भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ३५ ]

चिकित्सास्थानम्

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करती है, बलि और पलित को मिटाती है, वय को स्थिर करती है। भलीप्रकार सेवन की हुई बस्ति शरीर की पुष्टि, वर्ण, बल, आरोग्यता और दीर्घायु को उत्पन्न करती है।

वक्तव्य—“तस्माच्चिकित्साधर्मिति वृन्वन्ति सर्वा चिकित्सा-मपि बस्तिमेके ॥ (२) बस्तिः वयःस्थापयिता सुखायुःबलाग्नि-मेधास्वरवर्णकृच्छ्र । चरक सि० अ० १ ॥४॥

तथा ज्वरातीसारतिमिरप्रतिशयशिरोरोगाधिमन्था-द्विंताक्षेपकपक्षाघातैकाङ्क्षसर्वाङ्गरोगधामानोदरयोनिशूलश-कंराशूलैर्द्वयुपदंशानाहमूत्रकृच्छ्रगुल्मवातजोणितवातमू-त्रपुरीषोदावतंशुक्रांतवस्तन्यनाशहृद्वदुमन्थाग्रहशर्करारम-रौमूहगर्भप्रभृतिषु चात्यर्थमुपयुज्यते ॥५॥

ज्वर, अतिसार, तिमिर, शिरोरोग, अधिमन्थ, अद्विंता, आक्षेपक, पक्षाघात, एकांगरोग, सर्वाङ्गरोग, आधमान, उदर, योनिशूल, शर्करा, शूल, बुद्धि, उपदंश, आनाह, मूत्रकृच्छ्र, गुल्म, वातरक्त, वात-मूत्र-मल-उदावत्तं, शुक्रनाश, आत्तव-नाश, स्तन्यनाश, हृद्वग्रह, मन्थाग्रह, हनुग्रह, शर्करा, अरुमरी, मूहगर्भ आदि रोगों में विशेषतः बस्ति बरती जाती है ॥५॥

भवति चात्र—

बस्तिर्वाते च पित्ते च कफे रक्ते च शस्यते ।

संसर्गं सन्निपाते च बस्तिरेव हितः सदा ॥६॥

कहा भी है—

वायु में, पित्त में, कफ में, रक्त में, दोषों के संसर्ग में और दोषों के सन्निपात में बस्ति ही उत्तम है ॥६॥

तत्र सांवरसरिकाष्टद्विरघ्ववर्षाणां षडष्टदुग्धाङ्गुष्ठप्रमा-णानि कनिष्ठिकानामिकामध्यमाङ्गुष्ठपरिणाहान्यप्रस्यधर्वा-ङ्गुष्ठद्वयङ्गुष्ठाधर्तुतीयाङ्गुष्ठसन्निष्ठिकर्णिकानि कङ्कश्येनब-हिणपक्षनाडीतुल्यप्रवेशानि मुद्गमाषकलायमात्रस्रोतांसि विदध्यान्नेत्राणि । तेषु आस्थापनद्रव्यप्रमाणमातुरहस्त-समितेन प्रस्तुतेन समितौ प्रस्तुतौ द्वौ चत्वारोष्टौ च विवेयाः ॥७॥

वर्षान्तरेषु नेत्राणां बस्तिमानस्य चैव हि ।

वयोबलशरीराणि समीह्योत्कर्षयेद्विधिम् ॥८॥

इसमें एक साल के बच्चे के लिये छे अंगुल, आठ साल के लिये आठ अंगुल, और सोलह साल के लिये दस अंगुल लम्बी होती चाहिये। इनकी मोटाई क्रमशः कनिष्ठिका, अना-मिका और मध्यमांगुलि के बराबर, आगे इनमें कर्णिका डेढ़ अंगुल, दो अंगुल, एवं साठे तीन अंगुल, दूरी पर बनानी चाहिये। इनका प्रवेशस्थल क्रमशः कंकपक्षी, श्येन और मोर के पंख की नाड़ी के समान बनाना चाहिये। इनका स्रोत क्रमशः, मूंग, उड़द और मटर के जाने योग्य रखना चाहिये। इसमें आस्थापन द्रव्य की मात्रा रोगी के अपने हाथ के माप से

दो अंजली, चार अंजली और आठ अंजली क्रमशः रखनी चाहिये। बीच के वर्षों में नेत्र और बस्ति का परिमाण रोगी के बल, वय और शरीर को देखकर उसके अनुसार बढ़ा लेना चाहिये।

वि० मन्तव्य—इस सूत्र में—नेत्र की लम्बाई और मोटाई का वर्णन है और नेत्र पर कर्णिका बनाई जाती है जिससे नेत्र गुद आदि में आवश्यकता से अधिक नहीं प्रविष्ट हो सकता। प्रवेशस्थल—नेत्र का प्रवेशस्थल वह है जो गुद आदि में प्रविष्ट किया जाता है यथा छ अंगुल का यदि नेत्र बनाया जाता है तो उसके अग्र से १३ अंगुल ऊपर कर्णिका बनाई जाती है और गुद में नेत्र का १३ अंगुल भाग ही प्रविष्ट किया जाता है यह १३ अंगुल भाग ही “प्रवेश” कहलाता है। इस प्रवेश की मोटाई कङ्क आदि पक्षियों के पंख की मूलनलिका के समान होनी चाहिये। और नेत्र का छिद्र मूंग आदि के जाने आने योग्य हो ॥७,८॥

पञ्चविंशतैरुर्ध्व द्वादशाङ्गुलं, मूलेऽङ्गुष्ठोदरपरीणाहम्, अग्रे कनिष्ठिकोदरपरीणाहम्, अग्रे ऽङ्गुष्ठसन्निष्ठि-कर्णिकं, गुप्त्रपक्षनाडीतुल्यप्रवेशं, कोलास्थिमात्रछिद्रं, किञ्चनकलायमात्रछिद्रमित्येके, सर्वाणि मूले बस्तिनिबन्ध-नार्थं द्विकर्णिकानि। आस्थापनद्रव्यप्रमाणं तु विहितं द्वादशप्रस्तुताः। समस्तैस्तूर्ध्वं नेत्रप्रमाणमेतदेव, द्रव्यप्रमाणं तु द्विरघ्ववर्षवत् ॥९॥

पञ्चीस वर्ष के ऊपर नलिका बारह अंगुल लम्बी, मूल में अंगूठे की मोटाई के बराबर, आगे में कनिष्ठिका अंगुली की मोटाई के बराबर, आगे में तीन अंगुल की दूरी बनी कर्णिका-बाली, गिध के पंख की नाड़ी के तुल्य जाने योग्य, बेर की गुठली के बराबर स्रोतबाली, अथवा गीला करके फुलाये मटर के प्रवेश योग्य स्रोतबाली होनी चाहिये। बस्ति को बाँधने के लिये सब नेत्रों के मूल में दो दर्पणकार्य (गांठ) होनी चाहिये। आस्थापन द्रव्य का परिमाण बारह प्रस्तुत (अंजली) रखना चाहिये। सत्तर साल से आगे नेत्र का प्रमाण यही रखना चाहिये, परन्तु द्रव्य की मात्रा सोलह वर्ष के समान है।

वि० मन्तव्य—इस सूत्र में २५ वर्ष से ऊपर की वयस्-बालों के लिये जो नेत्र बरता जाता है। उसकी लम्बाई आदि बतलाया गया है। नेत्र के मूल में दो अंगुल पर दो कर्णिका बस्ति-थेली को बाँधने के लिये बनाई जाती हैं इन पर बस्ति का मुख भाग बाँध दिया जाता है ॥९॥

मुदुर्बस्तिः प्रयोक्तव्यो विशेषाद्वालवृद्धयोः ।

तयोस्तौदणः प्रयुक्तस्तु बस्तिर्हिंस्याद् बलायुषो ॥१०॥

बालक और बृद्ध में विशेषकर मुदु बस्ति बरतनी चाहिये। इनमें दी हुई तीक्ष्ण बस्ति इनके बल और आयु को नष्ट कर देती है।