सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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तत्र तापस्वेदः पाणिकॉस्यकन्दुककपालबालुकावच्छैः । प्रयुज्यते, गयानस्य चाङ्गतापो बहुशः खादिराङ्गारैरिति ॥ तापस्वेद—इनमें तापस्वेद हाथ, कांसी, कन्दुक, ठीकरा, रेत, वल्लों द्वारा किया जाता है। सोते हुये (लेटे हुये) के अंगों को खेर के अंगारों से बहुत बार गरम करके तापस्वेद दिया जाता है।
(कन्दुकम्-अपूपपाचनभाण्डम्-गोलवस्तु-तवा आदि)
वि० मन्तव्य—हाथ तपा-तपा कर, कांस्य पात्र को तपा २ कर, कन्दुक-रुई भरी पोट्ठी, तक्रिया आदि को तपा कर, कपाल-मिट्टी के ठीकरों को तपा २ कर, बालुका-तपे बालू की पोट्ठी अथवा बालू की पोट्ठी को तपा २ कर अथवा वल्ल को तपा २ कर वेदना युक्त अवयव पर स्पर्श करना। तपे बालू पर चलना, बैठना, लेटना आदि। तपे विस्तार पर लेटना, तपा तक्रिया लगाना आदि २। अंगारों को शय्या के नीचे रखना आदि २। स्वेद का विस्तृत वर्णन च० सू० अ० १४ में देखिये। सूखी रूखी वस्तुओं से जो स्वेदन किया जाता है वह ताप स्वेद कहलाता है ॥४॥
ऊष्मस्वेदस्तु कपालपाषाणेषट्कालोहपिण्डानगिनवर्णान- द्विरासिञ्चैद्वरुद्रव्यैर्वा, तैराद्वात्तुलकपरिवेष्टितैरङ्गप्रदेशं स्वेदयेत्। मांसरसपयोदधिस्तेहधान्याम्बलातह्रपत्रभङ्ग- क्वाथपूर्णा वा कुम्भोमनुतप्तां प्राष्टृत्योष्माणं गृह्णीयात्। पा- श्वचिच्छ्रवण वा कुम्भेनाधोमुखेन तस्या मुखमभिसन्धाय तस्मिच्छिन्नं हस्तिगुण्डाकारां नाडीं प्रणिधाय तं स्वेदयेत्।
ऊष्मस्वेद के लिये—ठीकरा, पत्थर, ईट, लोहपिण्ड इनको अगिन में लाल गरम करके इनके ऊपर ठण्डे पानी या कांजी के छींटे देकर (जब तक साँ साँ आवाज आये तब तक) इनको गीले वल्ल में लपेटकर अंगप्रदेश पर स्वेद देवे। मांसरस, दूध, दही, स्नेह, कांजी, एरण्ड आदि वातहर पत्रों के क्वाथ से भरे पात्र को गरम करके, उस पात्र को कम्बल आदि से ढाँप कर (जिस प्रकार कि आज कल च्वाय की केटली को ढाँपने की प्रथा है, जिससे वह गरम रहे) उसकी गरमी रोगी ले। अथवा इस घड़िया के पार्श्व में छेद करके उसमें अथवा इस घड़िया के मुख पर एक दूसरी हांडी (घड़िया) औँधों (उल्टी) रखकर दोनों का मुख जोड़कर, ऊपर की हांडी में छेद करके उस में हाथी के गुण्ड के आकार की मुड़ी हुई नलिका लगाकर (जिससे कि वाष्प सीधा जोर से न आये, अपि तु मुड़कर आये) स्वेद देवे।
वि० मन्तव्य—ऊष्म-वाष्प या भाप से जो स्वेदन किया जाता है वह ऊष्म स्वेद कहलाता है। हस्तिगुण्डाकार नाडी या नाली वही है जिसके द्वारा अर्क निकाला जाता है। इनकी उपयोगिता तथा निर्माण विधि श्लो० ६-७ में देखिये ॥५॥
सुखोपविष्टं स्वभ्यक्तं गुरुप्रावरणान्वृतम् । हस्तिगुण्डिकया नाडया स्वेदयेद्वातरोणिणम् ॥
सुखा सर्वाङ्गगा होषा न च किलशनाति मानवम् ॥ व्यामार्थमात्रा त्रिवेक्का हस्तहस्तसमाकृतिः।
स्वेदनाथं हित्वा नाडीं कैलिञ्जी हस्तिगुण्डिका ॥७॥
भली प्रकार अभयंग (तैल का) किये, भारी गरम वल्ल से ढाँपे हुए, आराम से बैठे, वात रोगी को हस्ति के गुण्ड के आकार की नाडी से स्वेद देवे। यह सब अंगों पर सुख से स्वेद देती है, मनुष्य को दुःख नहीं पहुँचाती। नाडी की लम्बाई आधा व्याम होती चाहिये, तीन स्थान पर घुमाववाली (मुड़ी) और हाथी की सूँड के आकार की, किलञ्ज (जिसकी लड़कों की कलम बनती है, उसकी, या नङसर, काश आदि की) बनी नाडी स्वेदन के लिये उत्तम है।
(व्याम—दोनों हाथों को कन्धे के समानान्तर सीधा फैलाने पर जो अन्तर बनता है वह व्याम है)। तीन स्थान पर मोड़ने से—बाष्प के साथ पानी नहीं आयेगा और भाप भी तेज नहीं होगी।
वि० मन्तव्य—कैलिञ्जी-किलिञ्ज कट अर्थात् चटाई का नाम है, कुश आदि की चटाई बनाकर और उसे मोड़कर बनाई नाली का नाम “कैलिञ्जी” है और वह हाथी की सूँड के समान, घड़े की ओर मोटी और स्वेदनीय मानव की ओर पतली होती चाहिये। इसीका नाम हस्तिगुण्डिका नाली है ॥
पुरुषायाममात्रां च भूमिमुकीर्य खादिरैः। काष्ठैर्दण्डा तथाऽभ्युद्युत् क्षीरधान्याम्बवारिभिः ॥८॥ पत्रभङ्गैर्वल्लच्चाद्या शयानं स्वेदयेत्ततः।
पुरुष की लम्बाई के बराबर भूमि को खोदकर उसको खेर की लकड़ियों से गरम करके, इस पर दूध, कांजी या पानी का सिंचन करके, वातभन पत्रों से इसको ढाँपकर रोगी को लेटाकर स्वेद देवे ॥८॥
पूर्ववत् स्वेदयेद्दण्डा भस्मापोह्यापि वा शिलाम् ॥९॥ अथवा शिला पर खेर की लकड़ियाँ जलाकर, राख को हटाकर, पानी का सिंचन करके, वातहर, पत्रों से ढाँपकर—इस पर रोगी को लेटाकर स्वेद देवे ॥९॥
पूर्ववत् कुटी वा चतुर्द्वारां कृत्वा तस्यासुपविष्टस्थानन्त- श्चतुर्द्वारेऽङ्गारानुपसन्धाय तं स्वेदयेत् ॥१०॥
चार द्वारवाली कुटिया को बनाकर उसमें पूर्व की भाँति (शिल तैल, वाष्प स्वेद की भाँति), उसके अन्दर बैठकर, इसके चारों द्वारों पर चलते हुए अंगारे रखकर रोगी को स्वेद देवे।
वि० मन्तव्य—यह कुटी स्वेद का विधान है, जैसे बंगलों में अग्न्याधान बने रहते हैं, शीत कठिनत्व के