सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३२ ]
स्नेहपानाद्भवन्त्येषां नृणां नानाविधा गदाः । गदा वा क्रुच्छ्रुतां यान्ति न सिध्दन्त्यथवा पुनः ॥४६॥ गर्भाशयेऽवरोधाः स्युः रक्तकलेदभलास्ततः । स्नेहं जहाच्चिपेवेत् पाचनं रूक्षमेव च ॥४७॥ दशरात्रात्ततः स्नेहं यथावदवचारयेत् ।
स्नेहपान का निषेध-अजीर्णरोगी, तरुण-ज्वरवाला, दुर्बल, अरोचकरोगी, स्थूल, मूर्च्छा से पीड़ित, मदपीड़ित, छिद्र से पीड़ित, पिपासा से दुःखी, भ्रान्त, मत्थपान के थकान से दुःखी, बस्ति जिसने ली है, विरेचन लिये, वमन किया हुआ, असमय में बादल आने पर मनुष्य स्नेहपान न करे । जिसने असमय पर प्रसव किया है, वह ली स्नेहपान न करे । स्नेह पान करने से इनको नाना प्रकार के रोग हो जाते हैं । रोग कष्टसाध्य हो जाते हैं, अथवा असाध्य बन जाते हैं । यदि रक्त, कलेद, मल ये गर्भाशय में रुक जायँ तो स्नेह को छोड़ देवे, पाचन और रूक्ष औषध सेवन करे । दस दिन के पीछे यथा योग्य स्नेह को वरते ॥४६-५०॥
पुरीषं प्रथितं रूक्षं क्रुच्छ्रादमं विपच्यते ॥५१॥ उरो विदहते वायुः कोष्ठाद्युपरि धावति । दुर्बर्णो दुर्बलश्चैव रूक्षो भवति मानवः ॥५२॥ स्नेह के अयोग में—पुरीष (मल) गॉठदार, रूक्ष होता है । अन्न कठिनाई से पचता है । छाती जलती है, वायु कोष्ठ से ऊपर आती है ( डकार आते हैं ) । वर्ण बदल जाता है, दुर्बल होता है, रूक्ष रहता है ।
“पुरीषं प्रथितं रूक्षं वायुप्रपुणो मृदुः । पक्ता खरलं रोक्षं च गात्रस्यास्तिगृधलक्षणम् ॥” चरक सू० अ० १३-५७ ॥५१,५२॥
सुस्तिग्धा त्वन्विदशैर्यित्यं दीप्तोऽस्तिगृधुग्रात्रता । ग्लानिर्लोघवमङ्गात्तामधस्तात् स्नेहदुर्जनम् ॥ सम्यक्स्तिग्धस्य लिङ्गानि स्नेहोद्भेगस्तथैव च ॥५३॥ मली प्रकार की चिकण त्वचा, मल में ढीलापन, अग्नि की प्रदीप्ति, शरीर में कोमलता, ग्लानि, अङ्गों में हल्कापन, गुदा से स्नेह का आना, स्नेह से उद्वेग ( जी मचलाना ) ये सम्यक् स्तिग्ध के लक्षण हैं ।
“वातानुलोम्यं दीप्तोऽस्तिगृधुर्चः स्तिग्धमसंहृतम् । मार्दवं स्तिग्धता चांगे स्तिग्धानामुपजायत ॥” चरक सू० अ० १३-५८ ॥५३॥
भक्तृष्टेयो मुखस्त्रावो गुददाहः प्रवाहिका । पुरीषातिप्रयुत्तिष्ठ भुशस्तिग्धस्य लक्षणम् ॥५४॥ भोजन में द्रव, मुख से खाव, गुदा में दाह, प्रवाहिका, मल की अतिप्रवृत्ति, ये अतिस्तिग्ध के लक्षण हैं । “पाण्डुता गौरवं जाड्यं पुरीषस्याविपक्वता । तन्निरस्चिकित्कलेशः स्यादतिस्तिग्धलक्षणम् ॥
चरक सू० अ० १३-५९ ॥५४॥ रूक्षस्य स्नेहनं स्नेहैरतिस्तिग्धस्य रूक्षणम् ।
श्यामामकोरदूषान्नतक्रपिण्याकशक्तुभिः ॥५५॥ रूक्ष व्यक्ति का स्नेहन द्रव्यों से स्नेहन करे । अतिस्तिग्ध का रूक्षण करे । रूक्षण के लिये—सांवक, कोरवूष, अन्न, तक्र, पिण्याक ( खल ) सत्त आदि देवे ।
‘तक्रारिष्ट प्रयोगश्च रूक्षपानान्नसेवनम् । मूत्राणां त्रिफलयाश्च स्नेहस्यापत्तिर्भेषजम् ॥’ चरक सू० अ० १३-५८ ॥५५॥
दीप्तान्तराग्निः परिशुद्धकोष्ठः । प्रत्यग्रधातुर्बलवर्णयुक्तः । दृढेन्द्रियो मन्दज्वरः श्रुतायुः । स्नेहोपसेवी पुरुषो भवेत् ॥५६॥
स्नेह का नित्य सेवन करनेवाले पुरुष की जठराग्नि प्रबल रहती है, कोष्ठ शुद्ध रहता है, रसादि धातु बल, वर्ण, सदा नूतन रहते हैं । इन्द्रियाँ दृढ़ रहती हैं, बुढ़ापा देर में आता है । आयु सौ साल की होती है ॥५६॥
स्नेहो हितो दुर्बलबहिर्देह- सन्मुखेण व्याधिनिपीडितस्य । बलान्वितो भोजनदोषजातैः । प्रमर्दितुं तौ सहसा न साध्यौ ॥५७॥
रोग से पीड़ित व्यक्ति की दुर्बल अग्नि, दुर्बल शरीर को बढ़ाने में स्नेह उत्तम है । स्नेहपान से बल प्राप्त किये हुए शरीर और अग्नि को भोजन दोष से उत्पन्न विकार भी एकदम से पीड़ित नहीं कर सकते ॥५७॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने स्नेहोपयोगिक- चिकित्सितं नामैकत्रिशोऽध्यायः ॥३१॥
द्वारिंशत्तमोऽध्यायः
अथातः स्वेदावचारणीयं चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे स्वेदावचारणीय चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।
वि० मन्तव्य —इस अध्याय में स्वेदविधि का वर्णन किया गया है ॥१,२॥
चतुर्विधः स्वेदः; तद्यथा—तापस्वेदः, ऊष्मस्वेदः, उप- नाहस्वेदो, द्रवस्वेद इति; अत्र सर्वस्वेदविकल्पावरोधः ॥
स्वेद चार प्रकार का है, यथा—तापस्वेद, ऊष्मस्वेद, उपनाहस्वेद और द्रवस्वेद । इन्हीं चार स्वेदों में अन्य सब ( तेरह प्रकार के चरकोक्त ) स्वेदों का अन्तर्भाव हो जाता है ।
यथा—तापस्वेद में—जेन्ताक, कर्ण, कुटी, कूप, और होलाक का, ऊष्मस्वेद में—संकर, प्रस्तर, अरम, धन, नाडी, कुम्भ और भूस्वेद इन छे का, द्रव स्वेद में—परिवेक और अवगाहन का समावेश है ॥३॥