भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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नं १४ ]

चिकित्सास्थानम्

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स्नेहस्वेदप्रचलित्वा रसेः स्निग्धैरुद्गीरिताः ।

दोषाः कोष्ठगता जन्तोः सुखा हतुं विशोधनैः ॥४७॥

स्नेहन और स्वेदन से चलायमान हुये, कोष्ठ में पहुँचे हुये दोष स्निग्ध रसों से बाहर की ओर प्रेरित होकर वमन-विरेचन रूपी विशोधनों से सुखपूर्वक निकाले जा सकते हैं ॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने वमनविरेचनस्य- ध्योपद्रवचिकित्सितं नाम त्रयस्त्रिशोऽध्यायः ॥३३॥

चतुर्विंशतमोऽध्यायः

अथातो वमनविरेचनव्यापचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे वमन विरेचन व्यापत् चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।

वि० मन्तव्य—वमन एवं विरेचन का सेवन करने में जो कोई व्यापद्—आपद् या विपत्ति आ जाती है—खड़ी हो जाती है उनकी चिकित्सा इस अध्याय में कही गई है । ये व्यापद् चिकित्सक, रोगी, परिचारक अथवा औषध के दोष से होती हैं ॥१,२॥

वैद्यातुरनिमित्तं वमनं विरेचनं च पञ्चदशधा व्याप- द्यते । तत्र वमनस्याधोगतिरुर्ध्वं विरेचनस्येति पृथक् ; सामान्यमुभयोः—सावशेषौषधत्वं, जीर्णौषधत्वं, हीनदो- षापहतत्वं, वातशूलम्, अयोगो, अतियोगो, जीवादानम्, आध्मानं, परिकर्त्तिका, परिस्त्रावः, प्रवाहिका, हृदयोपसर- णं, विबन्ध, अङ्गप्रग्रह इति ॥३॥

वैद्य और रोगी के कारण (इसों में औषध और परिचारक का अन्तर्भाव करना) वमन और विरेचन की व्यापत्ति (हानि- नुकसान) प्रन्द्रह प्रकार की होती है । यथा—इनमें वमन द्रव्य का नीचे जाना और विरेचन द्रव्य का ऊपर को जाना, यह अलग अलग है । शेष दोनों में सामान्य हानियाँ हैं, यथा—औषध का बचे रहना, औषध का पच जाना, दोष का थोड़ा निकालना, वातशूल, अयोग, अतियोग, जीवादान, आध्मान, परिकर्त्तिका, परिस्त्राव, प्रवाहिका, हृदयोपसरण, विबन्ध, अंगप्रग्रह (अंग का पकड़ा जाना) ॥३॥

तत्र तुसुक्ष्मापीडितस्यातितीक्ष्णानेर्धुदुकोष्ठस्य चाव- तिष्ठमानं दुर्बलस्य वा गुणसामान्यभावाद्भमनमधो- गच्छति, तत्रोत्पितान्वाभिदोषोत्कलेश्च ; तमाशु स्नेह- यित्वा भूयस्तीक्ष्णतरीर्वाभयेत् ॥४॥

इनमें भूख से पीड़ित या अतितीक्ष्ण अग्निवाले मृदुकोष्ठ व्यक्ति में रुका हुआ (जीर्ण हुआ) वमन अथवा भली प्रकार से वमन न होने पर वमन औषध विरेचन के समान सरल आदि गुणवाली होने के कारण नीचे अधो मार्ग में जाती है (विरेचन करती है) । इससे इच्छित वस्तु की प्राप्ति नहीं होती,

दोष का उत्कलेश होता है । इस अवस्था में रोगी को शीघ्र स्नेहन करके फिर पहले से अधिक तीक्ष्ण वामक औषध पिला कर वमन कराये ॥४॥

अपरिशुद्धामाशयस्योत्कलश्लेष्मणः सशेषानशय वाऽहृद्यमतिप्रभूतं वा विरेचनं पीतमूर्ध्वं गच्छति तत्रोत्पि- तान्वाभिदोषोत्कलेश्च, तत्राशुद्धामाशयमुत्खण्डलेष्मा- णमाशु वामयित्वा भूयस्तीक्ष्णतरीर्वाभयेत्, आमान्ये स्वामवेत् संविधानम्, अहृद्योऽतिप्रभूते च हृद्यं प्रमाणयुक्तं च, अत ऊर्ध्वमुत्पित्त्यौषधे न तृतीयं पाययेत्, ततस्तेन मधुघृतफाणितयुक्तैर्हैविरेचयेत् ॥५॥

जिसका आमाशय शुद्ध (वमन से) नहीं हुआ, उसमें, अथवा बहुत बड़े हुए कफवाले में, अब का पाचन पूर्ण न होने से, मन को अप्रिय या मात्रा में बहुत अधिक पिया हुआ विरेचन ऊपर की ओर आता है । इससे इच्छित फल नहीं होता, दोष का प्रकोप होता है । इसमें अशुद्ध आमाशयवाले एवं प्रचुर कफवाले रोगी को तुरन्त वमन करा के फिर अति- शय तीक्ष्ण विरेचन देवे । आम का योग होने पर आम की मति उपचार (लंघन-पाचन) करे । मन के लिये अप्रिय मात्रा में बहुत अधिक औषध की अवस्था में मन के लिये प्रिय और मात्रा में औषध देवे । इतने पर भी यदि औषध ऊपर की ओर जाये तो तीसरी बार विरेचन औषध न देवे । इस समय रोगी को मधु, घी, राब से युक्त लैहों से विरेचन देवे ।

वि० मन्तव्य—उक्त दशाओं में अथच उक्त कारणों में से विरेचन औषध से विरेचन न होकर वमन हो जाता है परन्तु यदि आमाशय में कफ रहने से वमन हो गया हो तो पुनः विरेचन औषध से विरेचन हो जाता है परन्तु यदि तथापि वमन हो ही जाय तो फिर विरेचन औषध न देकर केवल मधुघृत एवं फाणित युक्त औषध (न्यवनप्राश आदि) से विरेचन करे । अनेकों की ऐसी प्रकृति होती है जिससे- विरेचन के औषध से वमन हो जाया करता है । यह भी एक व्यापद् ही है ॥५॥

दोषविप्रथितमल्पमौषधमवस्थितमूर्ध्वभागिकमधो- भागिकं वा न संसयति दोषान्, तत्र वृष्णा पाश्चशूलं छर्दिर्मूर्च्छां पर्वभेदो हल्लासोऽरतिरूद्गाराविशुद्धिश्च भवति, तमुष्णाभिरद्गिराशु वामयेदूर्ध्वभागिके, अधोभा- गिकेऽपि च सावशेषौषधमतिप्रधावितदोषमतिबलमसम्य- ग्विरिक्तलक्षणमप्येवं वामयेत् ॥६॥

दोष से मिश्रित, मात्रा में थोड़ी औषध, पच जाने पर औषध दोषों को वमन या विरेचन रूप में बाहर नहीं करती । इससे प्यास, पाश्चशूल, वमन, मूर्च्छा, पर्वभेद, जी मचलाना, बैचैनी, अथवा ढकार की अशुद्धि होती है । इसमें वमन

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