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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २५ ]

गृहीत्वा सकफं कुर्याच्छोफं तद्वर्णवेदनम् । उन्मन्थकः सकण्डुको विकारः कफवातजः ॥८॥ वर्षमाने यदा कर्णे कण्डूदाहर्गन्वितः । ओफो भवति पाकश्च त्वकस्थोऽसौ दुःखवर्धनः ॥९॥ कफास्तृकृमयः कुर्युः सर्वपाषा विकारिणीः । स्नाविणीः पिडकाः पाल्यां कण्डूदाहर्गन्विताः ॥१०॥ कफासक्कूमिसंभूतः स विसर्पनितस्ततः । लिह्यात् सगङ्कूलीं पालीं परिलेहीति स स्मृतः ॥११॥ पाल्यामया ह्यमी घोरा नरस्याप्रतिकारिणः । मिथ्याहारविहारस्थ पालीं हिंस्युरपेक्षिताः ॥१२॥ परिपोट सुकुमारता के कारण बहुत समय से छोड़े हुए कान का सहरा छेदन करने से पाली में वेदना युक्त जो कर्ण-शोक होता है, उसको परिपोट कहते हैं । यह परिपोटक वायु के कारण कृष्ण-अर्ण वर्ण तथा स्तन्थ ( कड़ा ) होता है । भारी आभूषणों के पहनने से, थण्डा आदि लगाने से या कुरली आदि में रगड़ पड़ने से पाली में जो शोक-श्याव वर्ण, दाह, पाक, वेदना एवं सुर्खावाला होता है, उसे उत्तात कहते हैं, यह रोग रक्त और पिच से होता है । जयरदस्ती कान का बेथते हुए पाली में वायु प्रकृपित होती है । यह वायु कफ के साथ मिलकर कफ के वर्ण ( श्वेत ) एवं वेदना से युक्त शोक को उत्पन्न करती है । इस रोग को उन्मन्थक कहते हैं, इसमें कण्डु रहती है, यह रोग कफवातजन्य है । कान को बेथते समय कण्डु दाह और सुर्खावाला शोक एवं पाक, त्वचा में हो जाता है, उसे दुःखवर्धन कहते हैं । कफ-रक्त और कूमि विकार करनेवाली, एवं साव युक्त, सरसों जैसी पिडकाओं को पाली में उत्पन्न कर देते हैं । इसमें कण्डु, दाह और वेदना होती है । कफ रक्त और कूमि से उत्पन्न यह पिडका इधर-उधर फैलते हुए शङ्कुली और पाली को चट कर जाती है, इसे परि लेही कहते हैं । चिकित्सा न करनेवाले एवं मिथ्या आहार-विहारवाले पुरुष में पाली के ये मयानक रोग उपेक्षा करने पर पाली को नष्ट कर देते हैं ।

वि० मन्तव्य—बालक को सुकुमार समझकर छठे अथवा सातवें मास में कर्णवेध नहीं किया जाता और १-२-३-४-५ वर्ष का होने पर किया जाता है तो परिपोटक हो जाता या हो सकता है ॥४-१२॥

तस्मादागु भिषक् तेषु स्नेहादिक्रममाचरेत् । तथाऽभ्यङ्गपरीषेकप्रदेहामृग्विमोक्षणम् ॥१३॥ सामान्यतो विशेषाच्च वद्यामन्थभ्यङ्गजनं प्रति । खरमञ्जरियष्ट्याहसंन्धवामरदारुभिः ॥१४॥ सुपिष्टः साश्वतगन्धैश्च मूलकावलगुजैः फलैः । सर्पिस्तैलवसामञ्जसमधुच्छिष्टानि पाचयेत् ॥१५॥ सञ्चौराण्यथ तैः पालीं प्रदिह्यात् परिपोटकैः । मञ्जिष्टातिलयष्ट्याहसारिबोत्पलपदमकैः ॥१६॥

सरोधैः सकदम्बैश्च बलाजम्बवाघ्रपल्लवैः । सिद्धं धान्याम्लसंयुक्तं तैलमुत्पातनाशनम् ॥१७॥ तातपञ्चरवगन्धाकंबाकुचीफलसंन्धवैः । तैलं कुलीरगोधाभ्यां वसया सह पाचितम् ॥१८॥ सरलालाङ्गलीभ्यां च हितमुन्मन्थनाशनम् । तथाऽरमन्तकजम्बवामपत्रकाथेन सेचनम् ॥१९॥ प्रपौण्डरीकमधुकमञ्जिष्टारजनीद्वयेः । चूर्णैरुद्भवैः पालीं तैलात्कामवचूर्णयेत् ॥२०॥ लाक्षाविडङ्गकल्केन तैलं पक्त्वाऽवचारयेत् । स्वित्रां गोमयपिण्डेन प्रदिह्यात् परिलेहिके ॥२१॥ पिष्टैर्विडङ्गैरथवा त्रिवृन्तुचामार्कसंयुतैः । करञ्जेकुदिवीजैर्वा कुटजारवधायुरैः ॥२२॥ सर्वैर्वा सार्पपं तैलं सिद्धं सरिचसंयुतम् । सनिम्बपत्रैरभ्यंगे मधुच्छिष्टानिवतं हितम् ॥२३॥ पालीषु न्याधिद्युक्तासु तन्वीषु कठिनासु च । पुष्टयथं मार्दवाथं च कुर्यादभ्यङ्गजनं स्विदम् ॥२४॥ लोपाकानूपमज्जानं वसां तैलं नवं घृतम् । पचेहजगुणं क्षीरमावाप्य मधुरं गणम् ॥२५॥ अपामागारवगन्धे च तथा लाक्षारसं शुभम् । तस्सिद्धं परिपूतं च स्वनुगुप्तं निधापयेत् ॥२६॥ तेनाभ्यङ्गव्यात् सदा पालीं सुस्विन्नमातिमदिताम् । एतेन पालयो वर्धन्ते नीरुजो निरुपद्रवाः ॥२७॥

मृदुचः पुष्टाः समाः स्निग्धा जायन्ते भूषणक्षमाः । इसलिये वेदा इनमें शीघ्र ही स्नेहादि उपचार करते । एवं अभ्यङ्ग, परिषेक, प्रदेह, रक्त मोक्षण करे । यह सामान्य रूप में कहा, अब प्रत्येक के लिये विशेष रूप में प्रत्येक रोग के लिये अभ्यंग आदि कहते हैं । चिरचिटा, मुलेहटी, सैधव, देव-दारु, अश्वगन्धा, मूली और बावची के फल, इनसे दूध के साथ घी, तैल, वसा, मज्जा और मोम को पकाये । इसका परिपोटक में पाली पर लेप करे । संजीत, तिल, मुलेहटी, सारिवा, कमल, पद्माल, लोध, कदम्ब, बला, जामुन और आम के पत्ते, इनसे कांजों के साथ सिद्ध किया तैल, उत्पात-नाशक है । मुसली, अश्वगन्धा, आक, बावची, मेनफल, सैधव, सरल, कलिहारी, इनसे तैल को, कंकड़ा और गोह इनको वसा के साथ सिद्ध करे । यह तैल उन्मन्थ नाशक है । अरमन्तक, जामुन, आम इनके पत्तों के क्वाथ से परिषेचन करना उत्तम है । लाख और विडङ्ग के कल्क से तैल को पकाकर इससे पाली को स्निग्ध करके, प्रपौण्डरीक, मुलेहटी, मजीत, हल्दी, दारुहल्दी इनके चूर्ण को पाली पर बुरक देवे । परि लेहिक में गोमयपिण्ड ( गीला गोबर ) से स्वेद करके बायविडङ्ग अथवा निशोथ, श्यामा ( काली निशोथ ),

अ० २५ ]

६२

चिकित्सास्थानम्

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आक, करञ्ज, हिंगोट के बीज, कूड़ा और अमलतास इनको गोमूत्र में पीसकर लेप करे । या इन द्रव्यों से मरिच, नीम के पत्तों के साथ गोमूत्र में सरसों का तेल सिद्ध करके बरते । अभ्यंग के लिये इस तेल में मोम मिलाये । रोगप्रस्त, छोटी तथा कठिन पालियों में पुष्टि एवं कोमलता के लिये निम्न तेल में अभ्यंग करे । लोमड़ी, भैंस आदि आनूप प्राणियों की मजा, वसा, तैल, नूतनघृत (मक्खन) इनको दस गुणे दूध में मिलाकर, काकोल्यादिमधुरगण का और चिरचिता, अश्वगन्धा काभी प्रक्षेप देकर, लाक्षारस मिलाकर सिद्ध करे । सिद्ध हो जाने पर छानकर सुरक्षित स्थान पर रख देवे । भली प्रकार स्वेद करके अतिशय मर्दन की हुई पाली पर इससे अभ्यंग करे । इस तेल से पालियां बिना पीड़ा एवं उपद्रव के बढ़ती हैं । कोमल, पुष्ट, समान, स्निग्ध एवं आभूषणों को सहने योग्य हो जाती हैं ।

वि० मन्तव्य—किसी किसी बालक की कर्णपाली तन्वी-बहुत छोटी एवं कठोर होती है । इस दशा में उसे बड़ी एवं कोमल करने का उपाय किया जाता है, तदर्थ ही लोपाकादि स्नेह का अभ्यङ्ग करने का विधान है ॥१३-२७॥

नीलीदलं भुङ्करजोऽर्जुनत्वक् पिण्डोतकं कृष्णमयोरजश्व ।

बीजोद्भवं साहचरं च पुष्पं

पथ्याक्षधात्रीसहितं विचूर्ण्य ॥१२॥

एकोक्तं सर्वमिदं प्रमाय पङ्कने तुल्यं नलिनीभवेन । संयोज्य पक्षं कलशे निधाय लौहे घटे सदमनि सापिधाने । अनेन तैलं विपचेद्विमिश्रं रसेन भुङ्क्त्रिफलाभवेन ।

आसन्नपाके च परीक्षणार्थं पत्रं बलाकाभवमाक्षिपेत् ॥

भवेद्यदा तद्भ्रमराङ्गनीलं

तदा विपक्वं विनिधाय पात्रे ।

कृष्णायसे मासमवस्थितं तद-

भ्यङ्गयोगात् पलितानि हन्यात् ॥११॥

नील के पत्र, भांगरा, अर्जुन की छाछ, काले फूल का मैनफल, लोह का चूरा, बीजक (असन) और झिण्टी के फूल, हरड, बहेड़ा और आवला इन सबका चूर्ण करके, इनको मिलाकर, नलिनी का कीचड़ समान मात्रा में लेकर, उसके साथ मथकर ढक्कनदार लोहे के घड़े में पन्द्रह दिन सुरक्षित रख देवे । पन्द्रह दिन के पीछे इसमें त्रिफला और भांगरे के क्वाथ और स्वरस (क्रमशः) मिलाकर तैल सिद्ध करे । जब तैल पाक होने के लगभग आ जाये तब इस तैल की परीक्षा के लिये इसमें बलाका (बगला) पक्षी का श्वेत पंख गिराये । जब यह पंख भ्रमर के अंगों के समान नीला (काला) हो जाये,

तब पका हुआ जाने । इसको लौहे के पात्र में एक महीने तक रखले । इस तैल के लगाने से पलितरोग नष्ट होता है ॥१२-११॥ सैरीयजम्बुर्जुनकाश्मरीजं पुष्पं तिलान्मार्कवृत्तबीजे । पुनर्नवे कर्दमकण्टकायां कासीसपिण्डोतकबीजसारम् ॥

फलत्रयं लोहरजोऽञ्जनं च

यष्ट्याह्वयं नीरजसारिवे च ।

पिष्ट्वाऽथ सर्वं सह मोदयन्त्या

साराश्मसा बीजकसंभवेन ॥१३॥

साराश्मसः समभिरैव पश्चात्

प्रस्थैः समालोड्य दशाहगुप्तम् ।

लौहे सुपात्रे विनिधाय तैल-

मक्षोद्भवं तच्छ पचेत् प्रयत्नात् ॥१४॥

पक्वं च लौहेऽभितने निधाय

नस्यं विदध्यात् परिशुद्धकायः ।

अभ्यङ्गयोगैश्च नियुज्यमानं

भुञ्जीत माषान् कुशरामथो वा ॥१५॥

मासोपरिष्टाद्भक्तुच्छिताभाः

केशा भवन्ति भ्रमराञ्जनोभाः ।

केशास्तथाऽन्ये खलतौ भवेयुः

जंरा न चैनं सहसाऽभ्युपैति ॥१६॥

बलं परं संभवतीन्द्रियाणां भवेच्छ चक्रं बलिभिविमुक्तम् । नाकामिनेऽनर्थिनि नाकृताय नैवारये तैलमिदं प्रदेयम् ॥

सैरीय (कांटासरैया), जामुन, अर्जुन और गम्भारी के फूल, तिल, भांगरा, आम की गुठली, पुनर्नवा, लाल पुनर्नवा, कीचड़, कटेरी, कासीस, मैनफल, विजयसार, त्रिफला, लोहचूर्ण, रसांजन या (खोतोजन), मुलेहटी, नीलोत्पल, सारिवा, मल्लिका, इन सबको असन वृक्ष की लकड़ी के क्वाथ के साथ पीसकर इनको सात प्रस्थ असन के क्वाथ में घोलकर दस दिन सुरक्षित रख देवे । फिर लौहे के पात्र में बहेड़े का तैल एक आदक डालकर इस क्वाथ से सिद्ध करे । सिद्ध हुए तैल को लौहे के नये पात्र में रखले । वमनादि से शरीर का शोधन करके इस तैल से नस्य करे । इस तैल का अभ्यंग में ध्यवहार करे । भोजन में उड़द या तिल तण्डुल की खिचड़ी खाये । इस प्रकार एक मास तक इसका सेवन करने पर बाल घने और घुघरीले एवं काले बन जाते हैं । खलति में नये केश उत्पन्न हो जाते हैं, और बुढ़ापा भी एक दम से नहीं आता । इन्द्रियों में उत्तम बल आता है, मुख की झर्रियाँ मिट जाती हैं । न चाहनेवाले, बिना मांगे, कृतघ्न के लिये, शत्रु के लिये यह तैल नहीं देना चाहिये । (तैल को एक मास तक रखकर सिद्ध हो जाने के एक मास पीछे बरते) ।

वि० मन्तव्य—इस तैल में मोदयन्ती शब्द से मेहदी के पत्र लेना अधिक उपयुक्त है । श्लो० ३८-४२ के लाखादि

४६०

शुश्रुतसंहिता

[ अ० २१ ]

तैल में पारद शब्द से शिगरफ लेना चाहिये। इस तैल को सिद्ध करके अन्त में मोम ( तैल से ८ वॉं अथवा १६ वॉं भाग ) डालकर पिघलावे और अन्त में शिगरफ को अत्यन्त सूक्ष्म पीसकर मिलावे ॥३७॥

लाक्षा रोधं द्वे हरिद्रे शिलाले

कुष्ठं नागं गैरिका वर्णकाश्च ।

मखिष्ठोषा स्यात् सुराप्लोद्भवा च

पत्तङ्गं वै रोचना चाञ्जनं च ॥३८॥

हेमाङ्गत्वक् पाण्डुपत्रं वटरस

कालीयं स्यात् पद्मकं पद्ममध्यम् ।

रक्तं श्वेतं चन्दनं पारदं च

काकोल्यादिः क्षीरपिष्टश्च वर्गः ॥३९॥

मेदो मञ्जा सिकथकं गोघृतं च

दुग्धं क्वाथः क्षीरिणां च दुमाणाम् ।

एतत् सर्वं पक्वमैकध्यतस्तु

वक्राभ्यङ्गे सर्पिरक्तं प्रधानम् ॥४०॥

हृन्याद् व्यङ्गं नीलिंकां चातिवृद्धां

वक्रने जाताः स्फोटिकाश्चापि काश्चित् ।

पद्माकरं निर्बलीकं च वक्रं

कुर्यादेतत् पीनगण्डं मनोज्ञम् ॥४१॥

राजामेतथोषितां चापि नित्यं

कुर्याद्वैद्यस्तत्समानां नृणां च ।

कुष्ठन् वै सर्पिरेतत् प्रधानं

येषां पादे सन्ति वैपादिकाश्च ॥४२॥

लाक्षा, लोष, हल्दी, दारुहल्दी, मैनसिल, हरताल, कुष्ठ, नागकेसर, गेरु, वर्णकर ( कमीला ), मंजीठ, वच, सुराष्ट्रा, ( गोपीचन्दन ), चन्दन, गोरोचना, खोतोजन, आरग्वध की छाल, बरगद का पीला पत्र, कालीयक, पद्माख, कमल का केशर, लालचन्दन, श्वेतचन्दन, पारद और काकोल्यादिगण को दूध में पीसकर, मेद, मञ्जा, मोम, गाय का घी, दूध, बरगद आदि क्षीर वृष्टों का क्वाथ, इन सबको मिलाकर एक साथ पाक करे। इस सिद्ध हुए घृत का मुख पर अर्पण करना श्रेष्ठ है। इसके लगाने से व्यंग, बहुत बड़ी हुई झाँई, मुख पर उत्पन्न हुई जो फुसियाँ हैं वे सब नष्ट होती हैं। यह घृत मुख को कमल के समान सुन्दर, क्षुरियों रहित, भरी गालोंवाला और सुन्दर कर देता है। राजाओं, औरतों एवं इनके समान वैभवशाली पुरुषों के लिये वैद्य इस तैल को बनाये। यह घृत कुष्ठ को नाश करने में तथा जिनके पाँव में बिवाई फटी हो, उसके लिये श्रेष्ठ है ॥३८-४२॥

१—लाक्षा मनोज्ञगजरोघ्रताल

पटंगरक्ताकनकाभिधानाः ।

सौरष्टिका पाण्डुवटस्य पत्रं

कालीयकं पद्मकपद्ममध्यम् ॥

हरीतकीचूर्णमरिष्टपत्रं चूतत्वचं दाडिमपुष्पवृन्तम् । पत्रं च दद्यान्मद्वयन्तिकाया लेपोऽङ्गरागो नरदेवयोग्यः॥ हरङ्ग का चूर्ण, नीम के ( या रीठे के पत्ते ), आम की छाल, अनारगुष्प की कली, मेंहदी के पत्ते, इनका लेप राजाओं के योग्य अंगराग है।

वक्तव्य—हरीतकीपूतमरिष्टपत्रं चूतत्वचो दाडिमवृक्षकलङ्क । एषोऽङ्गरागः कथितोऽङ्गनानाम्, जंघा कषायश्च नराधिपानाम् ॥ घोड़े की सवारी से जंघावें खराब हो जाती हैं, इसलिये अंगराग लगाते हैं।

वि० मन्तव्य—अकेली मेंहदी भी हाथ-पाँव के तलुओं पर अंगराग के लिये और केशों तथा रमश्रु पर राग के लिये लगाई जाती है। इससे बाल लाल हो जाते हैं ॥४३॥

इति शुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मिश्रकचिकित्सितं नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥२५॥

पञ्चविंशतितमोऽध्यायः

अथातः क्षीणवलीयं वाजीकरणचिकित्सितं व्याख्यास्यामः। यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे क्षीणवलीय वाजीकरण चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में वाजीकरण तन्त्र का संक्षेपतः वर्णन कर दिया गया है। इसमें—अल्प, दुष्ट, क्षीण तथा विशुष्क ( खर, श्लो० १४ ) शुक्र के आप्पायन, प्रसादन, उपचयन तथा जनन के लिये अनेक आहार विहार एवं औषध लिखे गये हैं और छः प्रकार के क्लैब्य का भी वर्णन किया गया है। भगवान् पुनर्वसु ने भी ( च० चि० अ० २ ) एक ही अध्याय में वाजीकरण तन्त्र का वर्णन पूरा कर दिया है ॥१,२॥

गोरोचनाकुंकुमगैरिकाणि

निशाद्धयं पारदचन्दने च ।

श्रीद्रौत्यमज्जाज्यवसाप्यांसि

सस्वादुवर्गमयवर्णकानि ॥

क्षीरदुग्धानां-वयन्तेन पिष्टवा

संपाचितं ताम्रमये कटाहै ।

अमर्यगयोगेन निवेद्यमाणं

व्यंगं समस्तान् पिडकाश्च सर्पिः ॥

वक्त्रे प्रवृद्धामतिनीलिंकां च

तूर्णं निह्न्यात्तिलकालकांश्च ।

वलीविमुक्तं दृढपीनगण्डं

कुर्याच्च वक्त्रं कमलानुकारि ॥

यह पाठ भेद है। हेमांगत्वक् से कुछ स्वर्णक्षीरी की छाल लेते हैं।

अ० २६ ]

चिकित्सास्थानम्

४४९

कल्यस्योदप्रवयसो वाजीकरणसेविनः । सर्वेष्वुत्तुष्वहरहर्ष्यवायो न निवारितः ॥३॥ स्थविराणां रिरंसूनां स्त्रीणां वाल्लभ्यमिच्छताम् । योयिप्रसङ्गात् स्त्रीणानां क्लीवानामल्पप्रेतसाम् ॥४॥ विलासिनामर्थवतां रूपयौवनशालिनाम् । वृणां च बहुभार्याणां योगा वाजीकरा हिताः ॥५॥

रोग रहित, तरुण (उठती हुई जवानी या भरी हुई जवानी के) एवं वाजीकरण औषधियों का सेवन करनेवाले व्यक्ति के लिये सब मृत्युओं में प्रतिदिन स्त्री सहवास करना मना नहीं है, अर्थात् वह संयोग कर सकता है। बुद्धि-मैथुन की इच्छा-वाले, स्त्रियों का प्यार चाहनेवाले, स्त्रीसेवन से क्षीण हुए, नपुंसक एवं थोड़े शुक्रवाले, विलासी, धनी, रूप एवं यौवन से भरे, बहुत औरतोंवाले पुरुषों के लिये वाजीकर योग उत्तम है।

वाजीकर—“अवाजिनं वाजिनं कुर्वन्ति अनेन इति वाजीकरणम्। येन वाऽत्यर्थं व्यञ्ज्यते स्त्रीषु शुक्रं तद् वाजीकरणम्। वक्ष्यति च-येन नारीषु सामर्थ्यं वाविलक्ष्यते नरः। व्यञ्ज्यते चाधिकं येन वाजीकरणमेव तत् ॥ वाजः शुक्रं, सोऽस्यास्तीति वाजी, अवाजी वाजी क्रियते येन तद् वाजीकरणम्। किंवा वाजो मैथुनम्, उत्कं हि हारीते-वाजो नाम प्रकाशत्वाच्च मैथुनरंजितम्। वाजीकरणसंज्ञाभिः पुंस्त्वमेव प्रवक्ष्यते ॥ शिवदाससेनः ॥३-५॥

सेवमानो यदौचित्याद्वाजीवात्यर्थवेगवान् । नारीस्त्पर्पयते तेन वाजीकरणमुच्यते ॥६॥ भोजनानि विचित्राणि पानानि विविधानि च वाचःश्रोत्रानुगामिन्यस्त्वचः स्पर्शसुखास्वथा ॥७॥ यामिनी सेन्दुतिलका कामिनी नवयौवना । गीतं श्रोत्रमनोहारि ताम्बूलं मदिराः स्रजः ॥८॥ गन्धा मनोज्ञा रूपाणि चित्राण्युपवतानि च । मनसस्त्राप्रतीघातो वाजीकुर्वन्ति मानवम् ॥९॥

जिस के उचितरूप से निरन्तर सेवन करने पर मनुष्य घोड़े के समान अतिशय वेगवान् बनकर स्त्री को संतुष्ट करता है, उससे उसे वाजीकरण कहते हैं। नानाप्रकार के भोजन, अनेक प्रकार के पेय, कानों के लिये प्रिय वाणियाँ, त्वचा के लिये सुखदायी स्पर्श, चन्द्रमा से शोभित रात्रि, उठती जवानीवाली स्त्री, कानों के लिये मनोहर गीत, पान, मदिरा, मालाएँ मन की प्रिय सुगन्धियाँ (अतर), मन के प्रिय एवं नाना प्रकार के रूप, वाग-वगीचे, मन में ग्लानि (उदासी) का न होना मनुष्य को वीर्यवान् बनाते हैं ॥

वक्तव्य—“सुखाः सदायाः परपृष्ठध्याः, कुल्लाः वनान्ता विशदान्पानाः। गान्धर्वशब्दाश्च सुगन्धयोगाः सत्त्वं विशालं निरुपद्रवं च ॥ सिद्धार्थता चाभिनवश्च कामः स्त्रीचायुषं सर्वमिहात्मजस्य। वयो नवं जातमदश्च कालो, हर्षस्य योनिः परमा नरणाम् ॥” चरक० चि० अ० २-३०।

वाजीकरण तीन प्रकार का है—शुक्रजनक, यथा-मांस घृतादि, प्रवर्त्तक-उच्छृष्टा चूर्णादि, जनक और प्रवर्त्तक दोनों गुणवाला यथा-गोधृत, कौंच आदि। देहवलकारक जनक-गोधू-मादि, केवल मनो बलकर-संकल्यादि (संकल्लो ब्रह्मणाम् चरक)। घृत शीर आदि देह और मन दोनों को बल देते हैं। प्रवर्त्तक-विरेचन-क्षरणाभिमुल करनेवाले, न कि शुक्र का क्षय करनेवाले ॥६-८॥

तैस्तैर्भावेरहर्षैस्तु रिरंसोर्मनसि क्षते । द्वेष्ट्यस्त्रीसंप्रयोगाच्च कलैऽयं तन्मानसं स्मृतम् । कटुकाम्लोष्णलवणैरतिमात्रोपसेवितः ॥१०॥ सौम्यधातुक्षयो दुष्टः कलैऽयं तदप्यरं स्मृतम् । अतिऽयवायशोठो यो न च वाजीक्रियारतः ॥११॥ ध्वजभङ्गसव्राणोति तच्छुक्रक्षयहेतुकम् । महता मेढुरोगेण मर्मच्छेदेन वा पुनः ॥१२॥ कलैऽयमेतच्छतुर्थं स्यान्नृणां पुंस्तुलोपघातजम् । जन्मप्रभृति यः स्त्रीषः कलैऽयं तत् सहजं स्मृतम् ॥१३॥ बलिनः लुब्धमनसो निरोधाद् ब्रह्मचर्यतः । षष्ठं कलैऽयं मर्तं तत् स्वरशुक्रनिमित्तजम् ॥१४॥ असाध्यं सहजं कलैऽयं मर्मच्छेदाच्च यद्भवेत् । साध्यानामितरेषां तु कार्यां हेतुविपर्ययः ॥१५॥

भय, अविश्वास, स्त्रीदोष-दर्शन आदि हृदय के लिये अप्रिय भावों से मैथुन करनेवाले पुरुष के मन पर आघात पहुँचने से, और शत्रु स्त्री के संयोग के कारण जो क्लीबता होती है, उसे मानस क्लीबता कहते हैं। कटु, अम्ल, उष्ण रसों के अतिमात्रा में सेवन करने से शुक्र घातु का क्षय देखा जाता है, यह दुश्शा आहार जन्म कलैऽय कहा है। जो अतिशय मैथुन करते हुए-वाजीकर योगों को सेवन नहीं करता, उसे शुक्रक्षय के कारण ध्वजभंग हो जाता है। बहुत बड़े मेढू रोग के कारण अथवा शुक्रवह नाड़ियों (मर्म) के छेदन होने से पुरुष में पुंस्त्व का नाश होने से चौथे प्रकार की क्लीबता होती है। जो मनुष्य जन्म से ही क्लीब है, उसे सहज (जन्मजात) क्लीब कहते हैं। बलवान् परन्तु चंचल चित्त (असंयमो) मनुष्य में ब्रह्मचर्य के कारण छठे प्रकार की क्लीबता होती है, यह क्लीबता शुक्र के कठिन (शुष्क) होने के कारण होती है। इनमें सहज तथा मर्मच्छेद से उत्पन्न क्लीबता असाध्य है। शेषों में कारण से विपरीत चिकित्सा करने से ये साध्य हैं।

वक्तव्य—ब्रह्मचर्यजन्म क्लीबता को देखकर ही अधोगासंग्रह और अधोगहृदय में “त्रय उपस्तम्भाः शरीरस्य, आहारः, स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति” पढ़कर—“मनः शरीरस्थितिमात्रमेव सेवेत् व्यवयं न च तत्परः स्यात् ॥” यह नियम कर दिया। विस्तार के लिये अनुवाद अधोगासंग्रह पृष्ठ-१०२ देखें।

४८२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० २६ ]

वि० मन्तव्य—महता मेदुरोगेण—उपदंश एवं शुक दोध आदि के विकारों से भी क्लीवता हो जाती है। कभी २ तो शिरन ही सड़ जाता है। सर्म्च्छेदेन वा पुनः—शुकवह खोतषु अथवा अण्डवह सिराओं अथवा अण्ड वृषणों के कटने, निकाल देने, बधिया कर देने से भी नपुंसकता हो जाती है। एक स्मरणीय एवं विचारणीय बात है—उक्त प्रकार की क्लीवता नर के समान नारी में भी होती है। मैथुन कर्म की इच्छा न होना अथवा सामर्थ्य न होना नर नारी दोनों में समान रूप से मैथुन की इच्छा एवं सामर्थ्य हो जाते हैं, इसलिये यहाँ पर नर का उद्देश करके जो कुछ भी कहा गया है वह सब नारी के लिये भी समझना चाहिये। अर्थात् नर-नारी दोनों के लिये वाजीकरण का वैसे ही उपयोग किया जाता है जैसे ज्वरादि रोगों में अन्यान्य चिकित्सा का ॥१०-१५॥

विधिर्वाजीकरो यस्तु तं प्रवद्याम्यतः परम् । तिलमाषविदारोणां शालीनां चूर्णमेव वा ॥१६॥ पौण्ड्रकेतुरसैराद् मर्दितं सैन्धवान्वितम् । वराहमेदसा युक्तां घृतेनोत्कारिकां पचेत् ॥१७॥ तां भक्षयित्वा पुरुषो गच्छेत्तु प्रमदाशतम् ।

इसके आगे श्रेष्ठ वाजीकर विधि को कहूँगा। तिल, उड़द, विदारी अथवा शालिधान्य के चूर्ण को पौण्ड्रे या गन्ने के रस में गैयकर (मथकर) इसमें थोड़ा सा सैन्धानमक मिलाकर, सुअर की मेद के साथ घी में उत्कारिका (पूरी या कचौरी) तले। इनको खाकर पुरुष एक सौ स्त्रियों में रमण करता है ॥१६,१७॥ बस्ताण्डसिद्धे पयसि भावितानसकृत्तिलान् ॥१८॥

शिशुमारवसापक्वाः शङ्कुल्यस्तैस्तिलैः कृताः । यः खादेत् पुमान् गच्छेत् स्त्रीणां शातमपूर्ववत् ॥१९॥

बकरे के अण्ड से सिद्ध किये दूध में तिलों को बहुत बार भावित करके दूध के अनुपान से खाये। इन्हीं तिलों की बनाई कचौरियों को शिशुमार की वसा में पकाकर खाये। इस प्रकार जो पुरुष इन योगों का सेवन करता है, वह एकही औरतों में प्रथम सुरत की तरह रमण करता है।

वक्तव्य—“द्वय्यादधुर्णुं क्षीरं क्षोराचोयं चतुर्गुणम् । क्षीरा- वशेषः कर्त्तव्यः क्षीरपाके त्वयं विधिः” ॥१८,१९॥

पिप्पलीलवणोपेते बस्ताण्डे क्षीरसर्पिषि ।

साधिते, भक्षयेद्यस्तु स गच्छेत्तु प्रमदाशतम् ॥२०॥

दूध से निकाले घी में पिप्पली और लवण के साथ बकरे के अण्ड सिद्ध करके जो पुरुष खाता है, वह एक सौ स्त्रियों में रमण कर सकता है ॥२०॥

पिप्पलीमाषशालीनां यवगोधूमयोस्तथा ।

चूर्णभागैः समस्तैस्तु घृते पूपलिकां पचेत् ॥२१॥

तां भक्षयित्वा पीत्वा तु शर्करामधुरं पयः ।

वरश्चटकवद् गच्छेदशवारान्निरन्तरम् ॥२२॥

पिप्पली, उड़द, चावल, जौ और गेहूँ इनके समान भाग चूर्ण से घी में पूपलिका (पूरी) सिद्ध करे। इनको खाकर पीछे से शर्करा से मधुर किया दूध पीये। इससे मनुष्य चिड़िया के समान निरन्तर दस बार मैथुन कर सकता है ॥२१,२२॥ विदाराः सुकृतं चूर्णं स्वरसेनैव भावितम् ।

सपिर्मधुयुतं लीड्वा दश क्षीरधिगच्छति ॥२३॥

एवमासलकं चूर्णं स्वरसेनैव भावितम् ।

शर्करामधुसर्पिर्भिर्युक्तं लीड्वा पयः पिवेत् ॥२४॥

एतेनाशीतिवर्षाऽपि युवेव परिहृष्यति ।

विदारी का अच्छी प्रकार (बारीक) बनाया चूर्ण विदारी के स्वरस से भावित करके (सात बार) घी और मधु के साथ मिलाकर चाटने से मनुष्य दस स्त्रियों में मैथुन करता है। इसी प्रकार आंवले के चूर्ण को आंवले के स्वरस से भावित करके शर्करा, मधु और घी के साथ चाटकर पीछे से दूध पीये। इससे अस्सी वर्ष का बुढ़ा भी युवा की भाँति सत्र होता है ॥२३,२४॥

पिप्पलीलवणोपेते बस्ताण्डे घृतसाधिते ॥२५॥

शिशुमारस्य वा खादेत्तु तं वाजीकरे भूशम् ।

कुलारकूर्मनक्काणामण्डान्येवं तु भक्षयेत् ॥२६॥

महिषर्षभबस्तानां पिवेच्छुकाणि वा नरः ।

घी में तले हुए बकरे के अण्डों का या शिशुमार के अण्ड को पिप्पली और सैन्धानमक के साथ खाये। ये अतिशय वाजीकर हैं। कुलीर (कैकड़ा), कलुआ, नक इनके अण्डों को भी इसी प्रकार खाये। अथवा मनुष्य भैंस, बैल या बकरे के शुक को पीये।

वक्तव्य—आजकल जुन्द वेदस्तर का यूनानी में उपयोग इसी कार्य के लिये होता है। एलोपैथी में अण्डों का चूर्ण, गोली, इजैक्शन वरता जाता है। इनको दूसरी ग्रन्थियों के साथ मिलाकर या अलग बरतते हैं ॥२५,२६॥

अश्वत्थफलमूलत्वकं शुक्लसिद्धं पयो नरः ॥२७॥

पीत्वा सशर्कराक्षौद्रं कुलिङ्गं इव हृष्यति ।

विदारिमूलकलकं तु श्रुतेन पयसा नरः ॥२८॥

उडुम्बरसमं पीत्वा वृद्धोऽपि तरुणायते ।

माषाणां पल्लमेकं तु संयुक्तं क्षौद्रसर्पिषा ॥२९॥

अवलिह्य पयः पीत्वा तेन वाजी भवेन्नरः ।

क्षीरपक्वास्तु गोधूमानात्तमगुमाफलैः सह ॥३०॥

शीतान् घृतयुतान् खादेत्ततः पश्चात् पयः पिवेत् ।

नक्कम्पिकमण्डूकचटकाण्डकृतं घृतम् ॥३१॥

पादाभ्यङ्गनेन कुहते बलं भूमिं तु न स्थूशेत् ।

यावत् स्थूशति नो भूमिं तावद् गच्छेन्निरन्तरम् ।

स्वयंगुमेतुरकयोः फलचूर्णं सशर्करम् ।

धारोष्णेन नरः पीत्वा पयसा न क्षयं ब्रजेत् ॥३१॥

अ० २७ ]

चिकित्सास्थानम्

४४३

उच्छटाचूर्णमप्येवं क्षीरेणोत्तममिष्यते । शतातबुधुच्छटाचूर्णं पेयमेवं बलार्थिना ॥ स्वयंगुप्ताफलैर्युक्तं माषसूपं पिबेन्नरः ॥३४॥ गुप्ताफलं गोखुरकाश्च बीजं

तथोच्छटां गोपयसा विपाच्छ च ।

खजाहृतं शर्करया च युक्तं

पीत्वा नरो हृष्यति सर्वरात्रम् ॥३५॥

काषान् विदारीमपि सोच्छटां च

क्षीरे गवां क्षौद्रघृतोपपन्नम् ।

पीत्वा नरः शर्करया सुयुक्तां

कुलिङ्गवट्टादृष्यति सर्वरात्रम् ॥३६॥

पीपल के फल, मूल, छाल, शुंग ( आगे के कोमल पत्ते ) इनसे सिद्ध किया दूध शर्करा और मधु के साथ पीकर मनुष्य कुलिंग ( चिड़िया ) की भाँति हर्षित ( उत्तेजित ) होता है१ । विदारी मूल के कल्क की गूल्ह के समान मात्रा को गरम किये दूध के साथ पीकर बुद्ध भी युवा की भाँति आचरण करता है । उड़दों की एक पल मात्रा को मधु और घी में मिलाकर, चाटे पीछे से दूध पीये । इसी से मनुष्य शुक्रशाली बनता है । गेहूँ और कौंच को दूध में पकाये, शीतल होने पर इनमें घी मिलाकर खाये, पीछे से दूध पीये । नक, चूहा, मेढक, चिड़िया इनके अण्डों से ( वृषण नहीं, eggless ) बनाया घी पैरों के तल्लु पर मलने से, तब तक बलवान् करता है, जब तक कि मनुष्य पृथ्वी को नहीं छूता । तब तक वह स्त्री सेवन कर सकता है । कौंच और तालमखाने के फल का चूर्ण शर्करा के साथ मिलाकर धारोण दूध के साथ पीने से मनुष्य के शुक्र का क्षय नहीं होता । उच्छटा ( रत्ती श्वेत गुञ्जा ) के चूर्ण को दूध के साथ पीने से भी यही गुण होता है । बल को इच्छावाले को चाहिये कि वह शतावरी और श्वेत घेऊँची के चूर्ण को भी दूध से पीये । कौंच के फलों से मिली उड़द दाल मनुष्य पीये । कौंच के फल, गोखरू के बीज और श्वेत घेऊँचा इनको गाय के दूध में पकाकर मन्थनदण्ड से मिलाये । इसमें शर्करा मिलाकर पीने से मनुष्य सारी रात हर्षित रहता है । उड़द, विदारी, और श्वेत घेऊँची, इनको गाय के दूध में पकाकर इसमें मधु, घी और शर्करा मिलाकर पीने से मनुष्य सारी रात कुलिंग की भाँति हर्षित रहता है ॥२७-३६॥

गृष्टीनां वृद्धवत्सानां माषपर्णभूतां गवाम् ।

यत् क्षीरं तत् प्रशंसन्ति बळकामेषु जन्तुषु ॥३७॥

१ "शमीमक्षवस्थमाहूदः तत्र पुंसवनं कृतम् । तद् वै पुनस्य वेदनम् ॥" अथवेवेद, अक्षवस्थ का उपयोग पुत्रोत्पत्ति में विशेषकर पुंसवन में है ।

क्षीरमांसगणाः सर्वे काकोल्यादिश्च पूजितः । वाजीकरणहेतोर्हि तस्मात्तत्तु प्रयोजयेत् ॥३८॥

प्रथम बार व्याधी, जिसका बछड़ा बड़ा हो गया ( दूध पलेटा हो गया), जिसको उसको उड़द के पत्ते खाने को दिये जाते हैं, उस गाय का दूध बल चाहनेवाले मनुष्यों के लिये उत्तम है । सब प्रकार के दूध, सब प्रकार के मांस, और काकोल्यादिगण, ये वाजीकरण के कारण हैं, इसलिये इनका प्रयोग करे ॥३७-३८॥

एते वाजीकरा योगाः प्रीत्यपत्यबलप्रदाः ।

सेव्या विशुद्धोपचितदेहैः कालाक्षपेक्षया ॥३९॥

ये वाजीकर योग प्रीति (स्त्री प्रीति), सन्तान और बल को देनेवाले हैं । वमन विरेचन से शोषित एवं पुष्ट शरीरवाले मनुष्यों को देश, काल आदि की अपेक्षा से इनका सेवन करना चाहिये ॥३९॥

इति श्रीशुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने क्षीणबलीयवाजीकरणचिकित्सितं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥२६॥

सप्तविंशतितमोऽध्यायः

अथातः सर्वोपधातशमनीयं रसायनं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥

अब इसके आगे सर्वोपधातशमनीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।

वक्तव्य—सर्वोपधातशमनीय शब्द से 'रसायन' शब्द अभिधेत है । रसायन—“लाभोपायो हि शस्तानां रसादीनां रसायनम् ॥”—रसायन दो प्रकार की है—कुट्टी प्रावेशिक और वातातपिक । यह फिर तीन प्रकार की है—काम्य—प्राणकामः मेधाकामः श्रीकामः—इत्यादि । नैमित्तिक—श्याभिनिमित्त-शिलाजतु, भस्मातक, तुवरकादि सेवन । आज्ञिक-दूध घी का निरन्तर सेवन आदि ।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में रसायन तन्त्र का वर्णन किया गया है ॥१,२॥

पूर्व वयसि मध्ये वा मनुष्यस्य रसायनम् ।

प्रयुञ्जीत भिषक् प्राज्ञः स्तिग्धशुद्धतनोः सदा ॥३॥

नाविशुद्धशरीरस्य युक्तां रासायनो विधिः ।

न भाति वाससि किलष्टे रङ्गयोग इवाहितः ॥४॥

शरीरस्योपधाता ये दोषजा मानसास्तथा ।

उपदिष्टाः प्रदेशेषु तेषां वद्यामि वारणम् ॥५॥

बुद्धिमान् वैद्य, स्तिग्ध एवं शुद्ध शरीरवाले मनुष्य को किशोरावस्था में, अथवा मध्यावस्था में सदा रसायन का सेवन कराये । शरीर का शोधन किये बिना रसायन विधि बरतना ठीक नहीं । मलिन वस्त्र पर जैसे रङ्ग नहीं चढ़ता, इसी प्रकार

४८४

मुश्रुतसंहिता

[ अ० २७ ]

मलिन शरीर पर रसायन का रंग नहीं निखरता। शरीर को नष्ट करनेवाले वातादि शारीरिक दोष, रज-तम मानसिक दोष जो स्थान स्थान पर कहे हैं, उनका निवारण कहता हूँ।

वक्तव्य—पूर्व वयसि, मध्ये वा। इससे चरकोक्त—बाल्य मध्य अवस्था लेनी चाहिये। बाल अवस्था सोलह से लेकर तीस वर्ष तक, मध्य अवस्था—तीस से साठ तक है। इस समय में रसायन सेवन करना उत्तम है ॥ देखिये चरक० वि० अ० ना१२२ ॥३५॥

शीतोदकं पयः क्षौद्रं सर्पिरित्येकशो द्विशः।

त्रिशः समस्तमथवा प्राक् पीतं स्थापयेद्वयः ॥६॥

ठण्डा पानी, दूध, मधु, घी इनको अलग अलग, या किन्हीं दो को, किन्हीं तीन को अथवा सबको मिलाकर भोजन से पूर्व (प्रातः) पीने से वय स्थिर रहती हैं ॥६॥

तत्र विडङ्गतण्डुलचूर्णमाहृत्य यद्यीमधुकमधुयुक्तं यथाबलं शीततोयेनोपयुञ्जीत जीततोयं चानुपिवेदेवमहरहर्मांसं, तदेव मधुयुक्तं भलातकक्वाथेन वा, मधुद्राक्षाक्वाथयुक्तं वा, मध्यासलकरसाभ्यां वा, गुड्वोंकाथेन वा, एवमेते पञ्च प्रयोगा भवन्ति, जीर्णं मुद्रागमलकयूषेणालवणेनापस्तेहेन घृतवन्तमोदनमरनीयात्, एते खल्वर्गसि क्षययन्ति, कृमीनुपधन्ति, ग्रहणधारणशक्तिं जनयन्ति, मासे मासे च प्रयोगे वर्षशतं वर्षशतमायुषोऽभिबुद्धिर्भवति ॥७॥

विडंग-तण्डुल ( वाय विडंग की पिपली ) के चूर्ण को लाकर इसमें मुलेहटी का चूर्ण और मधु मिलाकर बल के अनुसार शीतल जल से खाये। पीछे से भी शीतल जल पीये। इस प्रकार प्रति दिन एक मास तक करे। विडंग तण्डुल चूर्ण को मधु में मिलाकर मिलाने के कषाय से पीये। विडंग-तण्डुल चूर्ण को मधु और द्राक्षा क्वाथ में मिलाकर पीये। विडंग-तण्डुल को मधु और आँवले के साथ अथवा गिलोय के क्वाथ से पीये। इस प्रकार से पाँच प्रयोग हैं। इसके जीर्ण हो जाने पर नमक रहित और घी थोड़ा डालकर मूँग और आँवले के गूथ के साथ घी मिला भात खाये। ये योग अर्श को नष्ट करते हैं। कृमियों को मारते हैं। वस्तु को समझने की ओर धारण शक्ति (स्मृति) को उत्पन्न करते हैं। एक एक मास के प्रयोग से एक सौ वर्ष की आयु बढ़ती है ॥७॥

विडङ्गतण्डुलानां द्रोणं पिष्टपचने पिष्टवदुपस्वेव विगतकषायं स्वित्तमवतार्य द्रपदि पिष्टमायसे हृदे कृम्भे मधुदूकोत्तरं प्रावृषि भस्मराशिवन्तर्गृहे चतुरो मासात्रिदध्यात्, वर्षाविगमे चोदुष्टयोपसंस्कृतशरीरः सहस्रसंपाताभिहुतं कृत्वा प्रातः प्रातयथाबलमुपयुञ्जीत, जीर्णं मुद्रागमलकयूषेणालवणेन घृतवन्तमोदनमरनीयात्, पांशुशय्यायां शयीत, तस्य मासादूर्ध्वं सर्वाभिभ्यः कृमयो

निष्क्रामन्ति, तान्गुतैलेनाभ्यक्तस्य वंशविदलेनापहरेत्, द्वितीये पिपीलिंकास्तृतीये यूकास्तथैवापहरेत्, चतुर्थे दन्तनखरोमाण्यवशीर्ण्यन्ते; पञ्चमे प्रशस्तगुणलक्षणानि जायन्ते, अमातुयं चादित्यप्रकाशं बपुरधिगच्छति, दूराच्छ्रवणानि दर्शनानि चास्य भवन्ति, रजस्तमसी चापोह्यसत्त्वमधिष्ठिति, श्रुतनिगाद्यपूर्वात्पादी गजबलोऽप्यवजवः पुनर्युवाऽष्टौ वर्षशतान्यायुरवाप्नोति; तस्याणुतैलमभ्यङ्गायं, अजकर्णकषायमुत्सादनायं, सोशीरं कृपोदकं स्नानायं, चंदनमुपलेपनायं, भरलातकविधानवदाहारः परिहारश्च ॥८॥

विडंग-तण्डुल की एक द्रोण मात्रा को पिष्ट पचन (भाप से गरम करके, जैसा कि गुजरात में ढोकरा बनाने में करते हैं), विधि से पिठी की तरह उबालकर, कषाय से अलग करके, गल जाने पर निकालकर पत्थर पर पीसकर लोहे के हड्डे घड़े में—मधु-मिश्रित जल पर्याप्त डालकर प्राह्ण काल में राख के ढेर में, अन्दर के घर में चार मास तक रख देये। वर्षा बीत जाने पर इसको निकालकर, शरीर को शुद्ध करके, एक हजार आहुतियाँ सहस्र संपात विधि से देकर, प्रतिदिन प्रातः काल बल के अनुसार उपयोग करे। इसके पच जाने पर नमक रहित मूँग और आँवले के गूथ के साथ घृत मिश्रित भात खाये। धूल की शय्या पर सोये। एक मास के पीछे इसके शरीर से कृमि निकलते हैं। इन पर अणुतैल का अभ्यंग करके बाँध की खपच्छ (चिमटे से इनको अलग करे। दूसरे महीने में चिऊंटी और तीसरे महीने में जूँ निकलती हैं, इनको भी इसी प्रकार हटाये। चौथे मास में दाँत—नख और रोम गिर जाते हैं। पाँचवें महीने में उत्तम लक्षणोंवाले दाँत, नख रोम निकल आते हैं। पाँचवें मास में मनुष्यों से अधिक (दिव्य), सूर्य के समान शरीर हो जाता है। कान और आँख की शक्ति बहुत बढ़ जाती है। रज और तम नष्ट होकर सत्त्व गुण बढ़ जाता है। सुनते ही कहनेवाला, नई नई बात कहनेवाला, घोड़े के समान वेगवान्, हाथी के समान बलवान्, पुनः युवा बनकर आठ सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है। इसको अभ्यंग के लिये अणुतैल, उत्पादन के लिए अजकर्ण (साल) का कषाय, स्नान के लिये खस मिला कुर्प का पानी, लेप के लिए चन्दन बरते। आधार और पारहार (स्याज्य) मिलावे के विधान की भाँति है।

वक्तव्य—विडंग-तण्डुल को पोटली में बाँधकर पानी में लटकाकर भी पका सकते हैं। इसमें पोटली का कुछ भाग पानी से छूता रहेगा। इसी कषाय में मधु मिलाकर घड़े में रखले। आठ वर्ष के घोड़े की उपमा चरक में भी है,—“एतेः प्रयोगैः विधिवद्गुणमान्, वीर्योपल्लो बलवर्णयुक्तः। हर्षान्वितो बाजिव-

अ० २७ ]

चिकित्सास्थानम्

४६५

भवेत् समर्थश्च वर्गानासु !” घोड़ा आठ वर्ष की अवस्था में पूर्ण यौवन पर होता है ॥८॥

कारमर्याणां निष्कलुक्तातानामेष एव कल्पः पाशुशय्याभोजनवर्जः; अत्र हि पयसा श्रुतेन भोक्तव्यसमानमन्यन् पूर्णनाशिष्यश्च । शोणितपित्तनिमित्तं विकारेण्वेतेषामुपयोगः ॥९॥

गम्भीर फलों में से गुठली निकालकर इसी बिधि से कहरा करे, परन्तु इसमें धूलि की शय्या और भोजन न बरते। इसमें दूध से पकाया भात खाना चाहिये, और सब एक जैसा है, और फलश्रुति भी पहले की भाँति है। रक्त-पित्तजन्य रोगों में इनका उपयोग है ॥१०॥

यथोक्तमागारं प्रविश्य बलामूलाधर्षपलं पलं वा पयसाऽऽलोड्य पिबेत्, जीर्णं पयःसर्पिरोदन इत्याहारः, एवं द्वादशरात्रमुपयुज्य द्वादशवर्षाणि वयस्तिष्ठति; एवं दिवसशतमुपयुज्य वर्षशतं वयस्तिष्ठति । एवमेवातिबलानागबलाविदारीशतावरीणामुपयोगः । विशेषतस्त्वतिबलामुदकेन, नागबलाचूर्णं मधुना, विदारीचूर्णं क्षीरेण, शतावरीमध्येन, पूर्वणान्यत् समानमाशिष्यश्च समाः । एतास्त्वौषधयो बलकामानां शोषिणां रक्तपित्तोपस्रष्टानां शोणितं छर्दयतां विरिच्यमानानां चोपदिश्यन्ते ॥१०॥

कहे हुए आगार (घर में - सूत्र ० अ० १६।४) में जाकर बला के मूल की आधा पल या पल भर मात्रा को दूध में घोलकर पीये। इसके जीर्ण होने पर दूध, घी और भात का आहार करे। इस प्रकार बारह रात्रि सेवन करने से बारह वर्ष तक वय स्थित रहता है। इसी प्रकार एक सौ दिन सेवन करने से एक सौ वर्ष तक वय स्थिर रहता है। इसी प्रकार से अतिबला, नागबला, विदारी, शतावरी का उपयोग करे, भेद इतना है कि अतिबला को पानी से, नागबला के चूर्ण को मधु से, विदारी के चूर्ण को दूध से, नागबला से शतावरी को भी दूध से लेवे। शेष सब पहले की भाँति, और फलश्रुति भी समान है। ये औषधियाँ बलकी चाहवाले, शोषरोगी, रक्त-पित्त से पीड़ित, रक्त का वलन करनेवाले तथा विरेचन करनेवालों के लिये कही जाती है।

वि० मन्तव्य—पुनर्वसु के शब्दों में यह कुटीप्रावेशिक रसायन सेवन का विधान है च० वि० अ० १ में देखिये ॥ १० ॥

वाराहीमूलतुलाचूर्णं कृत्वा ततो मात्रां मधुयुक्तां पयसाऽऽलोड्य पिबेत्, जीर्णं पयःसर्पिरोदन इत्याहारः, प्रतिषेधोऽत्र पूर्ववत्, प्रयोगमिममुपसेवमानो वर्षशतमायुरबान्नोति स्त्रीषु चाक्षयताम्, पतेनैव चूर्णेन पयोऽव-

चूर्णं शतशीतमभिमध्याज्यमुत्पाद्य मधुयुतमुपयुज्यीत सार्थं प्रातरेककालं वा, जीर्णं पयःसर्पिरोदन इत्याहारः, एवं मासमुपयुज्य वर्षशतायुर्भवति ॥११॥

वाराही कन्द के मूल का चूर्ण एक तुला (एक सौ पल) लेकर इसमें से योग मात्रा को मधु युक्त दूध में घोलकर पीये। इसके जीर्ण होने पर दूध घी चावल का भोजन करे। इसमें अपथ्य पूर्व की भाँति है। इस प्रयोग के उपयोग से एक सौ वर्ष की आयु होती है, स्त्रियों में अक्षयता (शुक्र का नाश न होना) मिलती है। वाराही मूल के चूर्ण को दूध में मिलाकर पकाये। इस पके हुए दूध के मथने से जो घी निकले, उस घी को मधु में मिलाकर प्रातः और सार्थ या एक समय खाये। इसके पवने पर दूध, घी, चावल का भोजन करे। इस प्रकार एक मास सेवन करने पर एक सौ वर्ष की आयु होती है।

वक्तव्य—वाराहीकन्दकल्क, दूध चार गुणा, घी एक द्रोण सिद्ध करे। इस प्रकार इस घृत को एक सौ बार पाक करे। इसमें जल भी चौगुना मिलाना चाहिये, ऐसा कई कहते हैं ॥ ११ ॥

चक्षुःकामः प्राणकामो वा बीजकसाराग्नितमन्थमूलं निष्कवाथं माषप्रस्थं साधयेत्, तस्मिन् सिध्यति चित्रकमूलानामक्षमात्रं कल्कं दद्यादामलकरसचतुर्थभागं, ततः स्निग्धमवतार्य सहस्रसंपाताभिहुतं कृत्वा। शीतीभूतं मधुसर्पिभ्यां संमुख्योपयुज्यीत यथाबलं यथासात्त्व्यं च लवणं परिहरन् भक्षयेत्। जीर्णं मुद्गामलकयूषेणालवणेन घृतवन्तमोदनमरनीयात् पयसा वा मासत्रयम्, एवमाभ्यां प्रयोनाभ्यां चक्षुः सौर्पणं भवत्यनल्पबलः क्षीषु चाक्षयो वर्षशतायुर्भवतीति ॥१२॥

आँखों के तेज या प्राणों की इच्छावाले जो हों, वे विजयसार, साल, अग्निमन्थ इनके मूल का क्वाथ करके इसमें एक प्रस्थ उड़द सिद्ध करें। जब उड़द पक रहे हों, तब इसमें चित्रक मूल का कल्क एक कर्ष आँवले का रस चौथाई भाग मिलाये। उड़दों के पक जाने पर उत्तारकर, सहस्र संपात आहुतियों से होम करके, ठण्डा होने पर इसमें मधु और घृत मिलाकर बल के अनुसार खाये। सात्त्व्य के अनुसार नमक को छोड़ते हुए, भोजन करे। पन जाने पर नमक रहित मृग और आँवले के ग्रूप के साथ घृत मिला भात खाये या दूध के साथ भात खाये। इस प्रकार तीन मास करे। इस प्रकार इन प्रयोगों को करने से आँख गरूरू के समान हो जाती है, बहुत बल आता है, स्त्रियों में निर्बलता अनुभव नहीं होती, एक सौ वर्ष की आयु होती है ॥ १२ ॥

भवति चात्र—

पयसा सह सिद्धानि नरः शणफलाणि यः। भक्षयेत् पयसा सार्थं वयस्तस्य न शीर्यते ॥१३॥

४६६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० २० ]

कहा भी है—जो मनुष्य दूध के साथ सिद्ध किये शुण के फलों को दूध के साथ खाता है, उसका वय-गिरता नहीं (वय स्थिर रहता है) ॥१३॥

इति श्री सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने सर्वोपचातशमनीयं रसायनचिकित्सितं नाम समविशोऽध्यायः ॥२७॥

अष्टाविंशतितमोऽध्यायः

अथातो मेधायुष्कामीयरसायनचिकित्सितं व्याख्यार्यामः, यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२१॥

अथ इसके आगे मेधायुष्कामीय रसायन चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में मेधा-स्मरण शक्ति तथा आयु की प्राप्ति के उपाय लिखे गये हैं। उन्माद एवं अपस्मार आदि रोगों में भी इन उपायों का प्रयोग करना चाहिये ॥१, २॥

मेधायुष्कामः श्वेतावल्युजफलान्यातपरिगृह्णाण्या- दाय सूक्ष्मचूर्णानि कृत्वा गुडैत सहलोड्य स्नेहकुम्भे सम- रात्रं धान्यराशिं निदध्यात्, समरात्रादुदुग्धस्य हृतदोषस्य यथाबलं पिण्डं प्रयच्छेदनुदिते सूर्ये, उष्णोदकं चानुपि- वेत् भलातकविधानवच्छागारप्रवेशः, जीर्णोषधैश्चापराह्नि हिमाभिरद्विः परिष्कृतान्नः शालीनां षष्ठिकानां च पयमा अर्कुरामधुरेणौदनमरनीयात्, एवं षण्मासानुपयुज्य विग- तपाप्मा बलवर्णोपेतः श्रुतिगादी स्मृतिमानरोगो वषेश- तायुर्भवति। कृष्ठिनं पाण्डुरोगिणमुदरिणं वा कृष्णाया गोमूत्रेणालोड्यार्धपलिकं पिण्डं विगतलौहिल्ये सवितरि पाययेत्, अपराह्नि चात्वणेतानमलकयूषेण सर्पिधमन्तमोद- नमरनीयात्; एवं मासमुपयुज्य स्मृतिमानरोगो वषश- तायुर्भवति। एष एवोपयोगश्चित्रकमूलानां रजन्त्याश्च, चित्रकमूले विशेषो द्विपलिकं पिण्डं परं प्रमाणं, शेषं पूर्ववत्।

मेधा और आयु की कामनावाला मनुष्य श्वेत बावची के फलों को धूप में सुखाकर बारीक चूर्ण बनाये। इस चूर्ण को गुड़ के साथ मिलाकर घी से स्निग्ध घड़े में रखकर सात दिन तक धान्यराशि में रख देवे। सात दिन के पीछे इसको निकालकर दोषों को वमन-विरेचन से शुद्ध करके, बल के अनुसार सूर्य के उगने से पहले ही योग्य मात्रा में खाकर पीछे से गरम पानी पीये। मिलावे के विधान की भाँति घर में प्रवेश करके नियम पाले। औषध के जीर्ण होने पर अपराह्नि में टण्डे जल से स्नान करके शाली या सांठी के भात को शर्करा मिश्रित दूध से खाये। इस प्रकार छः मास तक सेवन करने पर पाप रहित, बल-वर्ण से युक्त; सुनते ही धारण करनेवाला, स्मृतिशाली

नीरोगी, एक सौ वर्ष की आयु का होता है। कुष्ठरोगी, पाण्डुरोगी या उदररोगी को काली बावची के बीजों का चूर्ण गोमूत्र में घोलकर, आधापल की मात्रा में, सूर्य के लाल वर्ण से पहले अर्थात् उषाकाल में ही पिला देवे। अपराह्नि में नमक रहित यूप से घीवाष्पा भात खाये। इस प्रकार एक मास सेवन करने पर स्मृतिशाली, नीरोगी, एक सौ वर्ष की आयु का होता है। यही उपयोग चित्रकमूल और हल्दी का है। चित्रकमूल में इतना भेद है कि इसकी उत्कृष्ट मात्रा दो पल है, शेष पूर्व की भाँति है।

हृतदोष एव प्रतिसंसृष्टभक्तो यथाक्रममागारं प्रविश्य मण्डूकपर्णीस्वरसमादाय सहस्रसंपाताभिहुतं कृत्वा यथा- बलं पयसाऽऽलोड्य पिबेत् पयोऽनुपानं वा, तस्यां जीर्णो- यां यवान्नं पयसोपयुञ्जीत, तिलैर्वा सह भक्ष्येत्रीनं मा- सान् पयोऽनुपानं जीर्णं पयः सर्पिरोदन इत्याहारः, एवमुप- युञ्जानो ब्रह्मवर्चसी श्रुतिनिगादी भवति वर्षशतमायु- र्वाप्नोति। त्रिरात्रोपोषितश्च त्रिरात्रमेनां भक्ष्येत, त्रिरा- त्रादूर्ध्वं पयः सर्पिरिति चोपयुञ्जीत। बिल्बमात्रं पिण्डं वा पयसाऽऽलोड्य पिबेत् एवं द्वादशरात्रमुपयुज्य मेधावी वषशतायुर्भवति ॥४॥

वमन विरेचन से दोषों को निकालकर पेया आदि का संसर्जन क्रम पालकर क्रमशः भोजन पर पहुँच जाने पर आगार (घर) में प्रविष्ट होकर, मण्डूकपर्णी का स्वरस निकालकर सहस्र संपात आहुतियाँ देकर, बल के अनुसार स्वरस को दूध में मिलाकर पीये, अथवा स्वरस को पीसकर पीछे से दूध, पीये। इसके जीर्ण होने पर जो के अन्न को दूध के साथ खाये। अथवा तिल के साथ खाये। दूध का अनुपान बरते, इस प्रकार तीन मास करे। औषध के जीर्ण होने पर दूध, घी और भात का ही भोजन करे। इस प्रकार करने से ब्रह्मवर्चसवाला, सुनते ही धारण करनेवाला होता है, एक सौ वर्ष की आयु होती है। अथवा तीन दिन उपवास करके तीन दिन इस मण्डूकपर्णी को खाये। तीन दिन के पीछे दूध, घी को खाये। ब्राह्मी की या ब्राह्मीकलक की बिल्बमात्रा (एक पल मात्रा) को दूध में घोलकर पीये। इस प्रकार बारह रात्रि खाने पर मेधावी और एक सौ वर्ष की आयु होती है ॥४॥

हृतदोष एवागारं प्रविश्य प्रतिसंसृष्टभक्तो ब्राह्मीस्वर- समादाय सहस्रसंपाताभिहुतं कृत्वा यथाबलमुपयुञ्जीत, जीर्णोषधश्चापराह्नि यवागूमलवणां पिबेत्, क्षीरसाल्यो वा पयसा मुञ्जीत, एवं समरात्रमुपयुज्य ब्रह्मवर्चसी मे- धावी भवति द्वितीयं समरात्रमुपयुज्य ग्रन्थमीषितमुत्पाद- यति नष्टं चास्य प्रादुर्भवति, तृतीयं समरात्रमुपयुज्य द्वि- र्चचारितं शतमप्यवधारयति, एवमेकविंशतिरात्रमुपयुज्या- लदमीरपकामति, मूर्तिमती चैन वाग्देव्यनुप्रविशति, सर्वा- श्वैनं श्रुतय उपतिष्ठन्ति, श्रुतधरः पञ्चवर्षशतायुर्भवति ॥५॥

अ० २८ ] ६३

चिकित्सास्थानम्

४६७

वमन, विरेचन से शुद्ध होकर घी में जाकर पेया आदि संसर्जन विधि पूरी करके ब्राह्मी स्वरस को लेकर सहस्रपात विधि से होम करके, बल के अनुसार पीये। औषध के जीर्ण होने पर अपराह्ण में नमक रहित यवगू को पीये। दूध जिसको सात्त्व्य हो, वह दूध के साथ यवगू खाये। इस प्रकार सात दिन खाकर ब्रह्मवचस्वी, मेघात्री होता है। दूसरे सात दिन औषध खाकर इच्छित ग्रन्थ को बनाता है, भूला हुआ स्मरण हो जाता है, तीसरे सात दिन सेवन करने से दो बार कहीं सौ बात भी याद हो जाती हैं। इस प्रकार इक्कीस दिन सेवन करने से दारिद्र्य दूर होता है, सरस्वती देवी सामने मूर्ति रूप से खड़ी हो जाती है। सब भूतियाँ (वेद) याद हो जाती हैं। सुनते ही याद करता है, पाँच सौ वर्ष की आयु होती है ॥५॥

ब्राह्मोस्वरसप्रस्थद्वये घृतप्रस्थं विदङ्कृतण्डुलात् कुड्वं द्वे द्वे पले वचामृतयोर्द्वादश हरोतक्यामलकबिभीतकानि इलङ्गपिष्टान्यावाप्यैकध्वं साधयित्वा स्वनुगुणं निदध्यात, ततः पूर्वविधानेन मात्रां यथावलम्पुष्युजोत, जीर्णं पयः सर्पिरोदन इत्याहारः, पूर्ववच्छात्र परीहारः, एतेनोर्ध्व-मधस्तिर्यक् क्रमयो निष्कामन्ति, अलङ्करीयप्रकामति, पुष्करवर्णः स्थिरवयाः श्रुतनिगादी त्रिवर्षं शतायुर्भवति, एतदेव कुष्ठविषमञ्जरापस्मारोन्मादविषभूतग्रहेष्वन्येषु च महान्याधिषु संशोधनमादिशन्ति ॥६॥

ब्राह्मी स्वरस दो प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, विदङ्कृतण्डुल एक कुड्व, वच, गिलोय दो-दो पल, हरङ्ग आँवला और बहेड़ा मिलित बारह पल लेकर इनको बारीक पीसकर एक साथ खिड़ करके, सुरक्षित स्थान पर रख देवे। फिर पूर्व विधि से (वमनादि से शुद्ध होकर पेयादि क्रम का पालन करके) इसको बलानुसार सेवन करे। पचने पर दूध, घी, और भात खाये। पूर्व की भाँति परिहार है। इससे मुख, नासा, गुदा, मूत्र आदि ऊपर एवं नीचे के तथा हाथ पैर आदि सब स्थानों से (स्वचा से) क्रमि निकलते हैं। अलङ्करी दूर होती है, कमल जैसा वर्ण, स्थिर वय, सुनते ही धारण करनेवाला, तीन सौ वर्ष की आयु का होता है। कुष्ठ, विषमञ्जर, अपस्मार, उन्माद, विष-भूत-ग्रह और अन्य महारोगों में यही संशोधन कहा जाता है। (पुष्करवर्णः—पुष्कर पद्मवराटकम्। श्रुतनिगादी—श्रुतग्रहण-शक्तिमान्—इलङ्गः)।

वि० मन्तव्य—मण्डुकपर्णी एवं ब्राह्मी का सेवन करने—४-५ तथा ६ सूत्रों के अनुसार आहार विहार, मात्रा आदि पर ध्यान देवे। प्रायः ब्राह्मी के ७ या १४ सूत्रों का प्रयोग करके पूर्ण लाभ की असफल कामना की जाती है। वचामृतयोः के स्थान पर वचाविद्युतयोः पाठान्तर अधिक संगत है, क्योंकि इस घृत का कुष्ठ आदि रोगों में संशोधनार्थ प्रयोग करने का आदेश है ॥६॥

इतदोष एवागारं प्रविश्य हैमवत्या वचायाः पिण्ड-मासलकमात्रमभिहुतं पयसाऽऽलोड्य पिवेत, जीर्णं पयः सर्पिरोदन इत्याहारः, एवं द्वादशरात्रमुपयुज्जीत, ततोऽस्य ओत्रं त्रिव्रियते द्विरभ्यासात् स्मृतिमान् भवति; त्रिरभ्यासात् श्रुतमादत्ते, चतुर्द्वादशरात्रमुपयुज्य सर्वं तरति क्रिस्चिर्व, तादर्थदर्शनमुत्पद्यते, शतायुश्च भवति। द्वे द्वे पले इतरस्या वचाया निष्कवाध्य पिवेत, पयसा, समानं भोजनं समाः पूर्वेणाशिवश्च ॥७॥

वमनादि से शरीर के दोषों को निकालकर घर में प्रविष्ट होकर श्वेत वच की आँवले के समान मात्रा को होम विधि करके, दूध में घोलकर पीये। इसके जीर्ण होने पर घी, दूध, और भात का भोजन करे। इस प्रकार बारह दिन करे। इससे इसके कान खुल जाते हैं। दो बारह दिन (चौबीस दिन) सेवन करने से स्मृतिशाली हो जाता है। छत्तीस दिन सेवन करने पर सुनते ही याद हो जाता है, अङ्गतालीस दिन सेवन करने पर सब पाप नष्ट हो जाते हैं, एक सौ वर्ष की आयु होती है। दूसरी प्रकार की लाल वच के दो-दो पल दूध के साथ काय करके पीये। भोजन पूर्व की भाँति और फलश्रुति भी पूर्व की भाँति है। (श्रीर पाक विधि से पाक विधि है) ॥७॥

वचाशतपाकं वा सर्पिद्रोणमुपयुज्य पञ्चवर्षं शतायुर्भवति, गलगण्डापचोश्लीपदस्वरमेद्वक्षापहन्तीति ॥८॥

वचा के कल्क से एक सौ बार सिद्ध किये घी की एक द्रोण मात्रा को खाने से पाँच सौ वर्ष की आयु होती है। गलगण्ड-अपची श्लीपद स्वरमेद्व नष्ट हो जाते हैं ॥८॥

अत ऊर्ध्वं प्रवद्यामि आयुष्कामरसायनम्। मन्त्रौषधसमायुक्तं संवत्सरफलप्रदम् ॥९॥ बिल्बस्य चूर्णं पुष्पे तु हुतं वारान् सहस्रशः। श्रीसूक्तेन नरः कल्प्ये समुवर्णं दिने दिने ॥१०॥ सर्षिर्मधुयुतं लिह्यादलक्ष्मीनाशनं परम्। स्वचं विहाय बिल्बस्य मूलकवारं दिने दिने ॥११॥ प्राग्नीयात् पयसा सार्धं स्नात्वा हुत्वा समाहितः। दशसाहस्रमायुष्यं स्मृतं युक्तर्थं भवेत् ॥१२॥ हुत्वा विसानां क्वार्थं तु मधुलाजैश्च संयुतम्। अमोघं शतसाहस्रं युक्तं युक्तर्थं स्मृतम् ॥१३॥ इसके आगे आयुष्काम (आयुर्वर्धक) मंत्र और औषध के साथ, एक वर्ष में फल देनेवाली रसायन को कहूँगा। बिल्ब के चूर्ण को पुष्प नक्षत्र में श्रीसूक्त से (हिरण्यवर्णी हरिणीं सुवर्णरजतसजामित्यादि) एक हजार बार होम करके सुवर्ण के साथ घी और मधु मिलाकर प्रतिदिन प्रातःकाल में खाये। यह उत्तम दारिद्र्य नाशक है। बिल्बमूल की छाल उतारकर इसका काय करके प्रतिदिन दूध के साथ खाये।

४८८

सुश्रुतसंहिता

[ ८०-२८ ]

खाने से पूर्व स्नान और होम करे। इस प्रकार करने से दस हजार वर्ष की आयु प्राप्त होती है, और युकरथ होता है। हवन करके, बिस् (भिस्) के क्वाथ को मधु और लजा के साथ मिलाकर खाये। यह अत्यर्थ एवं एक सौ हजार वर्ष की आयु देती है, और युकरथ है।

वक्तव्य—बिल्व की इतनी बड़ी महिमा से ही, शायद बिल्वपत्र भगवान् शंकर पर चढ़ाने की प्रथा आर्य-संस्कृति में है। युकरथ—जोड़े हुए रथों में भी जो बरता जाये अर्थात् इनमें किसी प्रकार का परिहार नहीं होता। अथवा जैसे जुड़ा हुआ रथ होने पर तुरन्त कहीं भी जा सकते हैं, उस प्रकार यह रसायन तुरन्त जब इच्छा हो तभी ली जा सकती है, इसके लिये वमनादि कर्म की आवश्यकता नहीं। इसी प्रकार युक्त रथ वस्ति है, जो कि जब जरूरत समझी उसी समय बरती जा सकती है ॥६-१३॥

सुवर्ण पद्मवीजानि मधु लजाः प्रियङ्गवः। गन्व्येन पयसा पीतमलद्भी प्रतिषेधयेत् ॥१४॥ नीलोत्पलदलकवाथो गन्व्येन पयसा श्रुतः।

समुवर्णस्तिलैः सार्धमलद्भीनाशनः स्मृतः ॥१५॥

गन्व्यं पयः सुवर्णं च मधुच्छिद्रं च माक्षिकम्।

पीतं शतसहस्राभिर्हुतं युक्तर्थं स्मृतम् ॥१६॥

सुवर्णं भस्म (या वरक), कमलगढ़ा, मधु, लजा, प्रियंगु, इनको गाय के दूध से पीने पर पाप-दोषाग्नि नष्ट होता है। नीले कमल के पत्तों का क्वाथ गाय के दूध से पकाया हुआ, सुवर्ण और तिल के साथ खाना उत्तम अलद्भी—नाशक है। गाय का दूध, सुवर्ण, मोम और मधु (आमर मधु) पीने पर युक्त रथ रसायन हैं, इसके साथ एक लाख आहुतियों से होम करे ॥

वचाधृतसुवर्णं च बिल्वचूर्णमिति त्रयम्।

मेध्यमायुष्यमारोग्यपुष्टिसौभाग्यवर्धनम् ॥१७॥

वासामूलतुलाकवाथे तैलमावाप्य साधितम्।

हुत्वा सहस्रमन्नीयान्मेध्यमायुष्यमच्यते ॥१८॥

यावकांस्तावकान् खादेदभिभूय यवांस्तथा।

पिप्पलीमधुसंयुक्ताम् शिक्षा चरणवद्धवेत् ॥१९॥

वचाचूर्णं, सुवर्णभस्म और बिल्वचूर्ण इनको बी के साथ चाते। मेधा, आयुष्य, आरोग्य, पुष्टि, और सौभाग्य इससे बढ़ता है। वासामूल के क्वाथ में तैल प्रक्षेप देकर सिद्ध करे। एक हजार आहुति देकर खाये, यह मेध्य और आयुवर्धक कहा जाता है। जो को कूटकर बनाये भक्ष्य को पिप्पली और मधु के साथ खाने पर गुड से सीखे विना ज्ञान होता है, जिस प्रकार कि बाल्यावस्था में घुटने चलने के उपरान्त, विना सीखे पैरों से चलना आ जाता है ॥१७-१९॥

मध्वामलकचूर्णानि सुवर्णमिति च त्रयम् ॥

प्राश्यारिष्टगृहीतोऽपि सुच्यते प्राणसंशयात् ॥२०॥

शतावरीघृतं सम्यगुपयुक्तं दिने दिने।

सखौद्रं समुवर्णं च नरेन्द्रं स्थापयेद्दशे ॥२१॥

गोवन्दना मोहनिका मधुकं माक्षिकं मधु।

सुवर्णमिति संयोगः पेयः सौभाग्यमिच्छता ॥२२॥

पद्मनीलोत्पलकवाथे यष्टीमधुकसंयते।

सर्पिरासादितं गन्व्यं समुवर्णं सदा पिवेत् ॥२३॥

पयश्चानुपिवेत् सिद्धं तेषामेव समुद्धरे।

अलद्भीषनं सदाऽऽयुष्यं राज्ञाय सुभगाय च ॥२४॥

थत्र नोदीरितो मन्त्रो योगेऽवैतेषु साधने।

शब्दिता तत्र सर्वत्र गायत्री त्रिपदा भवेत् ॥२५॥

पाप्मानं नाशयन्त्येता द्युश्चौषधयः श्रियम्।

कुर्युर्नागवलं चापि मनुष्यममरोपमम् ॥२६॥

मधु, आँवले का चूर्ण और सुवर्ण इनको खाकर मृत्यु से पकड़ा हुआ भी मनुष्य प्राण संशय से छूट जाता है। शतावरी-घृत को सुवर्ण और मधु के साथ प्रतिदिन भली प्रकार खाने पर राजा को भी वध में कर देता है। सौभाग्य को चाहनेवाला व्यक्ति गोवन्दन (प्रियंगु), मोहनिका (जिया पोता), मुलेहठी, माक्षिक मधु और सुवर्ण को मिलाकर पीये। लालकमल, नीला कमल, मुलेहठी इनके क्वाथ में सिद्ध किया गाय का घृत सुवर्ण के साथ सदा पीये। और इसके पीछे लाल, नीले कमल और मुलेहठी में सिद्ध किया दूध पीये। यह अलद्भी नाशक, सदा आयुवर्धक, राज्य के लिये और मंगल के लिये है। इन योंगों के बनाने में जहाँ मंत्र का विधान नहीं किया, वहाँ सब स्थानों में तीन पदवाली गायत्री का पाठ करना चाहिये। ये औषधियाँ अलद्भी का नाश करती हैं, और लद्भी को देती हैं। मनुष्यों में हाथियों का वल देती हैं और मनुष्य को देवता के समान बना देती हैं।

वक्तव्य—त्रिपदा गायत्री—“ॐ भूर्भुवःस्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि, धियो योनः प्रचोदयात्” ॥२०-२६॥

सतताध्ययनं वादः परतन्त्रावलोकनम्।

तद्विद्याचार्यसेवा च बुद्धिमेधाकरो गु (ग) णः ॥२७॥

आयुष्यं भोजनं जीर्णं वेगानां चाविधारणम्।

ब्रह्मचर्यमहिंसा च साहसानां च वर्जनम् ॥२८॥

निरन्तर अध्ययन (स्वाध्याय), वाद, दूसरों के ग्रन्थों को देखना, उस विद्या को जाननेवाले आचार्यों की सेवा, ये बुद्धि-मेधा को करनेवाले हैं। पहले भोजन के जीर्ण होने पर भोजन करना, मल-मूत्र के उपस्थित वेगों को न रोकना, ब्रह्मचर्य, अहिंसा और साहसिक कार्यों का त्याग आयुवर्धक है।

वक्तव्य—‘वादे वादे जायते तत्त्वबोधः’ बुद्धि-समझने की शक्ति, मेधा-स्मृति-वारण करने की शक्ति।

अ० २६ ]

चिकित्सास्थानम्

४९९

ब्रह्मवर्षमायुष्यकराणाम्, अहिंसा प्राणवर्षनानामुत्कृष्टतमा ।

चरकः ॥२७,२८॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मेधायुष्कामीयं रसायनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः ॥२८॥

एकोनत्रिंशत्तमोऽध्यायः

अथातः स्वभावव्याधिप्रतिषेधनीयं रसायनं व्याख्या- स्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे स्वभावव्याधिप्रतिषेधनीय रसायन का व्याख्यान करेंगे - जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।

वि० मन्तव्य—स्वभावतः होनेवाली जरा एवं मृत्यु आदि रोगों का निरोध करने के उपाय इस अध्याय में लिखे गये हैं । युवावस्था के पश्चात् जरा स्वभावतः आती है और जरा के पीछे मृत्यु भी स्वभावतः आती है, परन्तु इन उपायों से कुछ काल के लिये जरा एवं मृत्यु का निरोध किया जा सकता है ॥ १, २ ॥

ब्रह्मादयोऽसृजन् पूर्वममृतं सोमसंज्ञितम् ।

जरामृत्युविनाशाय विधानं तस्य वक्ष्यते ॥३॥

ब्रह्मा आदि देवताओं ने बुढ़ापा और मृत्यु के नाश के लिये पूर्वकाल में सोम संज्ञावाले अमृत को बनाया था । उस सोम का विधान कहा जायेगा ॥३॥

एक एव खलु भगवान् सोमः स्थाननामाकृतिवीर्य- विशेषैश्चतुर्विंशतिधा भिद्यते ॥४॥

सोम वास्तव में एक ही है, परन्तु स्थान, नाम, आकार, वीर्य की भिन्नता से चौबीस प्रकार का हो जाता है ॥४॥

तद्यथा—

अंशुमान् मुळजार्शचैव चन्द्रमा रजतप्रभः ।

दूवोसोमः कनीयार्शच श्वेताक्षः कनकप्रभः ॥५॥

प्रतानवोस्तालवृन्तः करवीरोंऽजवानपि ।

स्वयंप्रभो महासोमो यश्चापि गरुडाहृतः ॥६॥

गायत्रस्त्रष्टुभः पाङ्क्तो जागतः शाकवरस्तथा ।

अग्निष्ठोमो रैवतश्च यथोक्त इति संज्ञितः ॥७॥

गायत्र्या त्रिपदायुक्तो यश्चाडुपतिरुच्यते ।

एते सोमाः समाख्याता वेदोक्तैर्नाभभिः शुभैः ॥८॥

सर्वेषामेव चैतेषामेको विभिरूपासने ।

सर्वं तुल्यगुणार्शचैव विधानं तेषु वक्ष्यते ॥९॥

जैसा कि—अंशुमान्, मुजवान्, चन्द्रमा, रजतप्रभ, दूवी-सोम, कनीयान्, श्वेताक्ष, कनकप्रभ, प्रतानवान्, तालवृन्त, करवीर, अंशवान्, स्वयंप्रभ, महासोम, गरुडाहृत, गायत्र, त्रष्टुभ, पाङ्क्त, जागत, शाकवर, अग्निष्ठोम, रैवत, त्रिपदा गायत्री से युक्त और उडुपति—ये चौबीस सोम वेदोंक शुभ नामों से कहे जाते हैं । इन सब सोमों के सेवन करने की एक ही विधि

है और सबका समान ही गुण है । इनका विधान-सेवन-विधि कही जाती है ॥५-९॥

अतोऽन्यतमं सोममुपयुयुतुः सर्वोपकरणपरिचार- कोपेतः प्रशस्ते देशे त्रिवृतसागरं कारयित्वा हृतदोषः प्रतिसंसृष्टभक्तः प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु अंशु- मन्तमादायाध्वरकल्पेनाहृतमभिषुतमभिहुतं चान्तरागारे- कृतमङ्गलस्वस्तित्वाचनः सोमकन्दं सुवर्णसूच्यं, विदार्य पयो गृह्णीयात् सौवर्णे ( राजते वा ) पात्रेऽञ्जलिमात्रं, ततः सकृदेवोपयुज्जीत नास्वादयन्, तत उपस्पृश्य शेषमप्य- वसाद्य यमनियमाभ्यासमात्मानं संयोज्य वायव्यतोऽभ्यन्त- रतः सुहृद्भिर्हृपास्यमानो विहरेत् ॥१०॥

इनमें से किसी भी एक सोम को पीने की इच्छावाला मनुष्य सब साधन एवं परिचारकों से युक्त, उत्तम स्थान में तीन खण्डवाली (एक कोठरी के अन्दर दूसरी, दूसरी में तीसरी) कोठरी बनवाकर, वमनादि से शरीर के दोषों को निकालकर, पेया आदि कम का पालन करके, प्रशस्त तिथि-करण-मुहूर्त-नक्षत्रों में, याज्ञिक विधि से अंशुमान् सोम को लाकर, मृत्तियों से स्नान कराये एवं अग्नि में दिये हुए सोम को, घर के अन्दर, मंगल ( शान्तिपाठ ) और स्वस्तित्वान्न करके सोमकन्द को सुवर्ण की सुई से (चाकू) से चीरकर, सोने या चाँदी के पात्र में एक अंजलि परिमाण रस को ले ले । इस रस को एकदम से ही पी जाये, यूँट-यूँट करके न पीये । फिर आचमन करके, बचे हुए को जल में फेंककर, अपने को यम-नियम रखते हुए, बाणी को नियमित (मौन) करके, मित्रों के साथ विहार करे—घूमि फिरे, बैठे ।

वक्तव्य—साधन-ग्रां दोग्नी शीलवतीमनातुरां जीवद्वत्स्थां सुप्रतिबिहिततुणधरणपानीयम् पाश्याचमनीयोदककोष्ठं, मणिक-घटपिठरपर्योगकुम्भीकुम्भकुण्डशरावदविकोटोदक्षनपरिचमन्थान-चर्मचेल्लसूत्रकार्पासोणादीनि च, चरक सूत्र० । “प्रशस्तदेश-प्रशस्ते भूमिभागे कृष्णमधुरमृत्तिके सुवर्णमृत्तिके वा परिवाप-पुष्करण्यादीनां जलाशयानामन्यतमस्य कृते ।” वास्तुविद्याकुशलः प्रशस्तं रम्यतमस्तर्क निवार्ता प्रवार्तेकदेशं हठमपगतश्वापदपशु-दंष्ट्रिमृषिकपतंगं सुविभक्तसलिलोल्बलमृत्रवन्ःस्थानस्तानभूमि-महानसमुदुमुखं यथर्तुययनासनान्तरणसंपन्नं कुर्यात् ॥” चरक । विहार चार प्रकार हैं, यथा—गमन, चक्रमण, स्थान, और आसन ॥१०॥

रसायनं पीतवास्तु निवार्ते तन्मनाः शुचिः ।

आसीत् तिष्ठन्न क्रामेच्च न कथंचन संविशेत् ॥११॥

रसायन पीकर मनुष्य वायु रहित स्थान में ( जहाँ सीधी वायु न आये ) रसायन में मन लगाकर, पवित्रता के साथ रहे, बैठे, खड़ा रहे और चले, परन्तु लेटे (खोये) नहीं ॥११॥

सायं वा भुक्तवानुपश्रुतान्तिः कुशग्रन्थायां कृष्णा- जिनोत्तरायां सुहृद्भिर्हृपास्यमानः शयीत, तृषितो वा शीतोदकमात्रां पिबेत् ( अशनायितो वा क्षीरं ); ततः

५००

सुश्रुतसंहिता

[ अ० १९ ]

प्रातस्तथायोपश्रुतशान्तिः कृतमङ्गलो गां स्मृष्टुवा तथैवासीत, तस्य जोर्ण सोमे क्ष्दिस्तप्यते, ततः शोणितार्कं कुमिन्व्यामिश्रं छदितवते सार्थं श्रुतशीतं क्षीरं वितरेत्; ततस्तृतीयेऽह्नि कुमिन्व्यामिश्रमतिसार्यते, स तेनानिष्टप्रतिग्रहभक्तप्रभृतिभिर्विशेषैर्विनिर्मक्तः शुद्धतनुर्भवति, ततः सार्थं स्नाताया पूर्ववदेव क्षीरं वितरेत्, क्षौमवस्त्रास्तृतायां चैनं शय्यायां शाययेत्, ततश्चतुर्थेऽह्नि तस्य श्वयथुरुत्पद्यते ततः सर्वाङ्गैभ्यः क्रमयो निष्क्रामन्ति, तदहर्षवशय्यायां पांशुभिरवकीर्णमाणः शयीत, ततः सार्थं पूर्ववदेव क्षीरं वितरेत्; एवं पञ्चमषष्ठयोर्दिवसयोर्वर्तते, केवलमुभयकालमस्मै क्षीरं वितरेत्; ततः सप्तमेऽह्नि निर्मासस्त्वगस्थिभूतः केवलं सोमपरिग्रहादेवोच्छ्वसिति, तदहश्च क्षीरेण सुखोष्णोपरिपिच्य तिलमधुकचन्दनानुल्लिप्तैर्ह्वैः पयः पाययेत्, ततोऽष्टमेऽह्नि प्रातरेव क्षीरपरिपिक्तं चन्दनप्रदिग्धगान्त्रं पयः पाययित्वा पांशुशय्यां समुत्सृज्य क्षौमवस्त्रास्तृतायां शय्यायां शाययेत्, ततोऽस्य मांसमाप्याप्यते, त्वक् चावदलति, दन्तनखरोमाणि चास्य पतन्ति; तस्य नवमादिवसात्प्रभृत्युणुतैलाभ्यङ्गः सोमवल्कृषायपरिपेकः; ततो दशमेऽह्न्येतदेव वितरेत्, ततोऽस्य त्वक् स्थिरतासुपैति; एवमेकादशद्वारुशयोर्वर्तते; ततस्तत्रयोदशाहात् प्रभृति सोमवल्कृषायपरिपेकः; एवमाषाडशाद्वर्तते; ततः सप्तदशद्वारुशयोर्दिवसयोर्दशना जायन्ते सिन्धुरिणः स्निग्धवज्रवैद्यैर्यस्फटिकभकाशाः समाः स्थिराः सहिष्णवः। तदा प्रभृति चानवैः शालितण्डुलैः क्षीरयवागृमुपसेवेत यावत् पञ्चविंशतिरिति; ततोऽस्मै द्वाच्छाल्यादौ मृदुसयकालं पयसा, ततोऽस्य नखा जायन्ते विदुमेन्द्रगपकतरुणादित्यप्रकाशाः स्थिराः स्निग्धा लक्षणसपन्नाः केशाश्च सूक्ष्मा जायन्ते, त्वक् च नोत्तोषत्वात्सौषुष्यवैद्यैर्यप्रकाशाः; ऊर्ध्वं च मासात् केशान् वापयेत्, वापायत्वा चांशीरचन्दनकुण्णतिलकलकैः शिरःप्रदिहात् पयसा वा स्नापयेत्, ततोऽस्थानन्तरं समरात्रात् केशा जायन्ते भ्रमराञ्जननिभाः कुञ्चित्वाः स्थिराः स्निग्धाः, ततस्त्रिरात्रात् प्रथमावसथपरिसरात्रिच्छम्य सुदृढं स्थित्वा पुनरेवान्तः प्रविशेत्, ततोऽस्य बलातैलमभ्यङ्गायंश्च वाचयं, यवपिष्टमुदूर्तनार्थं सुखोष्णं च पयः परिपेकार्थं, अजकर्णकृषायमुत्सादनार्थं सांशीरं कृपोदकं स्नानार्थं, चन्दनमनुलेपार्थं, आमलकरसविमिश्राश्चास्य यूपसूपविकल्पाः क्षीरमधुकसिद्धं च कृष्णतिलमवचारणार्थं; एवं दशरात्रं, ततोऽन्यदशरात्रं द्वितीये परिसरे वर्तते; ततस्तृतीये परिसरे स्थिरीकुर्वन्नात्मानमन्यदशरात्रमासीत, किञ्चिदातपपवनान् वा सेवेत्, पुनश्चान्तः प्रविशेत्, न चात्मानमादर्शोऽस्य वा निरीक्षेत् रूपशा-

लित्वात्, ततोऽन्यदशरात्रं क्रोधादीन् परिहरेत्, एवं सर्वेषामुपयोगविकल्पः विशेषतस्तु वल्लीप्रतान्छुपकादयः सोमा ब्राह्मणश्च त्रियवैश्यैर्भक्षयितव्याः। तेषां तु प्रमाणमध्वचतुष्कमुष्टयः ॥१२॥

अथवा सार्थकाल में भोजन करके शान्तिपाठ सुनकर, कुशा की शय्यापर काले मृग की मृगछाला बिछाकर-मित्रों से घिरा हुआ सोये। प्यास लगने पर शीतल जल ही थोड़ा सा पीये। ( भोजन न करने पर दूध ही पीये ) फिर प्रातःकाल उठकर शान्तिपाठ सुनकर, स्वस्तिवाचन करके, गाय का स्पर्श करके पूर्व की भाँति रहे। सोम के जीर्ण होने पर वमन होता है। फिर रक्तमिश्रित कुमियुक्त वमन करनेवाले मनुष्य को सार्थकाल गरम करके ठण्डा किया दूध देवे। फिर तीसरे दिन कुमिमिश्रित मल आता है। इससे वह मनुष्य अनिष्ट-प्रतिग्रह भोजन आदि से मुक्त होकर शुद्ध शरीरवाला होता है। फिर सार्थकाल स्नान किये हुए को पूर्व की तरह दूध देवे। रेशम की चादर बिछाई शय्यापर इसको सुलाये। फिर चौथे दिन इसमें शोथ उत्पन्न होता है। फिर सब अंगों से कुमि निकलते हैं। फिर उसी दिन शय्यापर धूल बिछाकर सोये। सार्थकाल पूर्व की भाँति गरम करके ठण्डा किया दूध दे। इसी तरह पाँचवें और छठे दिन करे। केवल दोनों समय इसको दूध ही देवे। फिर सातवें दिन मांस के बिना, त्वचा और अस्थिमात्र रहते हैं, सोम के पीने के कारण ही बचा रहता है। उस दिन सुहाते हुए गरम दूध से स्नान करके तिल, मुलेहट्टी और चन्दन का लेप शरीर पर कराके दूध पिलाये। फिर आठवें दिन प्रातःकाल में ही दूध से स्नान कराके, चन्दन का शरीर पर लेप कराके, दूध पिलाये। धूल की शय्या को छोड़कर रेशम से बिछाई शय्यापर लिटा देवे। फिर इसका मांस बढ़ने लगता है ( पुष्ट होता है )। त्वचा फटती है, दाँत-नख और रोम गिर जाते हैं। नवें दिन से इसके शरीर पर अणुतैल का अभ्यंग करे, खैर की छाल के कृषाय से स्नान कराये। दसवें दिन इसी प्रकार करे। इससे इसकी त्वचा स्थिर बन जाती है। ग्यारहवें और बारहवें दिन भी इसी प्रकार करे। तेरहवें दिन से लेकर खैर की छाल के कृषाय से स्नान कराये। इस प्रकार सोलहवें दिन तक करे। फिर सत्तरहवें और अठारहवें दिन नोकदार, स्निग्ध, वज्रवैद्यैर्य-स्फटिक-के समान निर्मल, समान, स्थिर, खट्टे आदि का सहन करनेवाले दाँत निकल आते हैं। तब से लेकर पुराने शाली चावलों की कणियाँ से दूध में बनाई यवागू को खाये। पचीसवें दिन तक इसी प्रकार करे। फिर इसको शाली चावलों का नरम भात दूध के साथ दोनों समय देवे। फिर इसके मृग, बौरबहुटी, तरुण सूर्य के समान लाल नख निकल आते हैं। स्थिर, स्निग्ध, सूक्ष्म एवं लक्षणों से युक्त बाल उग आते हैं। नोले कमल, अलसी के फूल, तथा वैद्य के सहस्र वर्णवाली त्वचा हो जाती है। एक मास के पीछे बालों को कटवा दे। बाल कटवा कर खस, चन्दन, काले तिल इनको

अ० २६ ]

चिकित्सास्थानम्

५०१

पीसकर सिर पर लेप करे । अथवा दूध से स्नान कराये । इससे सात दिन पीछे, भ्रमर के समान काले मुँबराले, स्थिर, स्निग्ध बाल उत्पन्न होते हैं । फिर तीन दिन पीछे पहले घर की देहली मेंसे (घर की चार दिवारी से) बाहर आकर, थोड़ी सी दूर रह कर फिर अन्दर उसी घर में चला जाये । अभ्यंग के लिये इसे बलातैल बरतना चाहिये । उद्घर्चन के लिये जी का आटा, परिषेक के लिये सुहाता हुआ गरम पानी, उत्सादन के लिये अजकर्ण (साल) का कषाय, स्नान के लिये खस मिश्रित कुण्ड का पानी, लेपन के लिये चन्दन, यूप सूप आदि आँबले का रस मिलाकर बनाये । गाय के दूध और मुलेहटी के कल्क से सिद्ध किया काले तिलों का तेल, श्राक, आदि वस्तुओं के सिद्ध करने में बरते । इस प्रकार दस दिन करे । दूसरे दस दिन दूसरे घर में रहें । इसके पश्चात् तीसरे घर में दस दिन तक वहाँ रहे । थोड़ी धूप और वायु का सेवन करने लगे । और फिर अन्दर चला जाये । अतिशय सुन्दर होने से अपना मुख शीशे या पानी में न देखे । अगले दस दिन तक क्रोध आदि को छोड़ देवे । यह विधि सब सोमों के सेवन की है । विशेषकर वल्ली (लता आदि), (दूर्वा जैसे)-लुपक (झाड़ी जैसे) आदि सोम ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यों को खाने चाहिये । इनकी मात्रा साढ़े तीन मुष्टि (पल) है ॥१२॥

अंगुमन्तं सौवर्णं पात्रेऽभिषुण्युयात्, चन्द्रमसं राजते तावुपुषुच्याष्टगुणमंश्चर्यमवाप्येशानं देवमनुप्रविशति, शेषास्तु ताम्रमये मृन्मये वा राहतिरे वा चर्मणि वितते, शूद्रवजं त्रिभिर्वर्णैः सोमा उपयोक्तव्याः । ततश्चतुर्थं मासे पौर्णमास्यां शुचौ दश ब्राह्मणान्चार्थत्वा कृतमङ्गला निष्क्रम्य यथोक्तं व्रजेदिति ॥१३॥

अंगुमान् सोम को सुवर्ण के पात्र से निचाड़े । चान्द्रमस सोम को चाँदी के पात्र में निचाड़े । इन दोनों का उपयोग करके मनुष्य देवताओं के अधविष ऐश्वर्य को प्राप्त करक भगवान् शिव में प्रवेश करता है । शेष सोमों को ताम्र के, मिट्टी के, या लोहित मृग के चमड़े से बने पात्र में निचाड़े । शूद्र को छोड़कर शेष तीनों वर्ण सोमका उपयोग करें । फिर चौथे मास में पूर्णमासी के दिन पवित्र स्थान पर ब्राह्मणों की पूजा करके, स्वस्तिपाठ करके, घर से निकलकर इच्छानुसार जाये ।

वक्तव्य—अधविषमैश्वर्यम्—“अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा । ईशित्वं च वशित्वं च तथा कामावषा-यिता ॥ आवेशश्चेतसो ज्ञानमर्थानां छन्दतः क्रिया । दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम् ॥ इत्यष्टगुणमाख्यातं योगिनां बलमैश्वरम् ॥” चरकः ॥१३॥

ओषधोनां पतिं सोममुपपुष्य विचक्षणः । दशवर्षसहस्राणि नवां धारयते तनुम् ॥१४॥

नारिगितं तोयं न विषं न शस्त्रं ताक्षमेव च । तस्यालमायःक्षपणे समर्थानि भवन्ति हि ॥१५॥ भद्राणां षष्टिर्वर्षाणां प्रसूतानामनेकधा । कुञ्जराणां सहस्रस्य बलं समधिगच्छति ॥१६॥ क्षीरोदं शक्रसदनमुत्तरांश्च कुरुनपि । यत्रेच्छति स गन्तुं वा तत्राप्रतिहता गतिः ॥१७॥ कन्दर्प इव रूपेण कान्त्या चन्द्र इवापरः । ग्रह्यादयति भूतानां मनांसि स महावृतिः ॥१८॥ साङ्गोपाङ्गश्च निखिलान् वेदान् विन्दति तत्त्वतः । चरत्यमोघसङ्कल्पो देववृत्चाखिलं जगत् ॥१९॥

बुद्धिमान् मनुष्य औषधियों के स्वामी सोम का उपयोग करके दस हजार वर्ष तक नूतन शरीर को धारण करता है । अग्नि, जल, विष, शस्त्र और अस्त्र कोई भी इसकी आयु को नष्ट नहीं कर सकते । अपितु इसको बढ़ाते हैं । उत्तम जाति के साठ वर्ष की आयुवाले तथा मद बहाते हुये हजारों हाथियों का बल आ जाता है । क्षीरसमुद्र, इन्द्र का घर-स्वर्ग, उत्तर कुब-जहाँ भी जाना चाहता है, वहाँ पर वह बेरोक-टोक गति से जा सकता है । रूप में कामदेव के समान, कान्ति में चन्द्रमा के समान, यह महान् तेजस्वी मनुष्यों के मनो को प्रसन्न करता है । अंग-उपांगों समेत सब वेदों को तत्त्व रूप से जानता है । देवता के समान अनर्थ संकल्पवाला जगत् में घूमता है ।

वक्तव्य—‘उत्तर-कुब’ वर्तमान ध्यानस्थान (देवताओं का पर्वत) है जो मध्य एशिया में है । उत्तर कुब का नाम किराता-लुनीय में भी अर्जुन की विजय वर्णन में आया है, यथा—‘विजित्य या प्राज्यमचच्छुत्तरान् कुरुतकुप्यं वसु वासवोपमः’ ॥१४-१६॥

सर्वधामेव सोमानां पत्राणि दश पञ्च च । तानि शुक्ले च कृष्णे च जायन्ते निपतन्ति च ॥२०॥

एकैकं जीयते पत्रं सोमस्याहरहस्तदा । शुक्लस्य पौर्णमास्यां तु भवेत् पञ्चदशच्छदः ॥२१॥ जीयते पत्रमेकैकं दिवसे दिवसे पुनः । कृष्णपक्षक्षये चापि लता भवति केवला ॥२२॥

अंगुमानाज्यगन्धस्तु कन्दवान् रजतप्रभः । कदल्याकारकन्दस्तु मुखवाङ्मगुनच्छदः ॥२३॥ चन्द्रमाः कनकाभासो जले चरति सर्वदा । गरुडाहृतनामा च श्वेताक्षरचापि पाण्डुरो ॥२४॥

सर्पनिर्मोकसहस्रो तौ वृक्षामावलम्बिनौ । तथाऽन्ये मण्डलैश्चित्रैश्चैत्रिता इव भान्ति ते ॥२५॥ सर्वं एव तु विज्ञेयाः सामाः पञ्चदशच्छदाः । क्षीरकन्दलतावन्तः पत्रैर्नानाविधैः स्मृताः ॥२६॥

सब प्रकार के सोमों के पत्ते पन्द्रह होते हैं । ये पत्ते शुक्ल पक्ष में उत्पन्न होते हैं, और कृष्ण पक्ष में गिर जाते हैं । शुक्ल

४०२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३० ]

पक्ष में प्रतिदिन एक एक पत्र सोम में बदता है, और पूर्णमासी में पूरे पन्द्रह पत्ते हो जाते हैं। कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन एक एक पत्र झड़ने लगता है, और अमावस्या के दिन केवल लता मात्र बच जाती है। अंशुमान् सोम घृत के समान गन्धवाला, एवं कन्दवान् होता है। रजतप्रभ केले के आकार के कन्दवाला है। मुंजवान में लहसुन के समान पत्ते होते हैं। चन्द्रमा और कनकप्रभ सदा जल में रहते हैं। गरुडाहृतनामा और श्वेताक्ष ये पाण्डुर वर्ण, साँप की कैंचुली जैसे, वृक्ष के अप्रभाग में लटकते हैं। शेष दूसरे चित्रित मण्डल (धन्वी से) चित्रित हुए दीखते हैं। सब सोमों के पत्ते पन्द्रह होते हैं, इनके कन्द में दूध होता है, लता रहती है, नाना प्रकार के पत्ते होते हैं ॥२०-२६॥

हिमवत्यर्धुदे सखे महेन्द्र मलये तथा ।

श्रीपर्वते देवगिरी गिरी देवसहे तथा ॥२७॥

पारियात्रे च विन्ध्ये च देवसुन्दे हृदे तथा ।

उत्तरेण वितस्तायाः प्रवृद्धा ये महीधराः ॥२८॥

पञ्च तेषामधो मध्ये सिन्धुनामा महानदः ।

हठवत् प्लवते तत्र चन्द्रमाः सोमसत्तमः ॥२९॥

तस्योहेशेष चाप्यस्ति मुञ्जवानंशुमानपि ।

काश्मीरेषु सरो दिव्यं नाम्ना लुद्रकमानसम् ॥३०॥

गायत्रस्त्रैष्टुभः पाङ्क्तो जागतः शाक्वरस्तथा ।

अत्र सन्त्यपरे चापि सोमाः सोमसमप्रभाः ॥३१॥

हिमालय, पहाड़ की चोटी पर, सहाद्री में, महेन्द्र में, मलयाचल पर, श्रीपर्वत पर, देवगिरि पर, देवसहगिरि पर, पारियात्र में, विन्ध्याचल में, देवसुन्द में, हृद में, वितस्ता के उत्तर में, जो ऊँचे पाँच पर्वत हैं, उनके नीचे, मध्य में, सिन्धु नामक जो बड़ी नदी है, उसमें सोमों में श्रेष्ठ चन्द्रमा सोम हठ (जल कुम्भी) की तरह तैरता है। इसके समीप में ही मुंजवान् अंशुमान् रहता है। कश्मीर में लुद्रक मानस नाम का दिव्य तालाब है, यहाँ पर गायत्र, त्रैष्टुभ, पांक, जागत, शाक्वर तथा चन्द्रमा के समान कान्तिवाले दूसरे सोम हैं ॥२७-३१॥

यैश्चात्र मन्दभाग्यैस्ते भिषजश्चापमानिताः ।

न तान् पश्यन्त्यधर्मिष्ठाः कृतघ्नाश्चापि मानवाः ।

भेषजद्वेषिणश्चापि ब्राह्मणद्वेषिणस्तथा ॥३२॥

इन स्थानों पर जो वैद्यों का अपमान करते हैं, अधर्मिष्ठा, कृतघ्न, औषध से द्वेष करनेवाले, ब्राह्मणों से द्वेष करनेवाले हैं वे लोग इन सोमों को नहीं देख सकते ॥३२॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने स्वभावव्याधिप्रतिषेधनीयं रसायनचिकित्सितं नामैकोनत्रिधोऽध्यायः ॥२६॥

त्रिशतमोऽध्यायः

अथातो निवृत्तसन्तापीयं रसायनं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे निवृत्त सन्तापीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१-२॥

यथा निवृत्तसन्तापा मोदन्ते दिवि देवताः ।

तथौषधीरिमाः प्राप्य मोदन्ते सुवि मानवाः ॥३॥

जिस प्रकार स्वर्ग में देवता संताप (दुःख) से रहित होकर आनन्द करते हैं, उसी प्रकार इन औषधियों को प्राप्त करके पृथ्वीलल पर मनुष्य आनन्द अनुभव करते हैं ॥३॥

अथ खलु सप्त पुरुषाः रसायनं नोपयुञ्जीरन्, तद्यथा-अनात्मवानलसो दरिद्रः प्रमादी व्यसनी पापकृद् भेषजापमानी चेति । सप्तभिरेव कारणैर्न संपद्यते, तद्यथा-अज्ञानादनारम्भादस्थिरचित्तस्वाहारिद्र्यादानायत्त्वाद्धर्मादौषधालाभाच्चेति ॥४॥

सात पुरुष रसायन का सेवन न करें। यथा—अजितेन्द्रिय, आलसी, दरिद्र, प्रमादी, व्यसनी, पापकर्म करनेवाला और औषध का अपमान करनेवाला। सात कारणों से रसायन औषध गुण नहीं करती, यथा—अज्ञान से, औषध का आरम्भ न करने से, चित्त के अस्थिर होने से, दारिद्र्य से (दरिद्रता से), अनायत्ता से, अधर्म से, औषध के न मिलने से ॥४॥

अथौषधीर्याख्यास्यामः—तत्राजगरी, श्वेतकापोती, कृष्णकापोती, गोनसो, वाराही, कन्या, छत्रा, अतिच्छत्रा, करेणु, अजा, चक्रका, आदित्यपर्णी, ब्रह्मसुवर्चला, श्रावणी, महाश्रावणी, गोलोमी, अजलोमी, महावेगवती, चेत्यष्टादश सोमसमवीयां महौषधयो व्याख्याताः। तासौ सोमवत् क्रियाग्रीस्तुतयः शाब्देऽभिहिताः। तासामागारैऽभिहुतानां याः क्षीरवत्स्वस्तासां क्षीरकुडवं सकृदेवोपयुञ्जीत यास्त्वक्षीरा मूलवत्स्वस्तासां प्रेजिनीप्रमाणानि त्रीणि काण्डानि प्रमाणमुपयोगे, श्वेतकापातां समूलपत्राभक्षयितव्या, गोनस्यजगरीकृष्णकापोतीनां सनखमुष्टिखण्डशः कल्पयित्वा क्षीरेण विपाच्य परिस्त्रान्याभिचारितमभिहुतं च सकृदेवोपयुञ्जीत, चक्रकायाः पयः सकृदेव, ब्रह्मसुवर्चला सप्तरात्रमुपयोक्तव्या। भदयकल्पेन शेषाणां पञ्च पञ्च पञ्चाणि क्षीरादककथितानि प्रस्थेऽवशिष्टवतार्य परिस्त्रान्य सकृदेवोपयुञ्जीत। सोमवदाहारविहारी व्याख्यातौ, केवलं नवनीतमभ्यज्ञार्थं, शेषं सोमवदानिर्गमादिति ॥५॥

इसके आगे औषधियों का व्याख्यान करेंगे—अजगरी, श्वेतकापोती, कृष्णकापोती, गोनसी, वाराही, कन्या, छत्रा, अतिच्छत्रा, करेणु, अजा, चक्रका; आदित्यपर्णी, ब्रह्मसुवर्चला, श्रावणी, महाश्रावणी, गोलोमी, अजलोमी, महावेगवती, ये

२० ]

चिकित्सास्थानम्

४०३

अठारह औषधियाँ सोम के समान शक्तिशाली हैं। इनकी क्रिया (सिवन विधि), और फलश्रुति-स्तुति शास्त्र में सोम के समान कही है। इनके स्थान पर होम करके, जो दूधवाली हों, उनके दूध की एक कुड्ड मात्रा एक साथ पी जाये। जो औषधियाँ दूध रहित हैं, और मूलवाली हैं, उनके मूल में से तर्जनी के बराबर तीन टुकड़े लेकर उपयोग करें। श्वेतकापोती को मूल और पत्ते के साथ खाना चाहिये। गोनसी, अजगरी, कृष्णकापोती, इनको नाख्तों समेत मुट्ठी भरकर-टुकड़े करके, काटकर दूध के साथ पकाकर, छानकर, घूत से थोड़ा स्निग्ध करके, पीछे से होम करके, इसको एक साथ पी जाये। चक्र का दूध एक साथ पीये। भक्ष्य विधि से ब्रह्मसुवर्चला को सात दिन खाना चाहिये। शेष औषधियों के पाँच-पाँच पल लेकर एक आङ्क दूध में पकाये। एक प्रस्थ रहने पर उतारकर, छानकर एक साथ पी जाये। आहार और विहार सोम की भाँति है। केवल भेद इतना है कि अभ्यङ्ग के लिये मक्खन बरते। शेष सब विधि बाहर आने तक सोम की भाँति है ॥५॥

भवन्ति चान्न—

युवानं सिंहविकान्तं कान्तं श्रुतनिगादिनम्। कुर्गुरेताः क्रमेणैव द्विसहस्रायुषं नरम् ॥६॥ अङ्गदी कुण्डली मौली दिव्यस्रक्चन्दनाम्बरः। चरत्यमोघसंकल्पो नभस्यम्बुदुर्गमे ॥७॥ ब्रजन्ति पक्षिणो येन जल्लम्बाश्च तोयदाः। गतिः सौषधिसिद्धस्य सोमसिद्धे गतिः परा ॥८॥

कहा भी है—ये औषधियाँ मनुष्य को युवा, सिद्ध के समान पराक्रमी, सुन्दर शरीर, सुनते ही धारण करनेवाला, तथा दो हजार वर्ष की आयुवाला करती हैं। केभूरयुक्त, कुण्डल धारण किये, मुकुटधारी, दिव्य माला चन्दन और वस्त्र को धारण करके, अभ्यर्थ संकल्पवाला होकर बादल से भी न जाने योग्य आकाश में विचरता है। जिससे पक्षी जाते हैं, और पानी से भरे बादल जिस गति ( मार्ग ) से जाते हैं, औषधि से सिद्ध मनुष्य की वह गति है, सोम से सिद्ध व्यक्ति की गति इससे भी ऊपर हो जाती है ॥६-८॥

अथ वक्ष्यामि विज्ञानमौषधीनां पृथक् पृथक्। मण्डलैः कपिलेश्चित्रैः सर्पाभा पञ्चपिण्निनी ॥९॥ पञ्चारत्रिप्रमाणं च विज्ञेयाऽजगरी बुधैः। निष्पन्ना कनकाभासा मूले द्वयंगुलसंमिता ॥१०॥ सर्पाकारा लोहितान्ता श्वेतकापोतिरुच्यते। द्विपिण्निनी मूलभवासरुणां कृष्णमण्डलाम् ॥११॥ इयरन्तिमात्रां जानीयाद् गोनसीं गोतसाङ्गतिम्। सक्षीरां रोमशं मुष्टीं रसेनेखुरसोपमाम् ॥१२॥ एवंरूपरसां चापि कृष्णकापोतिमादिशेत्। कृष्णसर्पस्वरूपेण वाराही कन्दसंभवा ॥१३॥ एकपत्रा महावीर्या भिन्नाञ्जनसमप्रभा।

छत्रातिच्छत्रके विद्याद्रक्षोभे कन्दसंभवे ॥१४॥ जराभृत्युनिवारिण्यौ श्वेतकापोतिसंस्थिते। कान्तेद्रादजभिः पत्रैर्मयूराङ्गरुहोपमैः ॥१५॥ कन्दजा काञ्चनक्षीरी कन्या नाम महौषधी। करेणुः सुबहुक्षीरा कन्देन गजरूपिणी ॥१६॥ हरितकर्णपलाञ्जस्य तुल्यपर्णा द्विपिण्निनी। अजास्तनाभकन्दा तु सक्षीरा जुपरूपिणी ॥१७॥ अजा महौषधी ज्ञेया जङ्गकुन्देन्दुपाण्डुरा। श्वेतां विचित्रकुसुमां काकादन्यां सर्मां छुपाम् ॥१८॥ चक्रकासोषधीं विद्याञ्जराभृत्युनिवारिणीम्। मूलिनी पञ्चभिः पत्रैः सुरक्तांशुककोमलैः ॥१९॥ आदित्यपिण्निनी ज्ञेया सदाऽऽदित्यानुवर्तिनी। कनकाभा जलान्तेषु सर्वतः परिसर्पति ॥२०॥ सक्षीरा पद्मिनीप्रख्या देवी ब्रह्मसुवर्चला। अरन्तिमात्र्युपका पत्रैर्द्वयंगुलसंमिताः ॥२१॥ पुष्पैर्निलोत्प्लाकाः फलैश्चाञ्जनसन्निभैः। श्रावणां महती ज्ञेया कनकाभा पयस्विनी ॥ श्रावणी पाण्डुराभासा महाश्रावणिलक्षणं। गोलोमी चाजलोमी च रौमशे कन्दसंभवे ॥२३॥ हंसपादौ विचिन्नन्तेः पत्रैर्मूलसमुद्भवैः। अथवा जङ्गपुष्प्या च समाना सर्वरूपतः ॥२४॥ वेगेन महताऽऽविद्या सपत्निमौकसन्निभा। एषा वेगवती नाम जायते ह्यम्बुदक्ष्ये ॥२५॥

इसके आगे औषधियों को पृथक् २ पहिचान करेंगे। अजगरी—चित्रित कपिल वर्ण के धन्वोवाली, सर्प के आकार की, पाँच पत्तों की पाँच अरति प्रमाण होती है। ( अरति—बालित )। श्वेतकापोती—पत्र रहित, स्वर्ण के समान चमकवाली, मूल में दो अंगुल लम्बी, सर्प के आकार की, अन्दर से लाल होती है। गोनसी—दो पत्तोंवाली, मूल में अरुण वर्ण काले धन्वों की दो अरति लम्बी, गाय की नासा के समान आकार की होती है। कृष्णकापोतिका—दुधयुक्त, हंसआटेवाली, कोमल, रस में गन्ने के रस के समान होती है। छत्रा, अतिच्छन्ना—एक पत्तेवाली, महान् शक्ति सम्पन्न, तोड़े हुए अञ्जन के समान कान्ति युक्त, रक्षोभन एवं कन्द से उत्पन्न होती है। ये जरा और मृत्यु को नष्ट करती हैं, श्वेतकापोतिका के आकार की हैं। कन्या—सुन्दर एवं मोर के बालों के समान बारह पत्रों से युक्त, कन्द से उत्पन्न, स्वर्ण के समान दूधमहौषधी है। करेणु—बहुत दूधवाली, और हाथी के समान कन्दवाली है। अजा-महौषधी—हरित कर्णपलाश ( हाथी चिवारी ढाक ) के समान पत्तों की, दो पत्तोंवाली, बकरी के स्तनों के समान कन्द की, दूधवाली, जुपरूप, शंख, कुन्द ( मोगरा ), इन्दु के समान श्वेत होती है। चक्रका औषधि—श्वेतवर्ण, विचित्र फूलों की, काकादनी के समान रूप की, जरा और मृत्यु को नष्ट करनेवाली है। आदित्यपिण्निनी—मूलवाली पाँच पत्तों की, ये पत्ते-

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मुश्रुतसंहिता

[ अ० ३० ]

सूय के सामान लाल, कोमल, होने हैं। यह महौषधी, सूर्य की ओर सदा मुख रखती है। इसकी चमक स्वर्ण के समान, जल के किनारों पर सब और फेन्ती है ब्रह्मसुवर्चला—दूधवाली, कमलिनी के समान, अरतिमात्र ( बालिस्तभर ) लूग की, दो अङ्गुल लम्बे पत्तों की, नीले कमल के समान फूलों की, और फल अञ्जन के समान काले होते हैं। महा श्रावणी—स्वर्ण के समान कान्ति की और दूधवाली है। श्रावणी-पाण्डुरवर्ण और महाश्रावणी के लक्षणों की है। गोलोमी और अजलोमी—हंआटे-वाली एवं कन्द से उत्पन्न होती है। वेगवती—हंसपाद ( हंस-राज ) के समान टूटे हुए, मूल से निकलते हुए पत्तोंवाली, अथवा सब प्रकार से शांखपुष्पी के समान, बड़े भारी वेग से घिरी हुई, सौप के केंचुली के समान होती है। वर्षा के बीतने पर यह उत्पन्न होती है।

वक्तव्य—अरतिनः—विस्तृतकनिष्ठिकाकुलिमष्टिकहस्तः अरतिनः। वदमष्टिकः अरतिनः—दोनों ही अर्थ इल्हण के हैं। अम्बुदक्षये शरदि ॥८—२५॥

समादौ सर्परूपिण्यो ह्यौषध्यो याः प्रकीर्तिताः।

तासामुद्गरणं कार्यं मन्त्रणानेन सबंदा ॥२६॥

महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवामपि।

तपसा तेजसा वाऽपि प्रशान्स्यध्वं जिवाय वै ॥२७॥

मन्त्रणानेन मतिमान् सर्वा एवाभिमन्त्रयेत्।

अश्रद्धवानैरलसः कृतध्वनैः पापकर्मभः ॥२८॥

नैवासादयितुं शक्याः सोमाः सोमसमास्तथा।

सौप के आकार की पहली जो सात औषधियाँ कही हैं, उनको निम्नमंत्र के साथ उखाड़ना चाहिये। महेन्द्र, राम, कृष्ण, ब्राह्मण, गाय, इनके तप या तेज के कारण कल्याण के लिये उपशमन करो। इस मंत्र से बुद्धिमान् सब औषधियों को आमन्त्रित करे। श्रद्धाहीन आलसी, कृतध्वन और पापकर्म करनेवाले मनुष्य सोम को तथा सोम जैसी अजगरी आदि को नहीं प्राप्त कर सकते ॥२६—२८॥

पीतावशेषममृतं देवैर्ब्रह्मपुरोगमैः ॥२९॥

निहितं सोमवीर्यासु सोमे चाप्यौषधीपतौ।

ब्रह्मा के आगे चलनेवाले देवताओं के पीने से बचे हुए अमृत को सोमवीर्यवाली औषधियों में और औषधियों के पति सोम नामक औषधी में रख दिया था ॥२९॥

देवसुन्दे हृदचरे तथा सिन्धौ महानदे ॥३०॥

हरयते च जलान्तेषु मेध्या ब्रह्मसुवर्चला।

आदित्यपिणीनीं ज्ञेया तथैव हिमसंक्षये ॥३१॥

हरयतेऽजगरो नित्यं गोनसी चाम्बुदागमे।

काश्मीरेषु सरो दिव्यं नाम्ना क्षुद्रकमानसम् ॥३२॥

करेणुस्तत्र कन्या च छत्रातिच्छत्रके तथा।

गोलोमी चाजलोमी च महती श्रावणी तथा ॥३३॥

वमन्ते कृष्णसर्पाख्या गोनसी च प्रहरयते।

कौशिकीं सरितं तीर्त्वा सञ्जयन्यन्यास्तु पूर्वतः ॥३४॥

क्षितिप्रदेशो वल्मीकैराचितो योजनत्रयम्।

विज्ञेया तत्र कापोती उवेता वल्मीकमूर्धसु ॥३५॥

मलये नलसेनौ च वेगवस्थौषधी ध्रुवा।

कार्तिकया पौर्णमास्यां च भक्ष्येत्तामुपोषितः ॥३६॥

सोमवन्च्चात्र वर्तते फलं तावन्च कीर्तिताम्।

सर्वा विचैयास्त्वोपधथः सोमाश्चाप्यनुदे गिरी ॥३७॥

स शृंगैर्देवचरितैरन्बुदानांकिभेदिभिः।

न्यामस्तीर्थैश्च बिख्यातेः सिद्धविपुरसेवितः ॥३८॥

गुहाभिर्भीमरूपाभिः सिंहोन्नादितकुक्षिभिः।

गजालोहिततोयाभिरापगाभिः समन्ततः ॥

विविधैर्धर्तुभिश्चित्रैः सर्वत्रैवोपशोषितः ॥३९॥

नदीषु जलेषु सरःसु चापि पुण्येऽवरण्येषु तथाऽऽश्रमेषु।

सर्वत्र सर्वाः परिमागितव्याः सर्वत्र भूमिहि वसुनिधत्ते ॥

ब्रह्मसुवर्चला तालाबों में श्रेष्ठ देवसुन्द में, महानदी सिन्धु में और जल के किनारे मेध्य बुद्धिवर्धक ब्रह्मसुवर्चला मिलती है। आदित्यपणी भी वसन्त में वहीं मिलती है। अजगरी सदा मिलती है, गोनसी वर्षा में मिलती है। काश्मीर में क्षुद्रक मानस नाम का दिव्य तालाब है, वहाँ पर करेणु, कन्या, छत्रा, अतिच्छत्रा, गोलोमी, अजलोमी, महाश्रावणी होती है। वसन्त में कृष्णसर्पा और गोनसी दीखती है। कौशिकी नदी को पार कर सञ्जयन्ती नदी से पूर्व की ओर वल्मीकों से भरे जो क्षिति ( भूमि ) भाग हैं, ये भूमि भाग तीन योजन लम्बे हैं, वहाँ से ये उत्पन्न होती हैं। वहाँ पर वल्मीक की छोटी पर श्वेतकापोती उत्पन्न होती है। मलय और नलसेतु पर वेगवती औषधियाँ होती हैं। उपवास करके इस औषधि को कार्तिकी की पूर्णिमा को खाये ( सोम के समान आचरण करे ), फल भी सोम के समान है। इन सब औषधियों को और सोम को भी अबुंद पर्वत से एकत्रित करना चाहिये। यह पर्वत देवताओं के विचरने से पवित्र बाढ़लों से भी ऊँचा सिद्धिर्वि—देवताओं से सेवित प्रसिद्ध है। भयङ्कर गुहाओं से युक्त सिंह की गर्जना से नादित हाथी से आलोहित जलवाली नदियों से घिरा नानाप्रकार के विचित्र धातुओं से सब स्थानों पर शोषित है। नदियों में, पर्वतों में, तालाबों में, पवित्र जङ्गलों में, आश्रमों में सब स्थानों में ये सब औषधियाँ दूँढ़नी चाहिये, क्योंकि—भूमि सर्व वसु—( रत्नों को ) धारण करती है।

वि० मन्तव्य—अ० २९ तथा ३० में सोमवर्ग की जिन २४ औषधियों का तथा अजगरी आदि १८ औषधियों का वर्णन किया गया है उनको जानना पहिचानना ज़रूरी हो गया है और साथ ही उनका प्रचार भी समाप्त हो गया है। यद्यपि जिन स्थानों पर उनका होना

अ० ३१ ] ६४

चिकित्सास्थानम्

४०४

अठारह औषधियाँ सीम के बतलाया गया है वहाँ सर्वत्र मानव आज भी जाता-आता है, निवास करता है परन्तु उन दिव्य औषधियों को मूल गया है ॥४०॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने निवृत्तसंतापीयं रसायनं नाम त्रिशोऽध्यायः ॥३०॥

एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः

अथातः स्नेहोपयोगिकचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे स्नेहोपयोगिक चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।

वि० मन्तव्य—इस अध्याय में स्नेहों के उपयोग तथा प्रयोग का वर्णन किया गया है ॥१,२॥

स्नेहसारोऽयं पुरुषः, भाणाश्च स्नेहभूमिष्ठाः स्नेहसाध्याश्च भवन्ति । स्नेहो हि पानानुवासनमस्तिऽक्षिरोवस्थुत्तरबस्तिनस्थकण्णपूर्णगात्राभ्यङ्गभोजनेषूपयोऽयः ॥३॥

यह पुरुष स्नेहसार ( स्नेह के सहारारे टिकनेवाला ) है, और प्राण भी स्नेह की मुख्यतावाले हैं, ( प्राणों का भी मुख्य आधार स्नेह ही है )। तथा रोग भी स्नेह से ही साध्य होते हैं। क्योंकि स्नेह पान-अनुवासन-मस्तिष्क ( शिरोविरेचन ) शिरोबस्ति, उत्तरबस्ति, नस्थ, कण्ण में भरने, शरीर पर अस्थंग, भोजनों में बरतना चाहिये ॥३॥

तत्र द्वियोनिश्चतुर्विकल्पोऽभिहितः स्नेहः स्नेहगुणाश्च । तत्र जङ्गमेभ्यो गन्धं घृतं प्रधानं स्थावरभ्यस्तिलतैलं प्रधानमिति ॥४॥

इसमें स्नेह की योनि ( उत्पत्तिस्थान ) दो प्रकार की ( स्थावर और जंगम ) है। स्नेह के चार भेद ( घी, तैल, वसा और मज्जा ) पहले ( सू० ४-५ में देखिये ) कहे हैं। इनमें जंगम स्नेहों में ( घी, वसा, मज्जा में ) गौ का घृत प्रधान है। और स्थावर स्नेहों में तिल तैल प्रधान है।

वक्तव्य—घृत की प्रधानता में—“नान्यः स्नेहस्तथा कश्चित् संस्कारमनुवर्तते, यथा सर्पिरतः सर्पिः सर्वस्नेहोत्तमं मतम् ॥ चरक० ( २ ) सर्पिस्तैलं वसा मज्जा सर्वस्नेहोत्तमा मताः । एषु चैवोत्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्त्तनात् ॥ चरक० । तैल शब्द—तिलों से उत्पन्न तैल को तैल कहना चाहिये, तथापि दूसरे स्थावर द्रव्यों से उत्पन्न स्नेह को भी तैल कहते हैं। यथा—“निष्पत्तेः तदुगुणत्वाच्च तत्तैलमितरेष्वपि ॥” घी दो प्रकार का है, दूध से निकाला हुआ और दही से निकाला। शुद्ध मांस का स्नेह वसा है, अस्थियों में आभित स्नेह मज्जा है। जंगमों में घी प्रधान है, स्थावरों में तिलतैल,

विरेचन के लिये एरण्ड तैल उत्तम है ॥४॥

अत ऊर्ध्वं यथाप्रयोजनं यथाप्रधानं च स्थावरस्नेहा-नुपदेद्यामः—तत्र तिल्वकैरण्डकोशाप्रदन्तीद्रवन्तीसप्तलाजङ्गिनीपलाशविषाणिकागवाक्षीकम्पिलकगम्पाकनीलिनीस्नेहा विरेचयन्ति, जीमूतककुटजकृतवैधनेद्वैवाकुधा-मार्गवमदनस्नेहा वामयन्ति, विडङ्गखरमज्जरीमधुजिमुसूयर्वल्लीपीलुसिद्धार्थकव्योतिष्मतीस्नेहाः शिरो विरेचयन्ति, करञ्जपूतीककृतमालमातुलुङ्गेडुगुदीकिराततिलस्नेहा दुष्ट-ब्रणेपुप्युच्यन्ते, तुवरककपित्थकम्पिलकभक्ष्जातकपटोलस्नेहा महाव्याधिषु, त्रपुसैर्वास्ककौरुकुतुबीकृष्माण्डस्नेहा मूत्रसंगेषु, कपोतवङ्गावलगुजहरीतकीस्नेहाः शर्करारुमरीषु, कुसुम्भसर्षपातसीपिचुमर्दातिमुक्तकभाण्डीकदुतुम्बीकटभीस्नेहाः प्रमेहेषु, तालनारिकेठपनसमोचप्रियालबिल्बमधूकर्लेष्मातकाप्रातकफलस्नेहाः पित्तसंमृद्धे वायो, बिभीतकभक्ष्जातकपिण्डोतकस्नेहाः कृष्णोकरणे, श्रवणककुटुण्डुकुस्नेहाः पाण्डुकरणे, सरलपीतदारुशिशुपागुरुसारस्नेहा ददुकुष्ठकिटिभेषु, सर्व एव स्नेहा वातमुपद्वन्ति, तैलगुणाश्च समासेन व्याख्याताः ॥५॥

इसके आगे प्रयोजन के अनुसार, प्रधान ( मुख्य ) की दृष्टि से स्थावर स्नेहों को कहेंगे—इनमें तिल्वक, एरण्ड, कोशाप्र, जमालगोठा, द्रवन्ती ( मोगलई एरण्ड ) सप्तला ( सातला ), शंखिनी ( यवतिलका ), टाक, विषाणिका ( मेढ़ाखिगी ), गवाक्षी ( इन्द्रायण ), कमीला, अमलतास, नीलिनी, इनके स्नेह विरेचन करते हैं। जीमूतक ( देवदाली ), कूड़ा, कृतवैधन ( कोशातकी—कडुई तोरई ) इद्वैवाकु ( कडुआ तुम्बा ), धामार्गव ( विषा तोरई—नेनुआ ), मेनफल, इनका स्नेह वमन कराते हैं। विडंग, चिरचिटा, मीठा सहजन, सूर्यवल्ली ( आदित्य भक्ता-हुलहुल ), पीलू, सरसों, मालकंगनी इनका स्नेह शिर का विरेचन करता है। करंज, पूतीकरंज, अमलतास, बिजौरा, हिंगोट, चिरायता इनका स्नेह दूषित ब्रणों में बरता जाता है। तुवरक, कैथ, कमीला, भिलावा, पटोल इनका स्नेह महारोगों में बरता जाता है। खीरा, ककड़ी, कर्काव ( फूट ), तुम्बी पेटा इनका स्नेह मूत्र के अवरोधों में बरता जाता है। कपोतवङ्गा, ( ब्रह्मसुवर्चला या ब्राह्मी ) बावची, हरड् का स्नेह शर्करा एवं अश्मरी में प्रयुक्त होता है। कुसुम्भ ( बरें ), सरसों, अलसी, नीम, माधवीलता, भाण्डी, कडुईतुम्बी और नीली अपराजिता ( कोयल ) इनका स्नेह प्रमेहों में बरता जाता है। ताल, नारियल, कटहल, केला, पियाल, बिल्ब, महुआ, लसूआ, अम्बाड़ा, इन फलों के स्नेह पित्त से मिली वायु में बरते जाते हैं। बहेड़ा, भिलावा, मेनफल, इनका स्नेह श्वेत ब्रण को काला बनाने में बरता जाता है। श्रवण, फङ्गु ( प्रियंगु ) और श्योनाक के

५०६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३१ ]

स्नेह काले को श्वेत बनाने में, चौड़, देवदारु, शीशम, अगर, इन लकड़ियों का स्नेह द्रव, कुछ, किटिभ में बरता जाता है। सभी स्नेह वायु का नाश करते हैं। तैलगुणों को संक्षेप से कह दिया है।

वक्तव्य—महाव्याधि—महाकुष्ठ—प्रमेह आदि आठ हैं। मोच का अर्थ सिम्बल और शिमु भी किया है ॥५॥

अत ऊर्ध्व कषायस्नेहपाकक्रममुपदेद्यामः। तत्र केचिदाहुः—त्वकपत्रफलमूलादीनां भागस्तत्तत्तुर्गुणं जलं चतुर्भागावशेषं निष्कवाध्यापहरेदित्येष कषायपाककल्पः, स्नेहप्रस्तेषु घटसु चतुर्गुणं द्रवमावाप्य चतुरश्चाक्षसमान-भेषजपिण्डानित्येष स्नेहपाककल्पः। एतत्तु न सम्यक्, कस्मात्? आगमासिद्धत्वात् ॥६॥

इसके आगे कषाय तथा स्नेह की पाकविधि का उपदेश करेंगे। इसमें कई आचार्य कहते हैं कि छाल, पत्र, फल, मूल आदि का एक भाग, इससे चार गुणा पानी मिलाकर कषाय करे। चतुर्थांश रहने पर उतार लेवे, यह कषाय कल्पना है। स्नेह के लै प्रस्त लेकर इसमें चौगुना द्रव मिलाकर, चार अक्ष मात्रा में औषधि का कल्क मिलाकर पाक करे, यह स्नेहपाक विधि है। यह ठीक नहीं है, क्योंकि यह शास्त्र से मान्य नहीं है।

वक्तव्य—प्रस्त (दोषल) अथवा, “संयुक्त पंचाङ्गुलिरीषद्व विस्तृतपाणिरेकः”। अक्ष—बड़े के बराबर या कर्ण मात्रा में ॥६॥

पलकुडवादीनामतो मानं तु न्यास्यास्यामः—तत्र द्वादश धान्यमाषा मध्यमाः सुवर्णमाषकः, ते षोडश सुवर्णम्, अथवा मध्यमनिष्पावा एकोनविंशतिधर्षणं, तान्यधर्षतृतीयानि कर्षः, ततश्चोर्ध्वं चतुर्गुणमभिधर्षयन्तः पलकुडवप्रस्थादकद्रोणा इत्यभिनिष्पद्यन्ते, तुला पुनः पलगतं, ताः पुनर्विशतिभारः शुष्काणामिदं मानम्, आर्द्रद्रवाणां च द्विगुणमिति ॥७॥

इसलिये पलकुडव आदि का परिमाण कहते हैं—इसमें श्रेष्ठ मध्यम आकार के बारह माषों (उड़दों) का एक सुवर्ण माष है। ये सोलह सुवर्ण माष एक सुवर्ण कर्ष के बराबर हैं। अथवा मध्यम आकार के उन्नीस निष्पाव (सेम के बीज) एक धरण के बराबर हैं। इन अढ़ाई धरण से एक कर्ष होता है। इससे आगे प्रत्येक का चार गुणा करते हुए पल, कुडव, प्रस्थ, आदक, द्रोण बन जाते हैं। तुला का परिमाण एक सौ पल है। बीस तुला से एक भार बनता है। यह मान शुष्क द्रव्यों के लिये ही है। गीले तथा द्रवों के लिये इस परिमाण को दुगुना करना चाहिये।

वक्तव्य—चार कर्ष से एक पल, चार पल का एक कुडव, चार कुडव से एक प्रस्थ, चार प्रस्थ से एक आदक, चार आदक का एक द्रोण। कहीं पर आर्द्र द्रव्यों का भी दुगुना

नहीं बरतते, यथा—“वासाकुटजकृष्माण्डशतमूलीसहामृता। प्रसारण्यरवगन्धा च शतपुष्पा सहाचराः ॥ नित्यमाद्रीः प्रयोक्तव्या न तासां द्विगुणं भवेत् ॥ प्रस्थ के विषय में—“द्वान्निश-शताडत्रविंशत्यापलैः, षोडशभिः क्रमात्। तोयस्नेहविशुष्काणां द्रव्याणां प्रस्थमादिशेत् ॥ सुश्रुत का मान मागध मान कहाता है, चरक का मान कालिंग मान है” ॥७॥

तत्रान्यतमपरिमाणसंमितानां यथायोगं त्वकपत्रफलमूलादीनामातपपरिशोषितानां छेयानि खण्डशस्त्रेदयित्वा भेद्यान्यगुणो भेदयित्वाडयकुट्याष्टगुणेन षोडशगुणेन वाडम्भसाभिषिच्य स्थाल्यां चतुर्भागावजिष्ठं कषाययित्वा-उपहरेदित्येष कषायपाककल्पः। स्नेहाच्छतुर्गुणो द्रवः, स्नेहचतुर्थांशो भेषजकल्कः, तदैकध्वं संसृज्य विपचेदित्येष स्नेहपाककल्पः। अथवा तत्रोदकद्रोणे त्वकपत्रफलमूलादीनां तुलामावाप्य चतुर्भागावजिष्ठं निष्कवाध्यापहरेदित्येष कषायपाककल्पः; स्नेहकुडवे भेषजपलं पिष्टं कल्कं चतुर्गुणं द्रवमावाप्य विपचेदित्येष स्नेहपाककल्पः ॥८॥

इनमें से किसी एक परिमाण के अनुसार, योग के अनुकूल छाल, पत्ते, फल, मूल आदि जो धूप में सुखाये हों, उनको लेकर उनमें से काटने योग्यों को काटकर, तोड़ने योग्यों को तोड़कर, सबको कूटकर, आठ गुणे (साधारण सस्त द्रव्यों में) या सोलह गुणे (खैर आदि कठिन द्रव्यों में) पानी में डालकर पात्र में रखकर पकाये। पानी का चौथाई अंश रह जाने पर इसको उतार ले, यह कषाय कल्पना है। स्नेह से चार गुणा द्रव, स्नेह से चतुर्थांश औषध का कल्क, इनको एक साथ, मिलाकर पकाये, यह स्नेहपाककल्प है। अथवा एक द्रोण जल में छाल, पत्ते, फल, मूल आदि की एक तुला मिलाकर, चौथाई रह जाने तक कषाय करे, यह कषाय पाक की विधि है। स्नेह के एक कुडव में—औषधि एक पल पीसकर कल्क बनाकर मिलाये, इसमें चार गुणा द्रव (स्नेह का) मिलाकर पाक करे, यह कषाय स्नेहपाकविधि है।

वक्तव्य—कर्षादौ तु पलं यावद् दद्यात् षोडशिकं जलम्। ततस्तु कुडवं यावद् तौयमष्टगुणं भवेत् ॥ चतुर्गुणमतश्चोर्ध्वं यावद् प्रस्थादिकं भवेत्। (२) मुदो चतुर्गुणं देयं कठिनेऽष्टगुणं जलम् ॥ कठिनात् कठिने देयं जलं षोडशिकं मतम् ॥ स्नेहपरिमाण—यत्रैकद्विचित्रचुराणि द्रवद्रव्याणि तत्र सर्वाण्येव स्नेहाच्छतुर्गुणानि पञ्चप्रभृतीनि स्नेहसमानानि। पञ्चप्रभृति यत्र स्युः द्रवाणि स्नेहसंविधौ। तत्र स्नेहसमान्याहुः अर्वाक् च स्याच्छतुर्गुणम् ॥९॥

१ मान के लिये रसयोगसागर भाग-२, और द्रव्यगुणविमर्श का उत्तरार्द्ध देखिये।

अ० ३१ ]

चिकित्सास्थानम्

४०७

भवतश्चात्र— स्नेहभेषजतोयानां प्रमाणं यत्र नेरितम् । तत्रायं विधिरास्थेयो निर्दिष्टे तद्धदेव तु ॥१॥ अनुके द्रवकार्यं तु सर्वत्र सलिलं मतम् । कल्ककवाथावनिर्दोषे गणात्तस्मात् प्रयोजयेत् ॥१०॥ कहा भी है—स्नेह, औषध और पानी का परिमाण जहाँ पर न कहा गया हो, वहाँ पर यह उपर्युक्त विधि बरतनी चाहिये। कहे हुए स्थान पर कही हुई विधि बरतनी चाहिये। द्रव कार्य में जहाँ कोई द्रव्य न कहा हो, वहाँ पर जड़ बरतना चाहिये। क्वाथ और कल्क का जहाँ पर निर्देश न किया हो, वहाँ पर उसी गण का क्वाथ एवं कल्क समझना चाहिये ॥१०॥

अत ऊर्ध्वं स्नेहपाकक्रममुपदेद्यामः । स तु त्रिविधः, तद्यथा—मृदुः, मध्यमः, खर इति । तत्र स्नेहौषधिबिषेकमात्रं यत्र भेषजं स मृदुरिति, मधुच्छिच्छमिव विशदमविलेपि यत्र भेषजं स मध्यमः कृष्णमवसन्नभौषद्विशदं चिक्कणं च यत्र भेषजं स खर इति, अत ऊर्ध्वं दग्धस्नेहो भवति, तं पुनः साधु साधयेत् । तत्र पानाभ्यवहारयोर्मृदुः, नस्याभ्यङ्ग्योर्मध्यमः, बस्तिकर्णपूर्णयोस्तु खर इति ॥११॥

इसके आगे स्नेहपाकविधि का उपदेश करेंगे—यह विधि तीन प्रकार की है, यथा—मृदु, मध्यम और खर। जिस स्नेहपाक में औषध और स्नेह प्रथक मात्र ही होते हैं, वह मृदुपाक है। जिसमें औषध मोम के समान निर्मल, चिपटनेवाली, ही जाती है, वह मध्यम पाक है। जिसमें औषध काली, जली हुई, थोड़ी काली विकास युक्त हो जाती है, वह खर पाक है। इसके आगे स्नेह जल जाता है। इस स्नेह को पुनः ठीक प्रकार से पकाये। पीने, खाने में मृदु स्नेहपाक, नस्त्र और अर्भंग में मध्यम, बस्ति और कान में डालने के लिये खर पाक स्नेह उत्तम है।

वक्तव्य—‘मृदुर्नस्थे, खरोऽभ्यंगे, पाने बस्ती च मध्यमः ॥’ चरक० क० अ० १२ । दोनों ही प्रमाण हैं ॥११॥

भवतश्चात्र— शब्दस्योपरमे प्राप्ते फेनस्योपशमे तथा । गन्धवर्णरसादीनां संपत्तौ सिद्धिमादिशेत् ॥१२॥ घृतस्यैवं विपक्वस्य जानीयात् कुशलो भिषक् । फेनोऽतिमात्रं तैलस्य शेषं घृतवदादिशेत् ॥१३॥

कहा भी है—घृतपाक में (द्रव) शब्द की समाप्ति होने पर और क्षाग आना रुक जाने पर, गन्ध, वर्ण, रस आदि की समृद्धि हो जाने से सिद्ध हुआ जाने। कुशल वैद्य घृत पाक से यह नियम समझे। तैल पाक में, क्षाग बहुत आती है, और शेष लक्षण घृत पाक के समान हैं ॥१२, १३॥

अत ऊर्ध्वं स्नेहपानक्रममुपदेद्यामः—अथ खलु लघुकोष्ठायातुराय कृतमक्कलस्वस्तिवाचनयोदयगिरिशिखर-

संस्थिते प्रतप्रकनकनिकरपीतलोहिते सवितरि यथाबलं तैलस्य घृतस्य वा मात्रां पातुं प्रयच्छेत् । पीतमात्रे चोष्णोदकेनोपसुदस्य सोपानत्को यथासुखं बिहरेत् ॥१४॥

इसके आगे स्नेह पान विधि का उपदेश करते हैं—हल्के (नरम) कोष्ठवाले रोगी को शान्तिपाठ, स्वस्तिवाचन करा के, गरम किये सोने की सी किरणोंवाले, पीले लाल सूर्य के उदया-चल पर्वत के शिखर पर पहुँच जाने पर रोगी के बल के अनुसार तैल या घृत की मात्रा पीने को देवे। पीने के पीछे तुरन्त गरम जल का आचमन करके, जूता पहनकर सुख के साथ रोगी घूमना आरम्भ करे।

वक्तव्य—‘द्रवोष्णमनमिष्यन्दिभोज्यमन्नं प्रमाणतः । नाति-स्निग्धमसंकीर्णं श्वः स्नेहं पातुमिच्छता । पिवेत् संघमन्नं स्नेहमन्नकाले प्रकाशितः । शुद्धयर्थं पुनराहारे नैशे जीर्णं पिवेन्नरः ॥ चरक० सू० अ० १३ ॥१६-६१ ॥१४॥

रुक्षक्षतविषातीनां वातपित्तविकारिणाम् । हीनमेधास्मृतीनां च सर्पिःपानं प्रशस्यते ॥१५॥ क्रुमिकोष्ठानिष्ठाविष्ठाः प्रवृद्धकफमेदसः । पिवेयुस्तैलसात्प्याश्च तैलं दाक्षीर्थिनश्च ये ॥१६॥ व्यायामकर्शिताः शुष्करोतोरक्ता महारुजः । महानिन्मासूतप्राणा वसायोग्या नराः स्मृताः ॥१७॥ क्रूराशयाः क्लेशसहा वाताता दीप्तबह्वयः । मज्जानमात्पुत्युः सर्वे सर्पिर्वा स्वौषधान्वितम् ॥१८॥

रुक्ष, क्षत, विष से पीड़ित, वात-पित्त रोगियों के लिये, मेधा और स्मृति में हीन पुरुषों के लिये घृतपान उत्तम है। क्रुमिकोष्ठवाले, वायु जिनमें मरी है (बहुत वायुवाले), कफ और मेद की जिनमें अधिकता है, जिनको तैल-साल्प्य है, शरीर को जो हृद करना चाहते हैं, वे तैल को पीयें। व्यायाम से कुश हृद, रेत और रक्त जिनके सूख गये अतिशय पीड़ा युक्त प्रवृद्ध अग्निवाले बढ़ी वायुवाले तथा महा प्राणवाले हैं, वे मनुष्य वसा के योग्य हैं। क्रू आशयवाले (क्रू कोष्ठ), क्लेश को सहनेवाले, वायु से पीड़ित, प्रदीप्त अग्नि के पुरुष मज्जा का सेवन करें, अथवा अपने रोग की औषध से युक्त घृत पीयें।

वक्तव्य—महानिन्मासूतप्राणा का अर्थ, अतिशयअग्नि, अतिशयवायु एवं अतिप्राण (अतिबलवाले) भी हैं। अथवा जिनमें वायु बहुत प्रबल है वे वसा को पीयें। यथा—‘बलवान्मासूतो येषां खानि चाहत्य तिष्ठति । महन्चाग्निबलं येषां वसा-सात्प्याश्च ये नराः ॥’ विस्तार के लिये देखिये च० सू० अ० १३। ४१-५० ॥१५-१८॥

केवलं पैत्तिके सर्पिर्वातिके लब्धान्वितम् । देयं बहुकफेचापि न्योषक्षारसमायुतम् ॥१९॥ पित्तविकार में शुद्ध (किसी द्रव्य से न मिलाये) घी पीना