भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ३५ ]

चिकित्सास्थानम्

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निरह से शोषित भागों में (धातुओं में) स्नेह भली प्रकार जाता है जिस प्रकार कि सब दोष रहित नालियों में बहता हुआ जल पहुँचता है। स्नेहवस्ति—सब दोषों को नाश करनेवाली, शरीर को जीवन देती है। इसलिये शुद्ध शरीर में स्नेहवस्ति दी जाती है॥

वि० मन्तव्य—निरुहणवस्ति उचित द्रव्यों के कषाय (कृथ), कोई क्षार तथा तैल मिलाकर दी जाती है अतः वह पुरीष को निकालती है फलतः मलाशय शुद्ध हो जाता है और उसके पश्चात् समय पर स्नेह वस्ति दी जाती है उससे शरीर का वृंहण (पुष्टि) होता है ॥२०॥

तत्रोन्मादभयशोकपिपासरोचकाजीर्णार्शःपाण्डुरोगभ्रममदमूर्च्छाच्छ्लिष्टकुष्ठमेहादरस्थौल्यश्वासकासकण्ठशोषजाः फोपसृष्टक्षतक्षीणचतुर्लिभासगभिणीदुर्बलाग्न्यसहा बाल वृद्धौ च वातरोगाहते क्षीणा नानुवास्या नास्थापयितव्याः॥

उन्माद, भय, शोक, प्यास, अरोचक, अजीर्ण, अर्श, पाण्डुरोग, भ्रम, मद, मूर्च्छा, वमन, कुष्ठ, मेह, उदर, स्थूलता, श्वास, कास, कण्ठशोष, शोक से पीड़ित, उरःक्षत, क्षीण, सात मास तक की गर्भवती, दुर्बलाग्नि, सहन न करनेवाला, बालक, वृद्ध, इनको तथा वायुरोग के बिना दूसरे कारण से कुछ हुए व्यक्तियों को न तो अनुवासन देना चाहिये और न आस्थापन देना चाहिये ॥२१॥

उदरी च प्रमेही च कुष्ठौ स्थूलश्च मानवः।

अवरुयं स्थापनीयास्ते नानुवास्याः कथञ्चन ॥२२॥

उदररोगी, प्रमेहरोगी, कुष्ठौ, स्थूल मनुष्य इनको अवस्था पड़ने पर जरूर आस्थापन देना चाहिये, परन्तु अनुवासन किसी भी हालत में नहीं देना चाहिये ॥

यथा उदररोग में—सुविरिक्तस्य यस्य स्यादाधमान पुनरेव तम्। सुस्निग्धैरम्ललवणः निरुहैः समुपाचरेत् ॥

वा० चि० अ० १५ ॥२२॥

असाध्यता विकाराणां स्यादेषामनुवासनात्।

असाध्यतेऽपि भूमिष्वं गात्राणां सदंनं भवेत् ॥२३॥

इनमें अनुवासन देने से रोग असाध्य हो जाते हैं। असाध्यवस्था में भी अंगों का टूटना विशेष रूप में होता है ॥

पक्वाशये तथा श्रोण्यां नाभ्यधस्ताच्च सर्वतः।

सस्यकप्रणिहितो वस्तिः स्थानेऽवेतेषु तिष्ठति ॥२४॥

पक्वाशयात् वस्तिवोयं खेदं हमनुसर्पति।

वृक्षमूले निषितानासपां वीर्यमिव द्रुमम् ॥२५॥

भली प्रकार दी हुई वस्ति पक्वाशय, श्रोणि और नाभि के नीचे चारों ओर इन स्थानों पर ठहरती है। पक्वाशय से वस्ति की शक्ति शरीर के भागों से सम्पूर्ण शरीर में फैल जाती है। जिस प्रकार वृक्ष की जड़ में दिये पानी की शक्ति से—वृक्ष के छोटों द्वारा सारे वृक्ष में फैल जाती है ॥

“मूले निषितो हि यथा द्रुमःस्याशीलच्छदः कोमलपल्लव-वाग्रः। काले महानुष्यफलप्रदश्च तथा नरः स्यादनुवासनेन ॥ चरक सि० अ० १ ॥१४,२५॥

स चापि सहसा वस्तिः केवलः समलोऽपि वा। प्रत्येति वीर्यं त्वनिलैरपानाद्यैर्विनायते ॥२६॥

कई बार यह वस्ति अकेली या मल के साथ अपान, उदान आदि की शक्ति से तुरन्त वापिस आ जाती है, अथवा, ऊपर को चली जाती है, सब शरीर में पहुँच जाती है ॥२६॥

वीर्येण वस्तिरादत्ते दोषानापामस्तकात् (न)।

पक्वाशयस्थोऽम्बरगो भूमेरुकां रसानिव ॥२७॥

स कटोपृष्ठकोष्ठमथान् वीर्येणलोड्य सचयान्।

उत्खानमूलान् हरति दोषाणां साधुयोजितः ॥२८॥

पक्वाशय में स्थित वस्ति अपनी शक्ति से सिर से लेकर पैर तक के सब दोषों को ग्रहण कर लेती है। जिस प्रकार आकाश में स्थित भूमि के रसों को खींच लेता है। भली प्रकार दी हुई यह वस्ति अपनी शक्ति से कटि-पीठ कोष्ठ में स्थित सचित दोषों को जड़ समेत उखाड़ देती है ॥२७,२८॥

दोषत्रयस्य यस्माच्च प्रकोपं वायुरीश्वरः।

तस्मात्तस्यातिवृद्धस्य शरीरमभिनिष्कृतः ॥२९॥

वायोर्विषहते वेगं नान्या वस्तेऋते क्रिया।

पवनाविद्धतोयस्य वेला वेगमिवोदयेः ॥३०॥

शरीरोपचर्य वर्णं वलमारोग्यमायुषः।

कुरुते परिवृद्धिं च वस्तिः सम्यगुपासितः ॥३१॥

वायु, पिच्छ, कफ इन तीनों दोषों को कुपित करने में शक्तिमान् वायु ही है। इसलिये बड़ी हुई वायु, जो वायु शरीर को हानि कर रही है, उसके वेग को वस्ति के बिना कोई भी क्रिया (चिकित्सा कर्म) सहन नहीं कर सकती है। जिस प्रकार वायु से ताड़ित समुद्र जल के (लहरों को) वेग को वेला ही सहन करती है। भली प्रकार सेवन की हुई वस्ति शरीर की पुष्टि, वर्ण, बल, आरोग्यता, आयु की वृद्धि को करती है ॥३१॥

वक्तव्य—शाखागताः कोष्ठगताश्च रोगा समोर्वसर्वावयवा-ङ्गजाश्च। ये सन्ति तेषां न हि कश्चिदन्यो वायोः परं जन्मनि हेतुरस्ति ॥ विष्णुमंत्रपितादिमलाशयानां विन्नेपसंधातकरः स यस्मात्। तस्यातिवृद्धस्य शमाम् नान्यत् वस्ति विना भेषजमस्ति किञ्चित् ॥

च० सि० अ० १-३८।

वि० मन्तव्य—तात्पर्य यह है कि वायु की शान्ति का सर्वश्रेष्ठ उपाय “वस्ति” है। कुपित वायु के वेग को वस्ति वैसे रोकती है जैसे समुद्र के ज्वार को वेला अर्थात् समुद्र का कूल-किनारा ॥३१॥

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