भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 572, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 572

४९६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३३ ]

देवे। इनको वमन मुलेहटो के क्वाथ से (क्वाथ के साथ वमन द्रव्य मिलाकर) वमन देवे ॥१७॥

वाग्यास्तु-विषशोषस्तन्यदोषमन्दाग्न्युन्मादापस्मारश्ली पद्वर्धुदाविदारिकामेदोमेहराड्वरासूच्यपत्थ्यामातीसारहट्टो गच्छितविभ्रमविसर्पविद्रध्यर्जोर्मुखप्रसेकह्लासश्चासका- सपीनसपूतीनासकण्ठोष्ठवक्रपाककर्णस्त्रावाधिजिह्वापजि- ह्निकागलशुण्डिकाधःशोणितपित्तिनः कफस्थानजेषु विका- रेखन्त्ये च कफ्याधिपरीता इति ॥१८॥

वमन के योग्य—विषदोष, शोषरोगी, स्तन्यदोष, ( दूषित दूध), मदाग्नि, उन्माद, अपस्मार, श्लीपद, अर्धुद, विदारिका, मेद, प्रमेहरोग, ज्वर, अरुचि, अपची, आमातीसार, हृद्वरोग, चित्तविभ्रम, विसर्प, विद्रधि, अजीर्ण, मुख प्रसेक (लालाक्षाव), जी मचलाना, श्वास, कास, पीनस, पूतीनास, कण्ठपाक, ओष्ठपाक, मुखपाक, कर्णस्त्राव, अधिजिह्निका, उपजिह्निका, गुलशु- ण्डिका, अबोगामि रक्तपित्तरोगी, कफस्थानजन्म रोगों में और कफ रोगों से पीड़ित मनुष्यों को वमन देना चाहिये।१ ( ज्वर नवज्वर और विषम ज्वर में वमन देवे, डल्हन ) ॥१८॥

विरेचनमपि स्निग्धस्विन्नाय वान्ताय च देयम्, अवान्तस्य हि सम्यग्विरिक्तस्यापि सतोऽधः स्रस्तः श्लेष्मा ग्रहणीं छादयति, गौरवमापादयति, प्रवाहिकां वा जनयति ॥१९॥

विरेचन भी स्नेहन, स्वेदन, किये और वमन कराये रोगी को देना चाहिये। क्योंकि वमन न किये हुए पुरुष में भली प्रकार विरेचन होने पर भी नीचे को आया हुआ कफ ग्रहणी (अग्नि) को ढांप लेता है, इससे भारीपन उत्पन्न होता है। अथवा प्रवाहिका उत्पन्न हो जाती है।

वक्तव्य—एकाहोपरस्तत्तदतु सुक्वापच्छर्दनं पिबेत् । स्नेहात्प्रस्कन्दनं जन्तुः त्रिरात्रोपरतः पिबेत् ॥ वान्तं षडहसंसृष्टं पुनः संगेहितं क्रमात् । उष्णं लघु अ्यहं युक्तं षोडशोऽहि विरेचयेत् ॥

चरक ॥१९॥

अथातुरं श्वेो विरेचनं पाययिताऽस्मीति पूर्वोद्धं लघु भोजयेत्, फलाम्लमुष्णोदकं चैनमनुपाययेत् । अथापरेऽ हनि विगतश्लेष्मधातुमातुरोपक्रमणीयादवेक्ष्यातुरमथास्मै औषधमात्रां पातुं प्रयच्छेत् ॥२०॥

इस रोगी को कल विरेचन पिलाऊँगा, ऐसा मन में निश्चय करके, पूर्वोद्धं में लघु (हल्का) भोजन देवे। से पीछे अनार के फल का रस या गरम पानी इसको पिलाये। फिर

दूसरे दिन कफधातु के नष्ट हो जाने पर (कफ के घट जानेपर), आतुरोपक्रमणीय सु० सू० अ० ३५ वां से रोगी की परीक्षा करके, इसको विरेचन औषध की मात्रा पीने के लिये देवे ॥२०॥

तत्र मृदुः, क्रूरो मध्यम इति त्रिविधः कोष्ठो भवति । यत्र बहुपित्तो मृदुः, स दुग्धेनापि विरेच्यते, बहुवातश्लेष्मा क्रूरः, स दुरेविच्यः, समदोषो मध्यमः, स साधारण इति । तत्र मृदो मात्रा मृद्वी, तीक्ष्णा क्रूरे, मध्ये मध्या कर्तव्येति । पीतौषधश्च तन्धनाः शय्याभ्यांशे विरेच्यते ॥२१॥

कोष्ठ तीन प्रकार का है, मृदु, मध्यम और क्रूर। इनमें पित्त की अधिकतावाला कोष्ठ मृदु है, इसमें दूध से भी विरेचन हो जाता है। वायु और कफ की अधिकतावाला कोष्ठ क्रूर कोष्ठ है, इसमें कठिनाई से विरेचन होता है। समान दोषों-वाला कोष्ठ मध्यम कोष्ठ है, इसे साधारण कहते हैं। इनमें मृदु कोष्ठवाले के लिये मृदु मात्रा, क्रूर में तीक्ष्ण मात्रा, और मध्यम में मध्यम मात्रा बरतनी चाहिए। औषध को पीकर-औषध में मन को लगाकर, शय्या के समीप में ही विरेचन करता है। (जल्दी विरेचन होता है)।

वक्तव्य—द्वे पले ज्येष्ठमास्यातं मध्यमं तु पलं भवेत् । पला- धर्मपयुञ्जीत कनीयस्तु विरेचनम् ॥२१॥

विरेचनं पीतवासस्तु न वेगान् धारयेद्बुधुः । निवातशायी शोबाम्बु न सृशेन्न प्रवाहयेत् ॥२२॥ विरेचन पीने पर बुद्धिमान् मनुष्य मल के वेग को न रोके। वायुरहित स्थान पर रहे, ठण्डे पानी का स्पर्श न करे, और बल्लत प्रवाहन न करे ॥२२॥

यथा च वमने प्रसेकौषधकफपित्तानिलाः क्रमेण गच्छन्ति, एवं विरेचने मूत्रपुरोषपित्तौषधकफा इति ॥२३॥ जिस प्रकार वमन औषध में क्रम से-प्रसेक (थूक), औषध कफ, पित्त और वायु क्रम से निकलते हैं, इसी प्रकार विरेचन में मूत्र, मल, पित्त, औषध, कफ, क्रम से निकलते हैं ॥२३॥

भवन्ति चात्र— (स्याद्दुर्विरिक्ते कफपित्तकोपो दाहोऽस्चिगौरवमग्निनासादः ।) हृत्कृच्छ्रशुद्धिः परिदाहकण्डू- विष्णुमूत्रसङ्काश्च न सद्दिरिक्ते । मूच्छर्जगुदभ्रंशकफा तियोगाः शूलोदगमश्चातिविरिक्तलिङ्गम् ॥२४॥

कहा भी है—भली प्रकार विरेचन न होने पर—हृदय और उदर में मेलापन ( भारीपन ), जलन, कण्डू रहती है, वायु-मल, मूत्र का अवरोध रहता है। अति-

१ विस्तार के लिये चरक सिद्धिस्थान अ० २ में देखिये।