सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 573, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ ३१ ]
चिकित्सास्थानम्
५१७
मात्रा में विरेचन होने पर मूर्च्छा, गुदभ्रंश, कफ का अतिस्त्राव, शूल का होना होता है ॥२४॥
गतेषु दोषेषु कफान्वितेषु
नाभ्या लघुत्वे मनसश्च दुष्टौ ।
गतेऽनिते चाप्यनुलोमभावं
सम्यग्निर्विरिक्तं मनुजं व्यवस्थेत ॥२५॥
पित्तस्थानगत बात मल, कफ और पित्त के निकल जाने पर नामि प्रदेश पर हल्कापन, मन की प्रसन्नता, वायु के अनुलोम हो जाने पर (गुदा मार्ग से वायु लगने पर)-भली प्रकार विरेचन हुआ जाने ॥२५॥
“क्षोतो विशुद्धीन्द्रियसंप्रसादो, लघुत्वमूर्जोऽग्निरनामयत्वम् । प्राप्तिश्च पिट्बित्तकफानिलानां सम्भ्यगं विरिक्तस्य भवेत् क्रमेण । चरक० सि० अ० १।१७।
मन्दाग्निमक्षीणमसद्विरिक्तं
न पाययेताहनि तत्र पेयाम् ।
क्षीणं कृषात् सुविरेचितं च
तन्वी सुखोष्णां लघु पाययेत् ॥२६॥
अग्निमान्द्य होने पर, क्षीण हुये, भली प्रकार विरेचन न होने पर उस दिन रोगी को पेया न पिलाये । क्षीण, प्यास से पीड़ित, भली प्रकार विरेचन हुये रोगी को पतली, हल्की, थोड़ी गरम पेया को पिलाये ॥२६॥
बुद्धैः प्रसादं बलमिन्द्रियाणां
धातुस्थिरत्वं बलमग्निदीप्तिम् ।
चिराच्च पाकं वयसः करोति
विरेचनं सम्यगुपायमानम् ॥२७॥
भली प्रकार लिया हुआ विरेचन बुद्धि की निर्मलता, इन्द्रियों में बल, धातुओं में स्थिरता, बल, अग्नि की प्रदीप्ति, वय का देर में पकना (बुढ़ापा देर में आना), करता है ॥२७॥ यथोदकानामुदकेऽपनीते
चरस्थिराणां भवति प्रणाशः ।
पित्ते हृते त्वेवमुपद्रवाणां
पित्तात्मकानां भवति प्रणाशः ॥२८॥
जल में रहनेवाले मछली आदि चर, कमल आदि स्थावर, जिस प्रकार जल के हटा लेने पर नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार विरेचन से पित्त को निकाल देने पर पित्तजन्य उपद्रवों का नाश हो जाता है ॥२८॥
मन्दाग्न्यतित्स्नेहितबालवृद्धः
स्थूलाः क्षतक्षीणभयपतम्राः ।
श्रान्तस्तृषात्तोऽपरिजीर्णभक्तो
गर्भियधो गच्छति यस्य चासूक् ॥२९॥
नवप्रतिश्यायमदात्ययी च
नवज्वरी या च नवप्रसूता ।
शल्यादिताश्चाप्यविरेचनीयाः
स्नेहादिभिर्यं स्वनुपस्कृताश्च ॥३०॥
विरेचन के अयोग्य—मन्दाग्नि, अतिशयस्नेह दिया, बालक, बुढ़, स्थूल, क्षतक्षीण, भय से डरा, थका हुआ, प्यास से पीड़ित, अजीर्ण में भोजन किया, गर्भवती, अधोगामि रक्त-पित्तरोगी, नूतन प्रतिशयाय का, मदात्यय रोगी, नवज्वरी, नूतनप्रसववती, शल्य से पीड़ित और जिसका स्नेहन आदि नहीं किया, इनको विरेचन नहीं देना चाहिये ॥२९,३०॥
अत्यर्थपित्ताभिपरीतदेहान्
विरेचयेत्तानपि मन्दमन्दम् ।
विरेचनैर्यान्ति नरा विनाश—
मन्दाग्न्युत्कैरविरेचनीयाः ॥३१॥
अपवाद—इनमें भी यदि पित्त की बहुत अधिकता हो तो, इनको भी धीरे धीरे विरेचन देवे । अविरेचनीय पुरुष मूर्ख से दिये हुए विरेचनों से नष्ट हो जाते हैं ॥३१॥
विरेच्याम्बु—ज्वरगाराह्ययशोऽंबुदोदरप्रस्थिविद्रधि-पाण्डुरोगापस्मारहृद्द्वोगवातरक्तभगन्दूरच्छद्वियोनिरोगवि-सपेगुलमपकाशयरुग्निवन्धविस्मृचिकालसकमूत्राघातकुष्ठ-विस्फोटकप्रमेहात्तह्लोहोफुल्लिश्चक्षतक्षाराग्निदग्ध-दुष्टव्रणाक्षिपाककाचतिमिराभिष्यन्दशिरःकर्णक्षिनासा-स्युगुदमेद्वहाहोर्ध्वरक्तपित्तकृमिकोष्ठनः पित्तस्थानजेष्ब-न्येषु च विकारेष्वन्ये च पैलिकन्याधिपरीता इति ॥३२॥
विरेचन के योग्य पुरुष—ज्वर, गरविव, अर्वाच, अर्श, अंबुद, उदर, ग्रन्थि, विद्रधि, पाण्डुरोग, अपस्मार, हृद्द्वोग, वातरक्त, भगन्दूर, वमन, योनिरोग, विषर्प, गुलम, पक्वाशय के रोग, विवन्ध, विस्मृचिका, अलसक, मूत्राघात, कुष्ठ, विस्फोट, प्रमेह, आनाह, शोफ, वृद्धि, शस्त्रक्षत, क्षार, अग्निदग्ध, दुष्ट-व्रण, अक्षिपाक, काच-तिमिर-अभिष्यन्द, शिरोरोग, कर्णपाक, अक्षिरोग, नासारोग, मुखरोग, गुदरोग, मेदूपाक, दाह, ऊर्ध्वरक्तपित्त, कृमिकोष्ठ में तथा पित्तस्थानगत अन्य दोषजनित रोगों में एवं पित्तरोग से पीड़ित व्यक्तियों को विरेचन देना चाहिये ॥३२॥
सरत्वसौन्दर्यतैह्यौण्यविकाशिर्वैविरेचनम् ।
वमनं तु हरेर्दोषं प्रकृत्या गतमन्यथा ॥३३॥
विरेचन सर होने से (सरण शील होने से), सूक्ष्म होने से (सूक्ष्म क्षोतों में पहुँचने से), तीक्ष्ण होने से, उष्ण होने से, विकासी होने से (धातुओं को थायिल करने के कारण), तथा अपने स्वभाव से दोषों को अधोगार्ग से निकालता है । वमन-सर होने से, सूक्ष्म होने से, तीक्ष्ण होने से, विकासी होने से, इससे विपरीत अर्थात् मुखमार्ग से दोषों को निकालता है । यह स्वभाव से ही है ॥३३॥
वक्तव्य-प्रकृति का अर्थ स्वभाव है, यथा—“ऊर्ध्वानुलोमिकं यद्यततप्रभावप्रभातिम् (च० सू० अ० २६) । विरेचन और