सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ अ० ३१ ]
चिकित्सास्थानम्
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वक्तव्य—“अहोरात्रमहः कृत्स्नमर्द्धाहं च प्रतीयते । प्रधाना मध्यमा हृत्वा स्नेहमात्रा जरां प्रति ॥”
वि० मन्तव्य—बुद्धिमान् चिकित्सक-रोगी की जठराग्निका विचार करके स्नेह की प्रथम मात्रा (१ प्रहर में पचनेवाली) पिलावे क्योंकि अत्यधिक मात्रा में पीया गया स्नेह प्राण संकट उत्पन्न कर सकता है । मिथ्या आहार-विहार के कारण अथवा अधिक मात्रा में होने के कारण जिसका स्नेह नहीं पचता अथवा उदर में विषम्भ उत्पन्न करके विलम्ब से पचता है उसको उष्ण जल पिलाकर वमन करा देवे । इसके पश्चात् जब उसका उदर लघु-हल्का हो जाय तब पुनः उचित मात्रा में स्नेह पिलावे । यदि स्नेह के पचने या न पचने का सन्देह हो तो उष्ण जल पीना चाहिये । इस प्रकार उष्ण जल पीने से उदगार शुद्ध हो जाता है और भोजन में रुचि हो जाती है । स्नेह पचते समय-प्रायः तृष्णा, दाह, भ्रम, शिथिलता, अरति तथा ग्लानि हो सकते हैं जो पच जाने पर स्वतः शान्त हो जाते हैं अथवा साधारण उचित उपचार से शान्त किये जा सकते हैं ॥२५-३३॥
परिपिच्यार्द्धिहृष्णाभिर्जीर्णस्नेहं ततो नरम् । यवागं पाययेच्छोष्णां कामं किलन्नाल्पतण्डुलाम् ॥३४॥ देयो यूपरसो वाऽपि सुगन्धी स्नेहवजितो । कृतो वाऽत्यल्पसर्पिष्को विलेपी वा विधीयते ॥३५॥ स्नेह के जीर्ण हो जाने पर मनुष्य को गरम पानी से स्नान कराये । थोड़ी सी चावल-कणियों को खूब गलाकर बनाई हुई यवागू को गरम एवं यथेच्छ पिलाये । सुगन्धी एवं स्नेह से रहित यूप एवं मांस रस देवे । या इनमें थोड़ा घी डालकर देवे । अथवा विलेपी देवे ॥३४, ३५॥
पिवेत्ययहं चतुरहं पश्चाहं षडहं तथा । सप्तरात्रात् परं स्नेहः सात्स्यीभवति सेवितः ॥३६॥ स्नेह को तीन दिन, चार दिन, पाँच दिन, छे दिन, अथवा सात दिन पीये । सात दिन के पीछे स्नेह साम्य हो जाता है । ( फिर आगे लाभ नहीं करता । आत्मा शब्द-शरीर के लिये है ) ।
“स्नेहन्स्य प्रकर्षो तु सतरात्रत्रिरात्रको ॥” चरक० सू० १३-५१ ॥३६॥
सुकुमारं कृशं वृद्धं शिशुं स्नेहद्विषं तथा । तृष्णार्तमुष्णकाले च सह भक्तेन पाययेत् ॥३७॥ नाशुक् प्रकृति, कृश, वृद्ध, बालक, स्नेह से द्रव करनेवाले, प्यास से पीड़ित को श्रोभकाल में स्नेह को भोजन के साथ मिलाकर देवे ।
स्नेहद्विषः स्नेहन्तिया मृदुकोष्ठाश्च ये नराः । कलेशासहा मद्यन्तियास्तेषामिषा विचारणा ॥
चरक० सू० अ० १३-८२ ॥३७॥
पिप्पल्यो लवणं स्नेहाश्वत्वारो दक्षिमतुक्तः ।
पीतमैकध्यमेतद्वि सद्यःस्नेहनमुच्यते ॥३८॥ श्रृष्टा मांसरसे स्निग्धा यवागूः सूपकल्पिता । प्रक्षुद्रा पीयमाना तु सद्यः स्नेहनमुच्यते ॥३९॥ सर्पिष्मती पयःसिद्धा यवागूः स्वरूपतण्डुला । मुखोष्णा सेव्यमाना तु सद्यःस्नेहनमुच्यते ॥४०॥ पिप्पल्यो लवणं सर्पिस्तिलपिण्डं बराहजा । वसा च पीतमैकध्वं सद्यः स्नेहनमुच्यते ॥४१॥ शर्कराचूर्णसंस्मृष्टे दोहनरथे घृते तु गाम् । दुग्ध्वा क्षीरं पिवेद्वक्षः सद्यः स्नेहनमुच्यते ॥४२॥ यवकोलकुलस्थानां क्वाथो मागधिकान्वितः । पयो दधि सुरा चेति घृतसम्यग्धर्म भवेत् ॥४३॥ सिद्धमेतैर्घृतं पीतं सद्यःस्नेहनमुत्तमम् ।
राज्ञे राजसमेभ्यो वा देयमेतद्घृतोत्तमम् ॥४४॥ पिप्पली, लवण, (सैन्धव) घी-तैल-वसा मज्जा चारों स्नेह,
दधि, मस्तु, इनको एक साथ मिलाकर पीने पर तुरन्त स्नेहन होता है । मांस रस में भूनकर मली प्रकार बनाई स्निग्ध यवागू को थोड़ी सी राव मिलाकर पीने से तुरन्त स्नेहन होता है । थोड़े से चावलों में दूध में बनाई, प्रचुर घी मिश्रित यवागू को गरम गरम सेवन करने पर स्नेहन होता है । पिप्पली, सैन्धानमक, घी, तिल की पिटटी, सुअर की वसा इनको एक साथ मिलाकर पीने पर तुरन्त स्नेहन होता है । दोहनी ( जिसमें दूध दोहते हैं ) में शर्करा, घी रखकर इसमें दूध निकाले । इस दूध को पीने से लूख मनुष्य का तुरन्त स्नेहन होता है । जौ, बेर, कुलस्थी इनका क्वाथ, इसमें पिप्पली का प्रक्षेप मिलाकर, दूध, दही, सुरा और आठवाँ घी इनके साथ घृत को सिद्ध करे । यह घृत पीने पर तुरन्त स्नेहन करता है । राजाओं को या राजा के समान वैभवशालियों को यह घृत देना चाहिये ।
वक्तव्य—“तेलं सुराया मण्डेन वसां मज्जानमेव वा । पिवेत्सफाणितं क्षीरं नरः स्निह्यति वातिकः ॥१॥ धारोष्णं स्नेहस्युक्तं पीत्वा सद्यर्करं पयः । नरः स्निह्यति पीत्वा वा सर्दं दन्तः सफाणितम् ॥२॥ च० सू० अ० १३-८२ ॥३८-४४॥
बळहोनेषु वृद्धेषु मृद्वांगन्खीहतात्मसु ।
अल्पदोषेषु योज्याः स्युयं योगाः सम्यगीरिताः ॥४५॥
निर्बलो मे, वृद्धो मे, मृदु अग्निवालो मे, स्त्री मे क्षीण हृण् पुष्करो मे, थोड़े दोषवालों में, ऊपर कहे हुए योग मली प्रकार बरतने चाहिये ॥४५॥
विवजयेत् स्नेहपानमजीर्णां तरुणवरी ।
दुर्बल्लोडरोचकी स्थूलो मूच्छ्रौर्तां मदपीडितः ॥४६॥
छर्द्यदितः पिपासातः श्रान्तः पानकलमान्वितः ।
दत्तबतिर्विरिक्तश्च वान्तो यश्चापि मानवः ॥४७॥
अकाले दुर्दिने चैव न च स्नेहं पिवेन्नरः ।
अकाले च प्रसूता स्त्री स्नेहपानं विवजयेत् ॥४८॥