिमात्रोपसेवितः ॥१०॥ सौम्यधातुक्षयो दुष्टः कलैऽयं तदप्यरं स्मृतम् । अतिऽयवायशोठो यो न च वाजीक्रियारतः ॥११॥ ध्वजभङ्गसव्राणोति तच्छुक्रक्षयहेतुकम् । महता मेढुरोगेण मर्मच्छेदेन वा पुनः ॥१२॥ कलैऽयमेतच्छतुर्थं स्यान्नृणां पुंस्तुलोपघातजम् । जन्मप्रभृति यः स्त्रीषः कलैऽयं तत् सहजं स्मृतम् ॥१३॥ बलिनः लुब्धमनसो निरोधाद् ब्रह्मचर्यतः । षष्ठं कलैऽयं मर्तं तत् स्वरशुक्रनिमित्तजम् ॥१४॥ असाध्यं सहजं कलैऽयं मर्मच्छेदाच्च यद्भवेत् । साध्यानामितरेषां तु कार्यां हेतुविपर्ययः ॥१५॥

भय, अविश्वास, स्त्रीदोष-दर्शन आदि हृदय के लिये अप्रिय भावों से मैथुन करनेवाले पुरुष के मन पर आघात पहुँचने से, और शत्रु स्त्री के संयोग के कारण जो क्लीबता होती है, उसे मानस क्लीबता कहते हैं। कटु, अम्ल, उष्ण रसों के अतिमात्रा में सेवन करने से शुक्र घातु का क्षय देखा जाता है, यह दुश्शा आहार जन्म कलैऽय कहा है। जो अतिशय मैथुन करते हुए-वाजीकर योगों को सेवन नहीं करता, उसे शुक्रक्षय के कारण ध्वजभंग हो जाता है। बहुत बड़े मेढू रोग के कारण अथवा शुक्रवह नाड़ियों (मर्म) के छेदन होने से पुरुष में पुंस्त्व का नाश होने से चौथे प्रकार की क्लीबता होती है। जो मनुष्य जन्म से ही क्लीब है, उसे सहज (जन्मजात) क्लीब कहते हैं। बलवान् परन्तु चंचल चित्त (असंयमो) मनुष्य में ब्रह्मचर्य के कारण छठे प्रकार की क्लीबता होती है, यह क्लीबता शुक्र के कठिन (शुष्क) होने के कारण होती है। इनमें सहज तथा मर्मच्छेद से उत्पन्न क्लीबता असाध्य है। शेषों में कारण से विपरीत चिकित्सा करने से ये साध्य हैं।

वक्तव्य—ब्रह्मचर्यजन्म क्लीबता को देखकर ही अधोगासंग्रह और अधोगहृदय में “त्रय उपस्तम्भाः शरीरस्य, आहारः, स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति” पढ़कर—“मनः शरीरस्थितिमात्रमेव सेवेत् व्यवयं न च तत्परः स्यात् ॥” यह नियम कर दिया। विस्तार के लिये अनुवाद अधोगासंग्रह पृष्ठ-१०२ देखें।