भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३१ ]

वि० मन्तव्य—यहाँ बस्ति शब्द आधेय द्वय के लिये आया है ॥१०॥

(व्रणनेत्रमष्टाङ्गुलं सुदुरवाहिस्त्रोतः, व्रणमवेक्ष्य यथारवं स्नेहकषाये विदधीत ॥११॥)

व्रण नेत्र की लम्बाई आठ अंगुल, स्त्रोत मूंग के जाने योग्य व्रण को देखकर दोषों के अनुसार स्नेहकषाय करते ॥११॥

तत्र नेत्राणि सुवर्णरजतताम्रायोरितदन्तशुद्धमणि-तरुसारमयानि श्लक्ष्णानि दृढानि गोपुच्छाकृतीन्यज्जूनि गुटिकामुखानि च ॥१२॥

नेत्र-सुवर्ण, चाँदी, ताम्र, लोह, पीतल, दाँत, सींग, मणि (कांच भी) वृक्ष की लकड़ी के बने, चिकने दृढ़ गाय की पूँछ के आकार के, (मूल में मोटे और आगे क्रमशः प्रतले हुए) सीधे और आगे गोल (गुटिकाकार) मुखवाले होने चाहिये। (आगे से तीखे नहीं) ॥१२॥

बस्तयश्च बन्ध्या मृदवो नातिबहला दृढाः प्रमाणवन्तो गोमहिषवराहाजोरभ्राणाम् ॥१३॥

नेत्रालाभे हिता नाडी नलवंशास्थिसंभवा।

बस्त्यलाभे हितं चर्मं सूक्ष्मं वा तान्तवं घनम् ॥१४॥

बस्तिर्वा—बाँधने योग्य, कोमल, बहुत मोटी नहीं, मजबूत, प्रमाणवाली (प्रमाण के अनुसार-बच्चों में बच्चों की, युवाओं में युवाओं की), गाय-मैंस, सुअर, बकरी, भेड़ के मूत्राशय की होती चाहिये।

नेत्र के न मिलने पुर नडसर, बांस अथवा अस्थि की नलिका से काम चलाना चाहिये। बस्ति के अभाव में पतला चर्म, या मजबूत वस्त्र बस्त लेना चाहिये।

चरक में—जारदगवो माहिषहारिणी वा स्याच्छौक्रो बस्ति-रजस्य वाऽपि। दृढस्तनुनर्धशिरो विगन्धः कषायरक्तः सुमृदुः सुशुद्धः ॥ (२) रस्तेरलाभे प्लवजो गलो वा स्यादङ्कृपादः सुघनः पटो वा ॥ चरक० सि० अ० ३-१०, ११ ॥ १३, १४॥

बस्तिं निरुपदिग्धं तु शुद्धं सुपरिमाजितम्।

मृदुनृदुतहीनं च मुदुः स्नेहविमर्दितम् ॥१५॥

नेत्रमूले प्रतिष्ठाप्य न्युक्जं तु विवृतान्तम्।

बद्ध्वा लोहेन तमेन चर्मं स्त्रोतसि निर्देहेत् ॥१६॥

परिवर्त्य ततो बस्तिं बद्ध्वा गुप्तं निधापयेत्।

आस्थापनं च तैलं च यथावत्तेन दापयेत् ॥१७॥

बस्ति—मांसादि से रहित, शुद्ध, भली प्रकार साफ की हुई, कोमल, न बड़ी और न कम, बार-बार स्नेह से मसली हुई लेकर नेत्र की जड़ में नीचे की ओर मुख रखकर-मुख को खुलाकर बाँधनी चाहिये। फिर गरम किये लोहे से चमड़े के छोड़ जला दे—फिर बस्ति को उल्टाकर, बाँधकर सुरक्षित

रख देवे। इस बस्ति से आस्थापनबस्ति और तैलबस्ति ठीक प्रकार से देवे ॥१५-१७॥

तत्र द्विविधो बस्तिः—नैरुहिकः, स्नेहिकश्च। आस्था-पनं, निरुह इत्यनर्थान्तरं; तस्य विकल्पो माधुतैलिकः; तस्य पर्यायगन्धो यापनी, युक्तस्थः, सिद्धबस्तिरिति। स दोषनिर्हरणच्छरीरनिरोगहणाद्वा निरुहः, वयःस्थापनादायुः स्थापनाद्वा आस्थापनम्। माधुतैलिकविधानं च निरुहोप-क्रमचिकित्सिते बद्ध्यामः। यथाप्रमाणगुणविहितः स्नेह-बस्तिविकल्पोऽनुवासनः पादाव (प) कृष्टः। अनुवासनपि न दुष्यत्यनुद्विसं वा दीयत इत्यनुवासनः तस्यापि विक-ल्पोऽर्धार्धमात्रावकृष्टोऽपरिहार्यां मात्राबस्तिरिति ॥१८॥

निरुहः गोधनो लेखी स्नेहिको बृंहणो मतः।

निरुहगोधितान्मार्गान् सम्यक् स्नेहोऽनुगच्छति ॥

अपेतसर्वदोषासु नाडीविवव वहञ्जलम् ॥१९॥

बस्ति दो प्रकार की है—नैरुहिक और स्नेहिक। आस्था-पन और निरुह ये नैरुहिक के पर्यायवाची हैं। इसी का भेद माधुतैलिक बस्ति है, इसके पर्याय यापना, युक्तस्थ और सिद्ध-बस्ति हैं। दोषों को निकालने से अथवा शरीर का रोहण करने से निरुह कहलाती है। वय को या आयु को स्थिर रखने से आस्थापन कहलाती है। माधुतैलिक विधि को निरुहचिकित्सा में कहेंगे। यथा प्रमाण कही हुई बस्ति के परिमाण में से चतु-र्थांश भाग निकालने पर स्नेहबस्ति का भेद अनुवासन होता है। शरीर के अन्दर रहने पर भी वृक्षित नहीं होती, या प्रति दिन दी जाती है, इसलिये अनुवासन कहते हैं। इसी अनु-वासन का भेद—आधे की भी आधी मात्रा लेने से—मात्रा बस्ति होती है, इसमें परिहार की आवश्यकता नहीं है।

वक्तव्य—यापना बस्ति—“आयुषो यापनं दीर्घकालानु-वर्त्तन कुर्वन्तीति यापनाबस्त्यः ॥” चन्द्रपाणी, युक्तस्थ-स्थ में घोंडे जुड़े होने पर तुरन्त जो बिना किसी पूर्व तैयारी के दी जा सकती है, जिन में किसी तरह का परहेज नहीं वह युक्तस्थ। बस्ति की मात्रा, “षट्कली मवेच्छेष्टा, मध्यमा त्रिफली भवेत्। कनीयस्यध्यर्षपला त्रिधा मात्राऽनुवासने। चौबीस पल में से चतुर्थांश छे पल लेने से अनुवासन की मात्रा है (स्नेह मात्रा है)। इसका भी आधा का आधा लेने से १३ पल मात्रा बस्ति है। गयी के विचार से छे पल स्नेह बस्ति, तीन पल अनुवासन बस्ति, और १३ पल मात्रा बस्ति है, ऐसा मानते हैं। चरक में—“निरुह पादांशसमे न तैलम्—” २४ पल निरुह से छे पल स्नेह चतुर्थांश होता है। यह उत्तम मात्रा है ॥१८-१९॥

सर्वदोषहरश्चासौ शरीरस्य च जीवनः।

तस्माद्विशुद्धदेहस्य स्नेहबस्तिर्विधीयते ॥२०॥

निरुह—शोधन द्रव्यों से बना होने के कारण लेखन करता है। स्नेहिक बस्ति बृंहण करती है।