सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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शुभ्रतसंहिता
[ अ० ३२ ]
देशों में घर घर बने रहते हैं वही सब इस सूत्र द्वारा बतलाया गया है। इसका विशद वर्णन च० सू० अ० १४ में इस प्रकार है—
भूगृहेषु च जेन्ताकेषु उष्ण गर्भगृहेषु च।
विधूमाऽङ्कारतप्तेषु स्वभ्यक्तः स्विद्यते सुखम् ॥२८॥
अनति-उत्तरोध विस्तारं वृत्ताकारं अलोचनाम्।
घनमिति कुटीं कृत्वा कुष्ठाद्यैः संप्लयेत्।
प्रावाराऽजिनकौशेयकुचकम्बलगोलकैः।
हसन्तिकामिः अंगारपूर्णाभिः तां च सर्वशः।
परिवार्य अन्तः आरोहेत् अभ्यक्तः स्विद्यते सुखम् ॥२९॥
पूर्ववत्—जैसा वि० अ० २६ के सू० १० में सोम-सेवन के लिये आगार-कुटी बनाने का विधान है तथा सू० अ० १६ में आगार बनाने का विधान है ॥१०॥
कोशधान्यानि वा सम्यगुपस्वेद्यास्तीर्य किञ्चिद्वजेऽन्यस्मिन् वा तत्परिरूपके शयानं प्रावृत्य स्वेद्येत, एवं पांशुगोशकृत्तुषवृषपलाखोष्मभिः स्वेद्येत ॥११॥
फलीवाले धान्यों (उड़द आदि) को भली प्रकार स्वेदन कर चटाई या इसीके समान किसी कम्बल आदि पर बिछा कर, लेटकर, ढाँपकर स्वेद देवे। इसी प्रकार धूली, गोबर, तुष, भूसा, तिलखली की उष्णमासे स्वेद देवे ॥११॥
उपनाहस्वेदस्तु वातहरमूलकलैरन्तर्लिपिष्टैर्लवणप्रगाढैः सुस्निग्धैः सुखोष्णैः प्रदिह्य स्वेद्येत। एवं काकोल्यादिभिरेलादिभिः सुरसादिभित्तिलातसीसर्षपकल्कैः कुरारापायसोत्कारिकामिर्बशवारैः साल्वणैर्वा तनुवसावनद्वैः स्वेद्येत ॥१२॥
उपनाह स्वेद में—वातधन्मूल (एरण्ड मूल आदि) द्रव्यों के कल्कों को कांजी में पीसकर प्रचुर मात्रा में नमक मिलाकर, तैल आदि से स्निग्ध बनाकर सुहाता हुआ गरम गरम लेप करके स्वेदन देवे। इसी प्रकार काकोल्यादि, एलादिगण, सुरसादिगण, तिल, अलसी, सरसों का कल्क, खिचड़ी, खीर, उत्कारिका (लपसी) वेशवार (कीमिया किया मांस) साल्वण (वातव्याधि में कहा) द्रव्यों का लेप करके सूक्ष्म वस्त्र से बाँध कर स्वेद देवे।
वक्तव्य—पित्तानुगत वायु में सुरसादि काकोल्यादि या एलादिगण से, कफानुगत वायु में तिल, अलसी, सरसों से शुद्ध-वायु में—कुरारा, वेशवार या साल्वण द्रव्यों से स्वेद देवे।
वि० मन्तव्य—उष्ण एवं स्निग्ध द्रव्य बाँधना-मोटा लेप लगाना “उपनाह” स्वेद कहलाता है। फोड़ा आदिपर जो तीसी की पुलिट्स बाँधी जाती है वह स्वेदन के लिये ही बाँधी जाती है। लेप लगाकर ऊपर से वस्त्र-पट्टी बाँधना चाहिये। द्रव्यों को वस्त्र में बाँधकर-गोठली बनाकर स्वेदन करना ऊष्मस्वेद कहलाता है ॥१२॥
द्रवस्वेदस्तु वातहरद्रव्यकाथपूर्णे कोष्णकटाहे द्रोण्या वाऽवगाह्य स्वेद्येत, एवं पयोमांसरसयूषतैलधान्याम्बुधृत-वसामृतैश्चवगाहेत, एतैरेव सुखोष्णैः कषायैश्च परिषिच्छेदिति ॥१३॥
द्रवस्वेद—वातहर द्रव्यों के गरम क्वाथ से भरे कड़ाहे या द्रोणी (टब) में गोता लगाकर (बैठकर) स्वेद ले। इसी प्रकार दूध, मांसरस, यूष, तैल, कांजी, घी, वसा, मूत्रों में अवगाहन करे। इन्हीं द्रव्यों के सुहाते गरम कषायों से रोगी परिषेचन (स्नान) करे।
वि० मन्तव्य—किसी भी उष्ण द्रव में बैठना अथवा उससे स्नान करना अथवा पीड़ित अवयव पर परिषेचन करना-टकर करना सब “द्रवस्वेद” कहलाता है। शीतकाल में उष्ण जल का स्नान भी द्रवस्वेद ही है। उक्त चारों प्रकार का स्वेद—चरक के शब्दों में अग्निगुण संश्रय है अर्थात् अग्नि के संयोग से किया जाता है ॥१३॥
तत्र तापोष्मस्वेदौ विशेषतः श्लेष्मघ्नौ, उपनाहस्वेदौ वातघ्नः अन्यतरस्मिन् पित्तसंस्तृष्टे द्रवस्वेद इति ॥१४॥
इनमें तास्वेद ऊष्मस्वेद ये विशेषरूप में कफनाशक हैं। उपनाहस्वेद वातनाशक है, किसी एक कफ या वायु से पित्त के मिले होने पर द्रवस्वेद देना चाहिये ॥१४॥
कफमेदोन्निवृते वायौ निवातातपगुरुप्रावरणनियुद्धा-ध्वन्यायामभारहरणामर्पः स्वेदमुत्पादयेदिति ॥१५॥
निरग्निस्वेद—वायु के कफ और मेद से मिला होने पर (जैसे ऊष्तम्भ में)—वायु रहित निवास धूप, भारी गरम ओढ़ना, कुरती आदि बलकार्य, मुसाफरी, व्यायाम, भार उठाना, क्रोध, इनसे रोगी का स्वेद उत्पन्न करे।
वि० मन्तव्य—निवातनिवास आदि से जो स्वेद उत्पन्न किया जाता है वह निरग्निस्वेद अर्थात् अग्नि के संयोग के बिना किया जाता है यथा—शीतकाल में निवातघर में रहना, गुरु ओढ़ना—दुलाई, कम्बल आदि से शरीर ढकना, आदि २ सब स्वेद के लिये ही किया जाता है ॥१५॥
भवन्ति चात्र—
चतुर्विधो योऽभिहितो द्विधा स्वेदः प्रयुज्यते। सर्वस्मिन्नेव देहे तु देहस्यावयवे तथा ॥१६॥
कहा भी है—चार प्रकार का जो स्वेद कहा है, वह दो प्रकार से बरता जाता है। यथा—यह स्वेद सम्पूर्ण शरीर में या शरीर के किसी अंग पर किया जाता है ॥१६॥
येषां नस्यं विधातन्यं वस्तिश्चैव हि देहिनाम्। शोधनीयाश्च ये केचित् पूर्व स्वेद्यास्तु ते मताः ॥१७॥
पश्चात् स्वेद्या हृते जल्ये मूढगर्भानुपद्रवा। सम्यक् प्रजाता काले या पश्चात् स्वेद्या विज्ञातता ॥