सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुमुक्षुसंहिता
[ ७ ]
वमन में गुणों की समानता होने पर भी कार्य की भिन्नता का कारण स्वभाव (प्रभाव) ही है परन्तु चरक में-अग्निवायुत्वात्मकत्वात् ऊर्ध्वभागप्रभावात् औषधस्य ऊर्ध्व उद्भिद्यते । सलिल-प्रथिव्यात्मकत्वात् अधोभागप्रभावाच्च औषधस्य अधः प्रवर्त्तते । उभयतश्च उभयगुणत्वात् ।
चरक० कल्प० अ० १ ॥३३॥
यात्यधो दोषमादाय पञ्चमानं विरेचनम् ।
गुणोत्कर्षाद्ब्रह्मजलूर्ध्वमपक्वं वमनं पुनः ॥३४॥
पश्चात हुआ विरेचन दोष को लेकर नीचे (अधोमार्ग से) जाता है । वमन-विना पचे ही, अपने गुण की उत्कर्षता के कारण ऊपर को जाता है ॥३४॥
कहा भी है—
अपक्वं वमनं दोषं पञ्चमानं विरेचनम्, निर्हरेद् ॥ चरक कल्प० ॥३४॥
मृदुकोष्ठस्य दीप्तान्गनेरतितीर्णं विरेचनम् ।
न सम्यङ्निर्हरेदोषानतिवेगप्रधवितम् ॥३५॥
मृदु कोष्ठवाले व्यक्ति में, अग्नि के प्रदीप्त होने से, अतितीक्ष्ण विरेचन अतिशीघ्र बाहर निकल जाने के कारण दोषों को भली प्रकार नहीं निकालता ॥३५॥
पीतं यदौषधं प्रातमुक्ततपाकसमे क्षणे ।
पर्यन्तं गच्छति दोषांश्च निर्हरेत्तन् प्रशस्यते ॥३६॥
प्रातः पी हुई औषध आहार के पचने के समय तक (तीन-घंटा तक) जीण हो जाती है, और दोषों को निकालती है, वह प्रशस्त है ॥३६॥
दुर्बलस्य चलात् दोषानल्पानल्पान् पुनः पुनः ।
हरेत् प्रभूतानल्पान्स्तु शमयेत् प्रच्युतानपि ॥३७॥
दुर्बल व्यक्ति के प्रचुर एवं चलायमान हुए दोषों को थोड़ा थोड़ा करके बाहर निकाले । दोष यदि थोड़ी मात्रा में हो तो उनके चलायमान होने पर भी दुर्बल मनुष्य में वही इनको शान्त करे । (यथा-क्षय रोगी में—उसे विरेचन, वमन न देवे) ॥
हरेदोषांश्चलात् पक्वान् बलिन्तो दुर्बलस्य वा ।
चला ह्यपेक्षिता दोषाः क्लेशयेयुश्चिरं नरम् ॥३८॥
बलवान् या दुर्बल व्यक्ति के पके हुए एवं चलायमान दोषों को शरीर से बाहर करे । क्योंकि इन दोषों की उपेक्षा करने पर ये दोष रोगी को देर तक पीड़ित करते हैं ॥३८॥
मन्दाग्निं क्रूरकोष्ठं च सञ्चारलवणैर्घृतेः ।
सन्मुखिताग्निं स्निग्धं च स्विन्नं चैव विरेचयेत् ॥३९॥
मन्दाग्नि एवं क्रूरकोष्ठवाले व्यक्ति की जाठराग्नि को यव-क्षार, लवण मिश्रित घृतों से (घट्टपल्लवृत आदि) प्रदीप्त करके, स्नेहन और स्वेदन देकर विरेचन दे ॥३९॥
स्निग्धस्विन्नस्य भेषज्यैर्दोषस्तूक्लेशितो बलात् ।
निळीयते न मार्गेषु स्निग्धे भाण्ड इवोदकम् ॥४०॥
स्नेहन और स्वेदन से स्निग्ध एवं स्विन्न शरीरों में औषधि द्वारा बलपूर्वक उत्कलेशित हुआ दोष मार्गों में नहीं लीन होता, जिस प्रकार चिकने पात्र में पानी नहीं रहता ।
वक्तव्य—“स विच्छिन्नः परिप्लवः स्नेहभाविते काये स्नेहा-क्तभाजनस्थमिव शीघ्रमसज्जन्नपुप्रवणभावात् आमाशयमा-गत्य ॥४०॥४०॥
न चातिस्नेहपीतस्तु पिबेत् स्नेहविरेचनम् ।
दोषाः प्रचलिताः स्थानान्द्रव्यः हिलष्यन्ति वर्त्तसु ॥४१॥
अतिशय स्नेहपान होने पर स्निग्ध विरेचन नहीं पीना चाहिये । क्योंकि चलायमान हुये दोष फिर रास्तों में चिपक जाते हैं (स्नेह के कारण) ॥४१॥
विषाभिघातपिडकाशोकपाण्डुविसर्पिणः ।
नातिस्निग्धा विशोध्यः स्युस्तथा कुष्ठिप्रमेहिणः ॥४२॥
विषपान किये, चोट लगे, पिडका, शोक, और पाण्डुरोगी, विसर्परोगी, कुष्ठ एवं प्रमेहरोगी को बहुत स्निग्ध किये बिना (रुक्ष अवस्था में ही) विरेचन देना चाहिये ॥४२॥
विरुद्धं स्नेहसात्तयं तु भूयः संस्नेह शोधयेत् ।
तेन दोषा हृत्वास्तस्य भवन्ति बलवर्धनाः ॥४३॥
स्नेहसात्तय व्यक्ति को रुक्ष बनाकर, फिर से स्नेहन करके उसे विरेचन देना चाहिये । इस शोधन से निकाले हुए दोष इस रोगी के लिये बलवर्धक होते हैं । (दोषों के निकलने से यल अच्छी प्रकार बढ़ता है) ॥४३॥
प्रागपीतं नरं शोध्यं पाययेतौषधं मृदु ।
ततो विज्ञातकोष्ठस्य कार्यं संशोधनं पुनः ॥४४॥
जिस रोगी ने पहले कभी विरेचन औषध नहीं पी हो, उसे पहले मृदु औषध देवे । फिर कोष्ठ का ज्ञान हो जाने पर पुनः संशोधन करना चाहिये ॥४४॥
मुखं दृष्टफलं हृद्यमल्पमात्रं महागुणम् ।
व्यापस्तवल्पतायं चापि पिबेन्नपतिरौषधम् ॥४५॥
राजा या कोमल प्रकृति, मनुष्य मुख से पीने योग्य, जिसका फल देखा हुआ हो, मन के लिये प्रिय, थोड़ी मात्रा वाली, अधिक गुणकारी, आपत्ति होने में थोड़ी हानि करने वाली औषध पीये ॥४५॥
स्नेहस्वेदावनभ्यस्य यस्तु संशोधनं पिबेत् ।
दारु शुष्कमिवानामे देहस्तस्य विशीर्यते ॥४६॥
स्नेहन और स्वेदन किये बिना जो मनुष्य संशोधन पीता है, वह नष्ट हो जाता है, जिस प्रकार शुष्क लकड़ी स्नेहन एवं स्वेदन किये बिना मोड़ने में टूट जाती है ।
“शुष्काण्यपि हि काष्ठानि स्नेहस्वेदोपपादनैः ।
नमयन्ति यथा न्यायं किं पुनर्जीवितो नरात् ॥
चरक० सू० अ० १४॥४६॥