भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ३४ ]

चिकित्सास्थानम्

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छोतों में परिकर्तन-खरोश पड़ जाते हैं। उसी के रोपणार्थ पिच्छा बस्ति का विधान है। यदि बस्ति की व्यवस्था न हो तो विलगिरी, ईसबगोल आदि पिच्छल द्रव्य खिला देवे। १६।

क्रूरकोष्ठ्यातिप्रभूतदोषस्य भृद्वौषधमवचारितं समुत्पिच्छये दोषात्र निःशेषानपहरति, ततस्ते दोषाः परिस्रावमापादयन्ति, तत्र दौर्बल्योदरविष्टम्भारुचिगात्रसदनाति भवन्ति, सवेदनौ चास्य पित्तरुलेष्माणौ परिस्रवतः, तं परिस्रावमित्याचक्षते, तमजकर्णधवतिनिशपलाशबलाकर्णायैमधुसंयुक्तीरुत्थापयेत्, उपशान्तदोषं स्निग्धं च भूयः संशोधयेत्। ११७।

क्रूरकोष्ठ्यक्ति को या अतिशय प्रचुर दोषवाले को दी हुई मृदु औषध दोषों को उत्कलेशित करके सम्पूर्ण रूप में बाहर नहीं निकालती। इससे वे दोष परिस्राव उत्पन्न करते हैं। इससे दुर्बलता, पेट में गड़गड़ाहट, अरुचि, अंगों में शिथिलता होती है। वेदना के साथ पित्त और कफ बहते हैं। इसको परिस्राव कहते हैं। इसमें अजकर्ण (साल), धावड़ी, सांदन, ढाक, बला, इनके क्वाथ में मधु मिलाकर आस्थापन बस्ति देवे। दोष के शान्त होने पर स्नेहन देकर फिर से संशोधन देवे।

वि० मन्तव्य—यह परिस्राव नामक व्यापद है। इसमें पुरीष रहित केवल पित्त एवं कफ का स्त्राव बार २ होता रहता है।

अतिरुक्षोऽतिस्निग्धे वा भेषजमवचारितमप्राप्तं वातवर्च उदरीयति वेगाघातेन वा, तदा प्रवाहिका भवति, तत्र सवार्तं सदाहं सशूलं गुरु पिच्छिन्नं श्वेतं कृष्णं सरक्तं वा भृशं प्रवाहमाणः कफमुपविजति, तां परिस्रावविधानेनोपचरेत्। ११८।

अतिरुक्ष या अतिस्निग्ध पुरुष में बरती हुई औषध अनुपस्थित वायु और मल को प्रेरित करके अथवा मल को रोककर प्रवाहिका उत्पन्न करती है। इसमें वायु के साथ, दाह, शूल के साथ भारी, चिकना, श्वेत, काला, रक्त मिश्रित अथवा मात्रा में बहुत कफ प्रवाहण करने पर आता है। इसकी चिकित्सा परिस्राव विधि से करे।

वक्तव्य—“भेषजेनावचारितेनासथोर्वा वातवर्चसोऽदीरणेन वेगाघातेन वा प्रवाहिका भवति।” यह पाठ रचिकर है।

वि० मन्तव्य—यह प्रवाहिका नामक व्यापद है। इसमें प्रवाहिका के सब लक्षण होते हैं देखिये उ० त० अ० ४० का श्लो० १३२ १३६ तथा इसके आगे उसकी चिकित्सा-प्रवाहण अर्थात् कौलना-मल-प्रवृत्ति के लिये प्रयत्न करना-बल लगाना।

यस्तृध्वंसधो वा भेषजवेगं प्रवृत्तमक्षत्वाद्विनिहितं तस्योपसरणं हृदि कुर्वन्ति दोषाः, तत्र प्रधानमसंसन्तापाद्देदनाभिरत्यर्थं पीड्यमानो दन्तान् किटकिटायते, उद्द-

ताक्षो जिह्वां खादति, प्रताम्यत्यचेताश्च भवति, तं परिवर्जयन्ति मूर्खाः, तमभक्ष्य धान्यस्वेदेन स्वेदयेत्, यष्टिमधु-कसिद्धेन च तैलेनानुवासयेत्, शिरोविरेचनं चास्मै तीक्ष्णं विदध्यात्, ततो यष्टिमधुकसिद्धेन तण्डुलास्तुना छदेयेत्, यथादोषोच्छ्रुण्येण चैनं बस्तिभिरुपाचरेत्। ११९।

जो व्यक्ति ऊपर या नीचे की ओर प्रवृत्त औषध के वेग को मूर्खता से रोक देता है, उसमें दोष हृदय की ओर जाते हैं। इसमें हृदय के सन्ताप से वेदना के कारण अतिशय दुःखी होता हुआ दांतों को दबाता है, आँखें बाहर आ जाती हैं, जीभ काटता है, मूर्खा आती है, वेभान हो जाता है। मूर्ख लोग इसकी चिकित्सा नहीं करते। इस पर धी का अम्यग करके उद्भव आदि धान्यों से स्वेद देवे। मुलेहटी से सिद्ध तैल का अनुवासन देवे। इसको तीक्ष्ण शिरोविरेचन देवे, चाबलों के पानी में मुलेहटी का कल्क मिलाकर वमन कराये। दोष की अधिकता के अनुसार बस्ति से इसकी चिकित्सा करे।

वि० मन्तव्य—यह हृदयोपसरण नामक व्यापद है। मूर्ख (जो इस व्यापद का ज्ञाता नहीं है) चिकित्सक इस व्यापद के उत्क भोषण लक्षणों को देखकर घबरा जाते हैं—असाध्य मानकर चिकित्सा से वित्त हो जाते हैं परन्तु बुद्धिमान् चिकित्सक इस दशा को वमनविरेचन की व्यापद मात्र समझ कर उत्क उपचार करे। न गच्छेत्विभ्रमं तत्र च० सि० अ० ६।

यस्तृध्वंसधो वा प्रवृत्तदोषः शीतागारमुदकमन्विलमन्यद्वा सेवेत्, तस्य दोषाः क्षोतःस्ववलीयमाना घनीभा-वमापन्ना वातमूत्रशकूद्ब्रह्ममापाद्य विबध्यन्ते, तस्याटोपो दाहोऽवरो वेदनाश्च तीव्रा भवन्ति, तमाशु वामयित्वा प्राप्तकालां क्रियां कुर्वन्ति, अधोभागे स्वधोभागदोषहरद्रव्यं सेन्धवास्त्वमूत्रसंसूष्टं विरेचनाय पाययेत्, आस्थापनमनु-वासनं च यथादोषं विदध्यात्, यथादोषमाहारक्रमं च, उभयतोभागे तूषद्रवविशेषान् यथास्वं प्रतिकुर्वन्ति। १२०।

जिस पुरुष के दोष ऊपर या नीचे प्रवृत्त हुए हैं, वह मनुष्य जब शीतल घर, शीतल पानी या वायु का अथवा अन्य शीतल आहार-विहार का सेवन करता है, उसके दोष छोतों में विलीन होते हुए टोसरूप बनकर वायु-भूत्र, मल को रोककर स्वयं रुक जाते हैं। इससे पेट का चढ़ना, दाह, ज्वर, तीव्र वेदना होती है। इसको तुरन्त वमन कराके जो ठीक समझे वह चिकित्सा करे। विरेचन की अवस्था में—अधोभागहार (विरेचन) द्रव्यों को सेन्धव, कांजी, मूत्र में मिलाकर विरेचन के लिये देवे। दोष के अनुसार आस्थापन और अनुवासन देवे। दोष के अनुसार ही आहार विधि बरते। वमन विरेचन दोनों की अवस्था में दोषों के अपने अनुसार उपद्रवों की चिकित्सा करे। (शूष्क कफ में, वृष-पित्त में, मांस रस-वायु में देवे)।