भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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शुश्रुतसंहिता

[ अ० २१ ]

तैल में पारद शब्द से शिगरफ लेना चाहिये। इस तैल को सिद्ध करके अन्त में मोम ( तैल से ८ वॉं अथवा १६ वॉं भाग ) डालकर पिघलावे और अन्त में शिगरफ को अत्यन्त सूक्ष्म पीसकर मिलावे ॥३७॥

लाक्षा रोधं द्वे हरिद्रे शिलाले

कुष्ठं नागं गैरिका वर्णकाश्च ।

मखिष्ठोषा स्यात् सुराप्लोद्भवा च

पत्तङ्गं वै रोचना चाञ्जनं च ॥३८॥

हेमाङ्गत्वक् पाण्डुपत्रं वटरस

कालीयं स्यात् पद्मकं पद्ममध्यम् ।

रक्तं श्वेतं चन्दनं पारदं च

काकोल्यादिः क्षीरपिष्टश्च वर्गः ॥३९॥

मेदो मञ्जा सिकथकं गोघृतं च

दुग्धं क्वाथः क्षीरिणां च दुमाणाम् ।

एतत् सर्वं पक्वमैकध्यतस्तु

वक्राभ्यङ्गे सर्पिरक्तं प्रधानम् ॥४०॥

हृन्याद् व्यङ्गं नीलिंकां चातिवृद्धां

वक्रने जाताः स्फोटिकाश्चापि काश्चित् ।

पद्माकरं निर्बलीकं च वक्रं

कुर्यादेतत् पीनगण्डं मनोज्ञम् ॥४१॥

राजामेतथोषितां चापि नित्यं

कुर्याद्वैद्यस्तत्समानां नृणां च ।

कुष्ठन् वै सर्पिरेतत् प्रधानं

येषां पादे सन्ति वैपादिकाश्च ॥४२॥

लाक्षा, लोष, हल्दी, दारुहल्दी, मैनसिल, हरताल, कुष्ठ, नागकेसर, गेरु, वर्णकर ( कमीला ), मंजीठ, वच, सुराष्ट्रा, ( गोपीचन्दन ), चन्दन, गोरोचना, खोतोजन, आरग्वध की छाल, बरगद का पीला पत्र, कालीयक, पद्माख, कमल का केशर, लालचन्दन, श्वेतचन्दन, पारद और काकोल्यादिगण को दूध में पीसकर, मेद, मञ्जा, मोम, गाय का घी, दूध, बरगद आदि क्षीर वृष्टों का क्वाथ, इन सबको मिलाकर एक साथ पाक करे। इस सिद्ध हुए घृत का मुख पर अर्पण करना श्रेष्ठ है। इसके लगाने से व्यंग, बहुत बड़ी हुई झाँई, मुख पर उत्पन्न हुई जो फुसियाँ हैं वे सब नष्ट होती हैं। यह घृत मुख को कमल के समान सुन्दर, क्षुरियों रहित, भरी गालोंवाला और सुन्दर कर देता है। राजाओं, औरतों एवं इनके समान वैभवशाली पुरुषों के लिये वैद्य इस तैल को बनाये। यह घृत कुष्ठ को नाश करने में तथा जिनके पाँव में बिवाई फटी हो, उसके लिये श्रेष्ठ है ॥३८-४२॥

१—लाक्षा मनोज्ञगजरोघ्रताल

पटंगरक्ताकनकाभिधानाः ।

सौरष्टिका पाण्डुवटस्य पत्रं

कालीयकं पद्मकपद्ममध्यम् ॥

हरीतकीचूर्णमरिष्टपत्रं चूतत्वचं दाडिमपुष्पवृन्तम् । पत्रं च दद्यान्मद्वयन्तिकाया लेपोऽङ्गरागो नरदेवयोग्यः॥ हरङ्ग का चूर्ण, नीम के ( या रीठे के पत्ते ), आम की छाल, अनारगुष्प की कली, मेंहदी के पत्ते, इनका लेप राजाओं के योग्य अंगराग है।

वक्तव्य—हरीतकीपूतमरिष्टपत्रं चूतत्वचो दाडिमवृक्षकलङ्क । एषोऽङ्गरागः कथितोऽङ्गनानाम्, जंघा कषायश्च नराधिपानाम् ॥ घोड़े की सवारी से जंघावें खराब हो जाती हैं, इसलिये अंगराग लगाते हैं।

वि० मन्तव्य—अकेली मेंहदी भी हाथ-पाँव के तलुओं पर अंगराग के लिये और केशों तथा रमश्रु पर राग के लिये लगाई जाती है। इससे बाल लाल हो जाते हैं ॥४३॥

इति शुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मिश्रकचिकित्सितं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥२५॥

पञ्चविंशतितमोऽध्यायः

अथातः क्षीणवलीयं वाजीकरणचिकित्सितं व्याख्यास्यामः। यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे क्षीणवलीय वाजीकरण चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में वाजीकरण तन्त्र का संक्षेपतः वर्णन कर दिया गया है। इसमें—अल्प, दुष्ट, क्षीण तथा विशुष्क ( खर, श्लो० १४ ) शुक्र के आप्पायन, प्रसादन, उपचयन तथा जनन के लिये अनेक आहार विहार एवं औषध लिखे गये हैं और छः प्रकार के क्लैब्य का भी वर्णन किया गया है। भगवान् पुनर्वसु ने भी ( च० चि० अ० २ ) एक ही अध्याय में वाजीकरण तन्त्र का वर्णन पूरा कर दिया है ॥१,२॥

गोरोचनाकुंकुमगैरिकाणि

निशाद्धयं पारदचन्दने च ।

श्रीद्रौत्यमज्जाज्यवसाप्यांसि

सस्वादुवर्गमयवर्णकानि ॥

क्षीरदुग्धानां-वयन्तेन पिष्टवा

संपाचितं ताम्रमये कटाहै ।

अमर्यगयोगेन निवेद्यमाणं

व्यंगं समस्तान् पिडकाश्च सर्पिः ॥

वक्त्रे प्रवृद्धामतिनीलिंकां च

तूर्णं निह्न्यात्तिलकालकांश्च ।

वलीविमुक्तं दृढपीनगण्डं

कुर्याच्च वक्त्रं कमलानुकारि ॥

यह पाठ भेद है। हेमांगत्वक् से कुछ स्वर्णक्षीरी की छाल लेते हैं।