सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० १९ ]
प्रातस्तथायोपश्रुतशान्तिः कृतमङ्गलो गां स्मृष्टुवा तथैवासीत, तस्य जोर्ण सोमे क्ष्दिस्तप्यते, ततः शोणितार्कं कुमिन्व्यामिश्रं छदितवते सार्थं श्रुतशीतं क्षीरं वितरेत्; ततस्तृतीयेऽह्नि कुमिन्व्यामिश्रमतिसार्यते, स तेनानिष्टप्रतिग्रहभक्तप्रभृतिभिर्विशेषैर्विनिर्मक्तः शुद्धतनुर्भवति, ततः सार्थं स्नाताया पूर्ववदेव क्षीरं वितरेत्, क्षौमवस्त्रास्तृतायां चैनं शय्यायां शाययेत्, ततश्चतुर्थेऽह्नि तस्य श्वयथुरुत्पद्यते ततः सर्वाङ्गैभ्यः क्रमयो निष्क्रामन्ति, तदहर्षवशय्यायां पांशुभिरवकीर्णमाणः शयीत, ततः सार्थं पूर्ववदेव क्षीरं वितरेत्; एवं पञ्चमषष्ठयोर्दिवसयोर्वर्तते, केवलमुभयकालमस्मै क्षीरं वितरेत्; ततः सप्तमेऽह्नि निर्मासस्त्वगस्थिभूतः केवलं सोमपरिग्रहादेवोच्छ्वसिति, तदहश्च क्षीरेण सुखोष्णोपरिपिच्य तिलमधुकचन्दनानुल्लिप्तैर्ह्वैः पयः पाययेत्, ततोऽष्टमेऽह्नि प्रातरेव क्षीरपरिपिक्तं चन्दनप्रदिग्धगान्त्रं पयः पाययित्वा पांशुशय्यां समुत्सृज्य क्षौमवस्त्रास्तृतायां शय्यायां शाययेत्, ततोऽस्य मांसमाप्याप्यते, त्वक् चावदलति, दन्तनखरोमाणि चास्य पतन्ति; तस्य नवमादिवसात्प्रभृत्युणुतैलाभ्यङ्गः सोमवल्कृषायपरिपेकः; ततो दशमेऽह्न्येतदेव वितरेत्, ततोऽस्य त्वक् स्थिरतासुपैति; एवमेकादशद्वारुशयोर्वर्तते; ततस्तत्रयोदशाहात् प्रभृति सोमवल्कृषायपरिपेकः; एवमाषाडशाद्वर्तते; ततः सप्तदशद्वारुशयोर्दिवसयोर्दशना जायन्ते सिन्धुरिणः स्निग्धवज्रवैद्यैर्यस्फटिकभकाशाः समाः स्थिराः सहिष्णवः। तदा प्रभृति चानवैः शालितण्डुलैः क्षीरयवागृमुपसेवेत यावत् पञ्चविंशतिरिति; ततोऽस्मै द्वाच्छाल्यादौ मृदुसयकालं पयसा, ततोऽस्य नखा जायन्ते विदुमेन्द्रगपकतरुणादित्यप्रकाशाः स्थिराः स्निग्धा लक्षणसपन्नाः केशाश्च सूक्ष्मा जायन्ते, त्वक् च नोत्तोषत्वात्सौषुष्यवैद्यैर्यप्रकाशाः; ऊर्ध्वं च मासात् केशान् वापयेत्, वापायत्वा चांशीरचन्दनकुण्णतिलकलकैः शिरःप्रदिहात् पयसा वा स्नापयेत्, ततोऽस्थानन्तरं समरात्रात् केशा जायन्ते भ्रमराञ्जननिभाः कुञ्चित्वाः स्थिराः स्निग्धाः, ततस्त्रिरात्रात् प्रथमावसथपरिसरात्रिच्छम्य सुदृढं स्थित्वा पुनरेवान्तः प्रविशेत्, ततोऽस्य बलातैलमभ्यङ्गायंश्च वाचयं, यवपिष्टमुदूर्तनार्थं सुखोष्णं च पयः परिपेकार्थं, अजकर्णकृषायमुत्सादनार्थं सांशीरं कृपोदकं स्नानार्थं, चन्दनमनुलेपार्थं, आमलकरसविमिश्राश्चास्य यूपसूपविकल्पाः क्षीरमधुकसिद्धं च कृष्णतिलमवचारणार्थं; एवं दशरात्रं, ततोऽन्यदशरात्रं द्वितीये परिसरे वर्तते; ततस्तृतीये परिसरे स्थिरीकुर्वन्नात्मानमन्यदशरात्रमासीत, किञ्चिदातपपवनान् वा सेवेत्, पुनश्चान्तः प्रविशेत्, न चात्मानमादर्शोऽस्य वा निरीक्षेत् रूपशा-
लित्वात्, ततोऽन्यदशरात्रं क्रोधादीन् परिहरेत्, एवं सर्वेषामुपयोगविकल्पः विशेषतस्तु वल्लीप्रतान्छुपकादयः सोमा ब्राह्मणश्च त्रियवैश्यैर्भक्षयितव्याः। तेषां तु प्रमाणमध्वचतुष्कमुष्टयः ॥१२॥
अथवा सार्थकाल में भोजन करके शान्तिपाठ सुनकर, कुशा की शय्यापर काले मृग की मृगछाला बिछाकर-मित्रों से घिरा हुआ सोये। प्यास लगने पर शीतल जल ही थोड़ा सा पीये। ( भोजन न करने पर दूध ही पीये ) फिर प्रातःकाल उठकर शान्तिपाठ सुनकर, स्वस्तिवाचन करके, गाय का स्पर्श करके पूर्व की भाँति रहे। सोम के जीर्ण होने पर वमन होता है। फिर रक्तमिश्रित कुमियुक्त वमन करनेवाले मनुष्य को सार्थकाल गरम करके ठण्डा किया दूध देवे। फिर तीसरे दिन कुमिमिश्रित मल आता है। इससे वह मनुष्य अनिष्ट-प्रतिग्रह भोजन आदि से मुक्त होकर शुद्ध शरीरवाला होता है। फिर सार्थकाल स्नान किये हुए को पूर्व की तरह दूध देवे। रेशम की चादर बिछाई शय्यापर इसको सुलाये। फिर चौथे दिन इसमें शोथ उत्पन्न होता है। फिर सब अंगों से कुमि निकलते हैं। फिर उसी दिन शय्यापर धूल बिछाकर सोये। सार्थकाल पूर्व की भाँति गरम करके ठण्डा किया दूध दे। इसी तरह पाँचवें और छठे दिन करे। केवल दोनों समय इसको दूध ही देवे। फिर सातवें दिन मांस के बिना, त्वचा और अस्थिमात्र रहते हैं, सोम के पीने के कारण ही बचा रहता है। उस दिन सुहाते हुए गरम दूध से स्नान करके तिल, मुलेहट्टी और चन्दन का लेप शरीर पर कराके दूध पिलाये। फिर आठवें दिन प्रातःकाल में ही दूध से स्नान कराके, चन्दन का शरीर पर लेप कराके, दूध पिलाये। धूल की शय्या को छोड़कर रेशम से बिछाई शय्यापर लिटा देवे। फिर इसका मांस बढ़ने लगता है ( पुष्ट होता है )। त्वचा फटती है, दाँत-नख और रोम गिर जाते हैं। नवें दिन से इसके शरीर पर अणुतैल का अभ्यंग करे, खैर की छाल के कृषाय से स्नान कराये। दसवें दिन इसी प्रकार करे। इससे इसकी त्वचा स्थिर बन जाती है। ग्यारहवें और बारहवें दिन भी इसी प्रकार करे। तेरहवें दिन से लेकर खैर की छाल के कृषाय से स्नान कराये। इस प्रकार सोलहवें दिन तक करे। फिर सत्तरहवें और अठारहवें दिन नोकदार, स्निग्ध, वज्रवैद्यैर्य-स्फटिक-के समान निर्मल, समान, स्थिर, खट्टे आदि का सहन करनेवाले दाँत निकल आते हैं। तब से लेकर पुराने शाली चावलों की कणियाँ से दूध में बनाई यवागू को खाये। पचीसवें दिन तक इसी प्रकार करे। फिर इसको शाली चावलों का नरम भात दूध के साथ दोनों समय देवे। फिर इसके मृग, बौरबहुटी, तरुण सूर्य के समान लाल नख निकल आते हैं। स्थिर, स्निग्ध, सूक्ष्म एवं लक्षणों से युक्त बाल उग आते हैं। नोले कमल, अलसी के फूल, तथा वैद्य के सहस्र वर्णवाली त्वचा हो जाती है। एक मास के पीछे बालों को कटवा दे। बाल कटवा कर खस, चन्दन, काले तिल इनको
अ० २६ ]
चिकित्सास्थानम्
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पीसकर सिर पर लेप करे । अथवा दूध से स्नान कराये । इससे सात दिन पीछे, भ्रमर के समान काले मुँबराले, स्थिर, स्निग्ध बाल उत्पन्न होते हैं । फिर तीन दिन पीछे पहले घर की देहली मेंसे (घर की चार दिवारी से) बाहर आकर, थोड़ी सी दूर रह कर फिर अन्दर उसी घर में चला जाये । अभ्यंग के लिये इसे बलातैल बरतना चाहिये । उद्घर्चन के लिये जी का आटा, परिषेक के लिये सुहाता हुआ गरम पानी, उत्सादन के लिये अजकर्ण (साल) का कषाय, स्नान के लिये खस मिश्रित कुण्ड का पानी, लेपन के लिये चन्दन, यूप सूप आदि आँबले का रस मिलाकर बनाये । गाय के दूध और मुलेहटी के कल्क से सिद्ध किया काले तिलों का तेल, श्राक, आदि वस्तुओं के सिद्ध करने में बरते । इस प्रकार दस दिन करे । दूसरे दस दिन दूसरे घर में रहें । इसके पश्चात् तीसरे घर में दस दिन तक वहाँ रहे । थोड़ी धूप और वायु का सेवन करने लगे । और फिर अन्दर चला जाये । अतिशय सुन्दर होने से अपना मुख शीशे या पानी में न देखे । अगले दस दिन तक क्रोध आदि को छोड़ देवे । यह विधि सब सोमों के सेवन की है । विशेषकर वल्ली (लता आदि), (दूर्वा जैसे)-लुपक (झाड़ी जैसे) आदि सोम ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यों को खाने चाहिये । इनकी मात्रा साढ़े तीन मुष्टि (पल) है ॥१२॥
अंगुमन्तं सौवर्णं पात्रेऽभिषुण्युयात्, चन्द्रमसं राजते तावुपुषुच्याष्टगुणमंश्चर्यमवाप्येशानं देवमनुप्रविशति, शेषास्तु ताम्रमये मृन्मये वा राहतिरे वा चर्मणि वितते, शूद्रवजं त्रिभिर्वर्णैः सोमा उपयोक्तव्याः । ततश्चतुर्थं मासे पौर्णमास्यां शुचौ दश ब्राह्मणान्चार्थत्वा कृतमङ्गला निष्क्रम्य यथोक्तं व्रजेदिति ॥१३॥
अंगुमान् सोम को सुवर्ण के पात्र से निचाड़े । चान्द्रमस सोम को चाँदी के पात्र में निचाड़े । इन दोनों का उपयोग करके मनुष्य देवताओं के अधविष ऐश्वर्य को प्राप्त करक भगवान् शिव में प्रवेश करता है । शेष सोमों को ताम्र के, मिट्टी के, या लोहित मृग के चमड़े से बने पात्र में निचाड़े । शूद्र को छोड़कर शेष तीनों वर्ण सोमका उपयोग करें । फिर चौथे मास में पूर्णमासी के दिन पवित्र स्थान पर ब्राह्मणों की पूजा करके, स्वस्तिपाठ करके, घर से निकलकर इच्छानुसार जाये ।
वक्तव्य—अधविषमैश्वर्यम्—“अणिमा लघिमा प्राप्तिः प्राकाम्यं महिमा तथा । ईशित्वं च वशित्वं च तथा कामावषा-यिता ॥ आवेशश्चेतसो ज्ञानमर्थानां छन्दतः क्रिया । दृष्टिः श्रोत्रं स्मृतिः कान्तिरिष्टतश्चाप्यदर्शनम् ॥ इत्यष्टगुणमाख्यातं योगिनां बलमैश्वरम् ॥” चरकः ॥१३॥
ओषधोनां पतिं सोममुपपुष्य विचक्षणः । दशवर्षसहस्राणि नवां धारयते तनुम् ॥१४॥
नारिगितं तोयं न विषं न शस्त्रं ताक्षमेव च । तस्यालमायःक्षपणे समर्थानि भवन्ति हि ॥१५॥ भद्राणां षष्टिर्वर्षाणां प्रसूतानामनेकधा । कुञ्जराणां सहस्रस्य बलं समधिगच्छति ॥१६॥ क्षीरोदं शक्रसदनमुत्तरांश्च कुरुनपि । यत्रेच्छति स गन्तुं वा तत्राप्रतिहता गतिः ॥१७॥ कन्दर्प इव रूपेण कान्त्या चन्द्र इवापरः । ग्रह्यादयति भूतानां मनांसि स महावृतिः ॥१८॥ साङ्गोपाङ्गश्च निखिलान् वेदान् विन्दति तत्त्वतः । चरत्यमोघसङ्कल्पो देववृत्चाखिलं जगत् ॥१९॥
बुद्धिमान् मनुष्य औषधियों के स्वामी सोम का उपयोग करके दस हजार वर्ष तक नूतन शरीर को धारण करता है । अग्नि, जल, विष, शस्त्र और अस्त्र कोई भी इसकी आयु को नष्ट नहीं कर सकते । अपितु इसको बढ़ाते हैं । उत्तम जाति के साठ वर्ष की आयुवाले तथा मद बहाते हुये हजारों हाथियों का बल आ जाता है । क्षीरसमुद्र, इन्द्र का घर-स्वर्ग, उत्तर कुब-जहाँ भी जाना चाहता है, वहाँ पर वह बेरोक-टोक गति से जा सकता है । रूप में कामदेव के समान, कान्ति में चन्द्रमा के समान, यह महान् तेजस्वी मनुष्यों के मनो को प्रसन्न करता है । अंग-उपांगों समेत सब वेदों को तत्त्व रूप से जानता है । देवता के समान अनर्थ संकल्पवाला जगत् में घूमता है ।
वक्तव्य—‘उत्तर-कुब’ वर्तमान ध्यानस्थान (देवताओं का पर्वत) है जो मध्य एशिया में है । उत्तर कुब का नाम किराता-लुनीय में भी अर्जुन की विजय वर्णन में आया है, यथा—‘विजित्य या प्राज्यमचच्छुत्तरान् कुरुतकुप्यं वसु वासवोपमः’ ॥१४-१६॥
सर्वधामेव सोमानां पत्राणि दश पञ्च च । तानि शुक्ले च कृष्णे च जायन्ते निपतन्ति च ॥२०॥
एकैकं जीयते पत्रं सोमस्याहरहस्तदा । शुक्लस्य पौर्णमास्यां तु भवेत् पञ्चदशच्छदः ॥२१॥ जीयते पत्रमेकैकं दिवसे दिवसे पुनः । कृष्णपक्षक्षये चापि लता भवति केवला ॥२२॥
अंगुमानाज्यगन्धस्तु कन्दवान् रजतप्रभः । कदल्याकारकन्दस्तु मुखवाङ्मगुनच्छदः ॥२३॥ चन्द्रमाः कनकाभासो जले चरति सर्वदा । गरुडाहृतनामा च श्वेताक्षरचापि पाण्डुरो ॥२४॥
सर्पनिर्मोकसहस्रो तौ वृक्षामावलम्बिनौ । तथाऽन्ये मण्डलैश्चित्रैश्चैत्रिता इव भान्ति ते ॥२५॥ सर्वं एव तु विज्ञेयाः सामाः पञ्चदशच्छदाः । क्षीरकन्दलतावन्तः पत्रैर्नानाविधैः स्मृताः ॥२६॥
सब प्रकार के सोमों के पत्ते पन्द्रह होते हैं । ये पत्ते शुक्ल पक्ष में उत्पन्न होते हैं, और कृष्ण पक्ष में गिर जाते हैं । शुक्ल
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३० ]
पक्ष में प्रतिदिन एक एक पत्र सोम में बदता है, और पूर्णमासी में पूरे पन्द्रह पत्ते हो जाते हैं। कृष्ण पक्ष में प्रतिदिन एक एक पत्र झड़ने लगता है, और अमावस्या के दिन केवल लता मात्र बच जाती है। अंशुमान् सोम घृत के समान गन्धवाला, एवं कन्दवान् होता है। रजतप्रभ केले के आकार के कन्दवाला है। मुंजवान में लहसुन के समान पत्ते होते हैं। चन्द्रमा और कनकप्रभ सदा जल में रहते हैं। गरुडाहृतनामा और श्वेताक्ष ये पाण्डुर वर्ण, साँप की कैंचुली जैसे, वृक्ष के अप्रभाग में लटकते हैं। शेष दूसरे चित्रित मण्डल (धन्वी से) चित्रित हुए दीखते हैं। सब सोमों के पत्ते पन्द्रह होते हैं, इनके कन्द में दूध होता है, लता रहती है, नाना प्रकार के पत्ते होते हैं ॥२०-२६॥
हिमवत्यर्धुदे सखे महेन्द्र मलये तथा ।
श्रीपर्वते देवगिरी गिरी देवसहे तथा ॥२७॥
पारियात्रे च विन्ध्ये च देवसुन्दे हृदे तथा ।
उत्तरेण वितस्तायाः प्रवृद्धा ये महीधराः ॥२८॥
पञ्च तेषामधो मध्ये सिन्धुनामा महानदः ।
हठवत् प्लवते तत्र चन्द्रमाः सोमसत्तमः ॥२९॥
तस्योहेशेष चाप्यस्ति मुञ्जवानंशुमानपि ।
काश्मीरेषु सरो दिव्यं नाम्ना लुद्रकमानसम् ॥३०॥
गायत्रस्त्रैष्टुभः पाङ्क्तो जागतः शाक्वरस्तथा ।
अत्र सन्त्यपरे चापि सोमाः सोमसमप्रभाः ॥३१॥
हिमालय, पहाड़ की चोटी पर, सहाद्री में, महेन्द्र में, मलयाचल पर, श्रीपर्वत पर, देवगिरि पर, देवसहगिरि पर, पारियात्र में, विन्ध्याचल में, देवसुन्द में, हृद में, वितस्ता के उत्तर में, जो ऊँचे पाँच पर्वत हैं, उनके नीचे, मध्य में, सिन्धु नामक जो बड़ी नदी है, उसमें सोमों में श्रेष्ठ चन्द्रमा सोम हठ (जल कुम्भी) की तरह तैरता है। इसके समीप में ही मुंजवान् अंशुमान् रहता है। कश्मीर में लुद्रक मानस नाम का दिव्य तालाब है, यहाँ पर गायत्र, त्रैष्टुभ, पांक, जागत, शाक्वर तथा चन्द्रमा के समान कान्तिवाले दूसरे सोम हैं ॥२७-३१॥
यैश्चात्र मन्दभाग्यैस्ते भिषजश्चापमानिताः ।
न तान् पश्यन्त्यधर्मिष्ठाः कृतघ्नाश्चापि मानवाः ।
भेषजद्वेषिणश्चापि ब्राह्मणद्वेषिणस्तथा ॥३२॥
इन स्थानों पर जो वैद्यों का अपमान करते हैं, अधर्मिष्ठा, कृतघ्न, औषध से द्वेष करनेवाले, ब्राह्मणों से द्वेष करनेवाले हैं वे लोग इन सोमों को नहीं देख सकते ॥३२॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने स्वभावव्याधिप्रतिषेधनीयं रसायनचिकित्सितं नामैकोनत्रिधोऽध्यायः ॥२६॥
त्रिशतमोऽध्यायः
अथातो निवृत्तसन्तापीयं रसायनं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे निवृत्त सन्तापीय अध्याय का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१-२॥
यथा निवृत्तसन्तापा मोदन्ते दिवि देवताः ।
तथौषधीरिमाः प्राप्य मोदन्ते सुवि मानवाः ॥३॥
जिस प्रकार स्वर्ग में देवता संताप (दुःख) से रहित होकर आनन्द करते हैं, उसी प्रकार इन औषधियों को प्राप्त करके पृथ्वीलल पर मनुष्य आनन्द अनुभव करते हैं ॥३॥
अथ खलु सप्त पुरुषाः रसायनं नोपयुञ्जीरन्, तद्यथा-अनात्मवानलसो दरिद्रः प्रमादी व्यसनी पापकृद् भेषजापमानी चेति । सप्तभिरेव कारणैर्न संपद्यते, तद्यथा-अज्ञानादनारम्भादस्थिरचित्तस्वाहारिद्र्यादानायत्त्वाद्धर्मादौषधालाभाच्चेति ॥४॥
सात पुरुष रसायन का सेवन न करें। यथा—अजितेन्द्रिय, आलसी, दरिद्र, प्रमादी, व्यसनी, पापकर्म करनेवाला और औषध का अपमान करनेवाला। सात कारणों से रसायन औषध गुण नहीं करती, यथा—अज्ञान से, औषध का आरम्भ न करने से, चित्त के अस्थिर होने से, दारिद्र्य से (दरिद्रता से), अनायत्ता से, अधर्म से, औषध के न मिलने से ॥४॥
अथौषधीर्याख्यास्यामः—तत्राजगरी, श्वेतकापोती, कृष्णकापोती, गोनसो, वाराही, कन्या, छत्रा, अतिच्छत्रा, करेणु, अजा, चक्रका, आदित्यपर्णी, ब्रह्मसुवर्चला, श्रावणी, महाश्रावणी, गोलोमी, अजलोमी, महावेगवती, चेत्यष्टादश सोमसमवीयां महौषधयो व्याख्याताः। तासौ सोमवत् क्रियाग्रीस्तुतयः शाब्देऽभिहिताः। तासामागारैऽभिहुतानां याः क्षीरवत्स्वस्तासां क्षीरकुडवं सकृदेवोपयुञ्जीत यास्त्वक्षीरा मूलवत्स्वस्तासां प्रेजिनीप्रमाणानि त्रीणि काण्डानि प्रमाणमुपयोगे, श्वेतकापातां समूलपत्राभक्षयितव्या, गोनस्यजगरीकृष्णकापोतीनां सनखमुष्टिखण्डशः कल्पयित्वा क्षीरेण विपाच्य परिस्त्रान्याभिचारितमभिहुतं च सकृदेवोपयुञ्जीत, चक्रकायाः पयः सकृदेव, ब्रह्मसुवर्चला सप्तरात्रमुपयोक्तव्या। भदयकल्पेन शेषाणां पञ्च पञ्च पञ्चाणि क्षीरादककथितानि प्रस्थेऽवशिष्टवतार्य परिस्त्रान्य सकृदेवोपयुञ्जीत। सोमवदाहारविहारी व्याख्यातौ, केवलं नवनीतमभ्यज्ञार्थं, शेषं सोमवदानिर्गमादिति ॥५॥
इसके आगे औषधियों का व्याख्यान करेंगे—अजगरी, श्वेतकापोती, कृष्णकापोती, गोनसी, वाराही, कन्या, छत्रा, अतिच्छत्रा, करेणु, अजा, चक्रका; आदित्यपर्णी, ब्रह्मसुवर्चला, श्रावणी, महाश्रावणी, गोलोमी, अजलोमी, महावेगवती, ये
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चिकित्सास्थानम्
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अठारह औषधियाँ सोम के समान शक्तिशाली हैं। इनकी क्रिया (सिवन विधि), और फलश्रुति-स्तुति शास्त्र में सोम के समान कही है। इनके स्थान पर होम करके, जो दूधवाली हों, उनके दूध की एक कुड्ड मात्रा एक साथ पी जाये। जो औषधियाँ दूध रहित हैं, और मूलवाली हैं, उनके मूल में से तर्जनी के बराबर तीन टुकड़े लेकर उपयोग करें। श्वेतकापोती को मूल और पत्ते के साथ खाना चाहिये। गोनसी, अजगरी, कृष्णकापोती, इनको नाख्तों समेत मुट्ठी भरकर-टुकड़े करके, काटकर दूध के साथ पकाकर, छानकर, घूत से थोड़ा स्निग्ध करके, पीछे से होम करके, इसको एक साथ पी जाये। चक्र का दूध एक साथ पीये। भक्ष्य विधि से ब्रह्मसुवर्चला को सात दिन खाना चाहिये। शेष औषधियों के पाँच-पाँच पल लेकर एक आङ्क दूध में पकाये। एक प्रस्थ रहने पर उतारकर, छानकर एक साथ पी जाये। आहार और विहार सोम की भाँति है। केवल भेद इतना है कि अभ्यङ्ग के लिये मक्खन बरते। शेष सब विधि बाहर आने तक सोम की भाँति है ॥५॥
भवन्ति चान्न—
युवानं सिंहविकान्तं कान्तं श्रुतनिगादिनम्। कुर्गुरेताः क्रमेणैव द्विसहस्रायुषं नरम् ॥६॥ अङ्गदी कुण्डली मौली दिव्यस्रक्चन्दनाम्बरः। चरत्यमोघसंकल्पो नभस्यम्बुदुर्गमे ॥७॥ ब्रजन्ति पक्षिणो येन जल्लम्बाश्च तोयदाः। गतिः सौषधिसिद्धस्य सोमसिद्धे गतिः परा ॥८॥
कहा भी है—ये औषधियाँ मनुष्य को युवा, सिद्ध के समान पराक्रमी, सुन्दर शरीर, सुनते ही धारण करनेवाला, तथा दो हजार वर्ष की आयुवाला करती हैं। केभूरयुक्त, कुण्डल धारण किये, मुकुटधारी, दिव्य माला चन्दन और वस्त्र को धारण करके, अभ्यर्थ संकल्पवाला होकर बादल से भी न जाने योग्य आकाश में विचरता है। जिससे पक्षी जाते हैं, और पानी से भरे बादल जिस गति ( मार्ग ) से जाते हैं, औषधि से सिद्ध मनुष्य की वह गति है, सोम से सिद्ध व्यक्ति की गति इससे भी ऊपर हो जाती है ॥६-८॥
अथ वक्ष्यामि विज्ञानमौषधीनां पृथक् पृथक्। मण्डलैः कपिलेश्चित्रैः सर्पाभा पञ्चपिण्निनी ॥९॥ पञ्चारत्रिप्रमाणं च विज्ञेयाऽजगरी बुधैः। निष्पन्ना कनकाभासा मूले द्वयंगुलसंमिता ॥१०॥ सर्पाकारा लोहितान्ता श्वेतकापोतिरुच्यते। द्विपिण्निनी मूलभवासरुणां कृष्णमण्डलाम् ॥११॥ इयरन्तिमात्रां जानीयाद् गोनसीं गोतसाङ्गतिम्। सक्षीरां रोमशं मुष्टीं रसेनेखुरसोपमाम् ॥१२॥ एवंरूपरसां चापि कृष्णकापोतिमादिशेत्। कृष्णसर्पस्वरूपेण वाराही कन्दसंभवा ॥१३॥ एकपत्रा महावीर्या भिन्नाञ्जनसमप्रभा।
छत्रातिच्छत्रके विद्याद्रक्षोभे कन्दसंभवे ॥१४॥ जराभृत्युनिवारिण्यौ श्वेतकापोतिसंस्थिते। कान्तेद्रादजभिः पत्रैर्मयूराङ्गरुहोपमैः ॥१५॥ कन्दजा काञ्चनक्षीरी कन्या नाम महौषधी। करेणुः सुबहुक्षीरा कन्देन गजरूपिणी ॥१६॥ हरितकर्णपलाञ्जस्य तुल्यपर्णा द्विपिण्निनी। अजास्तनाभकन्दा तु सक्षीरा जुपरूपिणी ॥१७॥ अजा महौषधी ज्ञेया जङ्गकुन्देन्दुपाण्डुरा। श्वेतां विचित्रकुसुमां काकादन्यां सर्मां छुपाम् ॥१८॥ चक्रकासोषधीं विद्याञ्जराभृत्युनिवारिणीम्। मूलिनी पञ्चभिः पत्रैः सुरक्तांशुककोमलैः ॥१९॥ आदित्यपिण्निनी ज्ञेया सदाऽऽदित्यानुवर्तिनी। कनकाभा जलान्तेषु सर्वतः परिसर्पति ॥२०॥ सक्षीरा पद्मिनीप्रख्या देवी ब्रह्मसुवर्चला। अरन्तिमात्र्युपका पत्रैर्द्वयंगुलसंमिताः ॥२१॥ पुष्पैर्निलोत्प्लाकाः फलैश्चाञ्जनसन्निभैः। श्रावणां महती ज्ञेया कनकाभा पयस्विनी ॥ श्रावणी पाण्डुराभासा महाश्रावणिलक्षणं। गोलोमी चाजलोमी च रौमशे कन्दसंभवे ॥२३॥ हंसपादौ विचिन्नन्तेः पत्रैर्मूलसमुद्भवैः। अथवा जङ्गपुष्प्या च समाना सर्वरूपतः ॥२४॥ वेगेन महताऽऽविद्या सपत्निमौकसन्निभा। एषा वेगवती नाम जायते ह्यम्बुदक्ष्ये ॥२५॥
इसके आगे औषधियों को पृथक् २ पहिचान करेंगे। अजगरी—चित्रित कपिल वर्ण के धन्वोवाली, सर्प के आकार की, पाँच पत्तों की पाँच अरति प्रमाण होती है। ( अरति—बालित )। श्वेतकापोती—पत्र रहित, स्वर्ण के समान चमकवाली, मूल में दो अंगुल लम्बी, सर्प के आकार की, अन्दर से लाल होती है। गोनसी—दो पत्तोंवाली, मूल में अरुण वर्ण काले धन्वों की दो अरति लम्बी, गाय की नासा के समान आकार की होती है। कृष्णकापोतिका—दुधयुक्त, हंसआटेवाली, कोमल, रस में गन्ने के रस के समान होती है। छत्रा, अतिच्छन्ना—एक पत्तेवाली, महान् शक्ति सम्पन्न, तोड़े हुए अञ्जन के समान कान्ति युक्त, रक्षोभन एवं कन्द से उत्पन्न होती है। ये जरा और मृत्यु को नष्ट करती हैं, श्वेतकापोतिका के आकार की हैं। कन्या—सुन्दर एवं मोर के बालों के समान बारह पत्रों से युक्त, कन्द से उत्पन्न, स्वर्ण के समान दूधमहौषधी है। करेणु—बहुत दूधवाली, और हाथी के समान कन्दवाली है। अजा-महौषधी—हरित कर्णपलाश ( हाथी चिवारी ढाक ) के समान पत्तों की, दो पत्तोंवाली, बकरी के स्तनों के समान कन्द की, दूधवाली, जुपरूप, शंख, कुन्द ( मोगरा ), इन्दु के समान श्वेत होती है। चक्रका औषधि—श्वेतवर्ण, विचित्र फूलों की, काकादनी के समान रूप की, जरा और मृत्यु को नष्ट करनेवाली है। आदित्यपिण्निनी—मूलवाली पाँच पत्तों की, ये पत्ते-
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मुश्रुतसंहिता
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सूय के सामान लाल, कोमल, होने हैं। यह महौषधी, सूर्य की ओर सदा मुख रखती है। इसकी चमक स्वर्ण के समान, जल के किनारों पर सब और फेन्ती है ब्रह्मसुवर्चला—दूधवाली, कमलिनी के समान, अरतिमात्र ( बालिस्तभर ) लूग की, दो अङ्गुल लम्बे पत्तों की, नीले कमल के समान फूलों की, और फल अञ्जन के समान काले होते हैं। महा श्रावणी—स्वर्ण के समान कान्ति की और दूधवाली है। श्रावणी-पाण्डुरवर्ण और महाश्रावणी के लक्षणों की है। गोलोमी और अजलोमी—हंआटे-वाली एवं कन्द से उत्पन्न होती है। वेगवती—हंसपाद ( हंस-राज ) के समान टूटे हुए, मूल से निकलते हुए पत्तोंवाली, अथवा सब प्रकार से शांखपुष्पी के समान, बड़े भारी वेग से घिरी हुई, सौप के केंचुली के समान होती है। वर्षा के बीतने पर यह उत्पन्न होती है।
वक्तव्य—अरतिनः—विस्तृतकनिष्ठिकाकुलिमष्टिकहस्तः अरतिनः। वदमष्टिकः अरतिनः—दोनों ही अर्थ इल्हण के हैं। अम्बुदक्षये शरदि ॥८—२५॥
समादौ सर्परूपिण्यो ह्यौषध्यो याः प्रकीर्तिताः।
तासामुद्गरणं कार्यं मन्त्रणानेन सबंदा ॥२६॥
महेन्द्ररामकृष्णानां ब्राह्मणानां गवामपि।
तपसा तेजसा वाऽपि प्रशान्स्यध्वं जिवाय वै ॥२७॥
मन्त्रणानेन मतिमान् सर्वा एवाभिमन्त्रयेत्।
अश्रद्धवानैरलसः कृतध्वनैः पापकर्मभः ॥२८॥
नैवासादयितुं शक्याः सोमाः सोमसमास्तथा।
सौप के आकार की पहली जो सात औषधियाँ कही हैं, उनको निम्नमंत्र के साथ उखाड़ना चाहिये। महेन्द्र, राम, कृष्ण, ब्राह्मण, गाय, इनके तप या तेज के कारण कल्याण के लिये उपशमन करो। इस मंत्र से बुद्धिमान् सब औषधियों को आमन्त्रित करे। श्रद्धाहीन आलसी, कृतध्वन और पापकर्म करनेवाले मनुष्य सोम को तथा सोम जैसी अजगरी आदि को नहीं प्राप्त कर सकते ॥२६—२८॥
पीतावशेषममृतं देवैर्ब्रह्मपुरोगमैः ॥२९॥
निहितं सोमवीर्यासु सोमे चाप्यौषधीपतौ।
ब्रह्मा के आगे चलनेवाले देवताओं के पीने से बचे हुए अमृत को सोमवीर्यवाली औषधियों में और औषधियों के पति सोम नामक औषधी में रख दिया था ॥२९॥
देवसुन्दे हृदचरे तथा सिन्धौ महानदे ॥३०॥
हरयते च जलान्तेषु मेध्या ब्रह्मसुवर्चला।
आदित्यपिणीनीं ज्ञेया तथैव हिमसंक्षये ॥३१॥
हरयतेऽजगरो नित्यं गोनसी चाम्बुदागमे।
काश्मीरेषु सरो दिव्यं नाम्ना क्षुद्रकमानसम् ॥३२॥
करेणुस्तत्र कन्या च छत्रातिच्छत्रके तथा।
गोलोमी चाजलोमी च महती श्रावणी तथा ॥३३॥
वमन्ते कृष्णसर्पाख्या गोनसी च प्रहरयते।
कौशिकीं सरितं तीर्त्वा सञ्जयन्यन्यास्तु पूर्वतः ॥३४॥
क्षितिप्रदेशो वल्मीकैराचितो योजनत्रयम्।
विज्ञेया तत्र कापोती उवेता वल्मीकमूर्धसु ॥३५॥
मलये नलसेनौ च वेगवस्थौषधी ध्रुवा।
कार्तिकया पौर्णमास्यां च भक्ष्येत्तामुपोषितः ॥३६॥
सोमवन्च्चात्र वर्तते फलं तावन्च कीर्तिताम्।
सर्वा विचैयास्त्वोपधथः सोमाश्चाप्यनुदे गिरी ॥३७॥
स शृंगैर्देवचरितैरन्बुदानांकिभेदिभिः।
न्यामस्तीर्थैश्च बिख्यातेः सिद्धविपुरसेवितः ॥३८॥
गुहाभिर्भीमरूपाभिः सिंहोन्नादितकुक्षिभिः।
गजालोहिततोयाभिरापगाभिः समन्ततः ॥
विविधैर्धर्तुभिश्चित्रैः सर्वत्रैवोपशोषितः ॥३९॥
नदीषु जलेषु सरःसु चापि पुण्येऽवरण्येषु तथाऽऽश्रमेषु।
सर्वत्र सर्वाः परिमागितव्याः सर्वत्र भूमिहि वसुनिधत्ते ॥
ब्रह्मसुवर्चला तालाबों में श्रेष्ठ देवसुन्द में, महानदी सिन्धु में और जल के किनारे मेध्य बुद्धिवर्धक ब्रह्मसुवर्चला मिलती है। आदित्यपणी भी वसन्त में वहीं मिलती है। अजगरी सदा मिलती है, गोनसी वर्षा में मिलती है। काश्मीर में क्षुद्रक मानस नाम का दिव्य तालाब है, वहाँ पर करेणु, कन्या, छत्रा, अतिच्छत्रा, गोलोमी, अजलोमी, महाश्रावणी होती है। वसन्त में कृष्णसर्पा और गोनसी दीखती है। कौशिकी नदी को पार कर सञ्जयन्ती नदी से पूर्व की ओर वल्मीकों से भरे जो क्षिति ( भूमि ) भाग हैं, ये भूमि भाग तीन योजन लम्बे हैं, वहाँ से ये उत्पन्न होती हैं। वहाँ पर वल्मीक की छोटी पर श्वेतकापोती उत्पन्न होती है। मलय और नलसेतु पर वेगवती औषधियाँ होती हैं। उपवास करके इस औषधि को कार्तिकी की पूर्णिमा को खाये ( सोम के समान आचरण करे ), फल भी सोम के समान है। इन सब औषधियों को और सोम को भी अबुंद पर्वत से एकत्रित करना चाहिये। यह पर्वत देवताओं के विचरने से पवित्र बाढ़लों से भी ऊँचा सिद्धिर्वि—देवताओं से सेवित प्रसिद्ध है। भयङ्कर गुहाओं से युक्त सिंह की गर्जना से नादित हाथी से आलोहित जलवाली नदियों से घिरा नानाप्रकार के विचित्र धातुओं से सब स्थानों पर शोषित है। नदियों में, पर्वतों में, तालाबों में, पवित्र जङ्गलों में, आश्रमों में सब स्थानों में ये सब औषधियाँ दूँढ़नी चाहिये, क्योंकि—भूमि सर्व वसु—( रत्नों को ) धारण करती है।
वि० मन्तव्य—अ० २९ तथा ३० में सोमवर्ग की जिन २४ औषधियों का तथा अजगरी आदि १८ औषधियों का वर्णन किया गया है उनको जानना पहिचानना ज़रूरी हो गया है और साथ ही उनका प्रचार भी समाप्त हो गया है। यद्यपि जिन स्थानों पर उनका होना
अ० ३१ ] ६४
चिकित्सास्थानम्
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अठारह औषधियाँ सीम के बतलाया गया है वहाँ सर्वत्र मानव आज भी जाता-आता है, निवास करता है परन्तु उन दिव्य औषधियों को मूल गया है ॥४०॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने निवृत्तसंतापीयं रसायनं नाम त्रिशोऽध्यायः ॥३०॥
एकत्रिंशत्तमोऽध्यायः
अथातः स्नेहोपयोगिकचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे स्नेहोपयोगिक चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—इस अध्याय में स्नेहों के उपयोग तथा प्रयोग का वर्णन किया गया है ॥१,२॥
स्नेहसारोऽयं पुरुषः, भाणाश्च स्नेहभूमिष्ठाः स्नेहसाध्याश्च भवन्ति । स्नेहो हि पानानुवासनमस्तिऽक्षिरोवस्थुत्तरबस्तिनस्थकण्णपूर्णगात्राभ्यङ्गभोजनेषूपयोऽयः ॥३॥
यह पुरुष स्नेहसार ( स्नेह के सहारारे टिकनेवाला ) है, और प्राण भी स्नेह की मुख्यतावाले हैं, ( प्राणों का भी मुख्य आधार स्नेह ही है )। तथा रोग भी स्नेह से ही साध्य होते हैं। क्योंकि स्नेह पान-अनुवासन-मस्तिष्क ( शिरोविरेचन ) शिरोबस्ति, उत्तरबस्ति, नस्थ, कण्ण में भरने, शरीर पर अस्थंग, भोजनों में बरतना चाहिये ॥३॥
तत्र द्वियोनिश्चतुर्विकल्पोऽभिहितः स्नेहः स्नेहगुणाश्च । तत्र जङ्गमेभ्यो गन्धं घृतं प्रधानं स्थावरभ्यस्तिलतैलं प्रधानमिति ॥४॥
इसमें स्नेह की योनि ( उत्पत्तिस्थान ) दो प्रकार की ( स्थावर और जंगम ) है। स्नेह के चार भेद ( घी, तैल, वसा और मज्जा ) पहले ( सू० ४-५ में देखिये ) कहे हैं। इनमें जंगम स्नेहों में ( घी, वसा, मज्जा में ) गौ का घृत प्रधान है। और स्थावर स्नेहों में तिल तैल प्रधान है।
वक्तव्य—घृत की प्रधानता में—“नान्यः स्नेहस्तथा कश्चित् संस्कारमनुवर्तते, यथा सर्पिरतः सर्पिः सर्वस्नेहोत्तमं मतम् ॥ चरक० ( २ ) सर्पिस्तैलं वसा मज्जा सर्वस्नेहोत्तमा मताः । एषु चैवोत्तमं सर्पिः संस्कारस्यानुवर्त्तनात् ॥ चरक० । तैल शब्द—तिलों से उत्पन्न तैल को तैल कहना चाहिये, तथापि दूसरे स्थावर द्रव्यों से उत्पन्न स्नेह को भी तैल कहते हैं। यथा—“निष्पत्तेः तदुगुणत्वाच्च तत्तैलमितरेष्वपि ॥” घी दो प्रकार का है, दूध से निकाला हुआ और दही से निकाला। शुद्ध मांस का स्नेह वसा है, अस्थियों में आभित स्नेह मज्जा है। जंगमों में घी प्रधान है, स्थावरों में तिलतैल,
विरेचन के लिये एरण्ड तैल उत्तम है ॥४॥
अत ऊर्ध्वं यथाप्रयोजनं यथाप्रधानं च स्थावरस्नेहा-नुपदेद्यामः—तत्र तिल्वकैरण्डकोशाप्रदन्तीद्रवन्तीसप्तलाजङ्गिनीपलाशविषाणिकागवाक्षीकम्पिलकगम्पाकनीलिनीस्नेहा विरेचयन्ति, जीमूतककुटजकृतवैधनेद्वैवाकुधा-मार्गवमदनस्नेहा वामयन्ति, विडङ्गखरमज्जरीमधुजिमुसूयर्वल्लीपीलुसिद्धार्थकव्योतिष्मतीस्नेहाः शिरो विरेचयन्ति, करञ्जपूतीककृतमालमातुलुङ्गेडुगुदीकिराततिलस्नेहा दुष्ट-ब्रणेपुप्युच्यन्ते, तुवरककपित्थकम्पिलकभक्ष्जातकपटोलस्नेहा महाव्याधिषु, त्रपुसैर्वास्ककौरुकुतुबीकृष्माण्डस्नेहा मूत्रसंगेषु, कपोतवङ्गावलगुजहरीतकीस्नेहाः शर्करारुमरीषु, कुसुम्भसर्षपातसीपिचुमर्दातिमुक्तकभाण्डीकदुतुम्बीकटभीस्नेहाः प्रमेहेषु, तालनारिकेठपनसमोचप्रियालबिल्बमधूकर्लेष्मातकाप्रातकफलस्नेहाः पित्तसंमृद्धे वायो, बिभीतकभक्ष्जातकपिण्डोतकस्नेहाः कृष्णोकरणे, श्रवणककुटुण्डुकुस्नेहाः पाण्डुकरणे, सरलपीतदारुशिशुपागुरुसारस्नेहा ददुकुष्ठकिटिभेषु, सर्व एव स्नेहा वातमुपद्वन्ति, तैलगुणाश्च समासेन व्याख्याताः ॥५॥
इसके आगे प्रयोजन के अनुसार, प्रधान ( मुख्य ) की दृष्टि से स्थावर स्नेहों को कहेंगे—इनमें तिल्वक, एरण्ड, कोशाप्र, जमालगोठा, द्रवन्ती ( मोगलई एरण्ड ) सप्तला ( सातला ), शंखिनी ( यवतिलका ), टाक, विषाणिका ( मेढ़ाखिगी ), गवाक्षी ( इन्द्रायण ), कमीला, अमलतास, नीलिनी, इनके स्नेह विरेचन करते हैं। जीमूतक ( देवदाली ), कूड़ा, कृतवैधन ( कोशातकी—कडुई तोरई ) इद्वैवाकु ( कडुआ तुम्बा ), धामार्गव ( विषा तोरई—नेनुआ ), मेनफल, इनका स्नेह वमन कराते हैं। विडंग, चिरचिटा, मीठा सहजन, सूर्यवल्ली ( आदित्य भक्ता-हुलहुल ), पीलू, सरसों, मालकंगनी इनका स्नेह शिर का विरेचन करता है। करंज, पूतीकरंज, अमलतास, बिजौरा, हिंगोट, चिरायता इनका स्नेह दूषित ब्रणों में बरता जाता है। तुवरक, कैथ, कमीला, भिलावा, पटोल इनका स्नेह महारोगों में बरता जाता है। खीरा, ककड़ी, कर्काव ( फूट ), तुम्बी पेटा इनका स्नेह मूत्र के अवरोधों में बरता जाता है। कपोतवङ्गा, ( ब्रह्मसुवर्चला या ब्राह्मी ) बावची, हरड् का स्नेह शर्करा एवं अश्मरी में प्रयुक्त होता है। कुसुम्भ ( बरें ), सरसों, अलसी, नीम, माधवीलता, भाण्डी, कडुईतुम्बी और नीली अपराजिता ( कोयल ) इनका स्नेह प्रमेहों में बरता जाता है। ताल, नारियल, कटहल, केला, पियाल, बिल्ब, महुआ, लसूआ, अम्बाड़ा, इन फलों के स्नेह पित्त से मिली वायु में बरते जाते हैं। बहेड़ा, भिलावा, मेनफल, इनका स्नेह श्वेत ब्रण को काला बनाने में बरता जाता है। श्रवण, फङ्गु ( प्रियंगु ) और श्योनाक के
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३१ ]
स्नेह काले को श्वेत बनाने में, चौड़, देवदारु, शीशम, अगर, इन लकड़ियों का स्नेह द्रव, कुछ, किटिभ में बरता जाता है। सभी स्नेह वायु का नाश करते हैं। तैलगुणों को संक्षेप से कह दिया है।
वक्तव्य—महाव्याधि—महाकुष्ठ—प्रमेह आदि आठ हैं। मोच का अर्थ सिम्बल और शिमु भी किया है ॥५॥
अत ऊर्ध्व कषायस्नेहपाकक्रममुपदेद्यामः। तत्र केचिदाहुः—त्वकपत्रफलमूलादीनां भागस्तत्तत्तुर्गुणं जलं चतुर्भागावशेषं निष्कवाध्यापहरेदित्येष कषायपाककल्पः, स्नेहप्रस्तेषु घटसु चतुर्गुणं द्रवमावाप्य चतुरश्चाक्षसमान-भेषजपिण्डानित्येष स्नेहपाककल्पः। एतत्तु न सम्यक्, कस्मात्? आगमासिद्धत्वात् ॥६॥
इसके आगे कषाय तथा स्नेह की पाकविधि का उपदेश करेंगे। इसमें कई आचार्य कहते हैं कि छाल, पत्र, फल, मूल आदि का एक भाग, इससे चार गुणा पानी मिलाकर कषाय करे। चतुर्थांश रहने पर उतार लेवे, यह कषाय कल्पना है। स्नेह के लै प्रस्त लेकर इसमें चौगुना द्रव मिलाकर, चार अक्ष मात्रा में औषधि का कल्क मिलाकर पाक करे, यह स्नेहपाक विधि है। यह ठीक नहीं है, क्योंकि यह शास्त्र से मान्य नहीं है।
वक्तव्य—प्रस्त (दोषल) अथवा, “संयुक्त पंचाङ्गुलिरीषद्व विस्तृतपाणिरेकः”। अक्ष—बड़े के बराबर या कर्ण मात्रा में ॥६॥
पलकुडवादीनामतो मानं तु न्यास्यास्यामः—तत्र द्वादश धान्यमाषा मध्यमाः सुवर्णमाषकः, ते षोडश सुवर्णम्, अथवा मध्यमनिष्पावा एकोनविंशतिधर्षणं, तान्यधर्षतृतीयानि कर्षः, ततश्चोर्ध्वं चतुर्गुणमभिधर्षयन्तः पलकुडवप्रस्थादकद्रोणा इत्यभिनिष्पद्यन्ते, तुला पुनः पलगतं, ताः पुनर्विशतिभारः शुष्काणामिदं मानम्, आर्द्रद्रवाणां च द्विगुणमिति ॥७॥
इसलिये पलकुडव आदि का परिमाण कहते हैं—इसमें श्रेष्ठ मध्यम आकार के बारह माषों (उड़दों) का एक सुवर्ण माष है। ये सोलह सुवर्ण माष एक सुवर्ण कर्ष के बराबर हैं। अथवा मध्यम आकार के उन्नीस निष्पाव (सेम के बीज) एक धरण के बराबर हैं। इन अढ़ाई धरण से एक कर्ष होता है। इससे आगे प्रत्येक का चार गुणा करते हुए पल, कुडव, प्रस्थ, आदक, द्रोण बन जाते हैं। तुला का परिमाण एक सौ पल है। बीस तुला से एक भार बनता है। यह मान शुष्क द्रव्यों के लिये ही है। गीले तथा द्रवों के लिये इस परिमाण को दुगुना करना चाहिये।
वक्तव्य—चार कर्ष से एक पल, चार पल का एक कुडव, चार कुडव से एक प्रस्थ, चार प्रस्थ से एक आदक, चार आदक का एक द्रोण। कहीं पर आर्द्र द्रव्यों का भी दुगुना
नहीं बरतते, यथा—“वासाकुटजकृष्माण्डशतमूलीसहामृता। प्रसारण्यरवगन्धा च शतपुष्पा सहाचराः ॥ नित्यमाद्रीः प्रयोक्तव्या न तासां द्विगुणं भवेत् ॥ प्रस्थ के विषय में—“द्वान्निश-शताडत्रविंशत्यापलैः, षोडशभिः क्रमात्। तोयस्नेहविशुष्काणां द्रव्याणां प्रस्थमादिशेत् ॥ सुश्रुत का मान मागध मान कहाता है, चरक का मान कालिंग मान है” ॥७॥
तत्रान्यतमपरिमाणसंमितानां यथायोगं त्वकपत्रफलमूलादीनामातपपरिशोषितानां छेयानि खण्डशस्त्रेदयित्वा भेद्यान्यगुणो भेदयित्वाडयकुट्याष्टगुणेन षोडशगुणेन वाडम्भसाभिषिच्य स्थाल्यां चतुर्भागावजिष्ठं कषाययित्वा-उपहरेदित्येष कषायपाककल्पः। स्नेहाच्छतुर्गुणो द्रवः, स्नेहचतुर्थांशो भेषजकल्कः, तदैकध्वं संसृज्य विपचेदित्येष स्नेहपाककल्पः। अथवा तत्रोदकद्रोणे त्वकपत्रफलमूलादीनां तुलामावाप्य चतुर्भागावजिष्ठं निष्कवाध्यापहरेदित्येष कषायपाककल्पः; स्नेहकुडवे भेषजपलं पिष्टं कल्कं चतुर्गुणं द्रवमावाप्य विपचेदित्येष स्नेहपाककल्पः ॥८॥
इनमें से किसी एक परिमाण के अनुसार, योग के अनुकूल छाल, पत्ते, फल, मूल आदि जो धूप में सुखाये हों, उनको लेकर उनमें से काटने योग्यों को काटकर, तोड़ने योग्यों को तोड़कर, सबको कूटकर, आठ गुणे (साधारण सस्त द्रव्यों में) या सोलह गुणे (खैर आदि कठिन द्रव्यों में) पानी में डालकर पात्र में रखकर पकाये। पानी का चौथाई अंश रह जाने पर इसको उतार ले, यह कषाय कल्पना है। स्नेह से चार गुणा द्रव, स्नेह से चतुर्थांश औषध का कल्क, इनको एक साथ, मिलाकर पकाये, यह स्नेहपाककल्प है। अथवा एक द्रोण जल में छाल, पत्ते, फल, मूल आदि की एक तुला मिलाकर, चौथाई रह जाने तक कषाय करे, यह कषाय पाक की विधि है। स्नेह के एक कुडव में—औषधि एक पल पीसकर कल्क बनाकर मिलाये, इसमें चार गुणा द्रव (स्नेह का) मिलाकर पाक करे, यह कषाय स्नेहपाकविधि है।
वक्तव्य—कर्षादौ तु पलं यावद् दद्यात् षोडशिकं जलम्। ततस्तु कुडवं यावद् तौयमष्टगुणं भवेत् ॥ चतुर्गुणमतश्चोर्ध्वं यावद् प्रस्थादिकं भवेत्। (२) मुदो चतुर्गुणं देयं कठिनेऽष्टगुणं जलम् ॥ कठिनात् कठिने देयं जलं षोडशिकं मतम् ॥ स्नेहपरिमाण—यत्रैकद्विचित्रचुराणि द्रवद्रव्याणि तत्र सर्वाण्येव स्नेहाच्छतुर्गुणानि पञ्चप्रभृतीनि स्नेहसमानानि। पञ्चप्रभृति यत्र स्युः द्रवाणि स्नेहसंविधौ। तत्र स्नेहसमान्याहुः अर्वाक् च स्याच्छतुर्गुणम् ॥९॥
१ मान के लिये रसयोगसागर भाग-२, और द्रव्यगुणविमर्श का उत्तरार्द्ध देखिये।
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चिकित्सास्थानम्
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भवतश्चात्र— स्नेहभेषजतोयानां प्रमाणं यत्र नेरितम् । तत्रायं विधिरास्थेयो निर्दिष्टे तद्धदेव तु ॥१॥ अनुके द्रवकार्यं तु सर्वत्र सलिलं मतम् । कल्ककवाथावनिर्दोषे गणात्तस्मात् प्रयोजयेत् ॥१०॥ कहा भी है—स्नेह, औषध और पानी का परिमाण जहाँ पर न कहा गया हो, वहाँ पर यह उपर्युक्त विधि बरतनी चाहिये। कहे हुए स्थान पर कही हुई विधि बरतनी चाहिये। द्रव कार्य में जहाँ कोई द्रव्य न कहा हो, वहाँ पर जड़ बरतना चाहिये। क्वाथ और कल्क का जहाँ पर निर्देश न किया हो, वहाँ पर उसी गण का क्वाथ एवं कल्क समझना चाहिये ॥१०॥
अत ऊर्ध्वं स्नेहपाकक्रममुपदेद्यामः । स तु त्रिविधः, तद्यथा—मृदुः, मध्यमः, खर इति । तत्र स्नेहौषधिबिषेकमात्रं यत्र भेषजं स मृदुरिति, मधुच्छिच्छमिव विशदमविलेपि यत्र भेषजं स मध्यमः कृष्णमवसन्नभौषद्विशदं चिक्कणं च यत्र भेषजं स खर इति, अत ऊर्ध्वं दग्धस्नेहो भवति, तं पुनः साधु साधयेत् । तत्र पानाभ्यवहारयोर्मृदुः, नस्याभ्यङ्ग्योर्मध्यमः, बस्तिकर्णपूर्णयोस्तु खर इति ॥११॥
इसके आगे स्नेहपाकविधि का उपदेश करेंगे—यह विधि तीन प्रकार की है, यथा—मृदु, मध्यम और खर। जिस स्नेहपाक में औषध और स्नेह प्रथक मात्र ही होते हैं, वह मृदुपाक है। जिसमें औषध मोम के समान निर्मल, चिपटनेवाली, ही जाती है, वह मध्यम पाक है। जिसमें औषध काली, जली हुई, थोड़ी काली विकास युक्त हो जाती है, वह खर पाक है। इसके आगे स्नेह जल जाता है। इस स्नेह को पुनः ठीक प्रकार से पकाये। पीने, खाने में मृदु स्नेहपाक, नस्त्र और अर्भंग में मध्यम, बस्ति और कान में डालने के लिये खर पाक स्नेह उत्तम है।
वक्तव्य—‘मृदुर्नस्थे, खरोऽभ्यंगे, पाने बस्ती च मध्यमः ॥’ चरक० क० अ० १२ । दोनों ही प्रमाण हैं ॥११॥
भवतश्चात्र— शब्दस्योपरमे प्राप्ते फेनस्योपशमे तथा । गन्धवर्णरसादीनां संपत्तौ सिद्धिमादिशेत् ॥१२॥ घृतस्यैवं विपक्वस्य जानीयात् कुशलो भिषक् । फेनोऽतिमात्रं तैलस्य शेषं घृतवदादिशेत् ॥१३॥
कहा भी है—घृतपाक में (द्रव) शब्द की समाप्ति होने पर और क्षाग आना रुक जाने पर, गन्ध, वर्ण, रस आदि की समृद्धि हो जाने से सिद्ध हुआ जाने। कुशल वैद्य घृत पाक से यह नियम समझे। तैल पाक में, क्षाग बहुत आती है, और शेष लक्षण घृत पाक के समान हैं ॥१२, १३॥
अत ऊर्ध्वं स्नेहपानक्रममुपदेद्यामः—अथ खलु लघुकोष्ठायातुराय कृतमक्कलस्वस्तिवाचनयोदयगिरिशिखर-
संस्थिते प्रतप्रकनकनिकरपीतलोहिते सवितरि यथाबलं तैलस्य घृतस्य वा मात्रां पातुं प्रयच्छेत् । पीतमात्रे चोष्णोदकेनोपसुदस्य सोपानत्को यथासुखं बिहरेत् ॥१४॥
इसके आगे स्नेह पान विधि का उपदेश करते हैं—हल्के (नरम) कोष्ठवाले रोगी को शान्तिपाठ, स्वस्तिवाचन करा के, गरम किये सोने की सी किरणोंवाले, पीले लाल सूर्य के उदया-चल पर्वत के शिखर पर पहुँच जाने पर रोगी के बल के अनुसार तैल या घृत की मात्रा पीने को देवे। पीने के पीछे तुरन्त गरम जल का आचमन करके, जूता पहनकर सुख के साथ रोगी घूमना आरम्भ करे।
वक्तव्य—‘द्रवोष्णमनमिष्यन्दिभोज्यमन्नं प्रमाणतः । नाति-स्निग्धमसंकीर्णं श्वः स्नेहं पातुमिच्छता । पिवेत् संघमन्नं स्नेहमन्नकाले प्रकाशितः । शुद्धयर्थं पुनराहारे नैशे जीर्णं पिवेन्नरः ॥ चरक० सू० अ० १३ ॥१६-६१ ॥१४॥
रुक्षक्षतविषातीनां वातपित्तविकारिणाम् । हीनमेधास्मृतीनां च सर्पिःपानं प्रशस्यते ॥१५॥ क्रुमिकोष्ठानिष्ठाविष्ठाः प्रवृद्धकफमेदसः । पिवेयुस्तैलसात्प्याश्च तैलं दाक्षीर्थिनश्च ये ॥१६॥ व्यायामकर्शिताः शुष्करोतोरक्ता महारुजः । महानिन्मासूतप्राणा वसायोग्या नराः स्मृताः ॥१७॥ क्रूराशयाः क्लेशसहा वाताता दीप्तबह्वयः । मज्जानमात्पुत्युः सर्वे सर्पिर्वा स्वौषधान्वितम् ॥१८॥
रुक्ष, क्षत, विष से पीड़ित, वात-पित्त रोगियों के लिये, मेधा और स्मृति में हीन पुरुषों के लिये घृतपान उत्तम है। क्रुमिकोष्ठवाले, वायु जिनमें मरी है (बहुत वायुवाले), कफ और मेद की जिनमें अधिकता है, जिनको तैल-साल्प्य है, शरीर को जो हृद करना चाहते हैं, वे तैल को पीयें। व्यायाम से कुश हृद, रेत और रक्त जिनके सूख गये अतिशय पीड़ा युक्त प्रवृद्ध अग्निवाले बढ़ी वायुवाले तथा महा प्राणवाले हैं, वे मनुष्य वसा के योग्य हैं। क्रू आशयवाले (क्रू कोष्ठ), क्लेश को सहनेवाले, वायु से पीड़ित, प्रदीप्त अग्नि के पुरुष मज्जा का सेवन करें, अथवा अपने रोग की औषध से युक्त घृत पीयें।
वक्तव्य—महानिन्मासूतप्राणा का अर्थ, अतिशयअग्नि, अतिशयवायु एवं अतिप्राण (अतिबलवाले) भी हैं। अथवा जिनमें वायु बहुत प्रबल है वे वसा को पीयें। यथा—‘बलवान्मासूतो येषां खानि चाहत्य तिष्ठति । महन्चाग्निबलं येषां वसा-सात्प्याश्च ये नराः ॥’ विस्तार के लिये देखिये च० सू० अ० १३। ४१-५० ॥१५-१८॥
केवलं पैत्तिके सर्पिर्वातिके लब्धान्वितम् । देयं बहुकफेचापि न्योषक्षारसमायुतम् ॥१९॥ पित्तविकार में शुद्ध (किसी द्रव्य से न मिलाये) घी पीना
घ श्ट
चाहिये । वायुरोग मे नमक के साथ, कंफ की अधिकता होने |
पर बिकटु ओर यवक्षार से मिलाकर देना चाये । वक्तम्य-““न् सर्पिः केवलं पित्ते पेयं सामे विशेषतः|
हयनुरजेदेहं हत्वा संज्ञां च मारयेत् |” इसलिये गयी का अश्-
'पित्तहरद्रन्यखाधितमेव केवलम् यह ठीक हे ।१६।। दोषाणामल्पभूयस्त्वं संसगे' समवेदंय च । युल्ज्यात्त्रिषष्टिधामिन्नः समासन्यासतो रसेः ॥२०॥
दोषों की न्यूनता या अधिकता का, उनके संसगं का
विचार करके, समास व्यास स्पसे तिरसठ प्रकारके रसां
सेघीकाया स्नेह का उपयोग करना चािये। वक्तव्य--“रसेश्वोपदिताः स्नेहःखमासुव्यासयोगिभिः। षड्-
भिखिषष्टिधा खख्यां प्राप्नोत्येकश्च केवलः || एवमेषा चतुःषष्टिः
स्नेहानां प्रविचारणा । ओकर्तव्याधिपुख्षान्प्रयोज्या जानता
भवेत् || चरक सू० अ०° १२-२७-२८ ॥२०॥
स्नेदसात्म्यः क्ठेशसहः काङे नाल्युष्णशीतठे ।
अच्छमेव पिवेत् रनेदमच्छपानं हि पूजितम् ॥२१॥
स्नेह जिनको सासम्य है, क्टेश को सहने के आदी न
बहुत उष्ण एवं न बहुत शीतल काल के होने पर केवल स्नेह (असंस्ङृत) को पीये । क्योकि केवर स्नेहपान उत्तम ईै।
` “अच्छपेयस्तु यः स्नेहो न तामाहूर्विचारणाम् | स्नेहस्य ख भिषग्हष्ः कल्पः प्राथमकल्पिकः ||“
चरकं अ० संर १३-२६॥ २२१ शीतकाङे दिवा स्नहसुष्णकाटे पिवेन्निलि। वातपित्ताधिको रात्रौ वातर्टेष्माधिको दिवा ॥२२॥ शीतकाल मे दिन के समय स्नेह को पीये | उष्णकाल मे रात्रि में स्नेह को पीये । वातपित्त की अधिकता मेरि में स्नेह पान करे । वात-कफ की अधिकता मे दिन मे स्नेह पानकरे। ~
वक्तव्य-- वातपित्ताधिको रात्रादुष्णे चापि पिवेन्नरः।
श्टेष्माधिको दिवा शीते पिबेच्चामल्मास्करे ॥ ^त्वरमाणे त॒ शीतेऽपि दिवा तैकं प्रयोजयेत् । उष्णेऽपि रात्रौ सरपिस्त॒ दोषा- दीन् वीय चान्यथा ॥” च° सू° अ० १३-१६।२२॥ वातपित्ताधिकस्योष्णे दण्मूरव्छोन्मादकारकः। शीते बातकफातस्य गौरवारचि शूलकरत् ॥२२॥ वातपित्त का अधिकता मेंउष्ण च्रूतुमें दिन मे पिया स्नेह प्याख, मृच्छ, उन्माद करता ३। शीत छतु मे बात-कपः से पीडति मनुष्य द्वारा रात में पिया स्नेह गोरव, अरुचि ओर श्र करता इ ।
ब्तव्य-- “अव्युष्णे बा दिवा पीतो वातपित्ताधिकेन वा । मृच्छ पिपासायुन्मादं काभलां बा समीरयेत् ॥ शीति रातौ पिबे स्नेहं नरः रलम्माधिकोऽपि बा | आनाहमदवि श्रं पाण्डुता षा समृच्छति ॥ |
सुश्रतसं हिता
| = प ० ९२२०१२३ स्नेह पीतस्य चेत्तृष्णा पिवेदुष्णोदकं नरः| एवं चानुपञाम्यन््यां स्तेहसुष्णाम्बुना वमेत् ॥२४। दिद्याच्छीतैः शिरः शीतं तोयं चाप्यवगाहयेत्।
पीये । यदि इससे भी प्यासन सुभे तो गरम षा नी पीकर | स्नेह का वमन कर देवे । शीतरु चन्दन आदि" का श्षिर पर् | ठेप करे, शीतल पानी मं गोता लगाये । वक्तम्य--स जग्ध्वा स्नेहमात्रां तामोजः प्रक्षारयन् बली । ` स्नेहाऽग्निरुत्तमां तृष्णां सोपसर्ग दीरयेत् ।
ं . परक सूर अ० १३-७० ॥२५। या माध्रा परिजीयत चतुभौगगतेऽहनि ॥२५॥ सा मात्रा दापयस्यग्निमस्पदोषे च पूजिता । या मात्रा परिजीय त यथाऽधेदिवसे गते ।॥२६॥ सा इष्या इदणीया च मध्यदोषे च पूजिता । या मान्ना परिजीयत चतुभागावशेषिते ॥२७॥ स्नेहनीया च सा मात्रा बहुदोषे च पूजिता । या मात्रा परिजीय त्त् तथा परिणतेऽहनि ॥२८॥ ग्डानिमूच्छामदान् दिस्वा सा मात्रा पूजिता भवेत्। अहोरात्रादसंदुष्टा या मात्रा परिजोयंति ॥२९॥ सा तु ुष्ठविषोन्मादम्रहापस्मारनाशिनी । यथागिनि प्रथमां मात्रां पाययेत्त॒ विचक्षणः ॥३०॥
पीतो ह्यतिबहुः स्नेहो जनयेत् प्राणसंशयम् । भिभ्या चाराद्रहुस्वाद्वा यस्य स्नेहो न जीयेति ॥३१॥
विष्टभ्य चापि जीयत्तं वारिणोष्णेन वामयेत्। ` ततः स्नेहं पुनदेयाज्ञघुकोष्ठाय देहिन ।
जीणाजीणविशंकायां स्नेहस्योष्णोदकं पिबेत् ॥२२॥ तेनोद्गारो भवेच्छुद्धो भक्तं प्रति रुचिस्तथा । स्युः पच्यमाने वृडदाह ्रमसाद।रतिक्छमाः ॥१३॥
दिन के एक चोथाई भाग (एक प्रहर) में स्नेदकीजो
मात्रा जीणं हो जाती है, वह मात्रा अग्नि को बद़ाती है, ओर योड़े दोषवाल्ते मनुष्य के ल्ि उत्तम है । स्नेह कौ जो मातरा आवे दिन (दो प्रहर) मे जीण होती दै, वह मात्रा इष्य है
बंहण करनेवाढी ओर मध्य दोष मे प्रशस्त दै । स्नेह की ज माघा तीन प्रहर में जीणं होती दै वह मात्रा स्नेहन करने >
एवं बहुत दोषवाङे पुरुष के ल्यि उत्तम दै । जो मात्रा ठ
दिन मे (चार प्रहर मे) जीणं होती हे, उदन्न नहीं होने देती (या जिखके पीने से उत्पन्न ग्छानि आदि
स्वयं न्ट हो जाती है) स्नेह की मात्रा स्नेदन में उत्तम् ६। किसी मी प्रकार का विकारन किय स्नेह की जो मतरा चीन षष्टे मे (दिनरात) जीणं होती दै, बह मात्रा कुष्ठ; उन्मा” विष, ग्रह, अपस्मार को नष्ट करती ई ।
गानि, मूच्छ मद क
। [
[ अ०३ १ |
|
[ अ० ३१ ]
चिकित्सास्थानम्
१०४
वक्तव्य—“अहोरात्रमहः कृत्स्नमर्द्धाहं च प्रतीयते । प्रधाना मध्यमा हृत्वा स्नेहमात्रा जरां प्रति ॥”
वि० मन्तव्य—बुद्धिमान् चिकित्सक-रोगी की जठराग्निका विचार करके स्नेह की प्रथम मात्रा (१ प्रहर में पचनेवाली) पिलावे क्योंकि अत्यधिक मात्रा में पीया गया स्नेह प्राण संकट उत्पन्न कर सकता है । मिथ्या आहार-विहार के कारण अथवा अधिक मात्रा में होने के कारण जिसका स्नेह नहीं पचता अथवा उदर में विषम्भ उत्पन्न करके विलम्ब से पचता है उसको उष्ण जल पिलाकर वमन करा देवे । इसके पश्चात् जब उसका उदर लघु-हल्का हो जाय तब पुनः उचित मात्रा में स्नेह पिलावे । यदि स्नेह के पचने या न पचने का सन्देह हो तो उष्ण जल पीना चाहिये । इस प्रकार उष्ण जल पीने से उदगार शुद्ध हो जाता है और भोजन में रुचि हो जाती है । स्नेह पचते समय-प्रायः तृष्णा, दाह, भ्रम, शिथिलता, अरति तथा ग्लानि हो सकते हैं जो पच जाने पर स्वतः शान्त हो जाते हैं अथवा साधारण उचित उपचार से शान्त किये जा सकते हैं ॥२५-३३॥
परिपिच्यार्द्धिहृष्णाभिर्जीर्णस्नेहं ततो नरम् । यवागं पाययेच्छोष्णां कामं किलन्नाल्पतण्डुलाम् ॥३४॥ देयो यूपरसो वाऽपि सुगन्धी स्नेहवजितो । कृतो वाऽत्यल्पसर्पिष्को विलेपी वा विधीयते ॥३५॥ स्नेह के जीर्ण हो जाने पर मनुष्य को गरम पानी से स्नान कराये । थोड़ी सी चावल-कणियों को खूब गलाकर बनाई हुई यवागू को गरम एवं यथेच्छ पिलाये । सुगन्धी एवं स्नेह से रहित यूप एवं मांस रस देवे । या इनमें थोड़ा घी डालकर देवे । अथवा विलेपी देवे ॥३४, ३५॥
पिवेत्ययहं चतुरहं पश्चाहं षडहं तथा । सप्तरात्रात् परं स्नेहः सात्स्यीभवति सेवितः ॥३६॥ स्नेह को तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन, छे दिन, अथवा सात दिन पीये । सात दिन के पीछे स्नेह साम्य हो जाता है । ( फिर आगे लाभ नहीं करता । आत्मा शब्द-शरीर के लिये है ) ।
“स्नेहन्स्य प्रकर्षो तु सतरात्रत्रिरात्रको ॥” चरक० सू० १३-५१ ॥३६॥
सुकुमारं कृशं वृद्धं शिशुं स्नेहद्विषं तथा । तृष्णार्तमुष्णकाले च सह भक्तेन पाययेत् ॥३७॥ नाशुक् प्रकृति, कृश, वृद्ध, बालक, स्नेह से द्रव करनेवाले, प्यास से पीड़ित को श्रोभकाल में स्नेह को भोजन के साथ मिलाकर देवे ।
स्नेहद्विषः स्नेहन्तिया मृदुकोष्ठाश्च ये नराः । कलेशासहा मद्यन्तियास्तेषामिषा विचारणा ॥
चरक० सू० अ० १३-८२ ॥३७॥
पिप्पल्यो लवणं स्नेहाश्वत्वारो दक्षिमतुक्तः ।
पीतमैकध्यमेतद्वि सद्यःस्नेहनमुच्यते ॥३८॥ श्रृष्टा मांसरसे स्निग्धा यवागूः सूपकल्पिता । प्रक्षुद्रा पीयमाना तु सद्यः स्नेहनमुच्यते ॥३९॥ सर्पिष्मती पयःसिद्धा यवागूः स्वरूपतण्डुला । मुखोष्णा सेव्यमाना तु सद्यःस्नेहनमुच्यते ॥४०॥ पिप्पल्यो लवणं सर्पिस्तिलपिण्डं बराहजा । वसा च पीतमैकध्वं सद्यः स्नेहनमुच्यते ॥४१॥ शर्कराचूर्णसंस्मृष्टे दोहनरथे घृते तु गाम् । दुग्ध्वा क्षीरं पिवेद्वक्षः सद्यः स्नेहनमुच्यते ॥४२॥ यवकोलकुलस्थानां क्वाथो मागधिकान्वितः । पयो दधि सुरा चेति घृतसम्यग्धर्म भवेत् ॥४३॥ सिद्धमेतैर्घृतं पीतं सद्यःस्नेहनमुत्तमम् ।
राज्ञे राजसमेभ्यो वा देयमेतद्घृतोत्तमम् ॥४४॥ पिप्पली, लवण, (सैन्धव) घी-तैल-वसा मज्जा चारों स्नेह,
दधि, मस्तु, इनको एक साथ मिलाकर पीने पर तुरन्त स्नेहन होता है । मांस रस में भूनकर मली प्रकार बनाई स्निग्ध यवागू को थोड़ी सी राव मिलाकर पीने से तुरन्त स्नेहन होता है । थोड़े से चावलों में दूध में बनाई, प्रचुर घी मिश्रित यवागू को गरम गरम सेवन करने पर स्नेहन होता है । पिप्पली, सैन्धानमक, घी, तिल की पिटटी, सुअर की वसा इनको एक साथ मिलाकर पीने पर तुरन्त स्नेहन होता है । दोहनी ( जिसमें दूध दोहते हैं ) में शर्करा, घी रखकर इसमें दूध निकाले । इस दूध को पीने से लूख मनुष्य का तुरन्त स्नेहन होता है । जौ, बेर, कुलस्थी इनका क्वाथ, इसमें पिप्पली का प्रक्षेप मिलाकर, दूध, दही, सुरा और आठवाँ घी इनके साथ घृत को सिद्ध करे । यह घृत पीने पर तुरन्त स्नेहन करता है । राजाओं को या राजा के समान वैभवशालियों को यह घृत देना चाहिये ।
वक्तव्य—“तेलं सुराया मण्डेन वसां मज्जानमेव वा । पिवेत्सफाणितं क्षीरं नरः स्निह्यति वातिकः ॥१॥ धारोष्णं स्नेहस्युक्तं पीत्वा सद्यर्करं पयः । नरः स्निह्यति पीत्वा वा सर्दं दन्तः सफाणितम् ॥२॥ च० सू० अ० १३-८२ ॥३८-४४॥
बळहोनेषु वृद्धेषु मृद्वांगन्खीहतात्मसु ।
अल्पदोषेषु योज्याः स्युयं योगाः सम्यगीरिताः ॥४५॥
निर्बलो मे, वृद्धो मे, मृदु अग्निवालो मे, स्त्री मे क्षीण हृण् पुष्करो मे, थोड़े दोषवालों में, ऊपर कहे हुए योग मली प्रकार बरतने चाहिये ॥४५॥
विवजयेत् स्नेहपानमजीर्णां तरुणवरी ।
दुर्बल्लोडरोचकी स्थूलो मूच्छ्रौर्तां मदपीडितः ॥४६॥
छर्द्यदितः पिपासातः श्रान्तः पानकलमान्वितः ।
दत्तबतिर्विरिक्तश्च वान्तो यश्चापि मानवः ॥४७॥
अकाले दुर्दिने चैव न च स्नेहं पिवेन्नरः ।
अकाले च प्रसूता स्त्री स्नेहपानं विवजयेत् ॥४८॥
५१०
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३२ ]
स्नेहपानाद्भवन्त्येषां नृणां नानाविधा गदाः । गदा वा क्रुच्छ्रुतां यान्ति न सिध्दन्त्यथवा पुनः ॥४६॥ गर्भाशयेऽवरोधाः स्युः रक्तकलेदभलास्ततः । स्नेहं जहाच्चिपेवेत् पाचनं रूक्षमेव च ॥४७॥ दशरात्रात्ततः स्नेहं यथावदवचारयेत् ।
स्नेहपान का निषेध-अजीर्णरोगी, तरुण-ज्वरवाला, दुर्बल, अरोचकरोगी, स्थूल, मूर्च्छा से पीड़ित, मदपीड़ित, छिद्र से पीड़ित, पिपासा से दुःखी, भ्रान्त, मत्थपान के थकान से दुःखी, बस्ति जिसने ली है, विरेचन लिये, वमन किया हुआ, असमय में बादल आने पर मनुष्य स्नेहपान न करे । जिसने असमय पर प्रसव किया है, वह ली स्नेहपान न करे । स्नेह पान करने से इनको नाना प्रकार के रोग हो जाते हैं । रोग कष्टसाध्य हो जाते हैं, अथवा असाध्य बन जाते हैं । यदि रक्त, कलेद, मल ये गर्भाशय में रुक जायँ तो स्नेह को छोड़ देवे, पाचन और रूक्ष औषध सेवन करे । दस दिन के पीछे यथा योग्य स्नेह को वरते ॥४६-५०॥
पुरीषं प्रथितं रूक्षं क्रुच्छ्रादमं विपच्यते ॥५१॥ उरो विदहते वायुः कोष्ठाद्युपरि धावति । दुर्बर्णो दुर्बलश्चैव रूक्षो भवति मानवः ॥५२॥ स्नेह के अयोग में—पुरीष (मल) गॉठदार, रूक्ष होता है । अन्न कठिनाई से पचता है । छाती जलती है, वायु कोष्ठ से ऊपर आती है ( डकार आते हैं ) । वर्ण बदल जाता है, दुर्बल होता है, रूक्ष रहता है ।
“पुरीषं प्रथितं रूक्षं वायुप्रपुणो मृदुः । पक्ता खरलं रोक्षं च गात्रस्यास्तिगृधलक्षणम् ॥” चरक सू० अ० १३-५७ ॥५१,५२॥
सुस्तिग्धा त्वन्विदशैर्यित्यं दीप्तोऽस्तिगृधुग्रात्रता । ग्लानिर्लोघवमङ्गात्तामधस्तात् स्नेहदुर्जनम् ॥ सम्यक्स्तिग्धस्य लिङ्गानि स्नेहोद्भेगस्तथैव च ॥५३॥ मली प्रकार की चिकण त्वचा, मल में ढीलापन, अग्नि की प्रदीप्ति, शरीर में कोमलता, ग्लानि, अङ्गों में हल्कापन, गुदा से स्नेह का आना, स्नेह से उद्वेग ( जी मचलाना ) ये सम्यक् स्तिग्ध के लक्षण हैं ।
“वातानुलोम्यं दीप्तोऽस्तिगृधुर्चः स्तिग्धमसंहृतम् । मार्दवं स्तिग्धता चांगे स्तिग्धानामुपजायत ॥” चरक सू० अ० १३-५८ ॥५३॥
भक्तृष्टेयो मुखस्त्रावो गुददाहः प्रवाहिका । पुरीषातिप्रयुत्तिष्ठ भुशस्तिग्धस्य लक्षणम् ॥५४॥ भोजन में द्रव, मुख से खाव, गुदा में दाह, प्रवाहिका, मल की अतिप्रवृत्ति, ये अतिस्तिग्ध के लक्षण हैं । “पाण्डुता गौरवं जाड्यं पुरीषस्याविपक्वता । तन्निरस्चिकित्कलेशः स्यादतिस्तिग्धलक्षणम् ॥
चरक सू० अ० १३-५९ ॥५४॥ रूक्षस्य स्नेहनं स्नेहैरतिस्तिग्धस्य रूक्षणम् ।
श्यामामकोरदूषान्नतक्रपिण्याकशक्तुभिः ॥५५॥ रूक्ष व्यक्ति का स्नेहन द्रव्यों से स्नेहन करे । अतिस्तिग्ध का रूक्षण करे । रूक्षण के लिये—सांवक, कोरवूष, अन्न, तक्र, पिण्याक ( खल ) सत्त आदि देवे ।
‘तक्रारिष्ट प्रयोगश्च रूक्षपानान्नसेवनम् । मूत्राणां त्रिफलयाश्च स्नेहस्यापत्तिर्भेषजम् ॥’ चरक सू० अ० १३-५८ ॥५५॥
दीप्तान्तराग्निः परिशुद्धकोष्ठः । प्रत्यग्रधातुर्बलवर्णयुक्तः । दृढेन्द्रियो मन्दज्वरः श्रुतायुः । स्नेहोपसेवी पुरुषो भवेत् ॥५६॥
स्नेह का नित्य सेवन करनेवाले पुरुष की जठराग्नि प्रबल रहती है, कोष्ठ शुद्ध रहता है, रसादि धातु बल, वर्ण, सदा नूतन रहते हैं । इन्द्रियाँ दृढ़ रहती हैं, बुढ़ापा देर में आता है । आयु सौ साल की होती है ॥५६॥
स्नेहो हितो दुर्बलबहिर्देह- सन्मुखेण व्याधिनिपीडितस्य । बलान्वितो भोजनदोषजातैः । प्रमर्दितुं तौ सहसा न साध्यौ ॥५७॥
रोग से पीड़ित व्यक्ति की दुर्बल अग्नि, दुर्बल शरीर को बढ़ाने में स्नेह उत्तम है । स्नेहपान से बल प्राप्त किये हुए शरीर और अग्नि को भोजन दोष से उत्पन्न विकार भी एकदम से पीड़ित नहीं कर सकते ॥५७॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने स्नेहोपयोगिक- चिकित्सितं नामैकत्रिशोऽध्यायः ॥३१॥
द्वारिंशत्तमोऽध्यायः
अथातः स्वेदावचारणीयं चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे स्वेदावचारणीय चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।
वि० मन्तव्य —इस अध्याय में स्वेदविधि का वर्णन किया गया है ॥१,२॥
चतुर्विधः स्वेदः; तद्यथा—तापस्वेदः, ऊष्मस्वेदः, उप- नाहस्वेदो, द्रवस्वेद इति; अत्र सर्वस्वेदविकल्पावरोधः ॥
स्वेद चार प्रकार का है, यथा—तापस्वेद, ऊष्मस्वेद, उपनाहस्वेद और द्रवस्वेद । इन्हीं चार स्वेदों में अन्य सब ( तेरह प्रकार के चरकोक्त ) स्वेदों का अन्तर्भाव हो जाता है ।
यथा—तापस्वेद में—जेन्ताक, कर्ण, कुटी, कूप, और होलाक का, ऊष्मस्वेद में—संकर, प्रस्तर, अरम, धन, नाडी, कुम्भ और भूस्वेद इन छे का, द्रव स्वेद में—परिवेक और अवगाहन का समावेश है ॥३॥
नं. ३२ ]
चिकित्सास्थानम्
५११
तत्र तापस्वेदः पाणिकॉस्यकन्दुककपालबालुकावच्छैः । प्रयुज्यते, गयानस्य चाङ्गतापो बहुशः खादिराङ्गारैरिति ॥ तापस्वेद—इनमें तापस्वेद हाथ, कांसी, कन्दुक, ठीकरा, रेत, वल्लों द्वारा किया जाता है। सोते हुये (लेटे हुये) के अंगों को खेर के अंगारों से बहुत बार गरम करके तापस्वेद दिया जाता है।
(कन्दुकम्-अपूपपाचनभाण्डम्-गोलवस्तु-तवा आदि)
वि० मन्तव्य—हाथ तपा-तपा कर, कांस्य पात्र को तपा २ कर, कन्दुक-रुई भरी पोट्ठी, तक्रिया आदि को तपा कर, कपाल-मिट्टी के ठीकरों को तपा २ कर, बालुका-तपे बालू की पोट्ठी अथवा बालू की पोट्ठी को तपा २ कर अथवा वल्ल को तपा २ कर वेदना युक्त अवयव पर स्पर्श करना। तपे बालू पर चलना, बैठना, लेटना आदि। तपे विस्तार पर लेटना, तपा तक्रिया लगाना आदि २। अंगारों को शय्या के नीचे रखना आदि २। स्वेद का विस्तृत वर्णन च० सू० अ० १४ में देखिये। सूखी रूखी वस्तुओं से जो स्वेदन किया जाता है वह ताप स्वेद कहलाता है ॥४॥
ऊष्मस्वेदस्तु कपालपाषाणेषट्कालोहपिण्डानगिनवर्णान- द्विरासिञ्चैद्वरुद्रव्यैर्वा, तैराद्वात्तुलकपरिवेष्टितैरङ्गप्रदेशं स्वेदयेत्। मांसरसपयोदधिस्तेहधान्याम्बलातह्रपत्रभङ्ग- क्वाथपूर्णा वा कुम्भोमनुतप्तां प्राष्टृत्योष्माणं गृह्णीयात्। पा- श्वचिच्छ्रवण वा कुम्भेनाधोमुखेन तस्या मुखमभिसन्धाय तस्मिच्छिन्नं हस्तिगुण्डाकारां नाडीं प्रणिधाय तं स्वेदयेत्।
ऊष्मस्वेद के लिये—ठीकरा, पत्थर, ईट, लोहपिण्ड इनको अगिन में लाल गरम करके इनके ऊपर ठण्डे पानी या कांजी के छींटे देकर (जब तक साँ साँ आवाज आये तब तक) इनको गीले वल्ल में लपेटकर अंगप्रदेश पर स्वेद देवे। मांसरस, दूध, दही, स्नेह, कांजी, एरण्ड आदि वातहर पत्रों के क्वाथ से भरे पात्र को गरम करके, उस पात्र को कम्बल आदि से ढाँप कर (जिस प्रकार कि आज कल च्वाय की केटली को ढाँपने की प्रथा है, जिससे वह गरम रहे) उसकी गरमी रोगी ले। अथवा इस घड़िया के पार्श्व में छेद करके उसमें अथवा इस घड़िया के मुख पर एक दूसरी हांडी (घड़िया) औँधों (उल्टी) रखकर दोनों का मुख जोड़कर, ऊपर की हांडी में छेद करके उस में हाथी के गुण्ड के आकार की मुड़ी हुई नलिका लगाकर (जिससे कि वाष्प सीधा जोर से न आये, अपि तु मुड़कर आये) स्वेद देवे।
वि० मन्तव्य—ऊष्म-वाष्प या भाप से जो स्वेदन किया जाता है वह ऊष्म स्वेद कहलाता है। हस्तिगुण्डाकार नाडी या नाली वही है जिसके द्वारा अर्क निकाला जाता है। इनकी उपयोगिता तथा निर्माण विधि श्लो० ६-७ में देखिये ॥५॥
सुखोपविष्टं स्वभ्यक्तं गुरुप्रावरणान्वृतम् । हस्तिगुण्डिकया नाडया स्वेदयेद्वातरोणिणम् ॥
सुखा सर्वाङ्गगा होषा न च किलशनाति मानवम् ॥ व्यामार्थमात्रा त्रिवेक्का हस्तहस्तसमाकृतिः।
स्वेदनाथं हित्वा नाडीं कैलिञ्जी हस्तिगुण्डिका ॥७॥
भली प्रकार अभयंग (तैल का) किये, भारी गरम वल्ल से ढाँपे हुए, आराम से बैठे, वात रोगी को हस्ति के गुण्ड के आकार की नाडी से स्वेद देवे। यह सब अंगों पर सुख से स्वेद देती है, मनुष्य को दुःख नहीं पहुँचाती। नाडी की लम्बाई आधा व्याम होती चाहिये, तीन स्थान पर घुमाववाली (मुड़ी) और हाथी की सूँड के आकार की, किलञ्ज (जिसकी लड़कों की कलम बनती है, उसकी, या नङसर, काश आदि की) बनी नाडी स्वेदन के लिये उत्तम है।
(व्याम—दोनों हाथों को कन्धे के समानान्तर सीधा फैलाने पर जो अन्तर बनता है वह व्याम है)। तीन स्थान पर मोड़ने से—बाष्प के साथ पानी नहीं आयेगा और भाप भी तेज नहीं होगी।
वि० मन्तव्य—कैलिञ्जी-किलिञ्ज कट अर्थात् चटाई का नाम है, कुश आदि की चटाई बनाकर और उसे मोड़कर बनाई नाली का नाम “कैलिञ्जी” है और वह हाथी की सूँड के समान, घड़े की ओर मोटी और स्वेदनीय मानव की ओर पतली होती चाहिये। इसीका नाम हस्तिगुण्डिका नाली है ॥
पुरुषायाममात्रां च भूमिमुकीर्य खादिरैः। काष्ठैर्दण्डा तथाऽभ्युद्युत् क्षीरधान्याम्बवारिभिः ॥८॥ पत्रभङ्गैर्वल्लच्चाद्या शयानं स्वेदयेत्ततः।
पुरुष की लम्बाई के बराबर भूमि को खोदकर उसको खेर की लकड़ियों से गरम करके, इस पर दूध, कांजी या पानी का सिंचन करके, वातभन पत्रों से इसको ढाँपकर रोगी को लेटाकर स्वेद देवे ॥८॥
पूर्ववत् स्वेदयेद्दण्डा भस्मापोह्यापि वा शिलाम् ॥९॥ अथवा शिला पर खेर की लकड़ियाँ जलाकर, राख को हटाकर, पानी का सिंचन करके, वातहर, पत्रों से ढाँपकर—इस पर रोगी को लेटाकर स्वेद देवे ॥९॥
पूर्ववत् कुटी वा चतुर्द्वारां कृत्वा तस्यासुपविष्टस्थानन्त- श्चतुर्द्वारेऽङ्गारानुपसन्धाय तं स्वेदयेत् ॥१०॥
चार द्वारवाली कुटिया को बनाकर उसमें पूर्व की भाँति (शिल तैल, वाष्प स्वेद की भाँति), उसके अन्दर बैठकर, इसके चारों द्वारों पर चलते हुए अंगारे रखकर रोगी को स्वेद देवे।
वि० मन्तव्य—यह कुटी स्वेद का विधान है, जैसे बंगलों में अग्न्याधान बने रहते हैं, शीत कठिनत्व के
५१२
शुभ्रतसंहिता
[ अ० ३२ ]
देशों में घर घर बने रहते हैं वही सब इस सूत्र द्वारा बतलाया गया है। इसका विशद वर्णन च० सू० अ० १४ में इस प्रकार है—
भूगृहेषु च जेन्ताकेषु उष्ण गर्भगृहेषु च।
विधूमाऽङ्कारतप्तेषु स्वभ्यक्तः स्विद्यते सुखम् ॥२८॥
अनति-उत्तरोध विस्तारं वृत्ताकारं अलोचनाम्।
घनमिति कुटीं कृत्वा कुष्ठाद्यैः संप्लयेत्।
प्रावाराऽजिनकौशेयकुचकम्बलगोलकैः।
हसन्तिकामिः अंगारपूर्णाभिः तां च सर्वशः।
परिवार्य अन्तः आरोहेत् अभ्यक्तः स्विद्यते सुखम् ॥२९॥
पूर्ववत्—जैसा वि० अ० २६ के सू० १० में सोम-सेवन के लिये आगार-कुटी बनाने का विधान है तथा सू० अ० १६ में आगार बनाने का विधान है ॥१०॥
कोशधान्यानि वा सम्यगुपस्वेद्यास्तीर्य किञ्चिद्वजेऽन्यस्मिन् वा तत्परिरूपके शयानं प्रावृत्य स्वेद्येत, एवं पांशुगोशकृत्तुषवृषपलाखोष्मभिः स्वेद्येत ॥११॥
फलीवाले धान्यों (उड़द आदि) को भली प्रकार स्वेदन कर चटाई या इसीके समान किसी कम्बल आदि पर बिछा कर, लेटकर, ढाँपकर स्वेद देवे। इसी प्रकार धूली, गोबर, तुष, भूसा, तिलखली की उष्णमासे स्वेद देवे ॥११॥
उपनाहस्वेदस्तु वातहरमूलकलैरन्तर्लिपिष्टैर्लवणप्रगाढैः सुस्निग्धैः सुखोष्णैः प्रदिह्य स्वेद्येत। एवं काकोल्यादिभिरेलादिभिः सुरसादिभित्तिलातसीसर्षपकल्कैः कुरारापायसोत्कारिकामिर्बशवारैः साल्वणैर्वा तनुवसावनद्वैः स्वेद्येत ॥१२॥
उपनाह स्वेद में—वातधन्मूल (एरण्ड मूल आदि) द्रव्यों के कल्कों को कांजी में पीसकर प्रचुर मात्रा में नमक मिलाकर, तैल आदि से स्निग्ध बनाकर सुहाता हुआ गरम गरम लेप करके स्वेदन देवे। इसी प्रकार काकोल्यादि, एलादिगण, सुरसादिगण, तिल, अलसी, सरसों का कल्क, खिचड़ी, खीर, उत्कारिका (लपसी) वेशवार (कीमिया किया मांस) साल्वण (वातव्याधि में कहा) द्रव्यों का लेप करके सूक्ष्म वस्त्र से बाँध कर स्वेद देवे।
वक्तव्य—पित्तानुगत वायु में सुरसादि काकोल्यादि या एलादिगण से, कफानुगत वायु में तिल, अलसी, सरसों से शुद्ध-वायु में—कुरारा, वेशवार या साल्वण द्रव्यों से स्वेद देवे।
वि० मन्तव्य—उष्ण एवं स्निग्ध द्रव्य बाँधना-मोटा लेप लगाना “उपनाह” स्वेद कहलाता है। फोड़ा आदिपर जो तीसी की पुलिट्स बाँधी जाती है वह स्वेदन के लिये ही बाँधी जाती है। लेप लगाकर ऊपर से वस्त्र-पट्टी बाँधना चाहिये। द्रव्यों को वस्त्र में बाँधकर-गोठली बनाकर स्वेदन करना ऊष्मस्वेद कहलाता है ॥१२॥
द्रवस्वेदस्तु वातहरद्रव्यकाथपूर्णे कोष्णकटाहे द्रोण्या वाऽवगाह्य स्वेद्येत, एवं पयोमांसरसयूषतैलधान्याम्बुधृत-वसामृतैश्चवगाहेत, एतैरेव सुखोष्णैः कषायैश्च परिषिच्छेदिति ॥१३॥
द्रवस्वेद—वातहर द्रव्यों के गरम क्वाथ से भरे कड़ाहे या द्रोणी (टब) में गोता लगाकर (बैठकर) स्वेद ले। इसी प्रकार दूध, मांसरस, यूष, तैल, कांजी, घी, वसा, मूत्रों में अवगाहन करे। इन्हीं द्रव्यों के सुहाते गरम कषायों से रोगी परिषेचन (स्नान) करे।
वि० मन्तव्य—किसी भी उष्ण द्रव में बैठना अथवा उससे स्नान करना अथवा पीड़ित अवयव पर परिषेचन करना-टकर करना सब “द्रवस्वेद” कहलाता है। शीतकाल में उष्ण जल का स्नान भी द्रवस्वेद ही है। उक्त चारों प्रकार का स्वेद—चरक के शब्दों में अग्निगुण संश्रय है अर्थात् अग्नि के संयोग से किया जाता है ॥१३॥
तत्र तापोष्मस्वेदौ विशेषतः श्लेष्मघ्नौ, उपनाहस्वेदौ वातघ्नः अन्यतरस्मिन् पित्तसंस्तृष्टे द्रवस्वेद इति ॥१४॥
इनमें तास्वेद ऊष्मस्वेद ये विशेषरूप में कफनाशक हैं। उपनाहस्वेद वातनाशक है, किसी एक कफ या वायु से पित्त के मिले होने पर द्रवस्वेद देना चाहिये ॥१४॥
कफमेदोन्निवृते वायौ निवातातपगुरुप्रावरणनियुद्धा-ध्वन्यायामभारहरणामर्पः स्वेदमुत्पादयेदिति ॥१५॥
निरग्निस्वेद—वायु के कफ और मेद से मिला होने पर (जैसे ऊष्तम्भ में)—वायु रहित निवास धूप, भारी गरम ओढ़ना, कुरती आदि बलकार्य, मुसाफरी, व्यायाम, भार उठाना, क्रोध, इनसे रोगी का स्वेद उत्पन्न करे।
वि० मन्तव्य—निवातनिवास आदि से जो स्वेद उत्पन्न किया जाता है वह निरग्निस्वेद अर्थात् अग्नि के संयोग के बिना किया जाता है यथा—शीतकाल में निवातघर में रहना, गुरु ओढ़ना—दुलाई, कम्बल आदि से शरीर ढकना, आदि २ सब स्वेद के लिये ही किया जाता है ॥१५॥
भवन्ति चात्र—
चतुर्विधो योऽभिहितो द्विधा स्वेदः प्रयुज्यते। सर्वस्मिन्नेव देहे तु देहस्यावयवे तथा ॥१६॥
कहा भी है—चार प्रकार का जो स्वेद कहा है, वह दो प्रकार से बरता जाता है। यथा—यह स्वेद सम्पूर्ण शरीर में या शरीर के किसी अंग पर किया जाता है ॥१६॥
येषां नस्यं विधातन्यं वस्तिश्चैव हि देहिनाम्। शोधनीयाश्च ये केचित् पूर्व स्वेद्यास्तु ते मताः ॥१७॥
पश्चात् स्वेद्या हृते जल्ये मूढगर्भानुपद्रवा। सम्यक् प्रजाता काले या पश्चात् स्वेद्या विज्ञातता ॥
अ० ३२ ]
६५
चिकित्सास्थानम्
४१३
स्वेद्यः पूर्व च पश्चाच्च भगन्दर्यशसस्तथा । अश्मरी चातुरो जनतुः शेषाञ्छाष्व प्रचदमहे ॥१९॥ जिन मनुष्यो को नश्य देना हो, वस्ति देनी हो, और जो शोषन के योग्य हों, उनको इन कार्यों से पहले स्वेदन देना चाहिये। शल्य निकालने के उपरान्त, उपद्रव रहित मूढगर्भा की, समय पर जिसने ठीक प्रकार प्रसव किया हो, इनका पीछे से स्वेद देना चाहिये। भगन्दर, अर्श और अश्मरी में रोगों को शल्य कर्म से पहले और पीछे स्वेद देना चाहिये। शेषों के लिये शाल में कईगे ॥१७-१९॥
नानभ्यक्ते नापि चासिन्गधदेहे
स्वेदो योज्यः स्वेदविद्धिः कथञ्चित् ।
दृष्टं लोके काष्ठमस्तिन्गधमाग्न
गच्छेदुभङ्गं स्वेदयोगैर्गृहीतम् ॥२०॥
स्वेद को जाननेवाला वैद्य बिना अर्भग (तेल अर्भग) के, शरीर का स्नेहन किये बिना कभी भी स्वेदन न देवे। क्योंकि लोक में हम देखते हैं कि बिना स्नेहन किया काष्ठ स्वेदन देने पर टूट जाता है, (ऐसे ही बिना स्नेहन किया शरीर, स्वेद से नष्ट हो जायेगा) ॥२०॥
स्नेहकिलन्ना धातुसंस्थाश्च दोषाः
स्वस्थानस्था ये च मागुषु लीनाः ।
सम्यक् स्वेदयोजितैस्ते द्रवत्वं
प्राप्ताः कोष्ठं शोषनैर्यान्यशेषम् ॥२१॥
धातुओं में स्थित, अपने स्थानों में स्थित और कोष्ठ शाला-मर्म-अस्थि-सन्धि आदि मागों में छिपे हुए जो दोष हैं वे स्नेह से किलन् बनकर स्वेद देने पर द्रव बनकर कोष्ठ में आकर शोषन द्रव्यों से (वमन, विरेचन से) —सम्पूर्ण रूप में बाहर निकल आते हैं ॥२१॥
अग्नेर्दीपितं मार्दवं त्वक्प्रसादं
भक्तश्रद्धां स्रोतसां निर्मलत्वम् ।
कुर्यात् स्वेदो हन्ति निद्रां सतन्द्रां
सन्धौन् स्तब्धाश्चेष्येदागु युक्तः ॥२२॥
भली प्रकार दिया हुआ स्वेद—अग्नि की दीप्ति, कोमलता, लचा की निर्मलता, भोजन में रुचि, स्रोतों की निर्मलता को उत्पन्न करता है। निद्रा, तन्द्रा को नष्ट करता है जड़ बनी सन्धियों को शीघ्र ही क्रियाशील बनाता है ॥२२॥
स्वेदास्त्रावो व्याधिहानिल्लघुत्वं
श्रीतार्थत्वं मार्दवं चातुरस्य ।
सम्यक्स्विन्नं लक्षणं प्राहुरेत-
न्मिथ्यास्विन्नं व्यत्ययेनैतदेव ॥२३॥
स्विन्नं प्रत्यर्थं सन्धिपीडा विदाहः
स्फोटोत्पत्तिः पित्तरक्तप्रकोपः ।
मूच्छां भ्रान्तिर्दहृत्पुणे कलमश्च
कुर्यात्तुर्णं तत्र शीतं विधानम् ॥२४॥
भली प्रकार स्वेद होने पर पसीने का टपकना, रोग का नाश, शरीर में हल्कापन, शीत की चाह, कोमलता, रोगी के भली प्रकार से स्विन्न होने पर यह लक्षण होते हैं। ठीक प्रकार स्वेद न होने पर इनसे विपरीत लक्षण होते हैं। स्वेद के अत्यधिक होने पर—सन्धियों में पीडा, विदाह, छालों की उत्पत्ति, पित्त, रक्त का प्रकोप, मूच्छा, भ्रान्ति, दाह, व्यास, कलम होता है। ऐसी अवस्था में तुरन्त शीत उपचार करना चाहिये ॥२३,२४॥
पाण्डुर्मही पित्तरक्ती क्षयार्तः
क्षामोऽजीर्णां चोदरातों विषातः ।
रुद्रच्छर्घातों गर्भिणी पीतमद्यो
नैते स्वेद्या यश्च मस्वोऽतिसारी ॥२५॥
स्वेदादेषां यान्ति देहा विनाशं
नो साध्यत्वं यान्ति चैषां विकाराः ।
स्वेदैः साध्यो दुर्बलोऽजीर्णभक्तः
स्यातां चेद्वृद्धौ स्वेदनौयो ततस्तौ ॥२६॥
पाण्डुरोगी, प्रमेही, रक्तपित्तरोगी, क्षयरोगी, क्षाम (निर्बल), अजीर्णरोगी, उदररोगी, विष से पीड़ित, प्यास, वमन से दुर्बली, गर्भवती, मद्यपान किया, अतीसाररोगी, इनको स्वेद नहीं देना चाहिये। स्वेद देने से ये मर जाते हैं, अथवा इनके रोग असाध्य हो जाते हैं। दुर्बल एवं अजीर्ण में भोजन किया व्यक्ति, यदि ये दो मनुष्य किसी स्वेद-साध्य रोग से पीड़ित हों तो इनको स्वेद दे सकते हैं ॥२५,२६॥
प्रतेषां स्वेदसाध्या ये व्याधयस्तेषु बुद्धिमान् ।
मुदून् स्वेदान् प्रयुञ्जोत तथा हन्मुष्कदृष्टिषु ॥२७॥
सर्वान् स्वेदात्रिवाते च जीर्णात्रस्यावचारयेत् ।
स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य शीतैराच्छाद्य चतुष्यौ ॥२८॥
स्विद्यमानस्य च मुहुर्द्वैदयं शीतलैः स्फुरेत् ।
सम्यक्स्विन्नं विमुदितं स्नातमुष्णान्मुभिः शनैः ॥२९॥
स्वभ्यक्तं प्रायुताङ्गं च निवातारणस्थितम् ।
भोजयेदनभिषग्नदि सव चचारमादिशेत् ॥३०॥
अस्वेद के अयोग्य इन व्यक्तियों को यदि कोई रोग स्वेद-साध्य हो तो इनको मुदू स्वेद देना चाहिये। हृदय, मुष्क और आँख पर भी मुदू स्वेद देना चाहिये। सब प्रकार का स्वेद वायुरहित स्थान में और अन्न के जीर्ण होने पर करना चाहिये। शरीर पर स्नेह का अर्भग करके और आँखों को शीतल वस्तुओं से ढांप कर स्वेद देवे। स्वेदन देते समय हृदय पर मणिमुक्ता आदि शीतल द्रव्यों से बार-बार स्पर्श करते रहना चाहिये। भली प्रकार स्वेदन हो जाने पर शरीर का मर्दन करके, गरम पानी से धीरे-धीरे स्नान कराके, भली प्रकार अर्भग करके, अंगों को वस्त्र से ढांपकर वायु रहित घर में विठाये। अनभिषग्नदि सब भोजन देवे—सब आचार-व्यवहार-
११४
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३३ ]
परहेज आदि के नियम बता देवे ।
वक्तव्य—“आमाशयगते वाते कफे पक्वाशयाश्रिते । रुक्षपूर्वो हितः स्वेदः स्नेहपूर्वस्तथैव च ॥१॥ वृषणो हृदयं हृष्टो स्वेदयेन्मृदु नैव वा । मध्यमं वंक्षणी शेषमङ्गावयवमिष्टतः ॥ सुशुद्धैर्नक्तकैः पिण्ड्या गोधूमानामथापि वा । पदमोत्पलपलाशैर्वा स्वेद्यः संवृत्य चत्तुषी । मुक्तावलीभिः शीताभिः शीतलैर्भाजने- रपि । जलार्द्रैर्जलजैर्हस्तैः स्विद्यतो हृदयं स्पृशेत् ॥ रात्रौ बद्धं दिवा मुक्तेन्मुक्तेद्वारान्नि दिवाकृतम् । विदाहपरिहारार्थं स्यात् प्रकर्षस्तु शीतले ॥ चरक सू० अ० १४-६-१४ ।
आचार—“उष्णोदकोपचारी स्यात् ब्रह्मचारीक्षपाशयः । शक्रन्मूत्रानिलोद्गारातुदीर्घात्र न धारयेत् ॥ व्यायाममुक्त्वेर्वचनं क्रोशघोक्रो हिमाऽस्तपो । वर्जयेदप्रवातं च सेवेत शयनासनम् ॥ इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने स्वेदावचारणीयं चिकित्सितं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥३१॥
—o—
त्रयात्रिंशत्तमोऽध्यायः
अथातो वमनविरेचनसाध्योपद्रवचिकित्सतं व्याख्यास्यामः यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे वमन विरेचन साध्य-उपद्रव चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—इस अध्याय में वमन एवं विरेचन का वर्णन किया गया है ॥१,२॥
दोषाः क्षीणा बृंहयितव्याः, कुपिताः प्रशमयितव्याः, बुद्धा निर्हतव्याः, समाः परिपातव्या इति सिद्धान्तः ॥३॥
क्षीण हुए दोष बढ़ाने चाहिये, कुपित हुए दोष शान्त करने चाहिये, बड़े हुए दोष निकालने चाहिये, समान रूप में स्थित दोषों की रक्षा करनी चाहिये, यह सिद्धान्त है।
वि० मन्तव्य—जैसे वातादि दोषों के बढ़ने पर विकार उत्पन्न हो जाते हैं वैैसे ही उनके घटने (क्षीण होने) पर विकार उत्पन्न होते हैं । देखिये सु० सू० अ० १५ ॥३॥
प्राधान्येन वमनविरेचने वर्तते निर्हरणे दोषाणाम् । तस्यात्तयोर्विधानमुच्यमानमुपधारय ॥४॥
दोषों को शरीर से निकालने में मुख्यतः वमन और विरे- चन करते जाते हैं । इसलिये इनकी कही हुई विधि को समझो।
वि० मन्तव्य—वात, पित्त एवं कफ ही केवल वमन विरेचन में नहीं निकलते अपितु उनके द्वारा दूषित पुरीषादि मल भी निकलते हैं, और रसादि धातुओं का दूषित जलीयांश भी निकलता है ॥४॥
अथातुरं स्तिग्धं स्विन्नमभिष्यन्दिभिराहारैरनवबद्ध- दोषमवलोक्य यो वमनं पाययिताऽस्मीति संभोजयेत्ती-
रूणाग्निं बलवन्तं बहुदोषं महाव्याधिपरीतं वमनसात्क्यं च ॥५॥
तीक्ष्ण अग्निवाले, बलवान्, बहुत दोषयुक्त, महान् रोग से पीड़ित और वमन सात्क्यवाले रोगी को स्नेहन और स्वेदन देकर और अभिष्यन्दी आहारों द्वारा दोषों को दौला हुआ जानकर, कल इसको वमन पिलाऊँगा, ऐसा निश्चय करके इस रोगी को भरपेट भोजन करावे ॥५॥
भवति चात्र—
पेशलैर्विषिधैरन्नैर्दोषानुत्कलेश्च देहिन्तः ।
स्तिग्धस्विन्नाय वमनं दत्तं सम्यक् प्रवर्तते ॥६॥
कहा भी है—स्नेहन और स्वेदन दिये रोगी के दोषों को कोमल, कफवर्धक नाना प्रकार के भोजनों से उत्कलेशित करके दिया हुआ वमन भली प्रकार प्रवृत्त होता है ॥६॥
अथापरेषुः पूर्वान्नि साधारणे काले वमनद्रव्यकषाय- कल्कचूर्णस्नेहानामन्यतमस्य मात्रां पाययित्वा वामयेद्य- थायोगं क्रोष्ठविशेषमवेद्य, असात्क्यबीभत्सदुर्गन्धदुर्दंश- नानि च वमनानि विद्ध्यात्, अतो विपरीतानि विरेच- नानि, तत्र सुकुमारं कृशं बालं वृद्धं भीरुं वा वमन- साध्येषु विकारेषु क्षीरदधितक्रयवागूनामन्यतममाकण्ठं पाययेत्, पीतौषधं च पाणिभिरग्नितप्तैः प्रताप्यमानं सुहृत्सुपेक्षेत, तस्य च स्वेदप्रादुर्भावेषु शिथिलतामापन्नं स्वेभ्यः स्थानेभ्यः प्रचलितं कुक्षिमनुसृतं जानीयात्, ततः प्रवृत्तहृत्सांसं ज्ञात्वा जानुमात्रासोपविष्टमात्रैर्ललाटे पुष्टे पार्श्वयोः कण्ठे च पाणिभिः सुपरिगृहीतमङ्गुली- गन्धर्वहस्तोत्पलनालानामन्यतमेन कण्ठमभिस्पृशन्त वाम- येत्तावद्यावत् सम्यग्वात्तलिङ्गानोति ॥७॥
फिर दूसरे दिन साधारण समय (न ठण्डे और न गरम) में—कोष्ठ की भिन्नता का विचार करके, जो ठीक हो, उस मात्रा में—वमन द्रव्य को कषाय, कल्क, चूर्ण, स्नेह इनमें से किसी एक रूप में पिलाये । असात्क्य (मन के अप्रिय), बीभत्स (घृणोत्सादक) दुर्गन्धवाले, देखने में अप्रिय वमन द्रव्य बनाये । विरेचन द्रव्य-मन के प्रिय, सुन्दर, सुगन्धवाले, प्रिय करके देवे । इसमें नाजुक प्रकृति, कृश, बालक, वृद्ध, डरपोक, इनको यदि वमन साध्य रोग हो जायें, तब दूध, दही, तक्, यवागू, इनमें से कोई एक वस्तु गले तक (पेट भरकर) पिलाकर वमन देवे । औषध पी चुकने पर आग के सामने बैठकर हाथों से अग्नि को तापते हुए दो घड़ी प्रतीक्षा करे । अग्नि के संताप से पसीना उत्पन्न होने पर दोष दौले बने हुए, अपने स्थानों से चलाय- मान होकर आमाशय की ओर जाते हुए जाने । फिर जी मन्- लाना (उबकाई) आरम्भ होने पर घुटनों के बल रोगी को बिठा- कर विश्वस्त परिचारकों से माथा, पीठ, पार्श्व और गले से
७०- ३३ ]
चिकित्सास्थानम्
११५
पकड़वाकर, अँगुली से, या एरण्ड की नाल अथवा कमलनाल से गले को स्पर्श करते हुए-वमन कराये, जब तक कि भली प्रकार किये हुए वमन के लक्षण दिखाई न दें ।
वि० मन्तव्य—जानुमात्रासनोपविधं-जानुभर ऊँचे आसन (कुरसी) पर उपविध-बैठे रोगी को भगवान् पुनर्वसु के शब्दों में-अस्मै जानुसमं असंबाधं सुप्रयुक्ताऽऽस्तरण-उत्तर प्रच्छद-उपधानं, सोपाश्रयं आसनं उपवेष्टुं प्रयच्छेत् । इसको बैठने के लिए आराम कुरसी देवे । च० सू० अ० १५ ॥७॥
भवतश्चात्र—
कफप्रसेकं हृदयाविशुद्धिं कण्ठं च दुर्छर्दितल्लिङ्गमाहुः ।
पित्तातियोगं च विसंज्ञतां च हृत्कण्ठपीडांमपि चातिवान्ते ॥८॥
कहा भी है-ठीक प्रकार से वमन न होने पर लाला (कफ) का गिरना, हृदय का (आमाशय प्रदेश का) साफ न होना, और कण्ठ होती है । अतिशय वमन होने पर पित्त की अति प्रवृत्ति, मूर्च्छा और हृदय एवं गले में पीड़ा होती है ॥८॥
पित्तं कफस्यानु सुखं प्रवृत्ते शुद्धेषु हृत्कण्ठशिरःभु चापि ।
लघौ च देहे कफसंज्ञे च स्थिते सुवान्तं पुरुषं व्यवस्येत ॥९॥
भली प्रकार वमन होने पर पहले कफ, पीछे पित्त आता है । हृदय, कण्ठ और शिर-निर्मल बन जाते हैं । शरीर हल्का हो जाता है, कफ निकल जाता है, इन लक्षणों से रोगी को भली प्रकार वमन हुआ जाने ।
चरक में—“क्रमात्कफः पित्तमथानिलश्च, यस्येति सम्यग् वमितः स दुष्टः । हृत्पार्श्वमूर्धन्द्रियमार्गशुद्धौ, तथा लघुत्वेऽपि च लघ्य-माणे । दुर्छर्दिते स्फोटककौठकण्डु हृत्खा विशुद्धिः गुरुगात्रता च । तृणमोह-मूर्च्छानिलकोपनिद्रा, बलातिहानिर्वमनेऽति च स्यात् ।” ॥९॥
सम्यग्वान्तं चैनमभिसमीक्ष्य स्नेहनविरेचनशमनानां धूमानामन्यतमं सामर्थ्यतः पाययिवाऽऽचारिकभादिशेत् ॥
भली प्रकार वमन हुआ जानकर इस रोगी को स्नेहन, विरेचन और शमन धूमों में से किसी एक धूम को सामर्थ्य के अनुसार पिलाकर परहेजी-के आचार नियम समझा देवे ॥१०॥
भवन्ति चात्र—
ततोऽपराह्ने शुचिशुद्धदैह- मुष्णाभिरद्भिः परिषिक्तागत्रम् ।
कुलस्थमुद्गाढकजिक्कालानां यूषै रसैर्वाऽप्युपभोजयेत् ॥११॥
१ वमनविधि-चरक के सूत्रस्थान (१५) उपकल्पनीय अध्ययन में विस्तार से ही है, वह बर्हो देखनी चाहिये ।
कहा भी है—फिर अपराह्ने में (सायंकाल) गरम पानी से स्नान करके शरीर के निर्मल और शुद्ध हो जाने पर कुलर्थी, मृग, अरहर, इनके यूप के साथ या जांगल पशु-पक्षियों के मांस रसों से इसको भोजन देवे ॥११॥
कांसोपलेपस्वरभेदनिद्रातन्द्रास्यदौर्गन्ध्यविषोपसर्गाः । कफप्रसेकग्रहणीपदोषा न सन्ति जन्तोर्वमतः कदाचित् ॥ वमन करनेवाले व्यक्ति को, कांस, खोतों में मलवृद्धि, स्वरभेद, निद्रा, तन्द्रा, मुख की दुर्गन्धता, विषजन्य उपद्रव, कफ का स्नाव, ग्रहणीरोग कभी नहीं होते ॥१२॥
छिन्नै त्री पुष्पफलप्ररोहा यथा विनारां सहसा व्रजन्ति ।
तथा हृते श्लेष्मणि शोधनेन तज्जा विकाराः प्रशमं प्रयान्ति ॥१३॥
जिस प्रकार वृक्ष के काटने पर जैसे पुष्प, फल, अंकुर एकदम से नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार वमन द्वारा कफ का शोधन होने से कफजन्य रोग भी शान्त हो जाते हैं ॥१३॥
न वामयेत्तैमिरिकोर्ध्वं वातगुरुमोदरप्लीहकृमिश्रमातान् । स्थूलक्षतक्षीणकृशातिवृद्धमूत्रातुरान् केवलवातरोगान् ॥ स्वरोपघाताध्ययनप्रसक्तदुर्छर्दितुःकोष्ठरुढार्तबालान् । ऊर्ध्वोत्पितिलुधितातिरुक्षगभिण्युदावर्तिनिरुहितान् ॥
वमन का निषेध—तिमिररोग, ऊर्ध्ववातरोगी, गुरुम, उदर, प्लीहा, कृमिरोगी, थकान से पीड़ित, स्थूल (मोटे आदमी को), क्षतक्षीण, कृश, अतिवृद्ध, मूत्र रोग से पीड़ित, शुद्ध वातरोग से पीड़ित, स्वरभेद, अध्ययन में फँसे, भली प्रकार जिसे वमन में दुःख हो, वृषित(कठिन) कोष्ठ, प्यास से पीड़ित, बालकों को, ऊर्ध्वरक्तपित्त रोगी, भूखे, अतिरुक्ष, गर्भवती, उदावर्त्तरोगी और जिसे निरुद्ध दिया गया है—इनको वमन न देवे ।
ऊर्ध्ववायु का लक्षण—अधः प्रतिहतो वायुः श्लेष्मणा कुपितेन च । करोत्यनिशयदुर्गासमूर्ध्ववातः स उच्यते ॥ (विस्तार के लिये देखिये चरक० सिद्धि स्थान अ० २) ॥१४,१५॥
अवम्यवमनाद्वागाः कुच्छतां यान्ति देहिनाम् । असाध्यतां वा गच्छन्ति नैते वाभ्यास्ततः स्थूताः ॥१६॥ वमन के अयोग्य पुरुषों में वमन देने से रोग कष्ट साध्य हो जाते हैं । अथवा असाध्य हो जाते हैं, इसलिये इनको वमन नहीं देना चाहिये ॥१६॥
प्रेतेऽप्यजीर्णन्यथिता वाभ्या ये च विषातुराः । अतीव चोल्बणकफास्ते च स्मूर्धुक्राम्बुना ॥१७॥ अपवाद—इन उपरोक्त रोगियों को भी अजीर्ण होने पर वमन देना चाहिये, और जो विष से पीड़ित हों उनको भी वमन देवे और जिनमें कफ अतिशय बढ़ा हो उनको भी वमन
४९६
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३३ ]
देवे। इनको वमन मुलेहटो के क्वाथ से (क्वाथ के साथ वमन द्रव्य मिलाकर) वमन देवे ॥१७॥
वाग्यास्तु-विषशोषस्तन्यदोषमन्दाग्न्युन्मादापस्मारश्ली पद्वर्धुदाविदारिकामेदोमेहराड्वरासूच्यपत्थ्यामातीसारहट्टो गच्छितविभ्रमविसर्पविद्रध्यर्जोर्मुखप्रसेकह्लासश्चासका- सपीनसपूतीनासकण्ठोष्ठवक्रपाककर्णस्त्रावाधिजिह्वापजि- ह्निकागलशुण्डिकाधःशोणितपित्तिनः कफस्थानजेषु विका- रेखन्त्ये च कफ्याधिपरीता इति ॥१८॥
वमन के योग्य—विषदोष, शोषरोगी, स्तन्यदोष, ( दूषित दूध), मदाग्नि, उन्माद, अपस्मार, श्लीपद, अर्धुद, विदारिका, मेद, प्रमेहरोग, ज्वर, अरुचि, अपची, आमातीसार, हृद्वरोग, चित्तविभ्रम, विसर्प, विद्रधि, अजीर्ण, मुख प्रसेक (लालाक्षाव), जी मचलाना, श्वास, कास, पीनस, पूतीनास, कण्ठपाक, ओष्ठपाक, मुखपाक, कर्णस्त्राव, अधिजिह्निका, उपजिह्निका, गुलशु- ण्डिका, अबोगामि रक्तपित्तरोगी, कफस्थानजन्म रोगों में और कफ रोगों से पीड़ित मनुष्यों को वमन देना चाहिये।१ ( ज्वर नवज्वर और विषम ज्वर में वमन देवे, डल्हन ) ॥१८॥
विरेचनमपि स्निग्धस्विन्नाय वान्ताय च देयम्, अवान्तस्य हि सम्यग्विरिक्तस्यापि सतोऽधः स्रस्तः श्लेष्मा ग्रहणीं छादयति, गौरवमापादयति, प्रवाहिकां वा जनयति ॥१९॥
विरेचन भी स्नेहन, स्वेदन, किये और वमन कराये रोगी को देना चाहिये। क्योंकि वमन न किये हुए पुरुष में भली प्रकार विरेचन होने पर भी नीचे को आया हुआ कफ ग्रहणी (अग्नि) को ढांप लेता है, इससे भारीपन उत्पन्न होता है। अथवा प्रवाहिका उत्पन्न हो जाती है।
वक्तव्य—एकाहोपरस्तत्तदतु सुक्वापच्छर्दनं पिबेत् । स्नेहात्प्रस्कन्दनं जन्तुः त्रिरात्रोपरतः पिबेत् ॥ वान्तं षडहसंसृष्टं पुनः संगेहितं क्रमात् । उष्णं लघु अ्यहं युक्तं षोडशोऽहि विरेचयेत् ॥
चरक ॥१९॥
अथातुरं श्वेो विरेचनं पाययिताऽस्मीति पूर्वोद्धं लघु भोजयेत्, फलाम्लमुष्णोदकं चैनमनुपाययेत् । अथापरेऽ हनि विगतश्लेष्मधातुमातुरोपक्रमणीयादवेक्ष्यातुरमथास्मै औषधमात्रां पातुं प्रयच्छेत् ॥२०॥
इस रोगी को कल विरेचन पिलाऊँगा, ऐसा मन में निश्चय करके, पूर्वोद्धं में लघु (हल्का) भोजन देवे। से पीछे अनार के फल का रस या गरम पानी इसको पिलाये। फिर
दूसरे दिन कफधातु के नष्ट हो जाने पर (कफ के घट जानेपर), आतुरोपक्रमणीय सु० सू० अ० ३५ वां से रोगी की परीक्षा करके, इसको विरेचन औषध की मात्रा पीने के लिये देवे ॥२०॥
तत्र मृदुः, क्रूरो मध्यम इति त्रिविधः कोष्ठो भवति । यत्र बहुपित्तो मृदुः, स दुग्धेनापि विरेच्यते, बहुवातश्लेष्मा क्रूरः, स दुरेविच्यः, समदोषो मध्यमः, स साधारण इति । तत्र मृदो मात्रा मृद्वी, तीक्ष्णा क्रूरे, मध्ये मध्या कर्तव्येति । पीतौषधश्च तन्धनाः शय्याभ्यांशे विरेच्यते ॥२१॥
कोष्ठ तीन प्रकार का है, मृदु, मध्यम और क्रूर। इनमें पित्त की अधिकतावाला कोष्ठ मृदु है, इसमें दूध से भी विरेचन हो जाता है। वायु और कफ की अधिकतावाला कोष्ठ क्रूर कोष्ठ है, इसमें कठिनाई से विरेचन होता है। समान दोषों-वाला कोष्ठ मध्यम कोष्ठ है, इसे साधारण कहते हैं। इनमें मृदु कोष्ठवाले के लिये मृदु मात्रा, क्रूर में तीक्ष्ण मात्रा, और मध्यम में मध्यम मात्रा बरतनी चाहिए। औषध को पीकर-औषध में मन को लगाकर, शय्या के समीप में ही विरेचन करता है। (जल्दी विरेचन होता है)।
वक्तव्य—द्वे पले ज्येष्ठमास्यातं मध्यमं तु पलं भवेत् । पला- धर्मपयुञ्जीत कनीयस्तु विरेचनम् ॥२१॥
विरेचनं पीतवासस्तु न वेगान् धारयेद्बुधुः । निवातशायी शोबाम्बु न सृशेन्न प्रवाहयेत् ॥२२॥ विरेचन पीने पर बुद्धिमान् मनुष्य मल के वेग को न रोके। वायुरहित स्थान पर रहे, ठण्डे पानी का स्पर्श न करे, और बल्लत प्रवाहन न करे ॥२२॥
यथा च वमने प्रसेकौषधकफपित्तानिलाः क्रमेण गच्छन्ति, एवं विरेचने मूत्रपुरोषपित्तौषधकफा इति ॥२३॥ जिस प्रकार वमन औषध में क्रम से-प्रसेक (थूक), औषध कफ, पित्त और वायु क्रम से निकलते हैं, इसी प्रकार विरेचन में मूत्र, मल, पित्त, औषध, कफ, क्रम से निकलते हैं ॥२३॥
भवन्ति चात्र— (स्याद्दुर्विरिक्ते कफपित्तकोपो दाहोऽस्चिगौरवमग्निनासादः ।) हृत्कृच्छ्रशुद्धिः परिदाहकण्डू- विष्णुमूत्रसङ्काश्च न सद्दिरिक्ते । मूच्छर्जगुदभ्रंशकफा तियोगाः शूलोदगमश्चातिविरिक्तलिङ्गम् ॥२४॥
कहा भी है—भली प्रकार विरेचन न होने पर—हृदय और उदर में मेलापन ( भारीपन ), जलन, कण्डू रहती है, वायु-मल, मूत्र का अवरोध रहता है। अति-
१ विस्तार के लिये चरक सिद्धिस्थान अ० २ में देखिये।
अ ३१ ]
चिकित्सास्थानम्
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मात्रा में विरेचन होने पर मूर्च्छा, गुदभ्रंश, कफ का अतिस्त्राव, शूल का होना होता है ॥२४॥
गतेषु दोषेषु कफान्वितेषु
नाभ्या लघुत्वे मनसश्च दुष्टौ ।
गतेऽनिते चाप्यनुलोमभावं
सम्यग्निर्विरिक्तं मनुजं व्यवस्थेत ॥२५॥
पित्तस्थानगत बात मल, कफ और पित्त के निकल जाने पर नामि प्रदेश पर हल्कापन, मन की प्रसन्नता, वायु के अनुलोम हो जाने पर (गुदा मार्ग से वायु लगने पर)-भली प्रकार विरेचन हुआ जाने ॥२५॥
“क्षोतो विशुद्धीन्द्रियसंप्रसादो, लघुत्वमूर्जोऽग्निरनामयत्वम् । प्राप्तिश्च पिट्बित्तकफानिलानां सम्भ्यगं विरिक्तस्य भवेत् क्रमेण । चरक० सि० अ० १।१७।
मन्दाग्निमक्षीणमसद्विरिक्तं
न पाययेताहनि तत्र पेयाम् ।
क्षीणं कृषात् सुविरेचितं च
तन्वी सुखोष्णां लघु पाययेत् ॥२६॥
अग्निमान्द्य होने पर, क्षीण हुये, भली प्रकार विरेचन न होने पर उस दिन रोगी को पेया न पिलाये । क्षीण, प्यास से पीड़ित, भली प्रकार विरेचन हुये रोगी को पतली, हल्की, थोड़ी गरम पेया को पिलाये ॥२६॥
बुद्धैः प्रसादं बलमिन्द्रियाणां
धातुस्थिरत्वं बलमग्निदीप्तिम् ।
चिराच्च पाकं वयसः करोति
विरेचनं सम्यगुपायमानम् ॥२७॥
भली प्रकार लिया हुआ विरेचन बुद्धि की निर्मलता, इन्द्रियों में बल, धातुओं में स्थिरता, बल, अग्नि की प्रदीप्ति, वय का देर में पकना (बुढ़ापा देर में आना), करता है ॥२७॥ यथोदकानामुदकेऽपनीते
चरस्थिराणां भवति प्रणाशः ।
पित्ते हृते त्वेवमुपद्रवाणां
पित्तात्मकानां भवति प्रणाशः ॥२८॥
जल में रहनेवाले मछली आदि चर, कमल आदि स्थावर, जिस प्रकार जल के हटा लेने पर नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार विरेचन से पित्त को निकाल देने पर पित्तजन्य उपद्रवों का नाश हो जाता है ॥२८॥
मन्दाग्न्यतित्स्नेहितबालवृद्धः
स्थूलाः क्षतक्षीणभयपतम्राः ।
श्रान्तस्तृषात्तोऽपरिजीर्णभक्तो
गर्भियधो गच्छति यस्य चासूक् ॥२९॥
नवप्रतिश्यायमदात्ययी च
नवज्वरी या च नवप्रसूता ।
शल्यादिताश्चाप्यविरेचनीयाः
स्नेहादिभिर्यं स्वनुपस्कृताश्च ॥३०॥
विरेचन के अयोग्य—मन्दाग्नि, अतिशयस्नेह दिया, बालक, बुढ़, स्थूल, क्षतक्षीण, भय से डरा, थका हुआ, प्यास से पीड़ित, अजीर्ण में भोजन किया, गर्भवती, अधोगामि रक्त-पित्तरोगी, नूतन प्रतिशयाय का, मदात्यय रोगी, नवज्वरी, नूतनप्रसववती, शल्य से पीड़ित और जिसका स्नेहन आदि नहीं किया, इनको विरेचन नहीं देना चाहिये ॥२९,३०॥
अत्यर्थपित्ताभिपरीतदेहान्
विरेचयेत्तानपि मन्दमन्दम् ।
विरेचनैर्यान्ति नरा विनाश—
मन्दाग्न्युत्कैरविरेचनीयाः ॥३१॥
अपवाद—इनमें भी यदि पित्त की बहुत अधिकता हो तो, इनको भी धीरे धीरे विरेचन देवे । अविरेचनीय पुरुष मूर्ख से दिये हुए विरेचनों से नष्ट हो जाते हैं ॥३१॥
विरेच्याम्बु—ज्वरगाराह्ययशोऽंबुदोदरप्रस्थिविद्रधि-पाण्डुरोगापस्मारहृद्द्वोगवातरक्तभगन्दूरच्छद्वियोनिरोगवि-सपेगुलमपकाशयरुग्निवन्धविस्मृचिकालसकमूत्राघातकुष्ठ-विस्फोटकप्रमेहात्तह्लोहोफुल्लिश्चक्षतक्षाराग्निदग्ध-दुष्टव्रणाक्षिपाककाचतिमिराभिष्यन्दशिरःकर्णक्षिनासा-स्युगुदमेद्वहाहोर्ध्वरक्तपित्तकृमिकोष्ठनः पित्तस्थानजेष्ब-न्येषु च विकारेष्वन्ये च पैलिकन्याधिपरीता इति ॥३२॥
विरेचन के योग्य पुरुष—ज्वर, गरविव, अर्वाच, अर्श, अंबुद, उदर, ग्रन्थि, विद्रधि, पाण्डुरोग, अपस्मार, हृद्द्वोग, वातरक्त, भगन्दूर, वमन, योनिरोग, विषर्प, गुलम, पक्वाशय के रोग, विवन्ध, विस्मृचिका, अलसक, मूत्राघात, कुष्ठ, विस्फोट, प्रमेह, आनाह, शोफ, वृद्धि, शस्त्रक्षत, क्षार, अग्निदग्ध, दुष्ट-व्रण, अक्षिपाक, काच-तिमिर-अभिष्यन्द, शिरोरोग, कर्णपाक, अक्षिरोग, नासारोग, मुखरोग, गुदरोग, मेदूपाक, दाह, ऊर्ध्वरक्तपित्त, कृमिकोष्ठ में तथा पित्तस्थानगत अन्य दोषजनित रोगों में एवं पित्तरोग से पीड़ित व्यक्तियों को विरेचन देना चाहिये ॥३२॥
सरत्वसौन्दर्यतैह्यौण्यविकाशिर्वैविरेचनम् ।
वमनं तु हरेर्दोषं प्रकृत्या गतमन्यथा ॥३३॥
विरेचन सर होने से (सरण शील होने से), सूक्ष्म होने से (सूक्ष्म क्षोतों में पहुँचने से), तीक्ष्ण होने से, उष्ण होने से, विकासी होने से (धातुओं को थायिल करने के कारण), तथा अपने स्वभाव से दोषों को अधोगार्ग से निकालता है । वमन-सर होने से, सूक्ष्म होने से, तीक्ष्ण होने से, विकासी होने से, इससे विपरीत अर्थात् मुखमार्ग से दोषों को निकालता है । यह स्वभाव से ही है ॥३३॥
वक्तव्य-प्रकृति का अर्थ स्वभाव है, यथा—“ऊर्ध्वानुलोमिकं यद्यततप्रभावप्रभातिम् (च० सू० अ० २६) । विरेचन और
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मुमुक्षुसंहिता
[ ७ ]
वमन में गुणों की समानता होने पर भी कार्य की भिन्नता का कारण स्वभाव (प्रभाव) ही है परन्तु चरक में-अग्निवायुत्वात्मकत्वात् ऊर्ध्वभागप्रभावात् औषधस्य ऊर्ध्व उद्भिद्यते । सलिल-प्रथिव्यात्मकत्वात् अधोभागप्रभावाच्च औषधस्य अधः प्रवर्त्तते । उभयतश्च उभयगुणत्वात् ।
चरक० कल्प० अ० १ ॥३३॥
यात्यधो दोषमादाय पञ्चमानं विरेचनम् ।
गुणोत्कर्षाद्ब्रह्मजलूर्ध्वमपक्वं वमनं पुनः ॥३४॥
पश्चात हुआ विरेचन दोष को लेकर नीचे (अधोमार्ग से) जाता है । वमन-विना पचे ही, अपने गुण की उत्कर्षता के कारण ऊपर को जाता है ॥३४॥
कहा भी है—
अपक्वं वमनं दोषं पञ्चमानं विरेचनम्, निर्हरेद् ॥ चरक कल्प० ॥३४॥
मृदुकोष्ठस्य दीप्तान्गनेरतितीर्णं विरेचनम् ।
न सम्यङ्निर्हरेदोषानतिवेगप्रधवितम् ॥३५॥
मृदु कोष्ठवाले व्यक्ति में, अग्नि के प्रदीप्त होने से, अतितीक्ष्ण विरेचन अतिशीघ्र बाहर निकल जाने के कारण दोषों को भली प्रकार नहीं निकालता ॥३५॥
पीतं यदौषधं प्रातमुक्ततपाकसमे क्षणे ।
पर्यन्तं गच्छति दोषांश्च निर्हरेत्तन् प्रशस्यते ॥३६॥
प्रातः पी हुई औषध आहार के पचने के समय तक (तीन-घंटा तक) जीण हो जाती है, और दोषों को निकालती है, वह प्रशस्त है ॥३६॥
दुर्बलस्य चलात् दोषानल्पानल्पान् पुनः पुनः ।
हरेत् प्रभूतानल्पान्स्तु शमयेत् प्रच्युतानपि ॥३७॥
दुर्बल व्यक्ति के प्रचुर एवं चलायमान हुए दोषों को थोड़ा थोड़ा करके बाहर निकाले । दोष यदि थोड़ी मात्रा में हो तो उनके चलायमान होने पर भी दुर्बल मनुष्य में वही इनको शान्त करे । (यथा-क्षय रोगी में—उसे विरेचन, वमन न देवे) ॥
हरेदोषांश्चलात् पक्वान् बलिन्तो दुर्बलस्य वा ।
चला ह्यपेक्षिता दोषाः क्लेशयेयुश्चिरं नरम् ॥३८॥
बलवान् या दुर्बल व्यक्ति के पके हुए एवं चलायमान दोषों को शरीर से बाहर करे । क्योंकि इन दोषों की उपेक्षा करने पर ये दोष रोगी को देर तक पीड़ित करते हैं ॥३८॥
मन्दाग्निं क्रूरकोष्ठं च सञ्चारलवणैर्घृतेः ।
सन्मुखिताग्निं स्निग्धं च स्विन्नं चैव विरेचयेत् ॥३९॥
मन्दाग्नि एवं क्रूरकोष्ठवाले व्यक्ति की जाठराग्नि को यव-क्षार, लवण मिश्रित घृतों से (घट्टपल्लवृत आदि) प्रदीप्त करके, स्नेहन और स्वेदन देकर विरेचन दे ॥३९॥
स्निग्धस्विन्नस्य भेषज्यैर्दोषस्तूक्लेशितो बलात् ।
निळीयते न मार्गेषु स्निग्धे भाण्ड इवोदकम् ॥४०॥
स्नेहन और स्वेदन से स्निग्ध एवं स्विन्न शरीरों में औषधि द्वारा बलपूर्वक उत्कलेशित हुआ दोष मार्गों में नहीं लीन होता, जिस प्रकार चिकने पात्र में पानी नहीं रहता ।
वक्तव्य—“स विच्छिन्नः परिप्लवः स्नेहभाविते काये स्नेहा-क्तभाजनस्थमिव शीघ्रमसज्जन्नपुप्रवणभावात् आमाशयमा-गत्य ॥४०॥४०॥
न चातिस्नेहपीतस्तु पिबेत् स्नेहविरेचनम् ।
दोषाः प्रचलिताः स्थानान्द्रव्यः हिलष्यन्ति वर्त्तसु ॥४१॥
अतिशय स्नेहपान होने पर स्निग्ध विरेचन नहीं पीना चाहिये । क्योंकि चलायमान हुये दोष फिर रास्तों में चिपक जाते हैं (स्नेह के कारण) ॥४१॥
विषाभिघातपिडकाशोकपाण्डुविसर्पिणः ।
नातिस्निग्धा विशोध्यः स्युस्तथा कुष्ठिप्रमेहिणः ॥४२॥
विषपान किये, चोट लगे, पिडका, शोक, और पाण्डुरोगी, विसर्परोगी, कुष्ठ एवं प्रमेहरोगी को बहुत स्निग्ध किये बिना (रुक्ष अवस्था में ही) विरेचन देना चाहिये ॥४२॥
विरुद्धं स्नेहसात्तयं तु भूयः संस्नेह शोधयेत् ।
तेन दोषा हृत्वास्तस्य भवन्ति बलवर्धनाः ॥४३॥
स्नेहसात्तय व्यक्ति को रुक्ष बनाकर, फिर से स्नेहन करके उसे विरेचन देना चाहिये । इस शोधन से निकाले हुए दोष इस रोगी के लिये बलवर्धक होते हैं । (दोषों के निकलने से यल अच्छी प्रकार बढ़ता है) ॥४३॥
प्रागपीतं नरं शोध्यं पाययेतौषधं मृदु ।
ततो विज्ञातकोष्ठस्य कार्यं संशोधनं पुनः ॥४४॥
जिस रोगी ने पहले कभी विरेचन औषध नहीं पी हो, उसे पहले मृदु औषध देवे । फिर कोष्ठ का ज्ञान हो जाने पर पुनः संशोधन करना चाहिये ॥४४॥
मुखं दृष्टफलं हृद्यमल्पमात्रं महागुणम् ।
व्यापस्तवल्पतायं चापि पिबेन्नपतिरौषधम् ॥४५॥
राजा या कोमल प्रकृति, मनुष्य मुख से पीने योग्य, जिसका फल देखा हुआ हो, मन के लिये प्रिय, थोड़ी मात्रा वाली, अधिक गुणकारी, आपत्ति होने में थोड़ी हानि करने वाली औषध पीये ॥४५॥
स्नेहस्वेदावनभ्यस्य यस्तु संशोधनं पिबेत् ।
दारु शुष्कमिवानामे देहस्तस्य विशीर्यते ॥४६॥
स्नेहन और स्वेदन किये बिना जो मनुष्य संशोधन पीता है, वह नष्ट हो जाता है, जिस प्रकार शुष्क लकड़ी स्नेहन एवं स्वेदन किये बिना मोड़ने में टूट जाती है ।
“शुष्काण्यपि हि काष्ठानि स्नेहस्वेदोपपादनैः ।
नमयन्ति यथा न्यायं किं पुनर्जीवितो नरात् ॥
चरक० सू० अ० १४॥४६॥
नं १४ ]
चिकित्सास्थानम्
५१९
स्नेहस्वेदप्रचलित्वा रसेः स्निग्धैरुद्गीरिताः ।
दोषाः कोष्ठगता जन्तोः सुखा हतुं विशोधनैः ॥४७॥
स्नेहन और स्वेदन से चलायमान हुये, कोष्ठ में पहुँचे हुये दोष स्निग्ध रसों से बाहर की ओर प्रेरित होकर वमन-विरेचन रूपी विशोधनों से सुखपूर्वक निकाले जा सकते हैं ॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने वमनविरेचनस्य- ध्योपद्रवचिकित्सितं नाम त्रयस्त्रिशोऽध्यायः ॥३३॥
चतुर्विंशतमोऽध्यायः
अथातो वमनविरेचनव्यापचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे वमन विरेचन व्यापत् चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।
वि० मन्तव्य—वमन एवं विरेचन का सेवन करने में जो कोई व्यापद्—आपद् या विपत्ति आ जाती है—खड़ी हो जाती है उनकी चिकित्सा इस अध्याय में कही गई है । ये व्यापद् चिकित्सक, रोगी, परिचारक अथवा औषध के दोष से होती हैं ॥१,२॥
वैद्यातुरनिमित्तं वमनं विरेचनं च पञ्चदशधा व्याप- द्यते । तत्र वमनस्याधोगतिरुर्ध्वं विरेचनस्येति पृथक् ; सामान्यमुभयोः—सावशेषौषधत्वं, जीर्णौषधत्वं, हीनदो- षापहतत्वं, वातशूलम्, अयोगो, अतियोगो, जीवादानम्, आध्मानं, परिकर्त्तिका, परिस्त्रावः, प्रवाहिका, हृदयोपसर- णं, विबन्ध, अङ्गप्रग्रह इति ॥३॥
वैद्य और रोगी के कारण (इसों में औषध और परिचारक का अन्तर्भाव करना) वमन और विरेचन की व्यापत्ति (हानि- नुकसान) प्रन्द्रह प्रकार की होती है । यथा—इनमें वमन द्रव्य का नीचे जाना और विरेचन द्रव्य का ऊपर को जाना, यह अलग अलग है । शेष दोनों में सामान्य हानियाँ हैं, यथा—औषध का बचे रहना, औषध का पच जाना, दोष का थोड़ा निकालना, वातशूल, अयोग, अतियोग, जीवादान, आध्मान, परिकर्त्तिका, परिस्त्राव, प्रवाहिका, हृदयोपसरण, विबन्ध, अंगप्रग्रह (अंग का पकड़ा जाना) ॥३॥
तत्र तुसुक्ष्मापीडितस्यातितीक्ष्णानेर्धुदुकोष्ठस्य चाव- तिष्ठमानं दुर्बलस्य वा गुणसामान्यभावाद्भमनमधो- गच्छति, तत्रोत्पितान्वाभिदोषोत्कलेश्च ; तमाशु स्नेह- यित्वा भूयस्तीक्ष्णतरीर्वाभयेत् ॥४॥
इनमें भूख से पीड़ित या अतितीक्ष्ण अग्निवाले मृदुकोष्ठ व्यक्ति में रुका हुआ (जीर्ण हुआ) वमन अथवा भली प्रकार से वमन न होने पर वमन औषध विरेचन के समान सरल आदि गुणवाली होने के कारण नीचे अधो मार्ग में जाती है (विरेचन करती है) । इससे इच्छित वस्तु की प्राप्ति नहीं होती,
दोष का उत्कलेश होता है । इस अवस्था में रोगी को शीघ्र स्नेहन करके फिर पहले से अधिक तीक्ष्ण वामक औषध पिला कर वमन कराये ॥४॥
अपरिशुद्धामाशयस्योत्कलश्लेष्मणः सशेषानशय वाऽहृद्यमतिप्रभूतं वा विरेचनं पीतमूर्ध्वं गच्छति तत्रोत्पि- तान्वाभिदोषोत्कलेश्च, तत्राशुद्धामाशयमुत्खण्डलेष्मा- णमाशु वामयित्वा भूयस्तीक्ष्णतरीर्वाभयेत्, आमान्ये स्वामवेत् संविधानम्, अहृद्योऽतिप्रभूते च हृद्यं प्रमाणयुक्तं च, अत ऊर्ध्वमुत्पित्त्यौषधे न तृतीयं पाययेत्, ततस्तेन मधुघृतफाणितयुक्तैर्हैविरेचयेत् ॥५॥
जिसका आमाशय शुद्ध (वमन से) नहीं हुआ, उसमें, अथवा बहुत बड़े हुए कफवाले में, अब का पाचन पूर्ण न होने से, मन को अप्रिय या मात्रा में बहुत अधिक पिया हुआ विरेचन ऊपर की ओर आता है । इससे इच्छित फल नहीं होता, दोष का प्रकोप होता है । इसमें अशुद्ध आमाशयवाले एवं प्रचुर कफवाले रोगी को तुरन्त वमन करा के फिर अति- शय तीक्ष्ण विरेचन देवे । आम का योग होने पर आम की मति उपचार (लंघन-पाचन) करे । मन के लिये अप्रिय मात्रा में बहुत अधिक औषध की अवस्था में मन के लिये प्रिय और मात्रा में औषध देवे । इतने पर भी यदि औषध ऊपर की ओर जाये तो तीसरी बार विरेचन औषध न देवे । इस समय रोगी को मधु, घी, राब से युक्त लैहों से विरेचन देवे ।
वि० मन्तव्य—उक्त दशाओं में अथच उक्त कारणों में से विरेचन औषध से विरेचन न होकर वमन हो जाता है परन्तु यदि आमाशय में कफ रहने से वमन हो गया हो तो पुनः विरेचन औषध से विरेचन हो जाता है परन्तु यदि तथापि वमन हो ही जाय तो फिर विरेचन औषध न देकर केवल मधुघृत एवं फाणित युक्त औषध (न्यवनप्राश आदि) से विरेचन करे । अनेकों की ऐसी प्रकृति होती है जिससे- विरेचन के औषध से वमन हो जाया करता है । यह भी एक व्यापद् ही है ॥५॥
दोषविप्रथितमल्पमौषधमवस्थितमूर्ध्वभागिकमधो- भागिकं वा न संसयति दोषान्, तत्र वृष्णा पाश्चशूलं छर्दिर्मूर्च्छां पर्वभेदो हल्लासोऽरतिरूद्गाराविशुद्धिश्च भवति, तमुष्णाभिरद्गिराशु वामयेदूर्ध्वभागिके, अधोभा- गिकेऽपि च सावशेषौषधमतिप्रधावितदोषमतिबलमसम्य- ग्विरिक्तलक्षणमप्येवं वामयेत् ॥६॥
दोष से मिश्रित, मात्रा में थोड़ी औषध, पच जाने पर औषध दोषों को वमन या विरेचन रूप में बाहर नहीं करती । इससे प्यास, पाश्चशूल, वमन, मूर्च्छा, पर्वभेद, जी मचलाना, बैचैनी, अथवा ढकार की अशुद्धि होती है । इसमें वमन