सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३३ ]
परहेज आदि के नियम बता देवे ।
वक्तव्य—“आमाशयगते वाते कफे पक्वाशयाश्रिते । रुक्षपूर्वो हितः स्वेदः स्नेहपूर्वस्तथैव च ॥१॥ वृषणो हृदयं हृष्टो स्वेदयेन्मृदु नैव वा । मध्यमं वंक्षणी शेषमङ्गावयवमिष्टतः ॥ सुशुद्धैर्नक्तकैः पिण्ड्या गोधूमानामथापि वा । पदमोत्पलपलाशैर्वा स्वेद्यः संवृत्य चत्तुषी । मुक्तावलीभिः शीताभिः शीतलैर्भाजने- रपि । जलार्द्रैर्जलजैर्हस्तैः स्विद्यतो हृदयं स्पृशेत् ॥ रात्रौ बद्धं दिवा मुक्तेन्मुक्तेद्वारान्नि दिवाकृतम् । विदाहपरिहारार्थं स्यात् प्रकर्षस्तु शीतले ॥ चरक सू० अ० १४-६-१४ ।
आचार—“उष्णोदकोपचारी स्यात् ब्रह्मचारीक्षपाशयः । शक्रन्मूत्रानिलोद्गारातुदीर्घात्र न धारयेत् ॥ व्यायाममुक्त्वेर्वचनं क्रोशघोक्रो हिमाऽस्तपो । वर्जयेदप्रवातं च सेवेत शयनासनम् ॥ इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने स्वेदावचारणीयं चिकित्सितं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥३१॥
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त्रयात्रिंशत्तमोऽध्यायः
अथातो वमनविरेचनसाध्योपद्रवचिकित्सतं व्याख्यास्यामः यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे वमन विरेचन साध्य-उपद्रव चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—इस अध्याय में वमन एवं विरेचन का वर्णन किया गया है ॥१,२॥
दोषाः क्षीणा बृंहयितव्याः, कुपिताः प्रशमयितव्याः, बुद्धा निर्हतव्याः, समाः परिपातव्या इति सिद्धान्तः ॥३॥
क्षीण हुए दोष बढ़ाने चाहिये, कुपित हुए दोष शान्त करने चाहिये, बड़े हुए दोष निकालने चाहिये, समान रूप में स्थित दोषों की रक्षा करनी चाहिये, यह सिद्धान्त है।
वि० मन्तव्य—जैसे वातादि दोषों के बढ़ने पर विकार उत्पन्न हो जाते हैं वैैसे ही उनके घटने (क्षीण होने) पर विकार उत्पन्न होते हैं । देखिये सु० सू० अ० १५ ॥३॥
प्राधान्येन वमनविरेचने वर्तते निर्हरणे दोषाणाम् । तस्यात्तयोर्विधानमुच्यमानमुपधारय ॥४॥
दोषों को शरीर से निकालने में मुख्यतः वमन और विरे- चन करते जाते हैं । इसलिये इनकी कही हुई विधि को समझो।
वि० मन्तव्य—वात, पित्त एवं कफ ही केवल वमन विरेचन में नहीं निकलते अपितु उनके द्वारा दूषित पुरीषादि मल भी निकलते हैं, और रसादि धातुओं का दूषित जलीयांश भी निकलता है ॥४॥
अथातुरं स्तिग्धं स्विन्नमभिष्यन्दिभिराहारैरनवबद्ध- दोषमवलोक्य यो वमनं पाययिताऽस्मीति संभोजयेत्ती-
रूणाग्निं बलवन्तं बहुदोषं महाव्याधिपरीतं वमनसात्क्यं च ॥५॥
तीक्ष्ण अग्निवाले, बलवान्, बहुत दोषयुक्त, महान् रोग से पीड़ित और वमन सात्क्यवाले रोगी को स्नेहन और स्वेदन देकर और अभिष्यन्दी आहारों द्वारा दोषों को दौला हुआ जानकर, कल इसको वमन पिलाऊँगा, ऐसा निश्चय करके इस रोगी को भरपेट भोजन करावे ॥५॥
भवति चात्र—
पेशलैर्विषिधैरन्नैर्दोषानुत्कलेश्च देहिन्तः ।
स्तिग्धस्विन्नाय वमनं दत्तं सम्यक् प्रवर्तते ॥६॥
कहा भी है—स्नेहन और स्वेदन दिये रोगी के दोषों को कोमल, कफवर्धक नाना प्रकार के भोजनों से उत्कलेशित करके दिया हुआ वमन भली प्रकार प्रवृत्त होता है ॥६॥
अथापरेषुः पूर्वान्नि साधारणे काले वमनद्रव्यकषाय- कल्कचूर्णस्नेहानामन्यतमस्य मात्रां पाययित्वा वामयेद्य- थायोगं क्रोष्ठविशेषमवेद्य, असात्क्यबीभत्सदुर्गन्धदुर्दंश- नानि च वमनानि विद्ध्यात्, अतो विपरीतानि विरेच- नानि, तत्र सुकुमारं कृशं बालं वृद्धं भीरुं वा वमन- साध्येषु विकारेषु क्षीरदधितक्रयवागूनामन्यतममाकण्ठं पाययेत्, पीतौषधं च पाणिभिरग्नितप्तैः प्रताप्यमानं सुहृत्सुपेक्षेत, तस्य च स्वेदप्रादुर्भावेषु शिथिलतामापन्नं स्वेभ्यः स्थानेभ्यः प्रचलितं कुक्षिमनुसृतं जानीयात्, ततः प्रवृत्तहृत्सांसं ज्ञात्वा जानुमात्रासोपविष्टमात्रैर्ललाटे पुष्टे पार्श्वयोः कण्ठे च पाणिभिः सुपरिगृहीतमङ्गुली- गन्धर्वहस्तोत्पलनालानामन्यतमेन कण्ठमभिस्पृशन्त वाम- येत्तावद्यावत् सम्यग्वात्तलिङ्गानोति ॥७॥
फिर दूसरे दिन साधारण समय (न ठण्डे और न गरम) में—कोष्ठ की भिन्नता का विचार करके, जो ठीक हो, उस मात्रा में—वमन द्रव्य को कषाय, कल्क, चूर्ण, स्नेह इनमें से किसी एक रूप में पिलाये । असात्क्य (मन के अप्रिय), बीभत्स (घृणोत्सादक) दुर्गन्धवाले, देखने में अप्रिय वमन द्रव्य बनाये । विरेचन द्रव्य-मन के प्रिय, सुन्दर, सुगन्धवाले, प्रिय करके देवे । इसमें नाजुक प्रकृति, कृश, बालक, वृद्ध, डरपोक, इनको यदि वमन साध्य रोग हो जायें, तब दूध, दही, तक्, यवागू, इनमें से कोई एक वस्तु गले तक (पेट भरकर) पिलाकर वमन देवे । औषध पी चुकने पर आग के सामने बैठकर हाथों से अग्नि को तापते हुए दो घड़ी प्रतीक्षा करे । अग्नि के संताप से पसीना उत्पन्न होने पर दोष दौले बने हुए, अपने स्थानों से चलाय- मान होकर आमाशय की ओर जाते हुए जाने । फिर जी मन्- लाना (उबकाई) आरम्भ होने पर घुटनों के बल रोगी को बिठा- कर विश्वस्त परिचारकों से माथा, पीठ, पार्श्व और गले से