सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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स्नेह करके तीक्ष्ण विरेचन देवे । विरेचन के अन्दर रुक जाने पर या ठीक प्रकार से प्रवृत्त न होने पर, संशोधन के वृषित होने पर ( क्रियाशील न होने पर ) इसके तेज को बढ़ाने के लिये गरम पानी पिलाये । हाथों को आग पर गरम करके पार्श्व और उदर पर सेक करे । इससे दोष प्रवृत्त होते हैं । दोष के पीछे से प्रवृत्त होने पर, या थोड़ी मात्रा में प्रवृत्त होने पर, औषध के जीर्ण होने पर, दोष की प्रवृत्तता को देखकर यदि दिन शेष हो तो, रोगी बलवान् हो—तो इसको फिर औषध की मात्रा पिलाये । दोष के प्रवृत्त न होने पर दस दिन के पीछे स्नेहन और स्वेदन से शरीर को संस्कृत बनाकर फिर संशोधन देवे । जिसे कठिनाई से विरेचन होता हो, उसे, निरुद्ध देकर—फिर स्नेहन करके विरेचन देवे । भय, लज्जा, लोभ से, उपस्थित वेगों को रोकने के स्वभाववाली प्रायः स्त्रियाँ, राजसेवक, वणिक् और श्रोत्रिय होते हैं । इसलिये इनको कठिनाई से विरेचन होता है । क्योंकि इनमें वायु की अधिकता रहती है । इसलिये इनको अतिशय स्नेहन देकर—स्वेद कराके फिर शोधन देवे ।
“सदातुरा, श्रोत्रिय राजसेवकाः तथैव वेश्या सह पण्य-जीविभिः ॥ चरक सि० अ० १२-२५ ।
वि० मन्तव्य—यह “अयोग” ( हीनयोग ) नामक व्यापद है ॥१०॥
स्निग्धस्विन्नस्यातिमात्रमतिमृदुकोष्ठस्य वाडितोद्वग-मधिकं वा दत्तमौषधमतियोगं कुर्यात् । तत्र वमनातियोगे पितातिप्रवृत्तिर्बलविसंशो वातकोपश्च बलवान् भवति, तं घृतेनाभ्यञ्ज्यावगाह्य औतास्त्रप्सु शर्करामधुमिश्रेलैहैरुपच-रेद्यथास्वं, विरेचनातियोगे कफस्यातिप्रवृत्तिरुत्तरकालं च सरक्तस्य, तत्रापि बलविसंशो वातकोपश्च बलवान् भवति, तमतिशीताम्बुभिः परिषिच्यवागाह्य वा शीतेस्तण्डुलाम्बु-भिर्मधुमिश्रेलद्वयेत् , पिच्छावस्ति चारम्भे दद्यात् , क्षीर-सर्पिषा चैनमनुवासयेत् , प्रियङ्गवादि चारम्भे तण्डुला-म्बुना पातुं प्रयच्छेत् , क्षीररसयोश्चान्यतरेण भोजयेत् ॥
अतिमात्रा में स्नेहन और स्वेदन करने पर, मात्रा में अधिक औषध पीने से, अतिमृदु कोष्ठ व्यक्ति में अतितीक्ष्ण या अधिक मात्रा में दी हुई औषध अतियोग को उत्पन्न कर देती है । इसमें वमन का अतियोग होने पर पित्त की अति-प्रवृत्ति, बल की हानि, वायु का अतिशय कोप होता है । इसमें घी से अभ्यंग और शीतल जल से स्नान करके दोषों के अनुसार शर्करा मधुमिश्रित लेह चाटने को देवे । विरेचन के अतियोग में कफ की अतिशय प्रवृत्ति, और पीछे से रक्त मिश्रित मल या कफ आता है । इसमें भी बल की हानि और वायु का अतिशय प्रकोप होता है । इसमें रोगी को अति-शीतल जल में गोता लगवाकर या स्नान कराके, चावलों के
अतिशीतल धोवन में मधु मिलाकर वमन कराये । पिच्छावस्ति देवे । दूध से निकाले घी से अनुवासन दे । प्रियंगु आदि को कर्पमात्रा में चावल के पानी से पीने को देवे । दूध या मांसरस किसी एक से भोजन कराये ।
वि० मन्तव्य—यह अतियोग ( वमन विरेचन अधिक होना ) नामक व्यापद है ॥११॥
तस्मिन्नेव वमनातियोगे प्रवृद्धे शोणितं शीवति छुर्द-यति वा, तत्र जिह्वानिःसरणमपसरणमण्णोव्यवृत्तिर्हनु-संहननं तृष्णा हिक्का ज्वरो वैसंज्ञयमित्युपद्रवा भवन्ति; तमजास्त्रक् चन्दनोशीराञ्जनलाजचूर्णैः सशर्करोदकैर्मन्थं पाययेत् , फलरसेवां सघृतक्षौद्रशर्करैः शुक्लाभिर्वा वटा-दीनां पेयां सिद्धां सखौद्रां वर्चोप्राहिभिर्वा, पयसा जाङ्कल-रसेन वा भोजयेत् , अतिसुतशोणितविधानोपचरेत् ; जिह्वामतिसर्पितां कटुकलवणचूर्णप्रघृष्टां तिलद्राक्षाप्रलिप्तां वाऽन्तः पीडयेत् , अन्तःप्रविष्टायामस्मलमन्ये तस्य पुरस्तात् स्वादयेयुः, न्यावृते चाक्षिणी घृताभ्यक्ते पीडयेत् , हनु-संहनने वातरलेऽमहरं नर्यं स्वेदांश्च विदध्यात् , तृष्णा दिषु च यथास्वं प्रतिकूर्वति, विसंज्ञं वेणुवोणागीतस्वनं श्रावयेत् ॥१२॥
इसी अतियोग में वमन का अतियोग बहुत बढ़ जाने पर थूक में या वमन में रक्त आता है । इसमें जिह्वा आगे निकल आती है, या पीछे मुड़ जाती है, आँखें पलट जाती हैं, जवाड़ी बन्द हो जाती है, प्यास, हिक्का, ज्वर, विसंज्ञा ये उपद्रव होते हैं । इस रोगी को बकरी का रक्त—चन्दन, खस, सुरमा, लाजाओं का चूर्ण इनसे शर्करा के शर्बत में मन्थ ( घोल ) बनाकर पिलाये । अनार बिजोरे आदि फलों के रस में घी, मधु, शर्करा मिलाकर बरगद आदि इक्षों के कोपलों से बनाई पेया को पिलाये । अथवा मल को बाँधनेवाले ( कुटज, बिल्ब आदि ) द्रव्यों को दूध या जांगल मांस रस से अथवा मधु से देवे । अतिशय निकले रक्त की चिकित्सा विधि बरते । जीभ बहुत बाहर निकल आई हो तो इस पर मरिच आदि कटु द्रव्य, लवण का चूर्ण या तिल-द्राक्षा का लेप करके अन्दर को दबाये । अन्दर घुस जाने पर दूसरे मनुष्य इसके सामने खट्टे फलों को खायें । आँख के पलट जाने पर आँखों पर घी का अभ्यङ्ग करके दबाये । जवाड़ी बन्द हो जाने पर वात-कफ नासक नर्य और स्वेद देवे । तृष्णा आदि में उनकी अपनी चिकित्सा करे । विसंज्ञा ( संज्ञाहीन ) होने पर वीणा, वेणु ( बंसरी ) या गीत की ध्वनि सुनावे ॥१३॥
विरेचनातियोगे च सचन्द्रकं सलिलमधः स्रवति, ततो मांसधावनप्रकाशमुत्तरकालं जीवशोणितं च, ततो गुदनिःसरणं वेपथुर्वमनातियोगोपद्रवाश्चास्य भवन्ति, तमपि निःस्रतशोणितविधानोपचरेत् , निःसर्पितगुदस्य