सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 571, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें७०- ३३ ]
चिकित्सास्थानम्
११५
पकड़वाकर, अँगुली से, या एरण्ड की नाल अथवा कमलनाल से गले को स्पर्श करते हुए-वमन कराये, जब तक कि भली प्रकार किये हुए वमन के लक्षण दिखाई न दें ।
वि० मन्तव्य—जानुमात्रासनोपविधं-जानुभर ऊँचे आसन (कुरसी) पर उपविध-बैठे रोगी को भगवान् पुनर्वसु के शब्दों में-अस्मै जानुसमं असंबाधं सुप्रयुक्ताऽऽस्तरण-उत्तर प्रच्छद-उपधानं, सोपाश्रयं आसनं उपवेष्टुं प्रयच्छेत् । इसको बैठने के लिए आराम कुरसी देवे । च० सू० अ० १५ ॥७॥
भवतश्चात्र—
कफप्रसेकं हृदयाविशुद्धिं कण्ठं च दुर्छर्दितल्लिङ्गमाहुः ।
पित्तातियोगं च विसंज्ञतां च हृत्कण्ठपीडांमपि चातिवान्ते ॥८॥
कहा भी है-ठीक प्रकार से वमन न होने पर लाला (कफ) का गिरना, हृदय का (आमाशय प्रदेश का) साफ न होना, और कण्ठ होती है । अतिशय वमन होने पर पित्त की अति प्रवृत्ति, मूर्च्छा और हृदय एवं गले में पीड़ा होती है ॥८॥
पित्तं कफस्यानु सुखं प्रवृत्ते शुद्धेषु हृत्कण्ठशिरःभु चापि ।
लघौ च देहे कफसंज्ञे च स्थिते सुवान्तं पुरुषं व्यवस्येत ॥९॥
भली प्रकार वमन होने पर पहले कफ, पीछे पित्त आता है । हृदय, कण्ठ और शिर-निर्मल बन जाते हैं । शरीर हल्का हो जाता है, कफ निकल जाता है, इन लक्षणों से रोगी को भली प्रकार वमन हुआ जाने ।
चरक में—“क्रमात्कफः पित्तमथानिलश्च, यस्येति सम्यग् वमितः स दुष्टः । हृत्पार्श्वमूर्धन्द्रियमार्गशुद्धौ, तथा लघुत्वेऽपि च लघ्य-माणे । दुर्छर्दिते स्फोटककौठकण्डु हृत्खा विशुद्धिः गुरुगात्रता च । तृणमोह-मूर्च्छानिलकोपनिद्रा, बलातिहानिर्वमनेऽति च स्यात् ।” ॥९॥
सम्यग्वान्तं चैनमभिसमीक्ष्य स्नेहनविरेचनशमनानां धूमानामन्यतमं सामर्थ्यतः पाययिवाऽऽचारिकभादिशेत् ॥
भली प्रकार वमन हुआ जानकर इस रोगी को स्नेहन, विरेचन और शमन धूमों में से किसी एक धूम को सामर्थ्य के अनुसार पिलाकर परहेजी-के आचार नियम समझा देवे ॥१०॥
भवन्ति चात्र—
ततोऽपराह्ने शुचिशुद्धदैह- मुष्णाभिरद्भिः परिषिक्तागत्रम् ।
कुलस्थमुद्गाढकजिक्कालानां यूषै रसैर्वाऽप्युपभोजयेत् ॥११॥
१ वमनविधि-चरक के सूत्रस्थान (१५) उपकल्पनीय अध्ययन में विस्तार से ही है, वह बर्हो देखनी चाहिये ।
कहा भी है—फिर अपराह्ने में (सायंकाल) गरम पानी से स्नान करके शरीर के निर्मल और शुद्ध हो जाने पर कुलर्थी, मृग, अरहर, इनके यूप के साथ या जांगल पशु-पक्षियों के मांस रसों से इसको भोजन देवे ॥११॥
कांसोपलेपस्वरभेदनिद्रातन्द्रास्यदौर्गन्ध्यविषोपसर्गाः । कफप्रसेकग्रहणीपदोषा न सन्ति जन्तोर्वमतः कदाचित् ॥ वमन करनेवाले व्यक्ति को, कांस, खोतों में मलवृद्धि, स्वरभेद, निद्रा, तन्द्रा, मुख की दुर्गन्धता, विषजन्य उपद्रव, कफ का स्नाव, ग्रहणीरोग कभी नहीं होते ॥१२॥
छिन्नै त्री पुष्पफलप्ररोहा यथा विनारां सहसा व्रजन्ति ।
तथा हृते श्लेष्मणि शोधनेन तज्जा विकाराः प्रशमं प्रयान्ति ॥१३॥
जिस प्रकार वृक्ष के काटने पर जैसे पुष्प, फल, अंकुर एकदम से नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार वमन द्वारा कफ का शोधन होने से कफजन्य रोग भी शान्त हो जाते हैं ॥१३॥
न वामयेत्तैमिरिकोर्ध्वं वातगुरुमोदरप्लीहकृमिश्रमातान् । स्थूलक्षतक्षीणकृशातिवृद्धमूत्रातुरान् केवलवातरोगान् ॥ स्वरोपघाताध्ययनप्रसक्तदुर्छर्दितुःकोष्ठरुढार्तबालान् । ऊर्ध्वोत्पितिलुधितातिरुक्षगभिण्युदावर्तिनिरुहितान् ॥
वमन का निषेध—तिमिररोग, ऊर्ध्ववातरोगी, गुरुम, उदर, प्लीहा, कृमिरोगी, थकान से पीड़ित, स्थूल (मोटे आदमी को), क्षतक्षीण, कृश, अतिवृद्ध, मूत्र रोग से पीड़ित, शुद्ध वातरोग से पीड़ित, स्वरभेद, अध्ययन में फँसे, भली प्रकार जिसे वमन में दुःख हो, वृषित(कठिन) कोष्ठ, प्यास से पीड़ित, बालकों को, ऊर्ध्वरक्तपित्त रोगी, भूखे, अतिरुक्ष, गर्भवती, उदावर्त्तरोगी और जिसे निरुद्ध दिया गया है—इनको वमन न देवे ।
ऊर्ध्ववायु का लक्षण—अधः प्रतिहतो वायुः श्लेष्मणा कुपितेन च । करोत्यनिशयदुर्गासमूर्ध्ववातः स उच्यते ॥ (विस्तार के लिये देखिये चरक० सिद्धि स्थान अ० २) ॥१४,१५॥
अवम्यवमनाद्वागाः कुच्छतां यान्ति देहिनाम् । असाध्यतां वा गच्छन्ति नैते वाभ्यास्ततः स्थूताः ॥१६॥ वमन के अयोग्य पुरुषों में वमन देने से रोग कष्ट साध्य हो जाते हैं । अथवा असाध्य हो जाते हैं, इसलिये इनको वमन नहीं देना चाहिये ॥१६॥
प्रेतेऽप्यजीर्णन्यथिता वाभ्या ये च विषातुराः । अतीव चोल्बणकफास्ते च स्मूर्धुक्राम्बुना ॥१७॥ अपवाद—इन उपरोक्त रोगियों को भी अजीर्ण होने पर वमन देना चाहिये, और जो विष से पीड़ित हों उनको भी वमन देवे और जिनमें कफ अतिशय बढ़ा हो उनको भी वमन