सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३४ ]
औषध की अवस्था में गरल पानी से वमन कराये। विरेचन औषध में भी—औषध के शेष रह जाने पर, दोष के अतिशय चलायमान होने पर अतिशय बलवान् पुरुष को तथा भली प्रकार विरेचन न हुए लक्षण देखकर वमन कराये ॥६॥
ऋककोष्ट्यातितीक्ष्णानेतरूपमौषधमल्पगुणं वा भक्तवत् पाकमुपैति, तत्र समुदीर्णा दोषा यथाकालमतिहीन्यामाणा न्याधिबिभ्रमं बलविभ्रमं चापादयन्ति, तमनत्पममन्दमौषधं च पाययेत् ॥७॥
कूर कोष्ठवाले पुरुष में या अतितीक्ष्ण अग्निवाले पुरुष में—थोड़ी औषध या थोड़े गुणवाली औषध भोजन की भाँति पच जाती है। इसमें उदीर्ण हुए दोष समय पर बाहर न निकालने पर रोग का विभ्रम (कोष्ठादि में क्षोभ), बल विभ्रम (सन्धि-विश्लेष आदि) को उत्पन्न कर देते हैं। इस रोगी को प्रचुर मात्रा में तीक्ष्ण औषध पिलाये।
वि० मन्तव्य—यह जीर्णौषधत्व नामक व्यापद है ॥७॥
अस्तिग्धस्विन्नैनाल्पगुणं वा भेषजमुपयुक्तमल्पान दोषान् हन्ति, तत्र वमने दोषशेषे गौरवमुत्कलं हृदया-विशुद्धि न्याधिषुद्धिं च करोति, तत्र न यथायोगं पाययित्वा वामयेदृहृदतरं; विरेचने तु गुदपरिकर्तनमाध्मानं शिरो-गौरवमनिःसरणं वा वायोर्न्याधिषुद्धिं च करोति, तमुप-पाद्य भूयः स्नेहस्वेदाभ्यां विरेचयेदृहृदतरं, हृदं बहुप्रचलि-तदोषं वा तृतीये दिवसेऽल्पगुणं चेति ॥८॥
स्नेहन, स्वेदन दिये बिना अथवा थोड़े गुणवाली दी हुई औषध थोड़े दोषों को नष्ट करती है। इसमें वमन की अवस्था में दोष के रह जाने से भारीपन, जी मचलाना, हृदय की अविशुद्धि और रोग की वृद्धि होती है। इसमें रोगी को यथा-योग्य औषध पिलाकर पहले से अधिक जोर से वमन कराये। विरेचन में गुदा में काटने की सी वेदना, आध्मान, शिर में भारीपन, वायु का बाहर न आना, रोग का बढ़ना होता है। इसमें रोगी को पुनः स्नेह और स्वेद देकर पहले से अधिक तीक्ष्ण विरेचन देवे। हृद शरीरवाले एवं बहुत दोषवाले व्यक्ति में दोषों के चलायमान होने पर तीसरे दिन (विरेचन या वमन देने के तीसरे दिन) थोड़े गुणवाली औषध देवे।
वि० मन्तव्य—यह हीनदोषापहृतत्व नामक व्यापद है ॥८॥
अस्तिग्धस्विन्नैन रूक्षमौषधमुपयुक्तमब्रह्मचारिणा वा वायुं कोपयति, तत्र वायुः प्रकृपितः पार्श्वपृष्ठश्रोणिमन्या-मर्मशूलं मूर्च्छा भ्रमं मर्दं संज्ञानाशं च करोति, तं वातशूल-मित्याचक्षते, तमभ्यज्य धान्यस्वेदेन स्वेदयित्वा यष्टीम-धुकविपकेन तैलैनानुवासयेत् ॥९॥
बिना स्नेहन स्वेदन किये, या रूक्ष औषध के सेवन से अथवा ब्रह्मचर्यव्रत पालन न करने से वायु कृपित हो जाती
है। इसमें कृपित वायु पार्श्व, श्रोणि, मन्या, मर्म (हृदय) में शूल, मूर्च्छा, भ्रम, मर्द, संज्ञानाश कर देती है। इस अवस्था को वातशूल कहते हैं। इसमें स्नेह का अभ्यंग करके उबुद आदि धान्यों से स्वेद देकर मुलेहटी के क्वाथ से खिद किये तैल से अनुवासन देवे।
वि० मन्तव्य—यह वातशूल नामक व्यापद है ॥९॥
स्नेहस्वेदाभ्यामविभाविताशरीरेणाल्पमौषधमल्पगुणं वा पीतमूर्ध्वमधो वा नाभ्येति दोषाश्चोक्तेक्ष्य तैः सह बलक्षयमापादयति, तत्राध्मानं हृदयग्रहस्तृष्णा मूर्च्छां दाहश्च भवति, तमयोगमित्याचक्षते; तमाशु वामयेन्म-दनफललवणाश्चुभिर्विरेचयेत्तीक्ष्णतैः कृपयैश्च । दुर्ब-न्तस्य तु समुक्लिष्टा दोषा न्याप्य शरीरं कण्डुश्चयु-कृष्णपिडकाञ्चराङ्गमर्दनिस्तोदनानि कुर्वन्ति, ततस्तान-शेषान्महौपधेनापहरेत् । अस्तिग्धस्विन्नस्य दुर्विरिक्तस्या-धोनाभेः स्तब्धपूणीदरता शूलं वातपुरीषसंगः कण्डुमण्ड-लप्रादुर्भाषो वा भवति, तमास्थाप्य पुनः संस्नेह विरेच-येत्तीक्ष्णैः । नातिप्रवर्तमाने तिष्ठति वा दुष्टसंशोधने तत्सन्तेजनार्मुष्णोदकं पाययेत् । पाणितापैश्च पार्श्व-दरमुपस्वेदयेत्, ततः प्रवर्तन्ते दोषाः । अनुप्रवृत्ते चाल्प-दोषे जीर्णौषधं बहुदोषमहःशेषं बलं चावेक्ष्य भूयो मात्रां विदध्यात् । अप्रवृत्तदोषं दशरात्रादूर्ध्वमुपसंस्कृतदेहं स्नेहस्वेदाभ्यां भूयः शोधयेत् । दुर्विरेच्यमास्थाप्य पुनः संस्नेह विरेचयेत् । ह्यौभयलोभैर्वैगाघातजीलाः प्रायशः क्षियो राजसमीपस्था वणिजः श्रोत्रियाश्च भवन्ति, तस्मादेते दुर्विरेच्याः, बहुवातत्वात्; अत एव तानति-स्तिग्धान् स्वेदापपन्नान् शोधयेत् ॥१०॥
स्नेहन और स्वेदन किये हुये शरीरों में थोड़ी मात्रा में या थोड़े गुणवाली पी हुई औषध ऊपर या नीचे नहीं जाती (वमन या विरेचन नहीं करती)। अपितु दोषों को उत्कलेशित करके उनके साथ में बलक्षय उत्पन्न कर देती है। इससे आध्मान, हृदयग्रह, तृष्णा, मूर्च्छा और दाह होता है। इस अवस्था को अयोग कहते हैं। इस रोगी को तुरन्त मैनफल और सैन्धव के क्वाथ से वमन कराये और अतितीक्ष्ण क्वाथों से विरेचन देवे। भली प्रकार वमन न होने पर अतिशय उत्कलेशित हुए दोष शरीर में फैलकर कण्डु, शोथ, कुष्ठ, पिडका, ज्वर, अंगमर्द, निस्तोद उत्पन्न करते हैं। इन सब दोषों को सम्पूर्ण रूप में औषध की बड़ी मात्रा से निकाले। स्नेहन को सम्पूर्ण रूप में औषध की बड़ी मात्रा से निकाले। स्नेहन स्वेदन किये बिना विरेचन लेने पर या भली प्रकार विरेचन न होने पर नाभि के नीचे-उदर में जड़ता और भारीपन, शूल, वायु, मल का अवरोध, कण्डु, चक्रांतों का उत्पन्न होना होता है। इसको आस्थापन (निरुद्ध) देकर, फिर से स्नेह करके