सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चाहिये । वायुरोग मे नमक के साथ, कंफ की अधिकता होने |
पर बिकटु ओर यवक्षार से मिलाकर देना चाये । वक्तम्य-““न् सर्पिः केवलं पित्ते पेयं सामे विशेषतः|
हयनुरजेदेहं हत्वा संज्ञां च मारयेत् |” इसलिये गयी का अश्-
'पित्तहरद्रन्यखाधितमेव केवलम् यह ठीक हे ।१६।। दोषाणामल्पभूयस्त्वं संसगे' समवेदंय च । युल्ज्यात्त्रिषष्टिधामिन्नः समासन्यासतो रसेः ॥२०॥
दोषों की न्यूनता या अधिकता का, उनके संसगं का
विचार करके, समास व्यास स्पसे तिरसठ प्रकारके रसां
सेघीकाया स्नेह का उपयोग करना चािये। वक्तव्य--“रसेश्वोपदिताः स्नेहःखमासुव्यासयोगिभिः। षड्-
भिखिषष्टिधा खख्यां प्राप्नोत्येकश्च केवलः || एवमेषा चतुःषष्टिः
स्नेहानां प्रविचारणा । ओकर्तव्याधिपुख्षान्प्रयोज्या जानता
भवेत् || चरक सू० अ०° १२-२७-२८ ॥२०॥
स्नेदसात्म्यः क्ठेशसहः काङे नाल्युष्णशीतठे ।
अच्छमेव पिवेत् रनेदमच्छपानं हि पूजितम् ॥२१॥
स्नेह जिनको सासम्य है, क्टेश को सहने के आदी न
बहुत उष्ण एवं न बहुत शीतल काल के होने पर केवल स्नेह (असंस्ङृत) को पीये । क्योकि केवर स्नेहपान उत्तम ईै।
` “अच्छपेयस्तु यः स्नेहो न तामाहूर्विचारणाम् | स्नेहस्य ख भिषग्हष्ः कल्पः प्राथमकल्पिकः ||“
चरकं अ० संर १३-२६॥ २२१ शीतकाङे दिवा स्नहसुष्णकाटे पिवेन्निलि। वातपित्ताधिको रात्रौ वातर्टेष्माधिको दिवा ॥२२॥ शीतकाल मे दिन के समय स्नेह को पीये | उष्णकाल मे रात्रि में स्नेह को पीये । वातपित्त की अधिकता मेरि में स्नेह पान करे । वात-कफ की अधिकता मे दिन मे स्नेह पानकरे। ~
वक्तव्य-- वातपित्ताधिको रात्रादुष्णे चापि पिवेन्नरः।
श्टेष्माधिको दिवा शीते पिबेच्चामल्मास्करे ॥ ^त्वरमाणे त॒ शीतेऽपि दिवा तैकं प्रयोजयेत् । उष्णेऽपि रात्रौ सरपिस्त॒ दोषा- दीन् वीय चान्यथा ॥” च° सू° अ० १३-१६।२२॥ वातपित्ताधिकस्योष्णे दण्मूरव्छोन्मादकारकः। शीते बातकफातस्य गौरवारचि शूलकरत् ॥२२॥ वातपित्त का अधिकता मेंउष्ण च्रूतुमें दिन मे पिया स्नेह प्याख, मृच्छ, उन्माद करता ३। शीत छतु मे बात-कपः से पीडति मनुष्य द्वारा रात में पिया स्नेह गोरव, अरुचि ओर श्र करता इ ।
ब्तव्य-- “अव्युष्णे बा दिवा पीतो वातपित्ताधिकेन वा । मृच्छ पिपासायुन्मादं काभलां बा समीरयेत् ॥ शीति रातौ पिबे स्नेहं नरः रलम्माधिकोऽपि बा | आनाहमदवि श्रं पाण्डुता षा समृच्छति ॥ |
सुश्रतसं हिता
| = प ० ९२२०१२३ स्नेह पीतस्य चेत्तृष्णा पिवेदुष्णोदकं नरः| एवं चानुपञाम्यन््यां स्तेहसुष्णाम्बुना वमेत् ॥२४। दिद्याच्छीतैः शिरः शीतं तोयं चाप्यवगाहयेत्।
पीये । यदि इससे भी प्यासन सुभे तो गरम षा नी पीकर | स्नेह का वमन कर देवे । शीतरु चन्दन आदि" का श्षिर पर् | ठेप करे, शीतल पानी मं गोता लगाये । वक्तम्य--स जग्ध्वा स्नेहमात्रां तामोजः प्रक्षारयन् बली । ` स्नेहाऽग्निरुत्तमां तृष्णां सोपसर्ग दीरयेत् ।
ं . परक सूर अ० १३-७० ॥२५। या माध्रा परिजीयत चतुभौगगतेऽहनि ॥२५॥ सा मात्रा दापयस्यग्निमस्पदोषे च पूजिता । या मात्रा परिजीय त यथाऽधेदिवसे गते ।॥२६॥ सा इष्या इदणीया च मध्यदोषे च पूजिता । या मान्ना परिजीयत चतुभागावशेषिते ॥२७॥ स्नेहनीया च सा मात्रा बहुदोषे च पूजिता । या मात्रा परिजीय त्त् तथा परिणतेऽहनि ॥२८॥ ग्डानिमूच्छामदान् दिस्वा सा मात्रा पूजिता भवेत्। अहोरात्रादसंदुष्टा या मात्रा परिजोयंति ॥२९॥ सा तु ुष्ठविषोन्मादम्रहापस्मारनाशिनी । यथागिनि प्रथमां मात्रां पाययेत्त॒ विचक्षणः ॥३०॥
पीतो ह्यतिबहुः स्नेहो जनयेत् प्राणसंशयम् । भिभ्या चाराद्रहुस्वाद्वा यस्य स्नेहो न जीयेति ॥३१॥
विष्टभ्य चापि जीयत्तं वारिणोष्णेन वामयेत्। ` ततः स्नेहं पुनदेयाज्ञघुकोष्ठाय देहिन ।
जीणाजीणविशंकायां स्नेहस्योष्णोदकं पिबेत् ॥२२॥ तेनोद्गारो भवेच्छुद्धो भक्तं प्रति रुचिस्तथा । स्युः पच्यमाने वृडदाह ्रमसाद।रतिक्छमाः ॥१३॥
दिन के एक चोथाई भाग (एक प्रहर) में स्नेदकीजो
मात्रा जीणं हो जाती है, वह मात्रा अग्नि को बद़ाती है, ओर योड़े दोषवाल्ते मनुष्य के ल्ि उत्तम है । स्नेह कौ जो मातरा आवे दिन (दो प्रहर) मे जीण होती दै, वह मात्रा इष्य है
बंहण करनेवाढी ओर मध्य दोष मे प्रशस्त दै । स्नेह की ज माघा तीन प्रहर में जीणं होती दै वह मात्रा स्नेहन करने >
एवं बहुत दोषवाङे पुरुष के ल्यि उत्तम दै । जो मात्रा ठ
दिन मे (चार प्रहर मे) जीणं होती हे, उदन्न नहीं होने देती (या जिखके पीने से उत्पन्न ग्छानि आदि
स्वयं न्ट हो जाती है) स्नेह की मात्रा स्नेदन में उत्तम् ६। किसी मी प्रकार का विकारन किय स्नेह की जो मतरा चीन षष्टे मे (दिनरात) जीणं होती दै, बह मात्रा कुष्ठ; उन्मा” विष, ग्रह, अपस्मार को नष्ट करती ई ।
गानि, मूच्छ मद क
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