सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३५ ]
वि० मन्तव्य—यह विबन्ध नामक व्यापद है। इसके आगे “अङ्ग प्रग्रह” नामक व्यापद का वर्णन होना चाहिये किसी भी प्रति में वह खोजने पर भी उपलब्ध नहीं हुआ और श्रीहाराण-चन्द्रजी ने तो सू० ३ में गिनी गई व्यापदों में से अंगप्रग्रह नामक व्यापद को निकाल ही दिया है। स्यात् इन उपलब्ध प्रतियों में उसके वर्णन को न पाकर आप ने ऐसा साहस कर डाला है और श्रीयादव शर्मा ने भी “अङ्गप्रग्रहः” इत्यर्थ न पठति हाराणचन्द्रः। टिप्पणी लिख डाली है परन्तु हमारा दृढ़ विश्वास है कि अंगप्रग्रह नामक व्यापद का वर्णनात्मक सूत्र (पाठ) नष्ट हो गया है, रहा अवश्य होगा क्योंकि च० सि० अ० ६ में गात्रग्रह नामक व्यापद का वर्णन पाया जाता है—
आध्मानं परिकर्तिश्च खावो हृद्गात्रयोर्ग्रहः। जीवादानं सविभ्रंशः स्तम्भः सोपद्रवः कलमः ॥२६॥ अयोगात् अतियोगात् च दश एता व्यापदः स्मृताः। प्रेष्य (परिवारक) मेष्वव्यवैधानां वैगुण्यात् आतुरस्थ च ॥ और विवरण में—गात्र-अङ्ग-ग्रह-प्रग्रह नामक व्यापद का वर्णन है—
पीतोपधस्य वेगानां निप्रहेण कफेन वा। रुद्वोऽति वाऽविशुद्धस्य गृह्णाति अङ्गानि मारुतः ॥७६॥ स्तम्भवेपथु निस्तोद सादो द्रेष्टु मन्थनैः। तत्र वातहरं सर्वं स्नेहस्वेदादि कारयेत् ॥७७॥
और सु० चि० अ० ३६ के श्लो० ४४-४५ में अंगग्रह नामक व्यापद का लक्षण एवं चिकित्सा लिखी गई है। इन सब कारणों से उक्त व्यापद को व्यापदों की श्रेणि से निकाल देना उचित नहीं है ॥२०॥
या तु विरेचने गुदपरिकर्तिका तद्भ्रमने कण्ठक्षणनं, यदधः परिस्रवणं स ऊर्ध्वभागो श्लेष्मप्रसेकः, या स्वधः प्रवाहिका सा तूर्ध्वं शुष्कोद्गारा इति ॥२१॥
विरेचन में जो गुदपरिकर्तिका है, वही वमन में गले का कुरकुराना (क्षत-खरोश होना) है। विरेचन में जो परिस्राव है, वमन में वही कफ प्रसेक है। विरेचन में जो प्रवाहिका है, वमन में वही शुष्क उद्गार है ॥२१॥
भवति चात्र— यास्त्वेता व्यापदः प्रोक्ता दश पञ्च च तत्त्वतः। एता विरेकातियोगदुर्योगायोगजाः स्मृताः ॥२२॥ कहा भी है—
परमार्थ रूप से जो ये पन्द्रह व्यापदार्थ कही हैं, ये विरेक के अतियोग, मिथ्यायोग एवं अयोग के कारण उत्पन्न होती हैं। वक्तव्य—विरेचन शब्द वमन और रेचन दोनों के लिये है। यथा—तत्र दोषहरणमूर्ध्वभागं वमनसंज्ञकमघोभागं विरेचनसंज्ञ-
कम्। उभयं वा शरीरमलविरेचनाद् विरेचनशब्दं लभते ॥ च० (२) आध्मानं परिकर्तिश्च खावो हृद्गात्रयोर्ग्रहः। जीवादानं सविभ्रंशः स्तम्भः सोपद्रवः कलमः। अयोगादतियोगाच्च दशेता व्यापदो मताः। प्रेष्यमेष्वव्यवैधानां वैगुण्यादातुरस्थ च। शुद्धो-त्किलघेन दुर्गन्धमहृद्यमतिबाध्यते ॥
चरक० सि० अ० ६।२५-२६ ॥२१॥ इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने वमनविरेचनव्यापत्ति- कित्सितं नाम चतुस्त्रिशोऽध्यायः ॥३४॥
पञ्चत्रिंशत्तमोऽध्यायः
अथातो नेत्रवस्तिप्रमाणप्रविभाग- चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥ अथ इसके आगे नेत्रवस्ति प्रमाणप्रविभाग चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—नेत्र-नली जो एक ओर से बस्ति में बाँध दी जाती है और दूसरी ओर से गुद, भग एवं मूत्रमार्ग में प्रविष्ट की जाती है। बस्ति—चैली जो मृग भैंस आदि का मूत्राशय लेकर उपयोग में लाया जाता है अथवा गाड़े वस्त्र की शैली, आजकल तो रबड़ की भी बनाई जाती है, इसमें आषेध द्रव भरा जाता है। नेत्र एवं बस्ति के संयुक्त उपकरण का नाम भी बस्ति है और इसके द्वारा जो द्रव प्रयुक्त किया जाता है उसका नाम भी बस्ति है। इन सब संज्ञाओं को समझकर इस अध्याय का अध्ययन कीजिये! बस्ति को ‘पिचकारी’ कहते हैं। आजकल केवल कांच की पिचकारी भी बनाई जाती है। और पीतल आदि धातु की भी ॥१,२॥
तत्र स्नेहादीनां कर्मणां बस्तिकर्म प्रधानतममाहुर्वाचार्याः। कस्मात् ? अनेककर्मकरत्वाद्भ्रस्तेः; इह खलु बस्तिर्ना- नाविधद्भ्यसंयोगाद्दोषाणां संशोधनसंज्ञमनसंग्रहणानि क- रोति, क्षीणशुक्रं बाजीकरोति, कृशं वृंहयति, स्थूलं कर्ण- यति, चक्षुः प्रोणयति, वलीपलितमपहनति, वयः स्थापयति। शरीरोपचर्यं वर्णं बलमारोग्यमायुषः। कुरुते परिवृद्धिं च बस्तिः सम्यगुपासितः ॥४॥
स्नेहादि कर्मों में आचार्य बस्ति को सबसे मुख्य मानते हैं। क्योंकि—बस्ति अनेक कार्यों को सिद्ध करती है, बस्ति नाना प्रकार के द्रव्यों के संयोग के कारण दोषों का संशोधन, संशमन, संग्रहण करती है, क्षीण शुक्र को शुक्रवान् बनाती है, कृश को पुष्ट-मोटा बनाती है, मोटे को पतला करती है, आँखों को तेजस्वी