सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० २५ ]
गृहीत्वा सकफं कुर्याच्छोफं तद्वर्णवेदनम् । उन्मन्थकः सकण्डुको विकारः कफवातजः ॥८॥ वर्षमाने यदा कर्णे कण्डूदाहर्गन्वितः । ओफो भवति पाकश्च त्वकस्थोऽसौ दुःखवर्धनः ॥९॥ कफास्तृकृमयः कुर्युः सर्वपाषा विकारिणीः । स्नाविणीः पिडकाः पाल्यां कण्डूदाहर्गन्विताः ॥१०॥ कफासक्कूमिसंभूतः स विसर्पनितस्ततः । लिह्यात् सगङ्कूलीं पालीं परिलेहीति स स्मृतः ॥११॥ पाल्यामया ह्यमी घोरा नरस्याप्रतिकारिणः । मिथ्याहारविहारस्थ पालीं हिंस्युरपेक्षिताः ॥१२॥ परिपोट सुकुमारता के कारण बहुत समय से छोड़े हुए कान का सहरा छेदन करने से पाली में वेदना युक्त जो कर्ण-शोक होता है, उसको परिपोट कहते हैं । यह परिपोटक वायु के कारण कृष्ण-अर्ण वर्ण तथा स्तन्थ ( कड़ा ) होता है । भारी आभूषणों के पहनने से, थण्डा आदि लगाने से या कुरली आदि में रगड़ पड़ने से पाली में जो शोक-श्याव वर्ण, दाह, पाक, वेदना एवं सुर्खावाला होता है, उसे उत्तात कहते हैं, यह रोग रक्त और पिच से होता है । जयरदस्ती कान का बेथते हुए पाली में वायु प्रकृपित होती है । यह वायु कफ के साथ मिलकर कफ के वर्ण ( श्वेत ) एवं वेदना से युक्त शोक को उत्पन्न करती है । इस रोग को उन्मन्थक कहते हैं, इसमें कण्डु रहती है, यह रोग कफवातजन्य है । कान को बेथते समय कण्डु दाह और सुर्खावाला शोक एवं पाक, त्वचा में हो जाता है, उसे दुःखवर्धन कहते हैं । कफ-रक्त और कूमि विकार करनेवाली, एवं साव युक्त, सरसों जैसी पिडकाओं को पाली में उत्पन्न कर देते हैं । इसमें कण्डु, दाह और वेदना होती है । कफ रक्त और कूमि से उत्पन्न यह पिडका इधर-उधर फैलते हुए शङ्कुली और पाली को चट कर जाती है, इसे परि लेही कहते हैं । चिकित्सा न करनेवाले एवं मिथ्या आहार-विहारवाले पुरुष में पाली के ये मयानक रोग उपेक्षा करने पर पाली को नष्ट कर देते हैं ।
वि० मन्तव्य—बालक को सुकुमार समझकर छठे अथवा सातवें मास में कर्णवेध नहीं किया जाता और १-२-३-४-५ वर्ष का होने पर किया जाता है तो परिपोटक हो जाता या हो सकता है ॥४-१२॥
तस्मादागु भिषक् तेषु स्नेहादिक्रममाचरेत् । तथाऽभ्यङ्गपरीषेकप्रदेहामृग्विमोक्षणम् ॥१३॥ सामान्यतो विशेषाच्च वद्यामन्थभ्यङ्गजनं प्रति । खरमञ्जरियष्ट्याहसंन्धवामरदारुभिः ॥१४॥ सुपिष्टः साश्वतगन्धैश्च मूलकावलगुजैः फलैः । सर्पिस्तैलवसामञ्जसमधुच्छिष्टानि पाचयेत् ॥१५॥ सञ्चौराण्यथ तैः पालीं प्रदिह्यात् परिपोटकैः । मञ्जिष्टातिलयष्ट्याहसारिबोत्पलपदमकैः ॥१६॥
सरोधैः सकदम्बैश्च बलाजम्बवाघ्रपल्लवैः । सिद्धं धान्याम्लसंयुक्तं तैलमुत्पातनाशनम् ॥१७॥ तातपञ्चरवगन्धाकंबाकुचीफलसंन्धवैः । तैलं कुलीरगोधाभ्यां वसया सह पाचितम् ॥१८॥ सरलालाङ्गलीभ्यां च हितमुन्मन्थनाशनम् । तथाऽरमन्तकजम्बवामपत्रकाथेन सेचनम् ॥१९॥ प्रपौण्डरीकमधुकमञ्जिष्टारजनीद्वयेः । चूर्णैरुद्भवैः पालीं तैलात्कामवचूर्णयेत् ॥२०॥ लाक्षाविडङ्गकल्केन तैलं पक्त्वाऽवचारयेत् । स्वित्रां गोमयपिण्डेन प्रदिह्यात् परिलेहिके ॥२१॥ पिष्टैर्विडङ्गैरथवा त्रिवृन्तुचामार्कसंयुतैः । करञ्जेकुदिवीजैर्वा कुटजारवधायुरैः ॥२२॥ सर्वैर्वा सार्पपं तैलं सिद्धं सरिचसंयुतम् । सनिम्बपत्रैरभ्यंगे मधुच्छिष्टानिवतं हितम् ॥२३॥ पालीषु न्याधिद्युक्तासु तन्वीषु कठिनासु च । पुष्टयथं मार्दवाथं च कुर्यादभ्यङ्गजनं स्विदम् ॥२४॥ लोपाकानूपमज्जानं वसां तैलं नवं घृतम् । पचेहजगुणं क्षीरमावाप्य मधुरं गणम् ॥२५॥ अपामागारवगन्धे च तथा लाक्षारसं शुभम् । तस्सिद्धं परिपूतं च स्वनुगुप्तं निधापयेत् ॥२६॥ तेनाभ्यङ्गव्यात् सदा पालीं सुस्विन्नमातिमदिताम् । एतेन पालयो वर्धन्ते नीरुजो निरुपद्रवाः ॥२७॥
मृदुचः पुष्टाः समाः स्निग्धा जायन्ते भूषणक्षमाः । इसलिये वेदा इनमें शीघ्र ही स्नेहादि उपचार करते । एवं अभ्यङ्ग, परिषेक, प्रदेह, रक्त मोक्षण करे । यह सामान्य रूप में कहा, अब प्रत्येक के लिये विशेष रूप में प्रत्येक रोग के लिये अभ्यंग आदि कहते हैं । चिरचिटा, मुलेहटी, सैधव, देव-दारु, अश्वगन्धा, मूली और बावची के फल, इनसे दूध के साथ घी, तैल, वसा, मज्जा और मोम को पकाये । इसका परिपोटक में पाली पर लेप करे । संजीत, तिल, मुलेहटी, सारिवा, कमल, पद्माल, लोध, कदम्ब, बला, जामुन और आम के पत्ते, इनसे कांजों के साथ सिद्ध किया तैल, उत्पात-नाशक है । मुसली, अश्वगन्धा, आक, बावची, मेनफल, सैधव, सरल, कलिहारी, इनसे तैल को, कंकड़ा और गोह इनको वसा के साथ सिद्ध करे । यह तैल उन्मन्थ नाशक है । अरमन्तक, जामुन, आम इनके पत्तों के क्वाथ से परिषेचन करना उत्तम है । लाख और विडङ्ग के कल्क से तैल को पकाकर इससे पाली को स्निग्ध करके, प्रपौण्डरीक, मुलेहटी, मजीत, हल्दी, दारुहल्दी इनके चूर्ण को पाली पर बुरक देवे । परि लेहिक में गोमयपिण्ड ( गीला गोबर ) से स्वेद करके बायविडङ्ग अथवा निशोथ, श्यामा ( काली निशोथ ),