सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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आक, करञ्ज, हिंगोट के बीज, कूड़ा और अमलतास इनको गोमूत्र में पीसकर लेप करे । या इन द्रव्यों से मरिच, नीम के पत्तों के साथ गोमूत्र में सरसों का तेल सिद्ध करके बरते । अभ्यंग के लिये इस तेल में मोम मिलाये । रोगप्रस्त, छोटी तथा कठिन पालियों में पुष्टि एवं कोमलता के लिये निम्न तेल में अभ्यंग करे । लोमड़ी, भैंस आदि आनूप प्राणियों की मजा, वसा, तैल, नूतनघृत (मक्खन) इनको दस गुणे दूध में मिलाकर, काकोल्यादिमधुरगण का और चिरचिता, अश्वगन्धा काभी प्रक्षेप देकर, लाक्षारस मिलाकर सिद्ध करे । सिद्ध हो जाने पर छानकर सुरक्षित स्थान पर रख देवे । भली प्रकार स्वेद करके अतिशय मर्दन की हुई पाली पर इससे अभ्यंग करे । इस तेल से पालियां बिना पीड़ा एवं उपद्रव के बढ़ती हैं । कोमल, पुष्ट, समान, स्निग्ध एवं आभूषणों को सहने योग्य हो जाती हैं ।
वि० मन्तव्य—किसी किसी बालक की कर्णपाली तन्वी-बहुत छोटी एवं कठोर होती है । इस दशा में उसे बड़ी एवं कोमल करने का उपाय किया जाता है, तदर्थ ही लोपाकादि स्नेह का अभ्यङ्ग करने का विधान है ॥१३-२७॥
नीलीदलं भुङ्करजोऽर्जुनत्वक् पिण्डोतकं कृष्णमयोरजश्व ।
बीजोद्भवं साहचरं च पुष्पं
पथ्याक्षधात्रीसहितं विचूर्ण्य ॥१२॥
एकोक्तं सर्वमिदं प्रमाय पङ्कने तुल्यं नलिनीभवेन । संयोज्य पक्षं कलशे निधाय लौहे घटे सदमनि सापिधाने । अनेन तैलं विपचेद्विमिश्रं रसेन भुङ्क्त्रिफलाभवेन ।
आसन्नपाके च परीक्षणार्थं पत्रं बलाकाभवमाक्षिपेत् ॥
भवेद्यदा तद्भ्रमराङ्गनीलं
तदा विपक्वं विनिधाय पात्रे ।
कृष्णायसे मासमवस्थितं तद-
भ्यङ्गयोगात् पलितानि हन्यात् ॥११॥
नील के पत्र, भांगरा, अर्जुन की छाछ, काले फूल का मैनफल, लोह का चूरा, बीजक (असन) और झिण्टी के फूल, हरड, बहेड़ा और आवला इन सबका चूर्ण करके, इनको मिलाकर, नलिनी का कीचड़ समान मात्रा में लेकर, उसके साथ मथकर ढक्कनदार लोहे के घड़े में पन्द्रह दिन सुरक्षित रख देवे । पन्द्रह दिन के पीछे इसमें त्रिफला और भांगरे के क्वाथ और स्वरस (क्रमशः) मिलाकर तैल सिद्ध करे । जब तैल पाक होने के लगभग आ जाये तब इस तैल की परीक्षा के लिये इसमें बलाका (बगला) पक्षी का श्वेत पंख गिराये । जब यह पंख भ्रमर के अंगों के समान नीला (काला) हो जाये,
तब पका हुआ जाने । इसको लौहे के पात्र में एक महीने तक रखले । इस तैल के लगाने से पलितरोग नष्ट होता है ॥१२-११॥ सैरीयजम्बुर्जुनकाश्मरीजं पुष्पं तिलान्मार्कवृत्तबीजे । पुनर्नवे कर्दमकण्टकायां कासीसपिण्डोतकबीजसारम् ॥
फलत्रयं लोहरजोऽञ्जनं च
यष्ट्याह्वयं नीरजसारिवे च ।
पिष्ट्वाऽथ सर्वं सह मोदयन्त्या
साराश्मसा बीजकसंभवेन ॥१३॥
साराश्मसः समभिरैव पश्चात्
प्रस्थैः समालोड्य दशाहगुप्तम् ।
लौहे सुपात्रे विनिधाय तैल-
मक्षोद्भवं तच्छ पचेत् प्रयत्नात् ॥१४॥
पक्वं च लौहेऽभितने निधाय
नस्यं विदध्यात् परिशुद्धकायः ।
अभ्यङ्गयोगैश्च नियुज्यमानं
भुञ्जीत माषान् कुशरामथो वा ॥१५॥
मासोपरिष्टाद्भक्तुच्छिताभाः
केशा भवन्ति भ्रमराञ्जनोभाः ।
केशास्तथाऽन्ये खलतौ भवेयुः
जंरा न चैनं सहसाऽभ्युपैति ॥१६॥
बलं परं संभवतीन्द्रियाणां भवेच्छ चक्रं बलिभिविमुक्तम् । नाकामिनेऽनर्थिनि नाकृताय नैवारये तैलमिदं प्रदेयम् ॥
सैरीय (कांटासरैया), जामुन, अर्जुन और गम्भारी के फूल, तिल, भांगरा, आम की गुठली, पुनर्नवा, लाल पुनर्नवा, कीचड़, कटेरी, कासीस, मैनफल, विजयसार, त्रिफला, लोहचूर्ण, रसांजन या (खोतोजन), मुलेहटी, नीलोत्पल, सारिवा, मल्लिका, इन सबको असन वृक्ष की लकड़ी के क्वाथ के साथ पीसकर इनको सात प्रस्थ असन के क्वाथ में घोलकर दस दिन सुरक्षित रख देवे । फिर लौहे के पात्र में बहेड़े का तैल एक आदक डालकर इस क्वाथ से सिद्ध करे । सिद्ध हुए तैल को लौहे के नये पात्र में रखले । वमनादि से शरीर का शोधन करके इस तैल से नस्य करे । इस तैल का अभ्यंग में ध्यवहार करे । भोजन में उड़द या तिल तण्डुल की खिचड़ी खाये । इस प्रकार एक मास तक इसका सेवन करने पर बाल घने और घुघरीले एवं काले बन जाते हैं । खलति में नये केश उत्पन्न हो जाते हैं, और बुढ़ापा भी एक दम से नहीं आता । इन्द्रियों में उत्तम बल आता है, मुख की झर्रियाँ मिट जाती हैं । न चाहनेवाले, बिना मांगे, कृतघ्न के लिये, शत्रु के लिये यह तैल नहीं देना चाहिये । (तैल को एक मास तक रखकर सिद्ध हो जाने के एक मास पीछे बरते) ।
वि० मन्तव्य—इस तैल में मोदयन्ती शब्द से मेहदी के पत्र लेना अधिक उपयुक्त है । श्लो० ३८-४२ के लाखादि