भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 569, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 569

अ० ३२ ]

६५

चिकित्सास्थानम्

४१३

स्वेद्यः पूर्व च पश्चाच्च भगन्दर्यशसस्तथा । अश्मरी चातुरो जनतुः शेषाञ्छाष्व प्रचदमहे ॥१९॥ जिन मनुष्यो को नश्य देना हो, वस्ति देनी हो, और जो शोषन के योग्य हों, उनको इन कार्यों से पहले स्वेदन देना चाहिये। शल्य निकालने के उपरान्त, उपद्रव रहित मूढगर्भा की, समय पर जिसने ठीक प्रकार प्रसव किया हो, इनका पीछे से स्वेद देना चाहिये। भगन्दर, अर्श और अश्मरी में रोगों को शल्य कर्म से पहले और पीछे स्वेद देना चाहिये। शेषों के लिये शाल में कईगे ॥१७-१९॥

नानभ्यक्ते नापि चासिन्गधदेहे

स्वेदो योज्यः स्वेदविद्धिः कथञ्चित् ।

दृष्टं लोके काष्ठमस्तिन्गधमाग्न

गच्छेदुभङ्गं स्वेदयोगैर्गृहीतम् ॥२०॥

स्वेद को जाननेवाला वैद्य बिना अर्भग (तेल अर्भग) के, शरीर का स्नेहन किये बिना कभी भी स्वेदन न देवे। क्योंकि लोक में हम देखते हैं कि बिना स्नेहन किया काष्ठ स्वेदन देने पर टूट जाता है, (ऐसे ही बिना स्नेहन किया शरीर, स्वेद से नष्ट हो जायेगा) ॥२०॥

स्नेहकिलन्ना धातुसंस्थाश्च दोषाः

स्वस्थानस्था ये च मागुषु लीनाः ।

सम्यक् स्वेदयोजितैस्ते द्रवत्वं

प्राप्ताः कोष्ठं शोषनैर्यान्यशेषम् ॥२१॥

धातुओं में स्थित, अपने स्थानों में स्थित और कोष्ठ शाला-मर्म-अस्थि-सन्धि आदि मागों में छिपे हुए जो दोष हैं वे स्नेह से किलन् बनकर स्वेद देने पर द्रव बनकर कोष्ठ में आकर शोषन द्रव्यों से (वमन, विरेचन से) —सम्पूर्ण रूप में बाहर निकल आते हैं ॥२१॥

अग्नेर्दीपितं मार्दवं त्वक्प्रसादं

भक्तश्रद्धां स्रोतसां निर्मलत्वम् ।

कुर्यात् स्वेदो हन्ति निद्रां सतन्द्रां

सन्धौन् स्तब्धाश्चेष्येदागु युक्तः ॥२२॥

भली प्रकार दिया हुआ स्वेद—अग्नि की दीप्ति, कोमलता, लचा की निर्मलता, भोजन में रुचि, स्रोतों की निर्मलता को उत्पन्न करता है। निद्रा, तन्द्रा को नष्ट करता है जड़ बनी सन्धियों को शीघ्र ही क्रियाशील बनाता है ॥२२॥

स्वेदास्त्रावो व्याधिहानिल्लघुत्वं

श्रीतार्थत्वं मार्दवं चातुरस्य ।

सम्यक्स्विन्नं लक्षणं प्राहुरेत-

न्मिथ्यास्विन्नं व्यत्ययेनैतदेव ॥२३॥

स्विन्नं प्रत्यर्थं सन्धिपीडा विदाहः

स्फोटोत्पत्तिः पित्तरक्तप्रकोपः ।

मूच्छां भ्रान्तिर्दहृत्पुणे कलमश्च

कुर्यात्तुर्णं तत्र शीतं विधानम् ॥२४॥

भली प्रकार स्वेद होने पर पसीने का टपकना, रोग का नाश, शरीर में हल्कापन, शीत की चाह, कोमलता, रोगी के भली प्रकार से स्विन्न होने पर यह लक्षण होते हैं। ठीक प्रकार स्वेद न होने पर इनसे विपरीत लक्षण होते हैं। स्वेद के अत्यधिक होने पर—सन्धियों में पीडा, विदाह, छालों की उत्पत्ति, पित्त, रक्त का प्रकोप, मूच्छा, भ्रान्ति, दाह, व्यास, कलम होता है। ऐसी अवस्था में तुरन्त शीत उपचार करना चाहिये ॥२३,२४॥

पाण्डुर्मही पित्तरक्ती क्षयार्तः

क्षामोऽजीर्णां चोदरातों विषातः ।

रुद्रच्छर्घातों गर्भिणी पीतमद्यो

नैते स्वेद्या यश्च मस्वोऽतिसारी ॥२५॥

स्वेदादेषां यान्ति देहा विनाशं

नो साध्यत्वं यान्ति चैषां विकाराः ।

स्वेदैः साध्यो दुर्बलोऽजीर्णभक्तः

स्यातां चेद्वृद्धौ स्वेदनौयो ततस्तौ ॥२६॥

पाण्डुरोगी, प्रमेही, रक्तपित्तरोगी, क्षयरोगी, क्षाम (निर्बल), अजीर्णरोगी, उदररोगी, विष से पीड़ित, प्यास, वमन से दुर्बली, गर्भवती, मद्यपान किया, अतीसाररोगी, इनको स्वेद नहीं देना चाहिये। स्वेद देने से ये मर जाते हैं, अथवा इनके रोग असाध्य हो जाते हैं। दुर्बल एवं अजीर्ण में भोजन किया व्यक्ति, यदि ये दो मनुष्य किसी स्वेद-साध्य रोग से पीड़ित हों तो इनको स्वेद दे सकते हैं ॥२५,२६॥

प्रतेषां स्वेदसाध्या ये व्याधयस्तेषु बुद्धिमान् ।

मुदून् स्वेदान् प्रयुञ्जोत तथा हन्मुष्कदृष्टिषु ॥२७॥

सर्वान् स्वेदात्रिवाते च जीर्णात्रस्यावचारयेत् ।

स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य शीतैराच्छाद्य चतुष्यौ ॥२८॥

स्विद्यमानस्य च मुहुर्द्वैदयं शीतलैः स्फुरेत् ।

सम्यक्स्विन्नं विमुदितं स्नातमुष्णान्मुभिः शनैः ॥२९॥

स्वभ्यक्तं प्रायुताङ्गं च निवातारणस्थितम् ।

भोजयेदनभिषग्नदि सव चचारमादिशेत् ॥३०॥

अस्वेद के अयोग्य इन व्यक्तियों को यदि कोई रोग स्वेद-साध्य हो तो इनको मुदू स्वेद देना चाहिये। हृदय, मुष्क और आँख पर भी मुदू स्वेद देना चाहिये। सब प्रकार का स्वेद वायुरहित स्थान में और अन्न के जीर्ण होने पर करना चाहिये। शरीर पर स्नेह का अर्भग करके और आँखों को शीतल वस्तुओं से ढांप कर स्वेद देवे। स्वेदन देते समय हृदय पर मणिमुक्ता आदि शीतल द्रव्यों से बार-बार स्पर्श करते रहना चाहिये। भली प्रकार स्वेदन हो जाने पर शरीर का मर्दन करके, गरम पानी से धीरे-धीरे स्नान कराके, भली प्रकार अर्भग करके, अंगों को वस्त्र से ढांपकर वायु रहित घर में विठाये। अनभिषग्नदि सब भोजन देवे—सब आचार-व्यवहार-

सुश्रुत संहिता · पृष्ठ 569, कुल 872 में से · BharatKosha